जिला अयोध्या के थाना पूराकलंदर क्षेत्र के कन्दैला गांव में पुराने जमीन विवाद को लेकर सामंतियों ने कल शाम को पहले तो बम मारा और जब नीचे गिर गए तो राम लगन मौर्य पर फायरिंग कर दी, जिन्हें अस्पताल ले जाने पर चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया।
घटना में मृतक भाई राम लगन मौर्य की वृद्ध मां गंभीर रूप से घायल हैं, परिजनों के अनुसार, पुरानी रंजिश के चलते हमला किया गया है।
मुख्यमंत्री @myogiadityanath जी,घटना के बाद से अभी तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी न होना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
@UPGovt मामले की त्वरित जांच कर दोषियों के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करे। पीड़ित परिवार को न्याय मिलना चाहिए। साथ ही, घायल वृद्ध मां को बेहतर से बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराते हुए उनके समुचित इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
घटना अत्यंत पीड़ादायक व दण्डनीय है। हमारी गहरी संवेदनाएँ मृतक राम लगन मौर्य जी के शोकाकुल परिवार के साथ हैं। प्रकृति परिजनों को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे। साथ ही, हम घायल मां के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हैं।
वंचितों की हिस्सेदारी के विरोधियों का दोहरा चरित्र देश के सामने है। पहले ‘आरक्षण हटाओ’ और अब ‘आरक्षण में सुधार’ की मांग करने वालों से तत्काल “सौहार्दपूर्ण वार्ता” लेकिन अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाले छात्रों पर लाठीचार्ज, आख़िर ये कैसा सौहार्द है, नड्डा जी?
एक तरफ वार्ता की तस्वीरें, दूसरी तरफ छात्रों पर लाठियाँ, यह दोहरा चरित्र अब किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होगा।
24 सितंबर 1982 को मान्यवर कांशीराम साहब ने पूना पैक्ट के 50 साल पूरे होने पर पूरे देश में “धिक्कार दिवस” मनाया था। यह कोई साधारण विरोध नहीं था, बल्कि एक अकाट्य राजनीतिक और सामाजिक समझ का नायाब उदाहरण था।
परम पूज्य बाबा साहेब ने जिस पूना पैक्ट पर बड़े दुखी मन से हस्ताक्षर किए थे, आज उसी पूना पैक्ट का दुष्परिणाम “Depressed Classes (वंचित वर्ग)” के सामने है। यही कारण है कि जब केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा जी आरक्षण विरोधियों से मुलाकात करते हैं, तो बहुजन समाज के सामने कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
किसान आंदोलन पर जिस सरकार ने 13 महीने बाद सुध ली, पेपर लीक के जनव्यापी आंदोलन के आंदोलनकारियों से नड्डा जी एक महीने बाद मिलने का समय निकाल पाए, लेकिन जैसे ही जातीय वर्चस्व बनाए रखने की जिद लिए कुछ मुट्ठीभर लोग भाजपा-RSS के दिल में छुपे एजेंडे को लेकर इकट्ठा होते हैं, तो तुरंत “सौहार्दपूर्ण वार्ता” होने लगती है।
सरकार को जवाब देना होगा कि ऐसे लोगों से आखिर क्या बात हुई और आरक्षण को लेकर सरकार का रुख क्या है?
आरक्षण कोई राजनीतिक खैरात नहीं, बल्कि सामाजिक गैर-बराबरी के रहते संविधान द्वारा सुनिश्चित प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की व्यवस्था है। जब तक भेदभाव और गैर-बराबरी कायम है, तब तक आरक्षण भी कायम रहेगा।
मुट्ठीभर जातंकवादियों की आड़ में वंचितों की संवैधानिक हिस्सेदारी को कमजोर करने की साजिश कर रहे सरकार के पिट्ठुओं, कान खोलकर सुन लो! भीम आर्मी-आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) 24 सितंबर, पूना पैक्ट दिवस पर दिल्ली में एक बड़ा जनांदोलन करके संविधान की ताकत का एहसास कराएगी।
जय भीम! जय भारत! जय मंडल!
जय संविधान! जय आरक्षण!
माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह आदेश स्वागत योग्य है। हाथरस की पीड़िता बहिन मनीषा बाल्मीकि की मृत्यु के 6 साल बाद भी उनके परिवार को न्याय, सुरक्षित आवास और रोजगार के लिए संघर्ष करना पड़े, यह मुख्यमंत्री @myogiadityanath जी की सरकार की संवेदनहीनता और प्रशासनिक विफलता का गंभीर उदाहरण है।
न केवल हाथरस की दलित पीड़िता के न्याय का मुद्दा, बल्कि उनके परिवार की सुरक्षा, सम्मान और पुनर्वास का सवाल भी कई बार उठाया गया। इसके बावजूद सरकार ने परिवार की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया।
जब पीड़ित परिवार अपनी सुरक्षा को लेकर स्पष्ट रूप से खतरा बता रहा था, तब भी सरकार का अलीगढ़, कासगंज या एटा में घर देने पर अड़ना बेहद चिंताजनक था। पीड़ित परिवार की सुरक्षा सरकार की कृपा नहीं, उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।
माननीय उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप बताता है कि जब सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल होती है, तब न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है। अब सरकार को बहानेबाजी छोड़कर हाईकोर्ट के आदेश को तत्काल, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से लागू करना चाहिए।
छह साल, शर्मनाक!
पत्रकार सौरभ द्विवेदी ने एक बयान में कहा कि वो अपना नाम बदलने में तो लेट हो गये लेकिन उन्होंने अपने बच्चों के नाम ऐसे रखे हैं जिसमें कोई जातीय शब्द न हो👇🏻
फिर क्या, जातिवादियों ने अपने ही समाज के सौरभ द्विवेदी को उल्टा-सीधा बोलना शुरू कर दिया और उनकी पोस्ट पर उन्हें जमकर अपशब्द कहे
सोचने का विषय है कि सौरभ द्विवेदी ने ऐसा क्या बोल दिया जो ये लोग उन्हें टार्गेट कर रहे हैं? ऐसे जातिवादी लोगों की वजह से सौरभ द्विवेदी जैसे सवर्ण समाज के एक पढ़े-लिखे व समझदार लोगों को भी कभी-कभी अपमान का शिकार होना पड़ता है
इन जातिवादियों को आरक्षण भी खत्म करना है और अपनी जात का घमंड भी बरकरार रखना है...!!
ब्रिटिशकालीन भारत में अंग्रेजों ने जमींदारी जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से शासन किया और पहले से सामाजिक एवं राजनीतिक प्रभुत्व रखने वाले वर्गों को अपने शासन में सहयोगी बनाया। इसके परिणामस्वरूप धन, धरती और राजपाट पर कुछ विशेष वर्गों का वर्चस्व और मजबूत हुआ। 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन आजादी के बाद भी धन, धरती और सत्ता-संसाधनों पर समाज के एक बड़े वर्ग का वर्चस्व बना रहा और भूमि तथा संसाधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हो सका।
इसी असमानता को कम करने के उद्देश्य से स्वतंत्र भारत में भूमि सुधार लागू किए गए। लेकिन प्रभावी क्रियान्वयन की कमी, कानूनी एवं प्रशासनिक अड़चनों और प्रभावशाली भू-स्वामी वर्गों के प्रतिरोध के कारण भूमि सुधार अपने व्यापक उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सके। भूमि और संसाधनों की असमानता से पैदा हुआ असंतोष आगे चलकर कई उग्र सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि बना, जिनमें नक्सल आंदोलन भी शामिल था।
ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक अवसरों से वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को संविधान लागू होने के साथ ही आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान मिला। वहीं, अन्य पिछड़ा वर्ग को केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1990 के दशक में लागू हुआ।
आरक्षण का संवैधानिक आधार मुख्यतः सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन तथा पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अभाव है। इसके बावजूद आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आर्थिक आधार पर EWS आरक्षण की व्यवस्था की गई। ऐसे में आज आवश्यकता है कि आरक्षण और प्रतिनिधित्व की पूरी व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का आंकड़ों के आधार पर मूल्यांकन किया जाए।
हम लंबे समय से सामाजिक-आर्थिक एवं जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि देश की धन-संपत्ति, जमीन, शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, राजनीति, मीडिया और अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में विभिन्न सामाजिक समूहों की कितनी हिस्सेदारी है। जब तक विश्वसनीय और व्यापक आंकड़े सामने नहीं आएंगे, तब तक सामाजिक न्याय और समान हिस्सेदारी की वास्तविक तस्वीर पूरी तरह सामने नहीं आ सकती।
हमारी मांग है कि जिसकी जितनी संख्या है, उसकी उतनी भागीदारी सुनिश्चित की जाए। महिलाओं को उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थानीय निकायों, संसद और विधानमंडलों में प्रभावी प्रतिनिधित्व मिले। OBC समाज को लोकसभा और विधानसभाओं में उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले। SC, ST और OBC के लिए राज्यसभा तथा विधान परिषदों में भी उचित और प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।
उच्च न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व, पदोन्नति में आरक्षण, सरकारी योजनाओं और बजट में आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी, सरकारी ठेकों और सरकारी खरीद में आरक्षण तथा निजी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि सामाजिक न्याय केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित न रहे।
निजी क्षेत्र में हमारे समाज के लोग केवल मजदूरी करने के लिए नहीं हैं। उन्हें प्रबंधन, निर्णय लेने वाली संस्थाओं और नेतृत्व के पदों पर भी उचित हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। आर्थिक विकास में भागीदारी तभी सार्थक होगी, जब विकास के साथ निर्णय लेने की शक्ति में भी समान भागीदारी सुनिश्चित हो।
मीडिया लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए मीडिया संस्थानों में भी ऐतिहासिक रूप से वंचित समाजों की पर्याप्त भागीदारी और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि समाज के हर वर्ग की आवाज लोकतांत्रिक विमर्श में प्रभावी रूप से सामने आ सके।
यह लड़ाई किसी के अधिकार छीनने की नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समाजों को उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के अनुरूप न्यायपूर्ण हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई है। हमारा लक्ष्य है-- धन, धरती, सत्ता और देश के महत्वपूर्ण संस्थानों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी तथा वास्तविक सामाजिक न्याय।
लंबे समय से संविधान प्रदत्त हिस्सेदारी की व्यवस्था यानी आरक्षण के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है। अब इसी मुहिम को “आरक्षण में सुधार” जैसे शब्दों की आड़ में आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है।
कान खोलकर सुन लो—आरक्षण कोई खैरात नहीं है। यह सदियों से सामाजिक भेदभाव और वंचना झेलते समाज को संविधान द्वारा दिया गया प्रतिनिधित्व का अधिकार है।
भारत सरकार व लखनऊ दरबार में बैठे सत्ताधीशों, कान खोलकर सुन लो—आरक्षण व्यवस्था में किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। आरक्षण पर हमला यानी सामाजिक न्याय पर हमला है और सामाजिक न्याय से समझौता आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) किसी भी कीमत पर नहीं करेगी।
हम यह भी देख रहे हैं कि इस पूरे माहौल को बनाने में मीडिया की बड़ी भूमिका है। हमारे हितों के विपरीत विचार रखने वाले लोगों को बार-बार बुलाकर एकतरफा माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन याद रखिए—हमारे सब्र का इतना इम्तिहान मत लीजिए। अगर हमारी आवाज को लगातार दबाने और नजरअंदाज करने की कोशिश की गई, तो जनता लोकतांत्रिक तरीके से इसका जवाब देगी।
हम जानते हैं कि मेनस्ट्रीम मीडिया में हमारा पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, लेकिन हमारी आवाज को दबाया नहीं जा सकता। मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर निष्पक्षता, संतुलन और जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका निभानी होगी।
और आरक्षण का विरोध करने वालों को आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) खुली बहस के लिए आमंत्रित करती है।
अगर आपके पास आरक्षण के खिलाफ तर्क और तथ्य हैं, तो सामने आइए। बहस हो—तर्क से, तथ्यों से और संविधान के दायरे में।
जय भीम! जय भारत! जय मंडल!
जय संविधान! जय आरक्षण!
अब SC/ST के प्रतिभागियों का चयन बहुत कठिन होता जा रहा है।
आरक्षण का नाम ले लेकर घर परिवार रिश्तेदारों दोस्तों को झूठ बोलते हो ......
आज देख लिया आरक्षण वालों की नौकरी लगना कठिन है बिना आरक्षण वाले मौज कर रहे हैं।
GEN -75 अंक
SC - 75, ST - 71
OBC -67, EWS- 59
MBC- 48
फिर भी मैं EWS MBC OBC आरक्षण का समर्थन कर रहा हूं।
आरक्षण का विरोध करने वालों समझदार बनों, केवल कट ऑफ देखकर आरक्षण का विरोध मत करों।
आज SC/ST के स्टूडेंट्स बहुत ज्यादा विषम परिस्थितियों से निकलने के बाद भी जोरदार मेहनत कर रहे हैं फिर चयन हो रहा है।
देशभर से सरकारी स्कूलों की बदहाली, जर्जर भवनों, बुनियादी सुविधाओं की कमी और शिक्षा व्यवस्था की खामियों के वीडियो लगातार सामने आ रहे हैं।ऐसे समय में सबसे पहले भाजपा शासित राजस्थान सरकार का सरकारी स्कूलों में बिना अनुमति प्रवेश, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी पर रोक लगाने का यह तुगलकी फरमान बेहद चिंताजनक और सवाल खड़े करने वाला है।
सरकार ने इस आदेश के लिए “In Loco Parentis” (अभिभावक के समान दायित्व) और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत बच्चों की सुरक्षा, गरिमा, निजता एवं कल्याण का हवाला दिया है।
लेकिन सवाल है, बच्चों की सुरक्षा की याद तब क्यों नहीं आती, जब जर्जर और जानलेवा स्कूल भवनों के गिरने की खबरें सामने आती हैं? गरिमा की बात तब क्यों नहीं आती, जब बच्चों को ऐसा भोजन परोसा जाता है, जो मानवीय गरिमा के अनुकूल नहीं होता? और निजता की बात तब क्यों आती है, जब कई स्कूलों के शौचालयों में दरवाजे तक नहीं होते?
अगर सरकार वास्तव में बच्चों के कल्याण को लेकर गंभीर है, तो उन्हें सुरक्षित भवन, स्वच्छ शौचालय, पौष्टिक भोजन, पर्याप्त शिक्षक और सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराए।
और सबसे बड़ा सवाल, “In Loco Parentis” यानी अभिभावक के समान दायित्व निभाने वाली सरकार क्या अपने बच्चों को ऐसे जर्जर और बदहाल स्कूलों में पढ़ने भेजेगी?
“जवाबदेही से पलायन का तुगलकी फरमान!”
समस्त देशवासियों को भारत के 80वें #स्वतंत्रता_दिवस पर ढ़ेर सारी बधाई एवं शुभकामनाएं ❤️
साथ ही भारत माता के उन वीर सपूतों को भी नमन जिन्होंने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया!!
Jai Hind, Jai Bharat 🇮🇳🙏🏻
#IndepedenceDay#15August
माननीया वित्त मंत्री @nsitharaman जी, सादर जय भीम!
UPI को शुल्क-मुक्त रखकर सरकार ने वर्षों तक डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया और आज यह देश की महत्वपूर्ण डिजिटल जन-सुविधा बन चुका है। ऐसे में UPI भुगतानों पर शुल्क वसूलने संबंधी विधायी संशोधन पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
आपने कहा है कि शुल्क (MDR) का भुगतान दुकानदार करेगा, लेकिन क्या कारोबारी इस अतिरिक्त लागत को अपनी जेब से वहन करेंगे? छोटे दुकानदार कम मार्जिन पर काम करते हैं। लागत बढ़ेगी तो कीमत बढ़ाकर इसका बोझ ग्राहकों पर डाल सकते हैं।
माननीय वित्त मंत्री जी, जब आप बड़े-बड़े मॉल में जाती होंगी तो देखती होंगी कि ग्राहक चाहे कितने का भी सामान खरीदे, कैरी बैग के पैसे तक अलग से वसूले जाते हैं, जबकि उपभोक्ता आयोग ऐसे शुल्क को अनुचित व्यापार व्यवहार मान चुका है। तो फिर यह कैसे माना जाए कि UPI शुल्क का असर अंततः उपभोक्ता पर नहीं पड़ेगा?
और क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव में UPI को मुफ्त रखने की नीति बदली जा रही है? U.S. Trade Representative, 2026 की रिपोर्ट में भारत की UPI और RuPay को बढ़ावा देने वाली नीतियों पर आपत्ति जताई गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इन नीतियों ने विदेशी भुगतान सेवा प्रदाताओं के लिए प्रतिस्पर्धा को प्रभावित किया और वैश्विक कार्ड नेटवर्क के शुल्क-आधारित कारोबारी मॉडल को बाधित किया।
क्या भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था का फैसला भारतीय जनता के हित में होगा या विदेशी कार्ड कंपनियों के दबाव में?
UPI को जन-सुविधा रहने दीजिए।
UPI भुगतान को मुफ्त रहने दीजिए।
@mygovindia@FinMinIndia
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डांगावास जैसी गंभीर घटना पर OBC राजनीति के बड़े-बड़े चेहरों की चुप्पी सिर्फ खामोशी नहीं है, यह उस चयनात्मक सामाजिक न्याय का आईना है, जिसमें न्याय का पैमाना घटना की गंभीरता से नहीं, बल्कि आरोपी और पीड़ित की जातीय पहचान से तय होता दिखाई देता है।
जब जाति से राजनीतिक लाभ मिलता हो तो “सामाजिक न्याय” के नारे बुलंद होते हैं, प्रतीक गढ़े जाते हैं, “ठाकुर का कुआँ” याद आता है और इतिहास के पन्ने खोल दिए जाते हैं। लेकिन जब सवाल अपनी सुविधानुसार असहज हो जाए, तो वही सामाजिक न्याय अचानक मौन व्रत पर चला जाता है।
यह कैसी राजनीति है? क्या सामाजिक न्याय का अर्थ यह है कि अपनी जाति के खिलाफ अन्याय हो तो आंदोलन और दूसरी जाति के खिलाफ हो तो मौन?
क्या न्याय का सिद्धांत भी अब राजनीतिक सुविधा के हिसाब से आरक्षित हो गया है?
“ठाकुर का कुआँ” सिर्फ तब याद नहीं किया जा सकता जब उससे राजनीतिक भाषण में तालियां मिलें। अगर उस प्रतीक का इस्तेमाल जाति आधारित अन्याय के खिलाफ किया जाता है, तो फिर सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या अन्याय की पहचान आरोपी की जाति देखकर बदलेगी?
अपराधी की कोई जाति नहीं होती। उसका धर्म अपराध होता है।
और पीड़ित की जाति उसके दर्द की तीव्रता तय नहीं करती।
लेकिन हमारी राजनीति ने शायद न्याय का भी एक नया फॉर्मूला खोज लिया है आरोपी अपना हो तो ‘षड्यंत्र’, दूसरे का हो तो ‘सामाजिक अन्याय’; पीड़ित अपना हो तो ‘आंदोलन’, दूसरा हो तो ‘मौन’।
डांगावास के मामले में OBC नेताओं से किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष में खड़े होने की अपेक्षा नहीं थी। अपेक्षा इतनी भर थी कि वे न्याय की प्रक्रिया के पक्ष में खड़े होते। यदि निचली अदालत का फैसला गलत लगता है तो ऊपरी अदालत में मजबूती से अपील की मांग करते। निष्पक्ष सुनवाई की मांग करते। साक्ष्यों की स्वतंत्र समीक्षा की मांग करते। और सबसे महत्वपूर्ण यह कहते कि न दोषी बचे, न निर्दोष फंसे।
लेकिन शायद यह राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है कि न्याय की मांग करना आसान है, न्याय के सिद्धांत पर कायम रहना मुश्किल।
सच्चा सामाजिक न्याय तीन कारक पर टिका है
1. जिसके साथ अन्याय हुआ है, उसके साथ खड़े रहो।
2. जिसे गलत तरीके से फंसाया गया है, उसके लिए निष्पक्ष जांच मांगो।
3. और जो वास्तव में दोषी है, उसे उसकी पहचान नहीं, उसके अपराध के आधार पर सजा दिलाओ।
राजनीति यदि यह तय करने लगे कि किस अन्याय पर बोलना है और किस अन्याय पर चुप रहना है, तो फिर वह सामाजिक न्याय की राजनीति नहीं रह जाती; वह सिर्फ राजनीतिक चयनवाद बन जाती है।
और शायद डांगावास का सबसे बड़ा सवाल यही है
क्या सामाजिक न्याय सचमुच न्याय है, या फिर यह भी राजनीतिक मौसम देखकर बदलने वाला एक सुविधाजनक नारा भर है?
और इसी कसौटी पर डांगावास ने कई नेताओं की राजनीति को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है।
राजस्थान के डांगावास हत्याकांड के पीड़ित परिवार से मेरी बात हुई। 11 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद 5 अगस्त को आए फैसले से वे बेहद आहत हैं। उनकी एक ही पीड़ा है यदि सभी 40 आरोपी बरी हो गए, तो फिर उनके 5 परिजनों सहित कुल 6 लोगों की हत्या किसने की?
वर्ष 2015 में राजस्थान के नागौर जिले के डांगावास गांव में हुए इस जघन्य हत्याकांड में 5 दलितों सहित कुल 6 लोगों की नृशंस हत्या हुई, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। अब एससी-एसटी विशेष अदालत द्वारा सभी 40 आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी किए जाने से पीड़ित परिवार स्वयं को न्याय से वंचित महसूस कर रहा है।
यह केवल एक परिवार का मामला नहीं है। इस फैसले ने पूरे क्षेत्र, विशेषकर दलित समाज के लोगों के बीच असुरक्षा और न्याय व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। लोगों के मन में यह सवाल है कि यदि इतनी बड़ी घटना में भी दोषियों की जवाबदेही तय नहीं हो पाती, तो पीड़ितों को न्याय कैसे मिलेगा और कानून के प्रति विश्वास कैसे कायम रहेगा?
डांगावास का फैसला उन पुराने जख्मों को फिर ताज़ा कर गया है, जो लक्ष्मणपुर बाथे जैसे नरसंहारों ने दलित समाज को दिए थे। वर्ष 1997 में बिहार के लक्ष्मणपुर बाथे में 58 दलितों का नरसंहार किया गया था, जिसमें 27 महिलाएं और 16 मासूम बच्चे भी शामिल थे। वर्षों बाद उस मामले में भी सभी आरोपी बरी हो गए। आज देश जानना चाहता है कि यदि सभी आरोपी निर्दोष हैं, तो इन निर्दोष लोगों की हत्या आखिर किसने की?
परिवार ने बताया है कि वे इस फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती देंगे। हम न्यायपालिका का सम्मान करते हैं, लेकिन न्याय की इस लड़ाई में पीड़ित परिवार के साथ मजबूती से खड़े हैं। हमें विश्वास है कि राजस्थान हाईकोर्ट में मामले के सभी तथ्यों की निष्पक्ष समीक्षा होगी और पीड़ित परिवार को न्याय मिलेगा।
नागौर के डांगावास कांड में 11 वर्षों बाद आया अदालत का फैसला न्याय व्यवस्था और जांच प्रक्रिया पर कई गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है। 6 लोगों की निर्मम हत्या के इस मामले में सभी 40 आरोपियों का बरी हो जाना पीड़ित परिवारों के लिए गहरा आघात है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कोई भी दोषी नहीं है, तो आखिर उन निर्दोष लोगों की हत्या किसने की? इतने वर्षों की जांच, सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी यदि पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता, तो यह व्यवस्था पर भरोसा कमजोर करता है।
पीड़ित परिवारों की उम्मीदें अभी भी न्याय से जुड़ी हुई हैं। सरकार को इस मामले में गंभीरता दिखाते हुए उच्च न्यायालय में प्रभावी पैरवी करनी चाहिए, ताकि दोषियों की जवाबदेही तय हो और पीड़ित परिवारों को न्याय मिल सके।
सचिन पायलट चुप?
गोविंद सिंह डोटासरा चुप?
अर्जुन राम मेघवाल चुप?
प्रेम चंद बैरवा चुप?
हनुमान बेनीवाल चुप?
किरोड़ी लाल मीणा?
रविन्द्र सिंह भाटी चुप?
चन्द्र शेखर रावण चुप?
आखिर राजस्थान डांगावास नागौर में 5 दलित मेघवालों की हत्या में बरी हुए 40 जाट आरोपियों पर बोलेगा कौन?
लानत है ऐसी न्याय व्यवस्था पर!
राजस्थान: 2015 में जाटों ने अपना जातीय दंभ दिखाने के चलते से 6 मासूमों की बर्बर हत्या कर दी। कई घायल हुए।
सरकार व प्रशासन की मिलीभगत के चलते आज कोर्ट ने सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया गया। भयावह!
इस देश में दलितों के नरसंहार पर कोई न्याय नहीं है।
मैं SC समाज के व्यक्ति को राष्ट्रपति या लोकसभा स्पीकर नही, प्रधानमंत्री बनते हुए देखना चाहता हूँ.
1947 में भारत आजाद हुआ. 79 साल हो चुके हैं आजादी को, आज तक कोई SC या ST भारत का प्रधानमंत्री नही बना.
भारत में 31 राज्यों में CM हैं, लेकिन किसी भी राज्य में SC मुख्यमंत्री नही है.
SC ST समाज के नेताओं पर मीडिया दलित या आदिवासी नेता होने का ठप्पा लगा देता है. आप समय आ चुका है SC ST समाज का मीडिया होना चाहिए.
दलित आदिवासी सिनेमा, दलित आदिवासी समाज की कंपनी और दलित आदिवासी बैंक. बिना शिक्षा और पूंजी के कुछ भी हासिल नही किया जा सकता है.
SC ST समाज को नेताओं के भरोसे नही रहना चाहिए. SC ST समाज को खुद अपने दम पर खड़ा होना होगा. जिस दिन SC ST समाज भी समृद्ध हो गया, उस दिन भारत का प्रधानमंत्री दलित या आदिवासी को बनने से कोई नही रोक सकता.
दलित नेता दलितों का नेता और ब्राह्मण नेता पूरे समाज का नेता ?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह नैरेटिव सबसे ज्यादा बहुजन समाज को नुकसान पहुंचा रहा है.
चंद्रशेखर आजाद ने भी एक बड़ी लोकसभा सीट पर जीत दर्ज की, कुल 5,12,552 वोट प्राप्त किया.
आजाद समाज पार्टी के नेता हैं. UP के 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव सभी 400 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है.
लेकिन मीडिया ने चंद्रशेखर आजाद को उस तरह प्रोजेक्ट नही किया जैसे प्रशांत किशोर को कर रही है.
प्रशांत किशोर ने एक छोटी सी विधानसभा में 64,151 वोट पाकर जीत हासिल की है. मीडिया ऐसे गुणगान कर रहा मानो प्रशांत किशोर इस देश के बहुत बड़े नेता हैं. इस मानसिकता को जातिवाद कहा जाता है.