सहारनपुर कलेक्ट्रेट में स्थित प्राचीन मस्जिद का ध्वस्तीकरण अत्यंत अफसोसजनक है। इस कार्रवाई ने एक बार फिर यह बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है कि अगर संविधान और कानून सभी के लिए समान हैं तो उनके लागू करने में दोहरा मापदंड क्यों दिखाई देता है? आज बुलडोजर न्याय की निशानी कम और बदले, भेदभाव और नफरत की राजनीति का हथियार बनता जा रहा है।
यह मामला केवल एक मस्जिद का नहीं, बल्कि संविधान की सर्वोच्चता, कानून के शासन, धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिक समानता और राज्य की निष्पक्ष भूमिका का सवाल है।
1991 का Places of Worship Act आज भी मौजूद है। इसी तरह नए वक्फ कानून में भी “वक्फ बाई यूजर” की धारा मौजूद है। यह मस्जिद वक्फ बोर्ड में दर्ज है जिसका नंबर 451 है। जबकि जमीन के पुराने रिकॉर्ड में याकूब खान और वहीद खान के से जमीन दर्ज हैं। मस्जिद कमेटी ने अदालत में 1911 से संबंधित दस्तावेज, नगरपालिका रिकॉर्ड और पुराने राजस्व अभिलेख प्रस्तुत करके यह पक्ष रखा था। ऐसे ऐतिहासिक और कानूनी साक्ष्यों को नजरअंदाज करके ध्वस्तीकरण की कार्रवाई न्याय की उसूलों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
अगर अवैध कब्जा या अतिक्रमण ही कार्रवाई का मापदंड है तो यही मापदंड हर धर्म और हर वर्ग के लिए समान होना चाहिए। देश के विभिन्न हिस्सों में सरकारी जमीनों, सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर दशकों से मौजूद दूसरी धार्मिक निर्माणों के खिलाफ भी क्या प्रशासन इसी जल्दबाजी, सख्ती और मापदंड से कार्रवाई करता है? अगर नहीं, तो किसी एक धार्मिक स्थल के खिलाफ असाधारण सख्ती समान न्याय के सिद्धांत के विपरीत महसूस होती है।
भारत किसी एक धर्म या वर्ग का नहीं, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और सभी धर्मों को मानने वालों का साझा वतन है। संविधान ने किसी को पहले और किसी को दूसरे दर्जे का नागरिक नहीं बनाया है।
हम किसी विशेष रियायत के इच्छुक नहीं हैं, केवल समान न्याय चाहते हैं। हमारा सवाल सीधा है: जो कानून मस्जिद के लिए है, वही हर धार्मिक स्थल के लिए क्यों नहीं? जो मापदंड मुसलमान के लिए है, वही दूसरे नागरिक के लिए क्यों नहीं? संविधान और कानून अगर सभी के लिए हैं तो उनका संरक्षण और लागू करना भी सभी के लिए समान होना चाहिए।
#ArshadMadani
#Jamiat_ulama_I_Hind
#SaharanpurMosque
#SaharanpurCollectorate
#SaharanpurDemolition
#PlacesOfWorshipAct1991
एक लड़के के फर्जी एनकाउंटर के खिलाफ एक वर्ग पूरी उग्रता के साथ देश भर में रोष जता रहा है। गुस्सा जायज भी है।
लेकिन जब निहत्थे दाढ़ी-टोपी वाले को उड़ा दिया जाता है तो यही वर्ग चुटिया पकड़-पकड़कर नाचता है और बाबा की जय-जयकार करता है।
हालात के हिसाब से पैमाना नहीं बदलना चाहिये
Are BSDK that's how a consumption-driven economy works
The goat seller,transporter,butcher, fodder supplier,leather industry & local market all earn from this
Also, BKL pays tax to the govt but wants Hospitals & Schools from Muslims during Eid
Paidaishi ch. hote hai ye Bhakt
@aneesazalansari@dvvnlhq@dvvnlKasganj@UPPCLLKO Jab bhi garmi thoda sa bhi badhti he electricity pehle band karte he ye. Jab pata he load badhega to pehle se preparation kyu nahi karte .
Sabse asan tarika bijli hi band kar do.
विदेशी दौरों पर विश्वगोरिल्ला खी खी खु खु करने वाला बूढ़ा जोकर लगता है, लेकिन जैसे ही चुनावी रैलियों का मौसम आता है, वही पुराना दंगाई रूप धारण कर लेता है। समाज की दरारों में से दरारें ढूंढकर आग भड़काने लगता है।
ना कुछ आगे, ना पीछे। लोग मरें तो मरें, बस कुर्सी बनी रहे।
~पनीर खाओ तो पनीर में दूध गायब,
~सॉस खाओ तो सॉस में टमाटर गायब,
~फ्रूट ज्यूस में फ्रूट गायब,
~हर मौसम ताजा आम में, आम गायब,
~टोमैटो कैचप में टोमैटो गायब,
~अगर शिकायत करो तो @fssaiindia
गायब!
#SudharJaoFSSAI
प्रिय अंधभक्तों
ईरान हम पर रहम खाकर हमारे जहाजों को आने दे रहा है, इसमें तुम्हारे चायवाले बाप का कोई योगदान नहीं है
😏अपने चुतियाप से इस मसले को ना बिगाड़ों, चुपचाप अपने हिस्से का सिलेंडर उठाओ और दो वक्त की रोटी खाओ!
दुनिया में शायद ही कोई सरकार होगी जो हर रोज अपने ही नागरिकों, सैनिकों और बुजुर्गों को इस तरह ज़लील करती होगी ......
जब भी आप यात्रा करने के लिए रेलवे का कोई टिकट खरीदते हैं तो टिकट पर लिखा हुआ आता है - IR recovers only 57% of cost of travel on an average.
इसका मतलब शुद्ध रूप से यह होता है कि (सालो, हरामखोरो), भारतीय रेल इस यात्रा के खर्चे की लागत का केवल 57 प्रतिशत ही वसूल कर पाता है।
सवाल यह है कि फिर यह बचा हुआ 43 % क्या वडनगर वाले मामा चुकाते हैं या रेल मंत्री जी के ससुराल से आता है? जाहिर है वह कमाई माल भाड़े से होती है? माल भाड़ा किससे वसूला जाता है, किसकी जेब से आता है? बताना ज़रा?
- क्या रेल मंत्री की रेल यात्रा के विशेष डिब्बे यानी सैलून पर लिखा है कि रेल मंत्री की इस यात्रा का 100 प्रतिशत खर्च भारत की जनता वहन करती है?
- क्या 8500 करोड़ के उस विशेष हवाई जहाज पर लिखा है कि इस विमान का 100 प्रतिशत खर्च भारत की जनता वहन करती है?
- इसी हिसाब से क्या मंत्रियों के बंगलों की दीवार पर नहीं लिखा जाना चाहिए कि यह बंगला, इसमें सुख सुविधा और विलासिता का सारा का सारा खर्च भारत की जनता वहन करती है?
-क्या माननीयों की कारों पर भी ऐसा नहीं लिखना चाहिए?
मंत्रियों, सांसदों, विधायकों को टोल टैक्स नहीं देना पड़ता, लेकिन सेना के अफसरों और जवानों के वाहन केवल तभी टोल से छूट पाते हैं, जब वे सरकारी ड्यूटी पर हों। नेताओं को यह विशेष राहत क्यों? क्या उनका आना जाना सैनिकों से ज्यादा महत्वपूर्ण है?
सड़क परिवहन मंत्री कहते हैं कि टोल टैक्स सभी को देना चाहिए। आप और आपकी जमात क्यों नहीं देते श्रीमान?
दुनियाभर के सभ्य देशों में बुजुर्गों को विमान और रेल यात्रा में छूट मिलती है, कई देशों में तो उनसे पार्किंग और टोल टैक्स भी नहीं लिया जाता।
यहां सरकार कहती है कि बुड्ढे हो गए तो क्या एहसान कर रहे हो? पैसे नहीं हैं तो घर बैठो!
कभी किसी पैसेंजर ट्रेन में साधारण सेकण्ड क्लास के डिब्बे में चढ़कर तो देखिए, किसी कस्बे के अस्पताल में इलाज के बहाने घूमकर आइये, फेरी लगाकर सामान बेचनेवाले किसी आदमी या औरत से बात करके तो देखिये, किसी कम्पोजिट दुकान पर पव्वा खरीदने वाले से बात तो कीजिए , आम आदमी की बेइज्जती, उत्पीड़न, और कुंठा की फाइलें खुलती जाएंगी।
बाकी तो सब कुछ चंगा है जी !
~ डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
#indianrail #tolltax #train #viral #trendingpost #AshwiniVaishnaw #NirmalaSitharaman
आप सब की मुलाक़ात कराते हैं BJP से सांसद Manoj Tiwari जी से। गाना बेशक़ अच्छा गाते हैं लेकिन आज ज़रा काम की भी बात हो जाए।
2014 से North East Delhi से सांसद हैं ,लगातार तीसरा कार्यकाल।
अब आइए Central Govt की MPLADS Website के आँकड़ों के आधार पर देखें कि इन वर्षों में MPLAD फंड से ज़मीनी स्तर पर क्या काम हुए और क्या नहीं।
कोई आरोप नहीं,कोई राय नहीं,सिर्फ़ सरकारी डेटा।
थ्रेड 🧵
@myluminous Dear luminous,
Kisi concern ko resolve karne ke liye apke customer care or service center or apki puri team ko 1 se 2 saal ka samay bhi kam padta he kya....
@myluminous Dear luminous,
Kisi concern ko resolve karne ke liye apke customer care or service center or apki puri team ko 1 se 2 saal ka samay bhi kam padta he kya....
नेहरू कब बने प्रधानमंत्री.. ?
कैसे बने?
दिलचस्प सवाल है, ठीक उसी तरह कि आजादी कब मिली। जवाब 15 अगस्त 1947..
पर क्या ये जवाब ठीक है?
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आम धारणा यह है कि माउंटबेटन ने कांग्रेस से बोला- प्रधानमंत्री किसे बनाना है, चटपट अपने अध्यक्ष का नाम दे दो।
तो कांग्रेस पार्टी ने सरदार पटेल का चयन किया हुआ। लेकिन नेहरू लँगड़ी मारकर खुद अध्यक्ष बन गए। इस तरह से प्रधानमंत्री बन गए।
बकवास है।
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इस दौर की भारत की राजव्यवस्था को समझें। ये 1935 के इंडिया गवर्नेस एक्ट के तहत संचालित था। इसमे दो प्रमुख पद थे-
1- वाइसराय - सिविल प्रमुख
2-कमांडर इन चीफ -सेना प्रमुख
इन 2 के अलावे कुछ और लोगो को मिलाकर वाइसराय काउंसिल बनती थी। देश की कैबिनेट समझ लीजिए।
काउंसिल में ज्ञानी ध्यानी लोग, सिविल सर्वेंट्स एपॉइंट होते थे। जो विभिन्न पोर्टफोलियो ( आम भाषा मे मंत्रालय) सम्हालते। इनमे भारतीय भी होते थे।
जैसे, एक उदाहरण के तौर पर, स्वयं बाबा साहब अम्बेडकर, 22 जुलाई 1942 से 20 अक्टूबर 1946 तक, अंग्रेज सरकार के PWD मिनिस्टर थे।
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पॉइंट यह है, कि इस व्यवस्था में प्रधानमंत्री नाम का कोई पद नही होता था। वाइसराय माउंटबेटन ने 2 सितंबर 1946 को नेहरू को इस काउंसिल में एपोइंट किया।
उनका पोर्टफोलियो था - विदेश एवं कॉमनवेल्थ अफेयर्स। तो प्रमाण यह है कि वे ब्रिटिश सरकार को, विदेशमंत्री के रूप में जॉइन किये। इसके बाद चीजें इंटरेस्टिंग हो जाती हैं।।
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माउंटबेटन नेहरू को काउंसिल का डेप्युटी चेयरमैन बनाया जाता है। इंटरेस्टिंग यह, कि फॉर्मली ऐसा कोई पद, इंडिया गवर्नेस एक्ट (तत्कालीन संविधान) में है ही नही।
ठीक वैसे ही जैसे उपप्रधानमंत्री का कोई पद भारतीय सम्विधान में है नहीं। मगर चरणसिंह, देवीलाल, और आडवाणी तो बन गए। वैसे ही उपमुख्यमंत्री नाम का भी कोई पद नही होता। पर अक्सर ये पद बनाकर लोगो को बिठाया जाता है।
तो नेहरू को डेप्युटी चेयरमैन बना दिया गया। इसकी डेट क्या है, मुझे खोजने पर नही मिली। मगर यह अक्टूबर 1946 में होता है। सम्भवतः 20 अक्टूबर के पहले..
क्योकि फिर बाकी के काउंसिल मेम्बर इस्तीफा देते हैं। ऊपर आपने नोटिस किया होगा, कि अम्बेडकर का ब्रिटिश सरकार में अंतिम दिवस 20 अक्टूबर 1946 है।
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खाली जगहों पर नेहरू को अपने हिसाब से कैबिनेट गठन करने को कहा जाता है। वे एक कैबिनेट बनाते हैं।
इसमे सभी कांग्रेसी हैं। क्योकि मुस्लिम लीग ने सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया था।
लेकिन शीघ्र ही, उनका इरादा बदल जाता है।
5 इस्तीफे होते हैं, और 26 अक्टूबर 1946 को 5 मंत्री, मुस्लिम लीग से लिये जाते है।
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यह ब्रिटिश सरकार ही है। नेहरू अब De Facto पीएम की तरह काम कर रहे हैं। मगर डेप्युटी चेयरमैन के पद से, नियमतः होता ही नही है। तो वे De-Juro पीएम नही हैं।
मुखिया तो माउंटबेटन हैं, सर्वेसर्वा हैं। मगर यूँ समझिये कि उन्होंने अपनी पावर्स, नेहरू को उधार दे रखी हैं।
और नेहरू माउंटबेटन की ट्यूनिंग बेहतरीन है। दरअसल इसीलिए तो एटली ने अपनी ओर से लार्ड माउंटबेटन का चयन किया था।
और गांधी ने नेहरू को..
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बहरहाल, 5 मुस्लिम लीग के मंत्री सरकार को काम नही करने देते। वित्तमंत्री लियाकत हर फाइल पर बैठ जाते हैं।
वित्तीय अनुमतियो के बगैर सरकार पंगु हो रही है। सरदार झल्ला रहे हैं, नेहरू भी क्रुद्ध हैं।पर यही तो मुस्लिम लीग की रणनीति है। वे अलग पाकिस्तान चाहते हैं।
वे सरकार नही चलने देते हैं, कैबिनेट मीटिंग्स में बकवास करते हैं। पाकिस्तान की मांग पर अड़े हैं। देश मे दंगे और अस्थिरता का माहौल है। तब इन हालात में विभाजन के लिए कांग्रेस में सहमति बननी शुरू होती है।
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14 अगस्त वे लोग पाकिस्तान में जिन्ना की सरकार में शामिल होते हैं। वह नई सरकार हैं।
यहां पुरानी सरकार कंटीन्यू है। इसमे नये कैबिनेट सदस्य ले लिए जाते हैं।
यहाँ नेहरू का आभामंडल "प्रधानमंत्री" का है। मगर उन्हें प्रधानमंत्री कहना, फिर भी गलत है।
क्योकि विधान तो 1935 वाला ही चल रहा है।
एक वायसराय (अब गवर्नर जनरल)
और दूसरा कमांडर इन चीफ।
नेहरू दोनों नही हैं।
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लेकिन सम्विधान सभा, ब्रिटिश पार्लियामेंट की तर्ज पर चल रही है। इसमे 380 सदस्य कांग्रेस के हैं। इसके नेता नेहरू हैं।
ब्रिटिश पार्लियामेंट में ऐसे शख्स को प्रधानमंत्री कहते हैं। तो अखबारों में, पॉपुलर कल्चर में, हिस्ट्री में हम उन्हें 15 अगस्त 1947 से प्रधानमंत्री कहते हैं।।
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लेकिन प्रधानमंत्री का पद क्रिएट होता है भारत के सम्विधान में, 26 जनवरी 1950 को।
इसके तहत, चुनाव होते हैं। कांग्रेस जीतती है। नेहरू इसके नेता होते हैं।
अब जाकर वे डिफेक्टो, और डीज्यूरो, भारत के प्राइमिनिस्टर होते हैं।
खेत को खाती हुई बाड़..
चुनाव आयोग, सवालों के घेरे में है। इसकी साख और प्रतिष्ठा, आजादी के बाद सबसे निम्न स्तर पर है।
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सम्विधान ने चुनाव आयोग की कल्पना ऐसे संस्थान के रुप मे की थी, जो राजनीतिक दलों के बीच रेफरी की भूमिका निभाये। चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता, पवित्रता और भरोसा बनाये रखे।
ऐसा करने के लिए उसे एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय का दर्जा मिला हुआ है। वह भारत के द्वारा नियुक्त होता है। उसे 6 साल या 65 वर्ष की आयु तक का कार्यकाल मिलता है।
उसे सिर्फ महाभियोग के द्वारा हटाया जा सकता है। सेवा के दौरान उसकी वेतन भत्ते घटाए नहीं का सकते। और सेवा शर्ते बदली नही जा सकती।
(केवल CEC के लिए, अन्य EC जब चाहे, हटाये जा सकते हैं)
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CEC को भारत सरकार में सचिव स्तर के कार्य का अनुभव होना चाहिए। अर्थात वह एक IAS होगा। भारत के सभी चुनाव आयुक्त IAS रहे।
याने तमाम उन्मुक्तियो के बावजूद EC बेसिकली एक नौकरशाह है। एक बाबू..
एक वेतनभोगी कर्मचारी,
हिसाबी राम है।
जिसे नियमो के तहत काम करना है।
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काम सिम्पल है
1- सही इलेक्टोरल रोल बने।
2- सुरक्षित वोटिंग हो
3- जितने वोट पड़ें, उतने गिने जायें।
4- उम्मीदवार और दल विहित प्रक्रिया का पालन करें।
यह होता हुआ दिखना चाहिए। ऐसा पारदर्शी, स्वप्रमाणित और लॉजिकल, कि सबको दूध का दूध और पानी का पानी साफ साफ दिखे।
और यहां पर ही, चुनाव आयोग फेल है।
1- वह वोटर रोल्स को स्क्रूटनाइज नही होने देना चाहता। वह सर्चेबल वोटर रोल जारी करने की जगह, कागजो की थाप्पियां थमा रहा है।
और उसमे मिली प्रत्यक्ष त्रुटियां, जो चुनावी परिणाम बदलने में सक्षम है, उसे बहस, बदजुबानी, हेकड़ी और धमकी के साथ इनकार करता है।
2- वह नही चाहता कि वोट जितने गिरे, और जितने गिने गए, उनके बीच समानता स्थापित हो। मशीनी डिवाइस यूज करने पर अड़ा है, जिसमे गिरे मत अमूर्त हों।
कोई वेरिफाई न कर सके। वह तो VVPAT पर्चियों को भी गिनवाने के खिलाफ है। कोर्ट में लीगल बैटल लड़ रहा है।
3- वह वोटिंग बन्द होने के बाद मतों के प्रतिशत अविश्वसनीय वृद्धि को क्रॉस चेक नही होने देने के लिए चट्टान की तरह अड़ा है।
5 बजे के बाद कितनी लाइन थी, कोई देख न सके, इसके लिए CCTV सबूतों को न सिर्फ गुप्त रखना चाहता है, बल्कि जल्द से जल्द नष्ट कर देने की हड़बड़ी में है।
4- वह इलेक्शन के दौरान राज्यो के पूरे प्रशासन को अपने अंगूठे तले ले लेता है। इस दौरान, चुनाव से जुड़ी किसी भी आपत्ति, सवाल, या अपील पर नकारात्मक प्रतिक्रिया ही मिलती है।
5- वह पोलिंग बूथ पर पड़े मतों की संख्या के 17C सर्टिफिकेट का टोटल देने से इनकार करता है।
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साधारण मति का व्यक्ति भी यही कन्क्लूजन लेगा कि कोई गम्भीर घपला छुपाया जा रहा है।
सप्रमाण बात रखने पर, यह सचिव स्तर का व्यक्ति, बड़बोली बयानबाजी कर रहा है।
अपने एम्प्लॉयर (जी हां LOP उसके 3 एम्प्लॉयर में से एक है) से बदतमीजी कर रहा है।
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चुनाव आयोग एक व्यक्ति नही।
बड़ी संस्था है, कई स्तर पर गलती हो सकती है। उसे संज्ञान लेकर सुधारा जा सकता है।आपत्ति सुनकर, प्रक्रिया में सुधार लाना उसका काम है। ताकि कोई भी पक्ष, खोट न निकाल सके।
पहले भी बूथ कैप्चरिंग, फर्जी वोट, गलत वोटर रोल के मामले हुए। तब आयोग समाचार पत्रों की रिपोर्ट, या दलों की शिकायत का संज्ञान लेकर रीपोलिंग/ रीकाउंटिंग करवाता था। यह शेषन पूर्व की बात है।
शेषन दौर से सुरक्षा बलों की अभूतपूर्व तैनाती से बूथ कैप्चरिंग से निजात मिली।
और फोटो पहचान पत्र के बाद फर्जी वोटिंग से। भी। उनके दौर से ही शुरू हुआ कि चुनाव आयोग,राज्यो का प्रशासन अपने हाथ मे लेकर, ऐन चुनाव के पहले, उन DM/SP, अफसरों के तबादले करता, जिनकी तटस्थता संदिग्ध हो।
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यह अन्य प्रदेशो से बुलाये गए ऑब्जर्वर के फीडबैक, और विपक्ष की मांग पर होता।
ऑब्जर्वर, पूरी चुनावी प्रक्रिया के दौरान सर्वशक्तिमान अधिकारी होते, और चुनाव की पारदर्शिता और तटस्थता सुनिश्चित करते।
अशोका यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने 2 साल पहले एक रिसर्च पब्लिश की। 2019 के चुनाव में 79 सीटों में भाजपा की जीत को असामान्य बताया।
पाया कि इन सीटों में नियुक्त ऑब्जर्वर भाजपा शासित राज्यो से, स्टेट कैडर के ऑफिसर्स थे। आम तौर पर स्टेट कैडर के अफसर, IAS की तुलना में अधिक आज्ञाकारी होते हैं।
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याने हर स्तर पर स्थापित मानदंड तोड़कर, चुनाव आयोग अपनी साख गंवा बैठा है। विपक्ष का घोर निकम्मापन यह है कि अभी तक इनके विरुद्ध महाभियोग नहीं आया।
जो संस्था, हमारे विद्वान पुरखों ने लोकतन्त्र की रक्षा के लिए बनाई थी, वही लोकसत्ता के मूल सिद्धांतों को कुचल कर अट्टहास कर रही है।और नागरिक, बेबस देख रहा है।
बाड़ को ही लोकतन्त्र का खेत खाते हुए
@sudhirchaudhary@letsblinkit तिहाड़ी, सालाना 15 करोड़ रुपए हराम के डकार रहा है तू टैक्सपेयर के, 70 रूपये की दही से तेरा क्या बिगड़ेगा। खा ले इसको, तेरे अंदर के जहर से बैक्टीरिया खुद मर जायेगा।