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CWC की बैठक में आज ये फैसला लिया गया है 👇
• देश के करीब 800 शहरों में 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम होगा और नेता विपक्ष श्री राहुल गांधी कई शहरों के कार्यक्रमों में शामिल होंगे
• कांग्रेस अध्यक्ष श्री मल्लिकार्जुन खरगे और नेता विपक्ष श्री राहुल गांधी ने चारों मुख्यमंत्रियों से कहा है कि उनके राज्यों में शिक्षा और परीक्षा प्रणाली में क्या सुधार होने चाहिए, इस बारे में मुख्यमंत्री एक महीने में रिपोर्ट दें
• राम मंदिर में 'चढ़ावा चोरी' के मामले में कांग्रेस पार्टी देश के सभी राज्यों में प्रदर्शन करेगी
• चीन और अमेरिका के मुद्दे पर CWC ने गहरी चिंता व्यक्त की है, क्योंकि PM मोदी द्वारा चीन को क्लीनचिट देने की वजह से लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में गंभीर मसला सामने आया है
• हल्द्वानी में BJP के लोगों ने जिस तरह खरगे जी के भाषण मंच का शुद्धिकरण किया, वह पाप है और संविधान के खिलाफ है। इसके लिए नरेंद्र मोदी को माफी मांगनी चाहिए
• परिसीमन को लेकर कांग्रेस पार्टी की राय है कि मौजूदा लोकसभा की संख्या 543 है और हम अगले 25 साल तक संख्या इतनी ही रखने के पक्ष में हैं। साथ ही, हम इसी संख्या पर महिला आरक्षण लागू करने की मांग रखते हैं
• हमने 'संगठन सृजन अभियान' से जुड़ी एक detailed progress report भी रखी है, जिसमें इस अभियान से जुड़े कामों पर बात की गई है
: कांग्रेस महासचिव (संचार) श्री @Jairam_Ramesh
कोयला घोटाला मामले में निचली अदालत की ओर से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जारी किया समन गलत था : सुप्रीम कोर्ट।
यह फैसला मनमोहन सिंह जी के निधन के करीब डेढ़ साल बाद आया है। साल 2025 में निचली अदालत के जज ने CBI की ओर से दो क्लोजर रिपोर्ट खारिज करते हुए मनमोहन सिंह को समन जारी किया था। उस समन को मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
आज CJI जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने फैसला सुनाया कि निचली अदालत के जज ने CBI की क्लोजर रिपोर्ट खारिज करते समय तय कानूनी सिद्धांतों का पालन नहीं किया। उनके पास ऐसा कोई ठोस कारण नहीं था, जिसके आधार पर क्लोजर रिपोर्ट ठुकराकर उन्हें समन किया जाता।
ये पूर्व प्रधानमंत्री का मामला है, आम आदमी के बारे में सोचकर देखिए।
Demographic Dividend बर्बाद मत कीजिए
शुक्र है कि जंतर मंतर पर छात्रों का आंदोलन खत्म हो गया. सरकार ने शनिवार को सारी मांगें मान लीं और छात्र अपने अपने घर लौट गए. इसके बाद भी बड़ा सवाल बना हुआ है कि हम इस Demographic Dividend का फ़ायदा विकसित देश बनने के लिए उठाएँगे या उसे बर्बाद कर देंगे?
पहले समझिए Demographic Dividend क्या है?
यह शब्द आपने बार बार सुना होगा. सरल शब्दों में इसका मतलब है कि 15 से 64 साल की आबादी को Working Population में गिना जाता है. यह आबादी अनुपात में अधिक होने का मतलब अधिक लोगों को काम करने का अवसर मिलता है. ज़्यादा लोग करेंगे तो उनकी आमदनी बढ़ेगी. वो ज्यादा खर्च करते हैं. सामान और सर्विस की खपत बढ़ती है. सरकार को ज़्यादा टैक्स मिलता है. सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य और इन्फ्रास्ट्रक्चर
पर खर्च बढ़ाती है. देश में समृद्धि आती है. चीन, दक्षिण कोरिया, वियतनाम जैसे देशों ने कामकाजी आबादी बढ़ने फ़ायदा उठाया है.
भारत में अभी हर 100 में से 67 लोग Working Population में हैं. 1960 में यह आँकड़ा 56 पर था . यह आँकड़ा 2030 तक बढ़कर 69 तक पहुँच जाएगा. फिर 2035 से नीचे जाने लगेगा. देश में आबादी स्थिर होना इसका एक कारण है यानी Demographic Dividend का फ़ायदा उठाने के लिए हमारे पास 10 साल हैं. इसका फ़ायदा उठाने के लिए युवाओं को शिक्षा देने की ज़रूरत है और रोज़गार. इसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी सरकार की है.
Azim Premji University की रिपोर्ट कहती है कि ज़्यादा बच्चे हायर एजुकेशन में आ रहे हैं. हर साल 50 लाख युवा ग्रेजुएट नौकरी के बाजार में आते हैं. इसमें से सैलरी वाली नौकरी सिर्फ 17 लाख लोगों को मिलती है. 11 लाख लोगों को कोई और रोज़गार मिल जाता है. जिन्हें नौकरी मिल भी रही है उनकी सैलरी नहीं बढ़ रही है.
अब जंतर मंतर आंदोलन के बारे में सोचिए.छात्रों की शिकायत शिक्षा को लेकर है. ख़ासकर परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर है. पढ़ाई पूरी होने के बाद रोज़गार की जद्दोजहद. वहाँ भी सरकारी नौकरियों के लिए परीक्षा में पेपर लीक जैसी समस्या. सबके लिए सरकारी नौकरी मिल भी नहीं सकती है. इस समस्या का हल निकालना आसान नहीं है लेकिन हल नहीं निकला तो Demographic Dividend बर्बाद हो सकता है.
यह मत भूलिए कि हम दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था भले बन गए हों प्रति व्यक्ति आय में हमारा नंबर लगभग 140 पर है. इस Dividend का फ़ायदा नहीं उठाया तो भारत अमीर होने से पहले ही बूढ़ा हो जाएगा.
21 मिनिटांचा हा व्हिडिओ वेळ काढून नक्की बघा.
इरफान फक्त अंगणवाडीपर्यंत शिकला. त्यानंतरचं त्याचं विद्यापीठ म्हणजे Google, YouTube आणि स्वतःची जिज्ञासा.
त्याच्या बोलण्यातला अभ्यास, समाज-राजकारणाची समज, भाषेवरची पकड आणि कष्टकरी माणसांविषयीची संवेदनशीलता पाहिली की एक गोष्ट स्पष्ट होते—प्रतिभेला महागड्या पदवीची गरज नसते; संधीची गरज असते.
आणि लल्लनटॉपचा पत्रकार रजत पांडे… त्याने घेतलेली ही मुलाखत म्हणजे केवळ प्रश्नोत्तर नाही, तर एका दुर्लक्षित भारताला आवाज देण्याचा प्रयत्न आहे.
देशाच्या झोपडपट्ट्यांमध्ये, छोट्या गावांत आणि दुर्लक्षित वस्त्यांमध्ये असे कितीतरी इरफान आजही आहेत. प्रश्न त्यांच्या क्षमतेचा नाही, तर त्यांना व्यासपीठ मिळतं का याचा आहे.
जंतर मंतर प्रोटेस्ट को लेकर मिडिल ईस्ट देशों के हैंडल से फ़ेक नैरेटिव फैलाने और विदेशों से जंतर मंतर के लिए ऑनलाइन खाना आर्डर किए जाने के सवाल पर विदेश मंत्रालय का जवाब
“हमारे पास ऐसी कोई जानकारी नहीं”
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने यहां तक कह दिया कि “मिडिल ईस्ट के देशों में बहुत से भारतीय रहते हैं वो भी कर सकते हैं। हालाँकि कि ऐसी कोई जानकारी नहीं है।”
#Imp: Three young boys have been detained by the @DelhiPolice at Nizamuddin Police Station for carrying food to Jantar Mantar. Yes, you read that right!
Several reports of young kids being detained for no reason. Central Delhi being cordoned off. Why is the new @CPDelhi cracking down like he is serving in North Korea?
Please remember you are officers. Not goons of the government. People will not tolerate this. Stop terrorising young kids RIGHT NOW!
@Cockroachisback
🇻🇳 A speedboat carrying Indian tourists capsized off southern Vietnam's Phu Quoc island on Saturday, killing at least 15 people, state media reported.
➡️ https://t.co/zgfEsrmSVV
ऐतिहासिक यमुना जल समझौते के बाद कल मुख्यमंत्री श्री @BhajanlalBjp जी के जयपुर आगमन पर आयोजित होने वाले भव्य स्वागत कार्यक्रम की तैयारियों का जायजा लिया गया।
इस अवसर पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्री @madanrrathore, गृह राज्य मंत्री श्री @jawaharbedam, प्रदेश महामंत्री श्री @bjpbhupendraRYB, प्रदेश मंत्री श्री नारायण मीणा एवं श्री @Imsitaramposwal उपस्थित रहे।
यह अत्यंत दुख का विषय है कि मेरे हमीरपुर संसदीय क्षेत्र के हमीरपुर के गलोड़ के 23 वर्षीय होनहार युवा श्री आदित्य शर्मा जी का ओमान तट के निकट स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास हुए जहाज हमले में दुखद निधन हो गया। मर्चेंट शिप में बतौर डेक कैडेट अपना कर्तव्य निभाते हुए श्री आदित्य शर्मा जी का निधन अत्यंत कष्टदायी व हृदय विदारक है।
दुख की इस घड़ी में मैं पूरी तरह पीड़ित परिवार के साथ हूँ और मेरी हार्दिक संवेदनाएं आदित्य शर्मा जी के परिजनों के साथ हैं। ईश्वर आदित्य शर्मा जी दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान तथा शोक संतप्त परिवार को यह दारुण दुःख सहन करने की शक्ति दें।
इस मामले को लेकर मैं व्यक्तिगत रूप से विदेश मंत्री श्री एस. जयशंकर व विदेश मंत्रालय के उच्चाधिकारियों के संपर्क में हैं। आदित्य शर्मा जी के पार्थिव देह को शीघ्र स्वदेश लाने के लिए संबंधित अधिकारियों एवं विदेश मंत्रालय के साथ बातचीत चल रही व इसके यथासंभव प्रयास किए जा रहे हैं।
अस्पताल में बच्चा जन्म देने आई महिलाओं की किडनी फेल हो गई, उन्हें डायलिसिस करवाना पड़ रहा है।
और उस पर यह बेहद शर्मनाक बयान!
क्या मंत्रीजी के घराने की प्रेग्नेंट महिलाएं प्रसव के लिए नाचती हुई अस्पताल जाती हैं ?
हर्षद मेहता सीरीज़ में एक डायलॉग है कि जब किसी का काम खराब नहीं कर सकते तो उसका नाम खराब कर दो। दुर्भाग्य से नेहरू इस देश की सबसे मिसअंडरस्टुड शख्सियत हैं, इतने कि कुछ लोग शास्त्री जी से भी उनकी तुलना करके शास्त्री जी को महान बताने का प्रयास करते हैं। पता नहीं, शास्त्री जी ये सब देखते तो ऐसे लोगों को क्या कहते।
जब तक नेहरू जीवित थे, न तो विपक्ष में किसी का क़द उनके सामने राजनीति करने लायक़ था, और न ही कांग्रेस में कोई उनके खिलाफ जाने की हैसियत रखता था।
तब घोर रूढ़िवादी कांग्रेसी उन्हें कट्टर कम्युनिस्ट कहते थे, मुस्लिम लीगी उन्हें कट्टर हिंदुवादी कहते थे, सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट उन्हें पूँजीपतियों का एजेंट कहते थे। महासभाई और संघी उन्हें मुस्लिम तुष्टिकर्ता कहते थे।
यह महासभाइयों का फैलाया हुआ झूठ ही है कि नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मैं शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुस्लिम और केवल दुर्घटनावश हिन्दू हूँ, जो आज सच की तरह बिकता है।
नेहरू दुनिया के उन दुर्लभतम पिता-पुत्र द्वय में से एक हैं, जिन्होंने जब अपने महान पिता की पगड़ी अपने सिर पर बांधी तो उनके पिता की पहचान फुटनोट्स में समा गई। यह पंडित मोतीलाल नेहरू ही थे जिन्होंने लॉर्ड बिर्किनहेड की इस चुनौती का कि इंडियन इतने मैच्योर नहीं हैं कि स्वयं अपने शासन के लिए संविधान लिख सकें, प्रत्युत्तर नेहरू रिपोर्ट लिखकर दिया था, जिसे भारत का पहला लिखित संविधान माना जाता है। इसी रिपोर्ट में पहली बार भारत को एक आज़ाद देश के रूप में देखने की अवधारणा दी गई थी।
नेहरू शौक से कम्युनिस्ट नहीं थे, उस वक्त तीसरी दुनिया ही पूरी तरह से कम्युनिज़्म की चपेट में थी। यूरोप की तरह यहाँ दुनिया भर से लूटकर लाई गई संपदा नहीं थी और इन्हीं यूरोपियन्स से आबाद हुए अमेरिका जैसे विभिन्न पूंजी के स्रोत भी नहीं थे।
इनमें से ज़्यादातर देशों में पारंपरिक सामंती व्यवस्था थी। पूंजी के एकमात्र स्रोत भूमि पर असमान स्वामित्व था। भारत भी इससे अछूता नहीं था। कम्युनिज़्म जहाँ भी फैला, उसके लिए सबसे उर्वर भूमि यहाँ भी थी। बड़े संख्या में जमींदार थे , जो कि विभिन्न व्यवस्थाओं के दें थे। देशभर में बड़े ज़मींदारों से लेकर छोटी जोत के किसान भी स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेसी थे। कई जगहों पर ज़मींदारों ने स्वतंत्रता के लिए अपना सबकुछ लुटा दिया था। वे कांग्रेस से लेकर क्रांतिकारी संगठनों तक की फंडिंग करते थे। इनके योगदान को भुलाकर नेहरू इन्हें कम्युनिस्टों के हवाले नहीं छोड़ सकते थे, जो कल्चरल रेवोल्यूशन के नाम पर सबको मरवा दें और फिर बाद में जिनसे मरवाएँ उन्हें भी भूखे मरने के लिए छोड़ दें, जैसे माओ ने छोड़ दिया था।
नेहरू ने अपनी सूझबूझ से पहले तो कम्युनिस्टों को लोकतंत्र स्वीकारने पर मजबूर किया, फिर उनके सशस्त्र विद्रोह के ख्वाबों के एक-एक करके पर कुतरे। फिर उनकी जायज नीतिओं को स्वीकारा , भूमि सुधार लागू किया। पूंजी के नए स्रोतों का सृजन किया।
अशोक गहलोत के बयानों के बाद कई लोग इसे सेल्फ गोल, बता रहे हैं, कोई गाइडेड स्टेटमेंट तो कोई बौखलाहट तो कोई आख़िरी दाव !
हालांकि, यकीन मानिए अशोक गहलोत ने जो कहा है, बड़ी सूझबूझ और नियंत्रण के साथ कहा है। गहलोत को जिसे खदेड़ना था, अपनी भावुक प्रस्तुति से खदेड़ दिया है।
आलाकमान के कानों में यह बार बार गूंजेगा कि गहलोत ने सरकार बचाई, विधायक चाहते थे कि सरकार बचाने वाले 100 में से किसी को भी CM बना दिया जाए, मगर मानेसर जाने वालों को नहीं।
इसका असर यह होगा कि अभी लंबे समय तक राजस्थान की कमान गहलोत की इच्छाओं के विरुद्ध किसी को नहीं दी जाएगी।
#Rajasthan
आज पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पुण्यतिथि है और यह चिंता करने का समय है कि इस देश का हर नागरिक हर तरह के आतंकवाद से सुरक्षित रहे। वह आतंकवाद बमों का तो हो ही सकता है, वह पृथकतावादियों का, सांप्रदायिकों का, धर्मांध लोगों और इस देश को जानबूझकर कमज़ोर करने वालों और नादानी से कमज़ोर करने वालों का भी हो सकता है। आइए, जानें उस अलग तरह के प्रधानमंत्री के बारे में कुछ ज़रूरी बातें।
एक, Rajiv Gandhi ने भारत में कंप्यूटर और टेलीकॉम क्रांति का बीज उस समय बोया जब सरकारी दफ़्तरों में टाइपराइटर को ही आधुनिकता माना जाता था। दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती दौर में उन्हें “कंप्यूटर वाला प्रधानमंत्री” कहकर उनका इतना अधिक मज़ाक उड़ाया गया कि विज्ञान और तकनालॉजी की समझ रखने वाली दुनिया भारत के इन लोगों पर हंसती थी। आपको हैरानी होगी कि राजीव गांधी का मज़ाक उड़ाने वाले इन लोगों में आज की सत्ताधारी पार्टी के लोग तो थे ही, विपक्ष तक में मौजूद दलों के लोगों ने उनका इतना उपहास किया कि वे अपने पुराने बयानों को देखें तो उन्हें शर्म आएगी कि ये बयान उन्होंने दिए थे। और राजीव गांधी का वही काम बाद में भारत की आईटी ताक़त की बुनियाद बनीं।
Rajiv Gandhi शायद भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने प्रशासनिक बैठकों में तकनीकी प्रस्तुतियों और डेटा आधारित निर्णयों पर ज़ोर दिया। एयरलाइन पायलट रहने के कारण उनकी कार्यशैली “कॉकपिट अनुशासन” जैसी थी। कम बोलना, मौसम का ख़याल रखना, उनके साथ जितने भी यात्री हैं, उन सबकी सुरक्षित लैंडिंग, हर दिन के ज्यादा से ज्यादा नोट बनाना और हर चीज़ की चेकलिस्ट रखना। भारतीय शासन प्रणाली में चेकलिस्ट नामकी दुर्लभ चीज़ राजीव गांधी ही लेकर आए थे।
पंचायती राज संस्थाओं को मज़बूत करने का उनका प्रयास केवल राजनीतिक नहीं था; वे गांव स्तर तक सीधे वित्त और अधिकार पहुँचाने के पक्षधर थे। कम लोग जानते हैं कि वे अफ़सरशाही की परतों से बेहद परेशान रहते थे और अक्सर कहते थे कि “दिल्ली से भेजा गया एक रुपया गांव तक पहुँचते-पहुँचते 15 पैसे रह जाता है।” सत्ता के पिपासु राजनेताओं ने इसे भी उनके ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया और मीडिया के हम लोग उनके छवि हनन में बहुत आगे रहे। लेकिन आज अगर प्रधानमंत्री कह दें कि मेरी शासन व्यवस्था इतनी अच्छी है कि मैं दिल्ली से 15 पैसे भेजता हूँ तो वह आख़िरी भारतीय नागरिक के पास पहुँचते-पहुँचते एक रुपया हो जाता है तो इस व्यवस्था की तारीफ़ में अंजना ओम कश्यप बहस बाज़ीगर पक्का कर डालेंगी और रूबिया बहन कांग्रेसियों को कोसने में पूरा दम लगा देंगी। सुधीर चौधरी इस पर डिकोड करेंगे और अर्नब गोस्वामी अपने चैनल के सारे रिपोर्टरों को दौड़ा देंगे कि इस सिस्टम की ख़ूबियों का लाइव करिए।
Rajiv Gandhi ने ही युवाओं को राजनीति में लाने के लिए मतदान आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष की थी। आलोचक भी मानते हैं कि इससे भारतीय लोकतंत्र में करोड़ों युवाओं की सीधी भागीदारी संभव हुई।
विज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में उनकी रुचि केवल औपचारिक नहीं थी। वे वैज्ञानिकों से घंटों अनौपचारिक चर्चा करते थे और नई तकनीक के डेमो देखने में व्यक्तिगत रुचि लेते थे। उस दौर के कई वैज्ञानिकों ने बाद में लिखा कि वे तकनीकी बातें जल्दी समझ लेते थे और कठिन सवाल पूछते थे। लेकिन राजीव गांधी की ग़लती यह थी कि वे रॉकेट लॉचिंग के समय कभी नारियल फोड़ने वाली बात नहीं सोच पाए। उन्हें यह मालूम ही नहीं हो सका कि भारतीय ज्ञान विज्ञान और तकनालॉजी वैज्ञानिकों की मेधा से नहीं, नारियल की जटाओं में विद्यमान रहती है।
विदेश नीति में उनका व्यक्तित्व अपेक्षाकृत आधुनिक और गैर-टकराववादी माना गया। वे शीत युद्ध के अंतिम दौर में भारत को “पुरानी वैचारिक भाषा” से थोड़ा बाहर निकालकर तकनीकी और आर्थिक सहयोग की ओर ले जाना चाहते थे।
उनके बारे में एक कम चर्चित तथ्य यह है कि उन्हें भारतीय हस्तशिल्प, कपड़ा डिज़ाइन और लोक कला में गहरी दिलचस्पी थी। वे विदेश यात्राओं में कई बार भारतीय कारीगरों के काम को विशेष रूप से प्रदर्शित करवाते थे ताकि भारत केवल “गरीब देश” की छवि तक सीमित न रहे।
Rajiv Gandhi को प्रशासन में “मध्यस्थ संस्कृति” पसंद नहीं थी। वे सीधे अधिकारियों, इंजीनियरों और जिला स्तर के लोगों से बात कर लेते थे। इससे कई वरिष्ठ नेता असहज भी हो जाते थे, लेकिन इससे निर्णय प्रक्रिया तेज होती थी।
पर्यावरण और गंगा सफाई पर शुरुआती सरकारी पहल को राष्ट्रीय एजेंडा बनाने वालों में उनका नाम आता है। उस समय पर्यावरण राजनीति का लोकप्रिय विषय नहीं था, फिर भी उन्होंने इसे सरकारी प्राथमिकता दी। यह समय से बहुत आगे की बात थी, लेकिन उस समय काँग्रेस के लोग भी खादी की टोपी उतार कर सिर खुजाते हुए राजीव को नासमझ बताया करते थे। राजीव गांधी को जो जलवायु संकट 1986 में समझ आ गया था, उसके बारे में आज 2026 में हमारे नेता खुद झुलस रहे हैं तो समझ आने लगा है।
उनकी सबसे उल्लेखनीय व्यक्तिगत खूबियों में एक थी निजी कटुता से बचना। तीखे राजनीतिक हमलों के बावजूद वे सार्वजनिक भाषा में अपेक्षाकृत संयमित रहे। उनके कई समकालीन विरोधियों ने भी बाद में स्वीकार किया कि निजी व्यवहार में वे विनम्र, सुनने वाले और कम आक्रामक स्वभाव के थे।
मैं भी अपने मीडिया के सीनियर लोगों और उनमें भी वामपंथी और समाजवादी विद्वानों के चक्कर में राजीव गांधी का आलोचक ही रहा था। उस समय आरएसएस, भाजपा, समाजवादी और वामदलों के सब लोग एक ही सुर में सुर साधकर राजीव गांधी का विरोध किया करते थे और उस अंधविरोध में उनकी ख़ूबियों को नहीं समझ पाए या उनका संतुलित आकलन उनके जीवन काल में नहीं कर पाए। वह अच्छाइयों से भरपूर एक सादा और संवेदनशील इनसान थे। मैं उनकी बहुत सी नीतियों का मुखर आलोचक हूँ, लेकिन आज उनके स्मरण दिन पर उनकी इन ख़ूबियों को याद करता हूँ तो लगता है कि हमारी राजनीति कहाँ से कहाँ चली आई है। राजीव गांधी जैसे लोग बहुत कम होते हैं।
#RajivGandhi #राजीवगांधी #राजीव_गाँधी #राजीव_गांधी #कंप्यूटरक्रांति #तकनीकीक्रांति #सूचनाप्रौद्योगिकी #कंप्यूटर_क्रांति #तकनीकी_क्रांति #सूचना_प्रौद्योगिकी
#आतंकवादविरोधीदिवस #आतंकवाद_विरोधी_दिवस
सुप्रीम कोर्ट में ऐसा कई बार हुआ है, जब बड़ी बेंच (larger bench) ने छोटी बेंच के फैसले को overrule किया. Supreme Court अपना फैसला बदलता है ताकि कानून static न रहे.
- Kesavananda Bharati v. State of Kerala (1973) में Golaknath v. State of Punjab (1967) को overrule किया गया था.
Golaknath (11-judge bench) में SC ने कहा था कि संसद Fundamental Rights को amend नहीं कर सकती,
जबकि Kesavananda (13-judge bench) ने इसे partly overrule किया। संसद संविधान amend कर सकती है, लेकिन Basic Structure नहीं बदल सकती।
- Navtej Singh Johar v. Union of India (2018) केस ने Suresh Kumar Koushal v. Naz Foundation (2013) को overrule किया था.
Koushal ने Section 377 (consensual same-sex relations) को upheld किया था,
Navtej (5-judge) ने इसे overrule कर decriminalize कर दिया.
- Justice K.S. Puttaswamy v. Union of India (2017) केस ने ADM Jabalpur v. Shivkant Shukla (1976) को overrule किया था.
Emergency के दौरान habeas corpus को suspend करने वाले कुख्यात ADM Jabalpur को Justice K.S. Puttaswamy के 9-judge bench ने overrule किया। Right to Privacy को Fundamental Right माना गया.
#supremecourt
सुप्रीम कोर्ट में जो आज हुआ वह अभूतपूर्व है। मुझे नहीं लगता है कि आज तक सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में ऐसा हुआ होगा!
अपने ही फैसले पर सवाल उठा दे ।वह भी वैसा फैसला जो चीफ जस्टिस वाली बेंच ने दिया हो। अभूतपूर्व!
नीट रद्द नहीं हुई, देश के भरोसे का पोस्टमार्टम हुआ है
NEET-UG 2026 का रद्द होना सिर्फ़ एक परीक्षा का स्थगन नहीं, यह भारत की परीक्षा-व्यवस्था पर लगा वह काला धब्बा है, जिसे प्रेस-नोट, जांच-कमेटी और “नई तारीख़ जल्द” जैसे वाक्यों से धोया नहीं जा सकता। NTA ने 3 मई 2026 को हुई परीक्षा रद्द कर दी है और कहा है कि परीक्षा दोबारा होगी; मामला CBI को सौंपे जाने की बात भी सामने आई है। यह मामला गंभीर तो अभी दो दिन पहले ही हो गया था, जब जयपुर के दैनिक नवज्योति, दैनिक राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर सहित सभी अख़बारों में प्रमुखता से छपा।
यह कहना आसान है कि बच्चों को फिर मौक़ा मिल जाएगा। लेकिन क्या किसी अफ़सर ने उन बच्चों की आंखों में झांककर देखा है, जिन्होंने दो-दो साल मोबाइल बंद कर दिए, घर की शादियों से दूर रहे, मां-बाप की कमाई को कोचिंग की आग में झोंका और फिर पाया कि उनके भविष्य की चाबी किसी “गेस पेपर”, किसी गिरोह, किसी डिजिटल फॉरवर्ड और किसी अंदरूनी लापरवाही के हाथ में थी? राजस्थान SOG की जांच में जिस तरह पहले से घूम रहे प्रश्नों, कई सवालों के मिलान और कथित नेटवर्क की बात सामने आई है, वह यह बताने के लिए काफ़ी है कि यह मामला सामान्य अफ़वाह नहीं, परीक्षा-तंत्र की रीढ़ में लगी दीमक है।
सरकार और NTA को अब यह पुराना नाटक बंद करना चाहिए कि “जांच चल रही है, दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।” दोषी नीचे बैठे क्लर्क, केंद्राधीक्षक या कोई दलाल भर नहीं हो सकते। ऐसी राष्ट्रीय परीक्षा में अगर पेपर की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाए तो जवाबदेही शीर्ष से शुरू होनी चाहिए। NTA के सर्वोच्च स्तर पर बैठे लोगों को तत्काल बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए। यह बर्खास्तगी दंड नहीं, प्रशासनिक शुचिता की न्यूनतम शर्त है। जिस संस्था का काम परीक्षा कराना था, वही परीक्षा की पवित्रता नहीं बचा पाई तो उसके शीर्ष अधिकारी कुर्सी पर क्यों रहें?
यह भी याद रखना चाहिए कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा का रद्द होना बिल्कुल पहली घटना नहीं है। 2015 में AIPMT, जो NEET-UG का पूर्ववर्ती ढांचा था, सुप्रीम कोर्ट के आदेश से रद्द हुआ था; तब अदालत ने परीक्षा की “sanctity and credibility” बचाने को प्राथमिकता दी थी। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने NEET-UG को इसलिए रद्द नहीं किया था; क्योंकि उसके सामने व्यापक “systemic breach” का पर्याप्त आधार नहीं माना गया था।
लेकिन 2026 में अगर परीक्षा रद्द करनी पड़ी है तो इसका अर्थ है कि व्यवस्था ने खुद मान लिया कि भरोसा बचा नहीं। अब सिर्फ़ री-एग्जाम नहीं, री-कंस्ट्रक्शन चाहिए यानी NTA का फॉरेंसिक ऑडिट, पेपर-सेटिंग से ट्रांसपोर्ट तक हर कड़ी की जवाबदेही, निजी एजेंसियों की भूमिका की जांच और परीक्षा माफिया पर संगठित अपराध जैसी कार्रवाई।
नीट में बैठने वाला बच्चा सिर्फ विद्यार्थी नहीं होता; वह भारत के भविष्य के अस्पतालों का संभावित डॉक्टर होता है। अगर डॉक्टर बनने की पहली सीढ़ी ही चोरी, रिसाव और अविश्वास से भीग जाए, तो यह बच्चों के साथ अन्याय नहीं, राष्ट्र के स्वास्थ्य-भविष्य के साथ अपराध है। इसलिए इस बार सिर्फ परीक्षा नहीं दोहराई जाए; जिम्मेदारी भी तय हो और सबसे ऊपर बैठे लोग पहले जाएं।
#NEET