🕉अध्यात्मवेत्ता🕉सनातन🕉
सत्य को जानो बस🔸बहुत रह लिए अंधेरे में🔸बहुत जी लिए भ्रम में🔸तुम्हारी चेतना अभी भी क्यूँ पशुओं के जैसी ही है❓चेतना को विकसित करो✴️
आज से एक थ्रेड प्रारम्भ कर रहा हूँ,
"सनातन का वास्तविक स्वरूप मेरी दृष्टि में"
जिसको वेदान्त/उपनिषद और गीता में भी बड़े व्यापक रूप से समझाया गया है।
मनुष्य क्या है?
मनुष्य एक जीव है जिसकी चेतना सभी जीवों से ज्यादा हैं।
मनुष्य का शरीर उस जीव की अभिव्यक्ति को प्रदर्शित करने का-1
किसको देते हो सजा?क्या तुम नहीं वैसे?
किया है जो उसने,वो है तुम्हारे किए जैसे।
कौन यहां बुराई का नहीं पहना है ताज?
जिसके छिप कर रह गए,वही है ये राज।
"पूरे गुनाहों की सजा कोई भी नहीं देता,
अधूरे गुनाहों की सजाएं हैं,यहां पे सारी।"
कर्तव्य और कर्म में है बहुत अन्तर,
गीता ने दिया इसका ज्ञान निरन्तर.
कर्तव्य हमें बस संयोग से हैं मिला,
इसमें बस स्वार्थ का फूल है खिला.
कर्म सदा ही निस्वार्थ हुआ करता,
जो बस हममें आत्मज्ञान है भरता.
कर्म सदा स्वयं के पास ही है लाता,
कर्तव्य हमें बस यूँ ही है भटकाता.
@myogiadityanath@narendramodi योगी जी ,सरकार की हनक खास तौर से राजा का भय होना चाहिए सरकारी तंत्र पर ,आप औचक चेक करवाइए सिस्टम 80 प्रतिशत सड़क पर भीख मांगेंगे,आप सरकारी कर्मचारियों,अधिकारियों के भ्रस्टाचार रोकने के लिए एक ईमानदार लोगों की टीम बनाइये अन्यथा जनता की परेशानी और सरकारी पैसों की बर्बादी होती रहेगी
साधन मात्र है।
मनुष्य क्यूँ पैदा होते है?
मनुष्य पैदा होते है अपनी अतृप्त कामनाओं को पूर्ण करने के लिए।
चूंकि समय विस्तार से इसकी कामनाओं का स्वरूप कई भिन्न स्वरूपों में दिखता तो है पर सभी कामनाओं का उद्देश्य पूर्णता,शान्ति और आनन्द को ही पाने के केंद्रीय लक्ष्य पर स्थित है-2
आज से एक थ्रेड प्रारम्भ कर रहा हूँ,
"सनातन का वास्तविक स्वरूप मेरी दृष्टि में"
जिसको वेदान्त/उपनिषद और गीता में भी बड़े व्यापक रूप से समझाया गया है।
मनुष्य क्या है?
मनुष्य एक जीव है जिसकी चेतना सभी जीवों से ज्यादा हैं।
मनुष्य का शरीर उस जीव की अभिव्यक्ति को प्रदर्शित करने का-1
यदि चाहते हो साथ हमारा,
नफरत त्यागना होगा सारा।
ये स्थूल शरीर जिनसे बना,
जीवन भर यहीं छाया घना।
मूढ़-पागल जो हैं यहाँ बसे,
सोच व कृत्य से मिटा उसे।
सावधान हो बस जीवन में,
विचारों,संसार बसा वन में।
सब यहाँ वन ही के प्राणी,
बस बोलते यहाँ की वाणी।
-मणि
हे जीव!जीवन रहते बन जा शिव,
अन्यथा तू फिर से शव बन जायेगा।
ब्रह्मज्ञान का प्रकाश फैला तू अभी,
वर्ना अज्ञान के अंधेरे में खो जाएगा।
माया का दिया सब,माया से पार हो,
माया में फंस के,क्या ब्रह्म को पायेगा?
संसार से हट,मुक्त हो संसार के लिए,
या संसार में पड़कर मौत को पायेगा।
-मणि
जीवन क्यूँ मिला?
〰️〰️〰️〰️〰️
स्त्री-पुरुष की ये कहानी सुहानी,
यहीं जीवन की है वो रीत पुरानी।
जो समझ न सको,उसे समझाऊं,
मिला जीवन क्यूँ हमें,वह बताऊं।
यह बात हमें समझ कभी न आये,
क्यूँ उलझने जीवन में बढ़ती जाये।
मिलता नहीं हमें कहीं पर भी चैन,
जाने क्यूँ हैँ जीवन में बहुत बैचैन।
-मणि
जब अंधकार स्वयं पर हावी होगा,
तब प्रकाश स्वयं को भावी होगा।
बिन दुःखों के ज्ञान आता है कहाँ,
सुखों की चाह में भटकता है यहाँ।
काल की भी अपनी एक सीमा हैं,
धर्म जीवन में हमारे बहुत धीमा है।
या तो जीवन के कुचक्र से पार हो,
या मृत्य व दुःख से साक्षात्कार हो।
-मणि