तुम चाहते तो समझा सकते थे मुझे
जो नहीं आता वो सिखा सकते थे मुझे
तुम तो बड़े थे उम्र में मुझसे
चाहते तो राह दिखा सकते थे मुझे
पर आसान लगा तुम्हें छोड़ना
मैं क्यों करुं इसके लिए ये सब करना
अब तो खुश होगें तुम
खुद के लिए बेहतर चुन रहे होगें तुम
सुनो… आओ हम दोनों एक ऐसी छोटी-सी, मखमली ज़िन्दगानी बुन लें जिसमें न कोई रिश्ता का नाम हो, न कोई बंधन का बोझ। तुम भले कभी साथ न रहो, दूर-दूर तक कोई वादा न हो, फिर भी हम एक-दूसरे के भीतर ऐसे बस जाएँ कि हर साँस में तुम्हारी खुशबू घुली रहे और हर धड़कन में मेरा नाम गूँजे।कोई रिश्ता न सही, मगर हम दोनों एक-दूसरे का सबसे कोमल, सबसे गहरा हिस्सा बन जाएँ,जैसे चाँद रात का, जैसे बारिश मिट्टी का।
सुनो… आओ एक ऐसी रीत निभाएँ जिसमें न तुम कोई वचन दोगे, न मैं कोई कसम खाऊँगी।बस यूँ ही, बिना कहे-सुने, बिना माँगे-दिए, ये रिश्ता अपने आप बहता रहेगा। जैसे नदी किनारे से बिना पूछे बह जाती है, वैसे ही हम एक-दूसरे के दिलों में बिना किसी शर्त के उतर जाएँगे।कोई वादा नहीं, कोई माँग नहीं;सिर्फ दो आत्माएँ जो चुपके-चुपके एक-दूसरे को सहलाती रहेंगी।
सुनो… आओ उन खुशियों को चुन लाएँ जो सिर्फ हमारे लिए बनी हैं।अगर कभी रास्ते जुदा हो भी जाएँ, तो भी उन लम्हों की याद इतनी मीठी होगी कि होंठ अपने आप मुस्कुरा उठेंगे।वो शामें जब हमने बिना बात किए भी सब कुछ कह दिया था, वो चुपियाँ जो शब्दों से भी ज्यादा बोलती थीं,उन्हीं को संभाल कर रखेंगे हम, ताकि अकेलेपन में भी मुस्कान लौट आए।
सुनो… आओ थोड़ा-सा प्यार जताएँ, बिना शोर के, बिना दिखावे के।मेरे माथे पर तुम्हारे होंठों का हल्का सा चुंबन पड़ जाए, बस दो पल ठहर जाओ… और फिर कंधे पर सिर रखकर हम दोनों के विरह के आँसू बहने दो।वो आँसू शिकायत नहीं होंगे, वो सिर्फ इतना कहेंगे कि हमने एक-दूसरे को इतना चाहा कि जुदाई भी प्यार लगने लगी।
सुनो… आओ फिर वही पुराना किस्सा दोहराएँ। तुम बन जाओ कृष्ण बाँसुरी बजाते हुए, मनमोहन;थोड़े से छलिया भी और मैं बन जाऊँ राधा.. बिन फेरे, बिन मंगलसूत्र, सिर्फ प्रेम की माला पहने हुए।कोई सात फेरे न हों, कोई समाज की स्वीकृति न हो, फिर भी ये रिश्ता उतना ही पवित्र, उतना ही गहरा हो जाए जितना वृंदावन की उन गलियों में कभी था।
आओ, बिना किसी नाम के, बिना किसी दावे के, बस प्रेम के इस अधूरे-से, पूरे-से रिश्ते को निभाते रहें; हमेशा के लिए, और फिर भी सिर्फ इसी पल के लिए।✨❤
#રાધાસ્વરા
#बज़्म
जब तुम बिल्कुल पास होती हो
तो मेरी साँसों को भी
अपना रास्ता याद नहीं रहता
वे तुम्हारी साँसों में उलझकर
कुछ पल ठहर जाना चाहती हैं।
तुम्हारे बाल जब
मेरे चेहरे को छूते हैं
तो लगता है जैसे रात
अपनी सारी चाँदनी समेटकर
मेरी हथेलियों में उतर आई हो।
मैं तुम्हें देखता हूँ
और तुम्हारी आँखों की वह शरारत
मेरी सारी शराफ़त से
एक-एक करके हिसाब माँगती है।
तुम मुस्कुराती हो,
मैं और क़रीब आ जाता हूँ
तुम नज़रें झुका लेती हो
और मेरी धड़कनें
तुम्हारी ख़ामोशी का अर्थ पढ़ने लगती हैं।
काश, उस पल
तुम अपनी उँगली से
मेरे होंठों पर ठहरकर कहो
“इतनी जल्दी क्या है?”
और मैं मुस्कुराकर कहूँ
जल्दी नहीं है जान,
बस तुम्हारे इतने पास आकर
ख़ुद को सँभालना मुश्किल है।
फिर तुम्हारी हथेली
मेरी हथेली में हो
उँगलियाँ धीरे-धीरे उलझें
और वह मामूली-सा स्पर्श
पूरे जिस्म में
एक मीठी-सी बिजली दौड़ा दे।
तुम्हारा चेहरा मेरे इतने पास हो
कि तुम्हारी पलकों की कंपन तक दिखाई दे
तुम्हारी साँस मेरे होंठों से टकराए
और हमारे बीच
बस एक अधूरा-सा फ़ासला रह जाए।
मैं उस फ़ासले को मिटाने से पहले
एक पल ठहरूँ
तुम्हारी आँखों में इजाज़त तलाशूँ
और तुम्हारी झुकी हुई पलकें
बिना शब्दों के
वह जवाब दे दें
जिसका इंतज़ार मेरी धड़कनों को था।
फिर एक चुंबन
इतना धीमा कि समय ठहर जाए
इतना गहरा कि
उसके बाद कोई शब्द
ज़रूरी ही न लगे।
तुम मेरे सीने से लगो
और मैं तुम्हें बाँहों में ऐसे भर लूँ
जैसे बरसों की दूरी
एक ही पल में मिटानी हो।
उस रात चाँद बाहर रहे
सितारे बाहर रहें
दुनिया बाहर रहे
हमें बस एक-दूसरे में
इतना खो जाना हो
कि सुबह भी दस्तक दे
तो हम कहें
थोड़ा और ठहरो..
अभी तो हमारी रात
अपने सबसे ख़ूबसूरत हिस्से तक पहुँची ही कहाँ है।
तुम से सालों से न मिलने के बाद भी जो कशिश तुम्हारी यादों में है वो मुझे मजबूर करती है ये सोचने पर कि तुम होते तो क्या इस कशिश की तासीर भी ऐसी ही होती ? नहीं हो इसलिए हर जगह हो, मैंने तुमको तुम्हारे न होने में पा लिया है!! अफ़सोस है, पर सच है !!
प्रेम से रीति-रीति वह स्त्री अपने जीवन के हर पल को तन्मयता से परिवार के उत्तरदायित्वों में समर्पित करती रही। कभी पत्नी बनकर पति के सपनों को अपने आँसुओं और मुस्कानों से सँवारती, कभी माँ बनकर बच्चों के किरदारों को रात-दिन के प्यार से गढ़ती, उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत को अपनी इच्छाओं से ऊपर रखकर पूरा करती रही।
सुबह की पहली किरण से लेकर रात की अंतिम घड़ी तक वह घर के हर कोने में घूमती रही खाना बनाती, कपड़े धोती, बच्चों की देखभाल करती, पति की थकान मिटाती, और सबके चेहरे पर मुस्कान बनाए रखने के लिए खुद के थके हुए शरीर और सूने मन को नज़रअंदाज़ करती रही।
जब दिनभर की मेहनत से चूर-चूर हो जाती, हड्डियाँ दर्द करने लगतीं, आँखों में नींद की भारीपन छा जाती, तब उसके भीतर प्रेम की एक गहरी, प्यासी इच्छा जाग उठती। वह चाहती कि कोई उसे गले लगा ले, उसके सिर को सहलाए, थके हुए कंधों पर हाथ फेरते हुए बस इतना कह दे “तुमने पूरे दिन हमें पाला-पोसा, हमारा ख्याल रखा, अब आओ, मैं तुम्हें थपकियाँ देकर सुला दूँ। तुमने हम पर इतना प्यार लुटाया है, अब मेरी बारी है तुम्हें आराम देने की।” पर ऐसा कभी नहीं हुआ। उसके अटूट समर्पण को बस “कर्तव्य” का नाम देकर इतिश्री कर दी गई।
कोई नहीं पूछा कि उसके दिल में भी कोई खालीपन तो नहीं है, कोई थकान तो नहीं है। परिवार को भरपूर स्नेह देने वाली वह स्त्री खुद रीती की रीती ही रह गई,जैसे कोई सूखी नदी जो सबको पानी देती रहे पर खुद कभी नहीं भरती।
जब समय के साथ उत्तरदायित्वों का बोझ कुछ हल्का हुआ, बच्चे बड़े हो गए, घर की जिम्मेदारियाँ कम हुईं, तब उसके अंदर प्रेम की उत्कंठा और भी तीव्र हो उठी। जी चाहा कि अब कोई उसे भी निःस्वार्थ प्रेम करे,बिना किसी शर्त के, बिना किसी अपेक्षा के, बस इसलिए कि वह भी एक इंसान है, एक स्त्री है जिसके दिल में भी भावनाएँ हैं।वह चाहती थी कि अब तक का जो सूनापन, जो रीतापन उसके भीतर जमा हो गया था, कोई आकर उसे भर दे।
पर समाज की वर्जनाएँ और मर्यादाओं की बेड़ियाँ उसकी इच्छाओं पर और कसकर जकड़ गईं। स्त्री को इतना सोचना नहीं चाहिए, अब उम्र हो गई,लोग क्या कहेंगे…. इन सब बातों ने उसके दिल की आवाज़ को दबा दिया।वह कभी अपने लिए जी ही नहीं सकी।
क्षण-क्षण वह जैसे मर रही हो.. हर अनसुनी इच्छा के साथ, हर अनदेखी थकान के साथ, हर अधूरे सपने के साथ। क्षण-क्षण आहत होती रही, अपने अस्तित्व को दूसरों के लिए टुकड़े-टुकड़े करके बाँटते हुए खुद को खोती चली गई। उसका जीवन एक लंबी मौन कहानी बनकर रह गया, जिसमें प्यार तो बहुत दिया गया, पर खुद को कभी पूरा प्यार मिला ही नहीं।✨♥️
#રાધાસ્વરા
#बज़्म
दृष्टि का तर्क यही है कि मेरा चेहरा आधा छिपा है, फिर भी आकर्षण पूरा है क्योंकि सौंदर्य का प्रमाण ये नहीं कि सब कुछ दिखाई दे।सौंदर्य तो वो है जो नज़र को एक जगह ठहरा दे।
मैंने जानबूझकर खुद को पूरा नहीं दिखाया।जो सब कुछ दिखा दे वो आँखों का सफर एक पल में खत्म कर देता है और जो थोड़ा छिपा रहे... वो उम्र भर दिल में रहता है।
मेरी काजल से गहरी ये आँखें देखो इनमें कोई शब्द नहीं है।शब्द जहाँ अपनी आखिरी सीमा पर पहुँचकर चुप हो जाते हैं, वहीं से इनकी भाषा शुरू होती है।ये बोलती नहीं, ये महसूस करवाती हैं।ये मांगती नहीं, ये सब दे जाती हैं।
माथे पर ये बिंदी सिर्फ़ रंग नहीं है।ये मेरे वजूद का केंद्र बिंदु है। जैसे किसी शेर का सबसे जरूरी मिसरा, जैसे किसी राग की सबसे मीठी तान।इसे देखते ही तुम्हें लगेगा कि बाकी सब गौण है।
और मेरे होंठ...गुलाब की तरह निर्दोष।बस एक हल्की सी नमी लिए हुए।इतने पास कि उनकी गर्मी तुम्हें महसूस हो, और इतने दूर कि उन्हें छूने की तमन्ना तुम्हें बेचैन करती रहे।
तो सच बताओ - हुस्न आँखों से देखा जाता है? या उस तड़प से जो देखने के बाद रूह में उतर जाती है?
तुम मुझे देखकर चेहरा नहीं पढ़ रहे।तुम मेरे भीतर की वो खामोशी पढ़ रहे हो और शायद इसीलिए मैं आधे पर्दे में भी तुम्हें मुकम्मल लगती हूँ क्योंकि कुछ लोग देखने से नहीं,महसूस करने से मिला करते हैं।✨♥️
#રાધાસ્વરા
चाहिए तो बहुत कुछ था
तुमसे ,
कुछ अधूरे सपनों का
पूरा होना ,
कुछ शामें
तुम्हारे कंधे पर सिर रखकर बिताना ,
कुछ उम्र तुम्हारे नाम लिख देना
बस इतना ही चाहिए था
_अ|जे|य🕊️
सिलसिला ज़ख्म ज़ख्म जारी है
ये ज़मी दूर तक हमारी है
मैं बहुत कम किसी से मिलता हूँ
जिससे यारी है उससे यारी है
हम जिसे जी रहे हैं वो लम्हा
हर गुज़िश्ता सदी पे भारी है
मैं तो अब उससे दूर हूँ शायद
जिस इमारत पे संगबारी है
नाव काग़ज़ की छोड़ दी मैंने
अब समन्दर की ज़िम्मेदारी है
फ़लसफ़ा है हयात का मुश्किल
वैसे मज़मून इख्तियारी है
रेत के घर तो बह गए नज़मी
बारिशों का खुलूस जारी है
अख़्तर नाज़्मी
@SuryaPatidar5@ipsvijrk क्या होता है धर्म
क्या पढ़ाई लिखाई की बात करना, समाज की कुरीतियों पर बात करना, जातिवाद को खत्म करने की बात करना, लोगों के अधिकारों की बात करना, तार्किकता की बात करना, भ्रष्टाचार पर बात करना, सरकार से सवाल करना
धर्म विरोधी है
अगर आप यह सोचते है तो दिक्कत आपको है इनको नहीं
@arvindchotia लेकिन पत्रकारिता फिर भी हार रही है क्योंकि तुम्हारे जैसे नाजायज आदमी अपने आप को पत्रकार कहते हैं
जिस व्यक्ति ने अपनी कलम को किसी राजनीतिक पार्टी के यहां गिरवी रख रखा हो वह पत्रकार नहीं दलाल कहलाता है
जो लोग राजनीतिक पार्टियों की भाषा बोलते हैं वह पत्रकार कैसे हो सकते हैं
@narendramodi आप गाली देने वाली इस पीढ़ी को नसीहत तो दे देते हैं शायद यह लोग आपकी बात का मान भी रखेंगे
लेकिन आपकी राजनीतिक पार्टी द्वारा पाले हुए इन चिंटू का क्या होगा
क्या राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर की गई इस भद्दी टिप्पणी के बदले इस पर कार्यवाही होगी
ये सत्ता पोषित पिपासु हैं,
लेकिन मैं आश्चर्यचकित हूं कि अभी तक कांग्रेस शासित राज्य में इसके ऊपर FIR क्यों नहीं हुई।
ये देश के राष्ट्रपिता का अपमान है।