मैं फिर जन्म लूँगा,
तुममें हिमालय!
प्रेम करने के लिए,
तुमसे!
तब तक तुम हिममय रहोगे ना!
मैं फिर लौटूँगा, अरावली!
तुम्हारे गुरुशिखर पर,
तपने के लिए।
तब तक तुम वहाँ रहोगी ना!
My grandmother would feed me a spoonful of Dahi (curd) with sugar just before my exams. My friends laughed at me. I laughed at my grandmother. As if a spoonful of Dahi would help me pass my exams!
Only recently has medical science accepted that we have a ‘Gut Brain’ where intuitively ‘Gut Intuition’ was a phrase always used.
So when we speak about Artificial Intelligence or AI .. we assume that all ‘Intelligence’ lies in the brain.
Really ?
Apparently there is more research that their is intuition that comes from the heart .. the Vagus nerve apparently sends more messages from the heart to the brain, than the brain to the heart ..
So when you fall in love and your heart beats faster, is the brain telling the heart it’s in love .. or the heart telling the brain of the existence of love ?
Of course there are those that say that love is just a chemical response .. and I am just being emotional .. or poetic .. but where does emotion or poetry come from?
And to those sceptics I ask that ..
science tells us that almost 80% of our cells are our Microbiome, other that viruses and and bacteria .. so what part of our cell make up is human in that case ? Our Microbiome? Does intelligence lie in our Microbiome?
So in all the controversies around Artificial ‘Intelligence’ overpowering Human ‘Intelligence’ should we not try and understand what Human Intelligence really is ? And if there is a locality where it resides or arises , what is that locality ?
#AI #Intelligence #GutInstinct #HumanIntelligence #Human #Microbiome #Dahi #Grandmother #Heart #Heartfelt #Love #VagusNerve #Brain #Gut
जब-जब बरखा बीते, शीत में भावों को धूप दिखाना।
जब कुछ सिहरती लगे भावना, धूप की ताप दिलाना॥
ऋतु देख चले जो, पकड़ रेख चले जो, क्या अद्भुत,
जब वसंत मन में छाये, ऋतु बिन उत्सव सदा मनाना।
जब भी मैंने जगत् लिखा, सोचा युग की हाय लिखूँ।
जब संसार लिखा, सोचा प्यार पर हर अध्याय लिखूँ॥
आह का क्या, हर ओर कराह, कहीं मूक मुखर कहीं,
कुछ शब्दों में अर्थ दे, कैसे इतनी आय-बलाय लिखूँ।
नियति जहाँ नैऋत्य हुई, प्रकृति कहाँ ईशान हुई।
वायव्य हुई वृत्ति कभी, आग्नेय हुई श्मशान हुई॥
ऊषा की रहे प्रतीक्षा, जब कुछ नव हो इस भव,
लौ सी जो जली पलक में, हर निशा विहान हुई।
यह जो दिक्काल रहा, उसमें ही बसा संसार रहा,
लघुकाया मेरी ठहरी, कह किससे रही महान हुई।
दीप्ति के पथ में दीपक, दीपित जो रहा अहर्निश।
घृत में सिक्त जली वर्तिका, ऊपर छायी धूम तमिश।।
दीप तले अँधेरा ठहरा, दीपक ऊपर धरी कालिमा,
जलना भी है मिटना ही, कंपित लौ हर एक निमिष।
@aishwaryam99 प्रधान जी,
यह आपकी सदाशयता है,
जो आप उन गुणों की प्रशस्ति कर रहे हैं,
जो संभवतः उतने यथार्थ नहीं,
जितने आप ने कहे या
मैंने जीवन में चाहे।
लोकसेवा का निर्वहन हो,
यही कामना रहेगी, चिरंतन।
साभार नमन!
राजस्थान की ब्यूरोक्रेसी से दिल्ली में कार्यरत डॉ केके पाठक ऐसे आईएएस हैं जिनके लिए शायद ही कोई नकारात्मक बोले..न आईएएस होने की ठसक न कोई बनावटीपन न ही चेहरे पर कोई चिंता...न ही कुछ पाने की खुशी और न ही पाने की प्रसन्नता न खोने का दुःख ..हिंदी संस्कृत का जो शब्दकोश का उदाहरण इनके लेख दे देते हैं।
#बस_यूँ_ही
कहीं खबर थी आज गगन में छह ग्रह एक रेख में आए।
दृष्टि हमारी ऐसी तिर्यक्, जो वंकिम चंद्र पर रुक जाए।।
विरल योग है खगोल का माना, ज्योतिर्विद् जानें उसको,
पर चंद्र मनस् जब, तारा कैसे अन्य नयन का बन पाए।
अपना धर्म सभी को दिव्य दिखे, वहीं उसे भगवान दिखे।
हर धर्म में कुछ अधर्म दिखे, उसमें भी सब असमान दिखे।।
हर धर्म कुछ संगत और असंगत, समान कभी न हो सकते,
एक सृजन के सोपान रचे, दूजे में विध्वंस का ही मान दिखे।
जीवन में जब हो ऐसा, हो तुहिन की अंतिम रात।
तुम ही बोलो, इस रजनी का भला कौन प्रभात।।
ओसबिंदु का जीवन है, अंधकार से पौ फटने तक,
निशा-उषा के मध्य भी तो, चलते कितने झंझावात।
मन:कामना अपना आकर्षण रचती है, पर सच यह,
वह स्वयं आकृष्ट हो रहती, यही तो अनसुलझी बात।
मेरे पाखी!
मैं आजीवन अपने बचपन की अमराई और प्रौढ़पन की बोधिवृक्ष के बीच डोलता रहा हूँ, "न यत:, न तत:।"
तुम भोजपत्र के वृक्ष पर अपनी चहचहाहट लिखना,
मैं तेरी छाँव मैं बैठा तुम्हें सुनूँगा, सपने बुनूँगा,
जगूँगा, तब जब आसमान में न सूरज होगा, न चाँद,
न दिन होगा, न रात,
मेरे विहंग!
जैसे कभी प्रकृति के किसी संयोग में,
ग्रीष्म में चली आती है वर्षा,
लेकर हिम अपने अंक में,
दे जाती है वासंती शिशिर का रोमांच,
वैसे ही जब कभी नियति के व्यतिक्रम में,
ताप घनीभूत हो जाए, संताप सा,
तृषा हो रहे, दुष्पूर, अदम्य,
तो ले आना सहसा कुछ बूँदें और बिंदु,
अभिलाषाओं के जल के.
कहानी को लिखना
उसका कोई किरदार भी बनना है,
कविता लिखने में
उसके पद्य में ही है कवित्व।
उस रचनाकार ने कहा-
सृजन से क्या परिवाद,
उपालंभ बस यह कि
ढालता ही रहा, काव्य बना कर जिसे,
उसकी ही कहानी में न बन सका, कोई किरदार।
हथेली चित्रफलक बने,
किसी रक्तगर्भा हिना की,
यह सौभाग्य है,
किंतु लेखनी तूलिका बन जाए,
यह कौशल मिलता है,
कुछ ही उँगलियों को।
सौभाग्य यह नहीं कि हथेली फलक बनी,
सौभाग्य यह भी नहीं कि उँगली बनी तूलिका,
सौभाग्य यह है कि वे हथेलियां व वो उँगलियाँ,
साथ हुई व रहीं, फलक व तूलिका बन कर।
मैं मुस्कुराती हूँ, तब भी,
जब मुझे कदंब की छाँव छोड़,
यमुना में उतरते हैं कृष्ण.
मैं तब भी शांतचित्त होती हूँ,
जब क्रीड़ास्थल पर
उनके कमरबंद से फिसल
धूल में गिरने को होती हूँ,
क्योंकि आभास है,
हृदय को मेरे,
जिसे खो जाने का भय हो,
वो बाँसुरी कृष्ण की नहीं.
-साभार