Sc st एक्ट का कितना मिसयूज हुआ है वह तो जांच का विषय है। उसके लिए न्यायालय अपना कार्य कर रही है,परन्तु यह बताए उच्च शिक्षण संस्थाओं से इतने ज्यादा छात्र क्यों छोड़ रहे है। जबकि यूनिवर्सिटी,iit, IIM में पढ़ना अपने आप में गर्व का विषय है। वैसे भी इन संस्थाओं में आपको जातिवाद कहा दिखती है? वो तो आप करते है।
#StopMisuseOfSCSTAct
“दलितों को कुएँ से पानी नहीं मिलता था तो वे ज़िंदा कैसे रहे?”
वाह! जातिवाद को धोने के लिए क्या ग़ज़ब का तर्क खोजा है! दलित ज़िंदा बच गए, इसलिए छुआछूत भी झूठी मान लें?
सवाल पानी मिलने का नहीं, सार्वजनिक कुएँ-तालाब पर बराबर अधिकार का था। जाति के कारण दलितों को साझा जलस्रोतों से पानी लेने से रोका जाता था। 1927 का महाड़ सत्याग्रह इसी अधिकार के लिए हुआ। आंबेडकर को हजारों लोगों के साथ चवदार तालाब से पानी पीकर अधिकार जताना पड़ा।
और इतिहास से भी शिकायत हो तो Protection of Civil Rights Act, 1955 की धारा 4 पढ़ लीजिए - अस्पृश्यता के आधार पर कुएँ, तालाब, नदी, नल आदि के इस्तेमाल से रोकना दंडनीय बनाया गया।
दलित ज़िंदा कैसे रहे, यह नहीं; सवाल है - उन्हें बराबरी से जीने क्यों नहीं दिया गया?
भारत में जिन चीज़ों की पूजा होती है…
उनकी हालत सबसे खराब होती जा रही है।
महिलाओं को देवी मानते हैं,
लेकिन संविधान से पहले और अब भी उनकी असली हालत देख लो।
नदियों को माँ कहते हैं,
आज वही नदियाँ प्रदूषण से दम तोड़ रही हैं।
जंगलों की पूजा करते हैं,
पर उन्हें किस स्तर पर काटा जा रहा है, सब जानते हैं।
गाय को माता कहते हैं,
फिर भी सड़कों पर भूखी-प्यासी भटकती रहती है… कोई पूछने वाला तक नहीं।
पूजा सिर्फ फूल-माला चढ़ाने का नाम नहीं।
सम्मान और सुरक्षा भी तो चाहिए ना?
वे कहते हैं कि अंबेडकर ने सवर्णों के लिए क्या किया?
हज़ारों वर्षों से सवर्णों द्वारा एक समुदाय का शोषण किया गया और उसे मुख्यधारा से अलग रखा गया। इसके बावजूद भी अंबेडकर ने SC, ST और OBC समुदाय को बदला लेने की शिक्षा नहीं दी। बल्कि उन्होंने समानता, बंधुत्व, न्याय, स्वतंत्रता और तार्किकता की विचारधारा पर चलने की शिक्षा दी।
यदि बदला लेने की बात होती, तो नक्सलवाद की तरह यह आक्रोश किसी सीमित क्षेत्र तक ही रहता। लेकिन SC, ST और OBC हर गली, मुहल्ले और चौराहे पर मौजूद हैं। कभी न कभी उनकी भावनाओं का आक्रोश बाहर निकलता, तो सवर्ण समाज की मुश्किलें बढ़ने लगतीं।
हर रोज अखबारों के पन्नों में कही छोटा सा कोना लिए एक संस्थागत मर्डर की सूचना मिलती है।यह दूसरी घटना है iit Delhi की, लेकिन यह घटना होती क्यों है, तो पता चलना है जातिवाद, अकादमिक दवाब , भेदभाव, लींग आधारित असमानता इत्यादि। ऐसे में सभी विश्विद्यालय या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त संस्था में rohith एक्ट लागू करने की जरूरत है।
इनके कुकर्मो का ब्याज इतना अधिक है कि कितना भी प्रदर्शन कर ले आरक्षण का बाल भी बांका नहीं कर पाएंगे.
ये लोग सिफारिश से प्राइवेट सेक्टर में जो मलाई खा रहे है वहां भी जल्द ही आरक्षण लागु होगा.
@drone_acharyaa Speaking in terms of "our UP," "our Bihar," or "our Tamil Nadu" reflects a narrow mindset. I believe we must be wary of the populist 'freebies' offered by political parties during elections.