Krishna River Management Board (KRMB) is an autonomous body constituted by Central Government under the administrative control of MoJS, Dept. of WR, RD&GR, GoI.
Quiz Time (Answer)
Caption: C) State List
The Constitution of India lays down the legislative and functional jurisdiction of the Union, State and local Governments regarding 'Water'. Under the scheme of the Constitution, 'Water' is basically a State subject and the Union comes in only in the case of inter- state river waters.
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हीराकुड जलाशय ओडिशा में स्थित, देश के सबसे बड़े मिट्टी के बाँध से निर्मित एक बहुआयामी जलधरोहर है। वर्ष 1957 से लाखों लोगों के जीवन और आजीविका को संबल प्रदान करने वाला यह अप्रतिम जलाशय प्रतिवर्ष लगभग 480 मीट्रिक टन मत्स्य उत्पादन और 7,000 मछुआरा परिवारों की आजीविका का आधार है। इसके साथ ही यह 300 मेगावाट जलविद्युत उत्पादन, 4.36 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई तथा महानदी डेल्टा में बाढ़ नियंत्रण जैसी बहुमूल्य जल सेवाएं भी सुनिश्चित करता है।
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The Indian Delegation, led by Shri V.L.Kantha Rao, Secretary, DoWR, RD & GR, held a productive meeting with Mr. Jaap Slootmaker, Vice Minister DG Water and Soil, Ministry of Infrastructure and Water Management, Netherlands, on 16th July 2026 at The Hague, Netherlands.
The deliberations in the meeting focused on advancing India–Netherlands technical cooperation in the water sector, with an emphasis on the Kalpasar Project, strengthening collaboration through the Centre of Excellence at IIT Delhi, established with Dutch support, and exploring joint initiatives in sedimentation studies, sludge management, and other water management challenges.
During the meeting, the broader India–Netherlands water partnership was also covered, including the Strategic Water Partnership (SWP), Joint Working Group (JWG), Water as Leverage (WaL), and the Urban River Management Plan (URMP).
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करीब 7.62 वर्ग किमी में विस्तृत हाइगम आर्द्रभूमि संरक्षण रिज़र्व समुद्र तल से लगभग 1,580 मीटर की ऊँचाई पर झेलम नदी के बाढ़ मैदान में स्थित है। निकटवर्ती हाइगम गाँव के नाम पर स्थापित यह रामसर स्थल वर्षभर बहने वाली बल्लाकुल धारा से पोषित होता है, जो इसके दक्षिणी भाग से इसमें प्रवाहित होती है। वहीं, इसकी पश्चिमी सीमा पर निंगली नाला के साथ हंजीपोरा कुल और ट्राम्बगुंड कुल जैसी सहायक धाराएँ इसमें मिलकर इस आर्द्रभूमि की समृद्ध जल प्रणाली तथा पारिस्थितिक संतुलन को सुदृढ़ बनाती हैं।
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ओडिशा की प्राकृतिक धरोहरों में शुमार ताम्पारा झील राज्य की सबसे बड़ी मीठे पानी की झीलों में से एक है। निकटवर्ती चिल्का लैगून के साथ मिलकर यह अज्ञात झील प्रदेश की समृद्ध पारिस्थितिक विविधता का जीवंत परिचय कराती है। विशाल काजू के बागानों से घिरी यह जलराशि प्रकृति के अनछुए सौंदर्य को संजोए हुए है। इन बागानों के बीच से होकर गुजरने वाला लगभग 2 किमी लंबा मनमोहक ट्रेक रोमांच और प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा अनुभव कराते हुए अंततः पर्यटकों को बंगाल की खाड़ी के एक शांत एवं निर्मल समुद्र तट तक ले जाता है।
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मरारी बीच प्रकृति की गोद में सुकून तलाशने वालों के लिए एक आदर्श ठिकाने के रूप में लोकप्रिय है। मरारीकुलम मछुआरा गाँव के नाम पर आधारित यह समुद्री तट लहराते नारियल के वृक्षों, सुनहरी रेत और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है। यहाँ मछुआरा समुदाय की पारंपरिक संस्कृति की सहज झलक देखने को मिलती है। वहीं, समुद्र किनारे लंबी सैर और आयुर्वेदिक उपचार का अनुभव यात्रा को बेहद यादगार बना देता है। अलाप्पुझा बीच, लाइटहाउस, कुमारकोम पक्षी अभयारण्य और अंतर्राष्ट्रीय कॉयर संग्रहालय इसके निकट स्थित प्रमुख पर्यटक आकर्षण हैं।
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वर्ष 1976 में प्रख्यात प्रकृतिविद् एवं सरीसृप विशेषज्ञ रोमुलस व्हिटेकर और ज़ाई व्हिटेकर द्वारा स्थापित मद्रास क्रोकोडाइल बैंक ट्रस्ट एवं सेंटर फॉर हर्पेटोलॉजी, लुप्तप्राय मगरमच्छों और अन्य सरीसृपों के संरक्षण के लिए समर्पित भारत का अग्रणी केंद्र है। संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए यह संस्थान व्हिटली अवार्ड सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित हो चुका है तथा नेशनल ज्योग्राफिक और बीबीसी की चर्चित वृत्तचित्र श्रृंखलाओं में भी अपनी विशिष्ट पहचान बना चुका है।
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भारत के दूसरा सबसे ऊंचा झरना कहलाने वाले जोग झरने के समीप शरावती नदी पर वर्ष 1964 में निर्मित लिंगनमक्की बाँध देश की सबसे पुरानी एवं प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। लगभग 2.7 किमी लंबा यह सुविकसित बाँध शरावती जलविद्युत परियोजना के मुख्य जलाशय के रूप में कार्यरत है। साथ ही, इससे निर्मित करीब 100 वर्ग किमी में विस्तृत बैकवाटर, हरित वनों और छोटे-छोटे द्वीपों से सुसज्जित मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है।
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दुधवा राष्ट्रीय उद्यान उत्तर प्रदेश की तराई का अनुपम प्राकृतिक खजाना है, जहाँ घने साल वन, दलदली आर्द्रभूमियाँ और जलोढ़ मैदान अद्भुत जैव विविधता संजोए हुए हैं। जलधाराओं से जैव विविधता तक समृद्ध इस संरक्षित क्षेत्र को वर्ष 1977 में राष्ट्रीय उद्यान तथा 1988 में टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला। लगभग 490 वर्ग किमी में फैले इस उद्यान के साथ 190 वर्ग किमी का बफर क्षेत्र जुड़ा है, जबकि इसके प्रमुख संरक्षित परिक्षेत्रों—किशनपुर और कटरनियाघाट वन्यजीव अभयारण्यों—के साथ मिलकर यह उत्तर भारत के सबसे समृद्ध वन पारिस्थितिकी तंत्रों में गिना जाता है।
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बिहार की राजधानी पटना में पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित गांधी घाट आध्यात्मिक आस्था का केंद्र होने के साथ-साथ मकर संक्रांति पर आयोजित भव्य पतंग महोत्सव के लिए भी विशेष पहचान रखता है। महात्मा गांधी की स्मृतियों को संजोए यह निर्मल घाट शांत जलधारा, दिव्य गंगा आरती और आध्यात्मिक वातावरण के बीच प्रत्येक आगंतुक को आत्मिक सुकून का अनूठा अनुभव प्रदान करता है। वहीं, इसकी यात्रा आसपास स्थित सांस्कृतिक धरोहरों के दर्शन किए बिना पूर्ण नहीं मानी जाती।
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भोपाल की ऐतिहासिक पहचान को गौरव प्रदान करने वाला रानी कमलापति महल गोंड शासनकाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अनुपम प्रतीक है। यह भव्य महल भोपाल की ऊपरी और निचली झीलों के मध्य स्थित अपनी अद्वितीय अवस्थिति के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र है। लाखौरी ईंटों से निर्मित यह ऐतिहासिक जल स्मारक दो-मंज़िला स्थापत्य, उत्कृष्ट शिल्पकला और राजसी भव्यता का मनोहारी उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसके प्रांगण से दिखाई देने वाला झीलों का मनोरम दृश्य इसकी प्राकृतिक सुंदरता में एक अनोखा आयाम जोड़ देता है।
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ओर्सिनस ओर्का, जिसे सामान्यतः किलर व्हेल कहा जाता है, डॉल्फ़िन परिवार की सबसे विशाल और प्रभावशाली प्रजाति है। इसका मज़बूत, सुडौल शरीर, गोल सिर और बिना चोंच वाला चेहरा इसे अन्य डॉल्फ़िनों से अलग पहचान देता है। इसके विशाल, चप्पू जैसे पंख तथा ऊँची पृष्ठीय पंख इसकी सबसे आकर्षक विशेषताओं में शामिल हैं। भारतीय समुद्री जल में किलर व्हेल की उपस्थिति अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, आंध्र प्रदेश के तट, उत्तरी तमिलनाडु, पुडुचेरी तथा महाराष्ट्र से केरल तक फैले पश्चिमी तट पर दर्ज की गई है।
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"Catch the Rain" Pledge campaign: Rain is nature’s gift. Conserving it is our responsibility. Let's pledge to make every drop count. Sri.SUBHRANGSHU BISWAS(Chairman), Sri. Satish Kamboj (Member Secretary), Sri. K. K. Jangid, (Member),Sri. L.B.Muanthang, Member (P) & staff of KRMB
एलीफैंट फाल्स शिलांग की प्राकृतिक सुंदरता का अनुपम प्रतीक है। ब्रिटिश काल में समीप स्थित हाथी के आकार की एक विशाल चट्टान के कारण इसे एलीफैंट फाल्स नाम मिला, यद्यपि वह चट्टान बाद में आए भीषण भूकंप में नष्ट हो गई। इस दिलचस्प झरने का पहला स्तर घोड़े की पूँछ जैसी जलधारा का आभास कराता है, दूसरा स्तर अपनी शांत और सौम्य प्रवाहधारा से मन को सुकून देता है, जबकि तीसरा एवं सबसे ऊँचा झरना गर्जना के साथ चट्टानों पर गिरकर ऐसा अद्भुत दृश्य रचता है, जो आगंतुकों की स्मृतियों में लंबे समय तक अंकित रहता है।
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द्वारका बावड़ी, जिसे लोहरेहड़ी बावड़ी के नाम से भी जाना जाता है, दिल्ली की ऐतिहासिक जलधरोहरों में एक विशेष स्थान रखती है। 16वीं शताब्दी के प्रारंभ में लोदी वंश के सुल्तानों द्वारा लोहरेहड़ी गाँव के निवासियों की जल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इसका निर्माण कराया गया था। लोदीकालीन स्थापत्य कला की उत्कृष्ट मिसाल यह सीढ़ीदार बावड़ी सुदृढ़ पत्थर की चिनाई, सीढ़ियों पर उकेरे गए द्विस्तरीय मेहराबों तथा अंतिम छोर पर स्थित पारंपरिक कुएँ के कारण विशेष पहचान रखती है।
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गढ़मऊ झील झाँसी की ऐतिहासिक धरोहरों के बीच बसी एक ऐसी प्राकृतिक विरासत है, जहाँ इतिहास और प्रकृति मानो शांत भाव से एक साथ प्रवाहित होते प्रतीत होते हैं। करीब 14 वर्ग किमी में फैली यह रमणीय झील, प्रसिद्ध झाँसी किले से लगभग 12 किमी की दूरी पर स्थित है। प्रातःकाल जब उगते सूर्य की सुनहरी आभा इस अज्ञात झील की निर्मल जलराशि पर बिखरती है, तो लहरों पर झिलमिलाती किरणें एक गज़ब का मनोहारी दृश्य रचती हैं, मानो प्रकृति स्वयं स्वर्णिम कैनवास पर अपनी अनुपम कलाकृति उकेर रही हो।
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गुजरात के शांत समुद्री तटों में शामिल ओखा-मढ़ी बीच अपनी स्वच्छ रेत, नीले जल और मनमोहक प्राकृतिक दृश्यों के लिए काफी मशहूर है। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय यहाँ के दिलचस्प नज़ारे पर्यटकों को एक अविस्मरणीय अनुभव प्रदान करते हैं। पारदर्शी समुद्री जल स्नॉर्कलिंग जैसी रोमांचक जल क्रीड़ाओं के लिए अनुकूल है, जबकि दूर तक फैला निर्मल तट प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर चुंबक की तरह आकर्षित करता है। इस समुद्री तट की एक विशेष पहचान समुद्री कछुओं के संरक्षण से भी जुड़ी है, जो इसे पर्यावरणीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बनाती है।
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सोन घड़ियाल अभ्यारण्य घड़ियालों के संरक्षण और उनकी संख्या में वृद्धि के लिए देश के प्रमुख संरक्षण केंद्रों में से एक है। सोन नदी की निर्मल जलधारा पर विकसित यह अभ्यारण्य जलीय सरीसृप संरक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण है। वर्ष 1981 में अधिसूचित इस अभ्यारण्य का विस्तार सोन नदी के करीब 161 किमी, बनास नदी के लगभग 23 किमी तथा गोपद नदी के तकरीबन 26 किमी क्षेत्र सहित कुल 210 किमी तक फैला है, जो इसे मध्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण नदी-आधारित वन्यजीव संरक्षण क्षेत्रों में स्थान दिलाता है।
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संगारेड्डी से महज़ कुछ ही दूरी पर स्थित सिंगुर बाँध एक बहुउद्देशीय जल परियोजना है, जो जलविद्युत उत्पादन, सिंचाई तथा पेयजल आपूर्ति के क्षेत्र में एक मिसाल बनकर उभरा है। वर्ष 1989 में निर्मित इस सुविकसित बाँध का विशाल जलाशय आसपास के क्षेत्रों के लिए पेयजल का प्रमुख स्रोत भी माना जाता है। संक्षेप में, सिंगुर बाँध तेलंगाना की उन जलधरोहरों में से एक है, जो सामाजिक एवं आर्थिक विकास की सुनहरी सीढ़ी के रूप में मजबूती से खड़ा है।
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