मेरे ज़िन्दगी के दरवाज़े
भले ही बंद करने पड़ेंगे
मुझे तुम्हारे लिए।
पर मैं खिड़कियाँ खुली रखूंगा।
अगर वक़्त की गली से गुज़रे
तो उन खिड़कियों पे मैं मिलूंगा,
मैं तुम्हारे लिए।।
@Kitabganj1
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वक़्त की चिट्ठियाँ
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दादाजी तीन तला मकान बनवा कर गए थे, अपने तीनों बेटों के लिए। पापा मतलब मंझले भाई को मिला था सबसे निचला तला। पटना के सबसे महंगे इलाके में था अपना घर। बड़े पापा और छोटे पापा ऊपर रहा करते थे।
1/N
प्रिये,
यदि वर्षा ने
तुम्हारे नाम की स्याही को विस्तार दिया है,
तो जानो—
वह मेरे अस्तित्व पर
तुम्हारी स्मृति का पुनर्लेखन है।
इतिहास के पृष्ठ भले ही भीग जाएँ,
किन्तु कुछ नाम
अक्षरों में नहीं,
अंतःकरण की शिलाओं पर उत्कीर्ण होते हैं।
https://t.co/uaPdWWba46
मैं लेना चाहूंगा कई जन्म l
मैं बनना चाहूंगा उन जन्मों में
तुम्हारा पति-पुत्र-पिता-प्रेमी-अजनबी।
ताकि उतार पाऊं कर्ज
पूरी मर्दजात का
जो तुमपे है।।
@kitab
इतिहास के पन्नों में,
मेरा और तुम्हारा ज़िक्र
उसी हिस्से पर था
जो बीती रात बारिश में भीग गया
मेरे नाम की स्याही पूरी ही बह गई,
और तुम्हारे नाम की स्याही ने फैल कर
वो जगह घेर ली,
ठीक वैसे ही
जैसे,
मैं सोता हूँ
बिस्तर पर तुम्हारी खाली जगह को समेट कर।।
(फ़ोटो: अब्बास कियारोस्तमी)
मैं लेना चाहूंगा कई जन्म l
मैं बनना चाहूंगा उन जन्मों में
तुम्हारा पति-पुत्र-पिता-प्रेमी-अजनबी।
ताकि उतार पाऊं कर्ज
पूरी मर्दजात का
जो तुमपे है।।
(2019: जब मुझे समझ आया कि ईश्वर के एक से ज्यादा नाम क्यों होते हैं)
पर पापा के डर से कभी आपसे बात नहीं करते" उन्होंने खत में हमारी id भी डाली थी। इस तरह प्रज्ञा को हमारी id मिली और उसने अपने पापा के साथ उन सारे खतों की फ़ोटो खींच हमें भेजा।
उन खतों में जमा 15 साल का वक़्त बन्द था, और मेरी आँखों में जमा 15 साल के आंसू।।
N/N
तो हुआ ये था, कि प्रज्ञा ने बोर्ड की परीक्षा के लिए पुरानी किताबों की दुकान से अपनी किताबें ली थीं। उसमें जो मैथ्स की किताब थी उसमें ये खत मिले थे। खत में कई जगह ये भी लिखा था कि,"दीदी हम दोनों आज भी आप दोनों को इंस्टाग्राम और फेसबुक पर ढूंढ कर चुपचाप फॉलो करते हैं।
12/N