भारत ही नहीं, सारी दुनिया में धर्म की वापसी जिस रूप और जिस लहजे में हो रही है, उसका उचित विमर्श विकसित किए बिना साम्प्रदायिक राजनीति के समकालीन रूपों से जूझने की विधि विकसित हो ही नहीं सकती। इसीलिए उस आध्यात्मिक पिपासा का मर्म समझना जरूरी है, जिसका दोहन धर्म द्वारा किया जाता है। प्रयास धर्म की भूमिका को नकारने का नहीं, उलटे उसकी समग्रता को समझने का है। उसकी द्वन्द्वात्मक समग्रता को, उसमें निहित वेदना की द्वन्द्वात्मकता को समझने का है। व्यावहारिक धरातल पर इसका सीधा अर्थ है-धर्म के प्रेरणाप्रद और समस्यापरक रूपों के अन्तर्सम्बन्धों को समझना। लोकमानस की धार्मिकता के प्रति जिज्ञासा करना उसकी अवज्ञा करना नहीं है। ऐसी धार्मिकता के प्रति संवेदनशीलता के साथ भी धर्म की अवधारणा और धर्मसत्ता के फाउस्टियन पैक्ट की समीक्षा आवश्यक है।
पुरुषोत्तम अग्रवाल • निज ब्रह्म विचार : धर्म, समाज और धर्मेतर अध्यात्म
हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित लेखिका गीतांजलि श्री को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ।
उनके चर्चित उपन्यास रेत समाधि के अंग्रेज़ी अनुवाद Tomb of Sand को अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिल चुका है, जिसने हिंदी साहित्य को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।