बाणभट्ट के द्वारा रचित कादंबरी दुनिया का पहला उपन्यास था. कादंबरी पूर्ण होने से पहले ही बाण भट्टराव जी का देहांत हो गया! उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र भूषणभट्ट ( पुलिन्दभट्ट) ने इसे पूरा किया!
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ॐ तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम्।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुंगवम्॥१॥
तपस्वी वाल्मीकिजी ने तपस्या और स्वाध्याय में लगे हुए विद्वानों में श्रेष्ठ मुनिवर नारदजी से पूछा-॥ १॥
मूलते ब्रह्म रूपाय मध्यतो विश्णु रूपिणे ।
अघ्रते शिव रूपाय वृक्षराजाय तेनम: ॥
My salutations to the king of trees.
Whose root is the form of Brahma,
Middle is the form of Lord Vishnu,
And top is the form of Lord Shiva.
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ॐ, मैं देवताओं के महा��तम, आदर्श पुरूष, महादेव पर ध्यान करता हूं। भगवान रुद्र, बुद्धि के साथ हमें आशीर्वाद दें और ज्ञान के साथ उजागर करें॥
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"भारतीय संस्कृति और लोकपर्व" कार्यक्रम का प्रसारण आज सोमवार को @DDNewsRajasthan पर अपराह्न 3:30 बजे होना है। इस परिचर्चा में प्रो. रमाकांत पाण्डेय जी, निदेशक - केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, भोपाल परिसर ने महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है। देखिएगा 🙏 @DDNational@shashidigital
यह एक बचकानी बात है कि अनेक विश्वविद्यालयों ने संस्कृत विश्वविद्यालयों की परास्नातक उपाधि आचार्य को MA के समान नहीं माना। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इस पर पहले ही स्पष्टीकरण दे चुका है तथापि संस्कृत विश्वविद्यालयों को बार-बार इसके लिए प्रयास करना पड़ता है। खैर, इस आदेश का स्वागत।
अयि वरोरु हतस्मरदीपिके
यदि गतासि मदीक्षणगोचरात्।
असमसायकसायककीलिता
वद गमिष्यसि मे हृदयात् कथम्।।
हे प्रिये, यदि तुम सोचती हो कि मेरी दृष्टि की सीमा से तुम कहीं दूर चली जाओगी तो मुझे बताओ कि क्या यह हो सकता है? तुम दूर जाने पर भी अपने आपको मेरे प्रेममय हृदय से कैसे निकाल पाओगी?
अयमेव परो धर्मो ह्ययमेव परं तपः।
पतिशुश्रूषणं यत्र तत्स्त्रीणां स्वर्गहेतुकम्॥
पति के प्रति समर्पण और उसकी सेवा ही पत्नी का सर्वोच्च कर्तव्य और सर्वोच्च तपस्या है। केवल इस एक धर्माचरण से ही स्त्रियां स्वर्ग को प्राप्त कर लेती हैं। #शुकसप्तति@Sanatan_Science@meenakshisharan
#सुभाषित_रत्न_भाण्डागार बताता है कि दुष्ट व्यक्ति से धन कभी प्राप्त नहीं हो सकता क्योंकि दुष्ट का धन सभी प्रकार से दूषित होता है -
अयश्चणकचर्वणं फणिफणामणेः कर्षणं
करेण गिरितोलनं जलनिधेः पदा लङ्घनम्।
प्रसुप्तहरिबोधनं निशितखड्गसंस्पर्शनं
कदाचिदखिलं भवेन्न च शठाद्धनस्यार्जनम्।।