शेर दहाड़ते है वो तो ठीक परंतु अशोक स्तम्भ वाला शेर तो हमेशा से ही गंभीर रहा है
वैसे सत्ता की चाटुकारिता के आगे इतना मिमियाओ मत पत्रकारिता के लिए अच्छा नहीं रहेगा
It is interesting that Republic has the remand copy because Zubair's lawyers haven't been provided the copy despite multiple requests to the concerned police personnel.
पहले रोहतक में सचिन और अब फतेहपुर में ‘विकास की आत्महत्या’ से देश का हर युवा व्यथित है।
मैदान पर 6 वर्षों के मैराथन संघर्ष के बाद महज 4 वर्षों की सेवा छात्र कैसे स्वीकारेंगे?
सिर्फ संवादहीनता की वजह से किसान आंदोलन में सैकड़ों जानें गयी, क्या हम फिर वही गलती दोहराना चाहते हैं?