और वह पुरुष बेरोज़गार कैसे हो सकता है, जो धूप में मेहनत करके अपने परिवार के लिए पैसे कमाता है, उनके लिए दो वक़्त की रोटी लाता है?
👉बेरोज़गार महिला और पुरुष नहीं हैं,
बल्कि इस समाज की सोच बेरोज़गार है।👈
कि न पुरुष बेरोज़गार होता है और न ही महिलाएँ बेरोज़गार होती हैं।✍️....
यह तो समाज का नज़रिया है कि सरकारी नौकरी नहीं, तो इज़्ज़त नहीं।
वरना घर सँभालने वाली, खाना बनाने वाली और परिवार का ख़याल रखने वाली महिला बेरोज़गार कैसे हो सकती है?
@news24tvchannel सरकार न तो एग्जाम ढंग से करवा पा रही तो जॉव की उम्मीद तो छोड़ ही दो । जितना पैसा पढ़ाई करके नौकरी पाने मे खर्च करते है उतने मे अच्छा खासा विजनेस हो जाए।
@NavodayanAtul और जो लडकियाँ कहती हूँ ।
कि मुझे कैरियर वनाना है।
पैसा कमाना है
लाइफ मे आगे वढना है
उन्हें भी तो एहसास दिलाया गया होगा
कि लडकियो का पैसा कमाना क्यूँ जरूरी है
उनका आत्म निर्भर होना क्यूँ जरूरी है??
वरना लडकियाँ क्यूँ डबल वर्क ( घर + वाहर/ जॉव) करना चाहेगी!
एक लड़की है जिसकी शादी को छह साल हो चुके है और लड़की के ससुराल मे एक नियम है की घर की बहुओ को फोन नही दिया जाता क्योकि फोन से वहुए विगड जाती है। टोटल तीन वहुए है और शादी के वाद से ससुराल वालो ने एक को भी फोन नहीं दिलाया ।
क्या ये चीज सही है या गलत??
कितनी अजीब बात है कि शिक्षा के मंदिर — स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी — का माहौल धीरे-धीरे इतना खराब होता जा रहा है कि वहाँ पढ़ाई और करियर से ज्यादा सेक्स, ड्रग्स, स्मोकिंग, ड्रिंकिंग और दिखावे की संस्कृति बढ़ती दिखाई देती है। जिन जगहों का उद्देश्य युवाओं का भविष्य बनाना था,
कहीं-कहीं वही स्थान भविष्य को भटकाने का कारण बनते जा रहे हैं।
हालाँकि हर छात्र ऐसा नहीं होता, आज भी बहुत से युवा मेहनत और सपनों के लिए पढ़ रहे हैं, लेकिन गलत चीजों को “कूल” या “स्टेटस” समझने की सोच चिंता का विषय है। शिक्षा संस्थानों में अनुशासन, सही मार्गदर्शन, मानसिक स्वास्थ्य