इस कथा में उस क्षण का वर्णन है जब एक शिकारी शिकार की खोज में बेल के पेड़ पर रात भर जागता है। भूख और थकान के कारण वह अनजाने में बेल के पत्ते तोड़कर नीचे गिराता है, जो संयोग से नीचे स्थित शिवलिंग पर गिरते हैं। भगवान शिव उसकी इस अनजानी सेवा से ही प्रसन्न हो जात�� हैं।
आज दिव्य और अद्भुत प्रकटोत्सव है—भगवान श्री नरसिंह जयंती। यह वह पावन क्षण है जब धर्म की रक्षा हेतु स्वयं ने आधे मानव और आधे सिंह के रूप में प्रकट होकर भक्त की पुकार का उत्तर दिया।
सुवर्णकूटं रजताभिकूटं माणिक्यकूटं माणिरत्नकूटं।
अनेककूटं बहुवर्णकूटं श्री चित्रकूटं शरणं प्रपद्ये॥
🌺 अर्थ (भावार्थ):
मैं उस श्री चित्रकूट को शरणागत होता हूँ
जो स्वर्ण (सोने) के समान तेजस्वी है
रजत (चाँदी) के समान निर्मल है
माणिक्य और रत्नों के समान दीप्तिमान है
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