छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चांपा के पोड़ी राछा में जो हुआ, वह कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि डीएड अभ्यर्थी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद भी नियुक्ति की मांग कर रहे हैं, तो उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें हिरासत में लेने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या लोकतंत्र में अपनी मांग का पोस्टर दिखाना भी अपराध है? यदि राजनीतिक कार्यकर्ताओं और समर्थकों को मुख्यमंत्री तक पहुंचने की छूट थी, तो बेरोजगार युवाओं के लिए अलग नियम क्यों?
जिन युवाओं ने वर्षों पढ़ाई की कानूनी लड़ाई लड़ी और न्यायालय से राहत हासिल की उन्हें नौकरी के बजाय थाने का रास्ता क्यों दिखाया गया? क्या प्रशासन का काम संवाद स्थापित करना है या असहमति को दबाना? और यदि अभ्यर्थियों ने कोई अपराध नहीं किया था तो उनसे शपथ पत्र लिखवाने की आवश्यकता क्या थी? सरकार और प्रशासन को इन सवालों का जवाब देना चाहिए, क्योंकि यह मामला केवल 2300 पदों का नहीं, बल्कि युवाओं के लोकतांत्रिक अधिकारों और व्यवस्था पर उनके भरोसे का भी है।
हमें 170 दिन हो गए, हम यहाँ पे मर रहें है लेकिन सरकार हमारी सुध लेने नहीं आ रही है।
हम अपनी जायज़ माँग को लेकर बैठे है, हम नियुक्ति लिए बिना घर भी नहीं जा सकते।
-छत्तीसगढ़ के डीएड अभ्यर्थी।
D.Ed Abhyarthi Protest : D.Ed अभ्यर्थी मन के अनसन जारी हे | अनसन म एक अउ अभ्यर्थी के बिगड़िस तबीयत
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