नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है
कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है
मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं
जिस से अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है
हमने तुझ पर कोई इल्ज़ाम नहीं आने दिया,
इक ग़ज़ल में भी तेरा नाम नहीं आने दिया।
तूने इक दिन हमें नाकाम कहा और हमने,
ख़ुद को अपने भी किसी काम नहीं आने दिया
#shayri#poetry#rekhta
यादें पागल कर देती हैं
बातें पागल कर देती हैं
चेहरा होश उड़ा देता है
आँखें पागल कर देती हैं
तन्हा चलने वालों को ये
राहें पागल कर देती हैं
दिन तो ख़ैर गुज़र जाता है
रातें पागल कर देती हैं
मेरे बस में नहीं वरना कुदरत का लिखा काटता
तेरे हिस्से में आए ग़म कोई दूसरा काटता
लारिया से ज्यादा बहाव था उसके हर एक लफ़्ज़ में
मैं इशारा नहीं काट सकता बात क्या काटता
जहां में जितनी इज्जत है सिर्फ दाम की है ।
ये बात जान लो लोगों ये बात काम की है ।।
कही पर जाकर भुगतनी पड़ेगी ध्यान रहे ।
तुम्हारे पास भी दौलत अगर हराम की है।।
उलझ करके तेरी जुल्फों में यूं आबाद हो जाऊं
जैसे लखनऊ का मैं अमीनाबाद हो जाऊं
मैं जमुना की तरह तन्हां निहारू ताज को कब तक
कोई गंगा मिले तो मैं इलाहबाद हों जाऊं
गजल कहने लगा हूं मैं जरा सा मुस्कुरा तो दो
यही तो चाहती थी तुम कि मैं बर्बाद हो जाऊं...
कितने ऐश उड़ाते होंगे, कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग वो होंगे, जो उस को भाते होंगे
यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में, वो तो मर जाते होंगे।
हमारे जख्मे तमन्ना पुराने हो गए हैं
कि अब उसे गली से गुजरे जमाने हो गए हैं
तुम अपने चाहने वालों की फिक्र मत करियो
तुम्हारे चाहने वाले दीवाने हो गए हैं।।