इफ यू लव समबडी, देन शो इट !!
ज़िन्दगी निकल जाती है, ये कहने में, बताने में। मुनीर नियाजी की एक बेहतरीन नज़्म है, जिसमें वे कहते हैं- हमेशा देर कर देता हूँ मैं . . .
कुछ ऐसी है कि . . .
"ज़रूरी बात कहनी हो, कोई वादा निभाना हो, उसे आवाज़ देनी हो, उसे वापस बुलाना हो, हमेशा देर कर देता हूँ मैं . . . ।।
मदद करनी हो उसकी, यार का ढांढस बंधाना हो, बहुत देरीना रास्तों पर, किसी से मिलने जाना हो, हमेशा देर कर देता हूँ मैं . . .
बदलते मौसमों की सैर में, दिल को लगाना हो, किसी को याद रखना हो, किसी को भूल जाना हो, हमेशा देर कर देता हूँ मैं...।।
किसी को मौत से पहले, किसी ग़म से बचाना हो, हक़ीक़त और थी कुछ, उस को जा के ये बताना हो, हमेशा देर कर देता हूँ मैं . . ."
(इरादा सिर्फ दो पंक्ति लिखने का था, मगर शुरू किया तो रुकना मुश्किल हुआ। पोस्ट लम्बी करने की माफी दें)
●●
तो अंग्रेजी की उस कहावत और मुनीर नियाजी के शेर की रौशनी में इस बात का उत्तर देना चाहता हूँ कि खुलकर कांग्रेस, गांधी, नेहरू, सोनिया, राहुल के लिए लिख देता हूँ।
इस घनघोर पप्पू प्रचार के दौर में, कमिटेड कांग्रेसी भी जो खुलकर नहीं कहते, वो मुझ नॉन-पॉलिटीकल बन्दे को इतने जोर शोर से कहने की जरूरत क्या है??
सीधी सपाट बात है- आई लव देम।
. . . एंड व्हाय आई शूड नॉट ??
●●
उनकी आज की राजनीतिक स्थिति चाहे जो हो, व्यक्तिगत रूप से बेदाग है, और हमारी ज़िन्दगियों पर उनकी बड़ी छाप है।
यह छाप निस्संदेह सकारात्मक है, खुशनुमा है। उनके सत्तर साल के राज के बावजूद देश में लोकतन्त्र रहा, बोलने लड़ने की आजादी रही, फ्लोरिशिंग इकॉनमी थी, समरसता थी, अवसर थे।
आज 10 साल में लोकतन्त्र, इकॉनमी, समरसता, अवसरों और व्यवस्था का जनाजा निकालने वाले मुझे बतायेंगे कि इंदिरा ने इमरजेंसी लगा दी थी ????
राजीव ने "भारी पेड़ गिरने का" डायलॉग बोला था, शाहबानो का फैसला पलट दिया था, नेहरू का एडविना से अफेयर था ??
●●
अरे छोड़िये जनाब।
जिनकी ज़िन्दगियाँ खुली किताब हैं, पचास वर्षों से देशी विदेशी अखबारों, मैगजीनों और किताबों में जो लिखा, वो मुट्ठी भर व्हाट्सप के नीचे कैसे दब जाने दूं।
आपके बार-बाला से लेकर दुनिया की चौथी अमीर महिला के फॉरवर्ड, नकली इतिहास, झूठे किस्से, और हिन्दू विरोधी बताना ...
इस पर यकीन करने के लिए कह कर, मेरी इंटेलिजेंस का अपमान मत कीजिये।
●●
मैं उनमें से नहीं जो हवा देख कर रुख तय करते हैं। सच्चाई और ह्यूमन इंटेलिजेंस हवा के रुख का मोहताज नहीं होती।
एग्जिट पोल और चुनाव के नतीजे, जनता की इस वक्त की एस्पिरेशन, इल्यूजन और भय बताते हैं। वे धर्म, हिस्ट्री, साइंस, लॉजिक , तथ्य और सत्य पर जनमत नहीं होते।
●●
कांग्रेस आपकी तिकड़मों से बीस साल में 100 और चुनाव हार जाये, इससे यह बात नही झुठलाई जायेंगी कि मैं, आप, ये देश 2014 में जहाँ थे, वो कांग्रेस की नीतियों की वजह से थे।
आपकी चुनावी जीत कैसे झुठला सकती है कि हम 10 साल में हर साल> हर माह> हर दिन> हर घण्टे . . . गिरावट, और सिर्फ गिरावट की तरफ ही बढ़े हैं।
जिन्हें गिरावट पसन्द है, वो संख्या में कम हैं, पर एकजुट हैं। नेता से प्रेम औऱ उसकी शख्सियत से जन्मी एस्पिरेशन की वजह से नहीं।
वो डर की वजह से, नफरत की वजह से , किसी तीसरे को कॉमन एनिमी समझने की वजह से उसकी छतरी तले बैठे हैं।
दिल पर हाथ रखकर कहें कि वे अपने नेता से प्यार करते हैं ?? सावरकर, श्यामू, नानू, गोलू, मुंजे से लेकर आज के सरेंडर मो'दी तक। किससे आपको "मोहब्बत" है ??
जीरो !!
आपका तर्क बस इतना है कि कमीने अब्दुल से देश को बचाने के लिए हमें बड़े कमीने लीडर की जरूरत है, और आप कन्विंस है कि
"मेरा लीडर सबसे ज्यादा कमीना है"।
माफ कीजिये, कमीनगी मेरे लिए चयन का पैमाना नहीं। आप डिनायल में रहिये, भारत की उपलब्धियों को नकारिये, उसमें कमियां निकालिये।
गर्व में रहिये कि आपके पास कमीनों की पूरी लीडरशिप तैयार है। मुझसे नहीं होता।
●●
मेरे पास एक ही प्रेम का प्रतीक है। एक ही लीडर दिख रहा है जो मेरी तासीर के मुताबिक है। वो फिलहाल राहुल है, तो मैं बेफिक्र समर्थन करता हूँ। और यह बेशक पॉलिटीकल है।
मगर गांधी, नेहरू, राजीव, सोनिया इनके प्रति मेरा भाव एक निजी सहानुभूति और कृतज्ञता का है। इफ आई लव दिस फैमली, तो कहने में क्या शर्म ??
आसन्न तानाशाही के खिलाफ ये परिवार, आखरी कांटा है।
ये जीतें या न जीतें, देश दोबारा अवसर दे, या न दे, कम से कम मुझे पलटकर अफसोस नहीं होगा कि मैंने कहने, बोलने, इजहार करने में देर की थी।
●●
देर आप कर रहे हैं, कन्फ्यूज्ड आप हैं, तो यह आपकी छाती का कांटा बनेगा। मुनीर नियाजी की नज्म रट लीजिये, काम आएगी।
या फिर . . .
इफ यू लव समबडी, देन शो इट
पहली तस्वीर में वो कपड़े है, जो राजीव गांधी ने अपने एसासिनेशन के वक्त पहने थे।
दूसरी तस्वीर एसासिन स्क्वॉड की मेम्बर नलिनी की है।
तीसरी इस परिवार का कैरेक्टर एसासिनेशन करने वाले की है।
●●
सुब्रह्मण्यम स्वामी इस देश के लीडिंग इकॉनमिक अफेयर्स के जानकारों में हैं।
गवर्नेस, इकॉनामिक्स औऱ लॉ के मामले में सिद्धहस्त इस बन्दे को जहां होना था, तमाम बुद्धिमत्ता, सीनियरिटी और टैलेंट के बावजूद वहाँ न पहुंच सका।
वजह शायद वो सेंसेशन थ्रिल है, जो उनके मुंह से कहीं भी, कुछ भी, किसी के लिए भी निकलवा सकता है।
●●
चन्द्रशेखर, नरसिंहराव और अटल जैसे लोगो ने इन्हें इज्जत दी, सलाह ली, मानी.. मगर जिम्मेदार पद कभी नही दिया।
इन्ही स्वामीजी ने जयललिता और सोनिया को मिलाकर, अटल की सरकार गिराकर, सोनिया सरकार बनाने में कोई कसर नही छोड़ी थी।
आज मोदी दौर में, मोदी के सबसे मुखर निडर आलोचक होने के बावजूद, पक्ष विपक्ष किसी का समर्थन और सम्मान से महरूम है।
दरअसल आजीवन, अंतहीन प्रलापों ने उनकी क्रेडिबिल्टी ऐसी शून्य कर दी, की कुछ भी कहें, तो लोग यकीन न करें।
●●
मैं सोनिया-राजीव के प्रेम, उनके जीवन के उतार चढ़ाव पर कुछ पोस्ट लिख चुका हूँ।
उस जगह पर बैठकर, उनकी तरह सोचकर, अन्तर्मन में उठती भावनाओ को समझने की कोशिश की। उस गैर राजनीतिक पोस्टों पे जो विमर्श पर जो असहमत उत्तर आये..
वो या तो डॉ नो (जेम्स बॉन्ड की फ़िल्म) की नायिका उर्सला आंद्रेस के फोटो थे। बारबाला, डांसर जैसी तोहमतें थी,
या स्वामी के हवाले से कही गयी बाते..
उनके कुछ वीडियोज के लिंक आये।
जिसमे उनका टैलेंटेड माइंड ... सोनिया को षडयंत्रकारी, जासूस, स्मगलर, बदचलन, अनपढ़ और सस्ती महिला बताने का कोई कंसिवेबल तरीका नही छोड़ता।
●●
सबूत कुछ नही है।
सिर्फ स्वतः कथन है। और सचाई का सबूत यह है कि लम्बे कांग्रेसी सत्ताकाल भी वे वीडियो डिजिटल स्पेस पर बैन नही हुए।
कांग्रेस अथवा गांधी परिवार से कोई काउंटर बयान आया। कोर्ट में कोई मामला उनके खिलाफ दर्ज नही हुआ।
लोग कहते है कि आज कोई झूठा वीडियो योगी-मोदी बारे के कहकर डाल देखिए, और उसका नतीजा देखिए। खाल खींच कर न ली जाये, तो कहना..
तो अगर वैसा विरोध और वैसा हस्र, कांग्रेस की सरकार में स्वामी जी का नही हुआ, तो स्वामी की सत्यता साबित हो गई, इतिसिद्धम।
इंटरनेशनल स्मगलर से सीआईए की जासूस तक.. प्रमाणित!!!
■■■◆◆■■■
बम विस्फोट का वो धमाका एक परिवार की आत्मा के चीथड़े कैसे उड़ा गया होगा, इन कपड़ो को देखकर सोचिये।
उस हत्या की षडयँत्रकारिणी, पार्टिसिपेंट, न्यायालय में दोषसिद्ध, उस नलिनी की मौत की सजा की पर क्लीमेंसी की अपील वर्ष 2000 में विपक्ष की नेता सोनिया ने की।
सजा कम्यूट हुई। आजीवन कारावास में बदली। समय पूर्ण होने पर रिहा हुई। आजाद जिंदगी जी रही है।
●●
बाद के किसी दौर में प्रियंका भी जाकर मिली। अखबारी वर्जन कहते हैं कि गले मिलकर रोई, और नलिनी को माफ कर आई।
उस नलिनी को माफ करने वाला परिवार, सुब्रह्मण्यम स्वामी के प्रलापों पर किसी अदालत में केस करने जाएगा????
अर्नब गोस्वामियों को तवज्जो देगा? सड़क छाप, फर्जी आईडी, नकली हैंडल चलाने वाले ट्रोल्स के खिलाफ, कार्यवाही करेगा?
●●
सूली चढ़ रहे उस सन्त नें, झूठा आरोप लगाने वालों, झूठी गवाही देने वालो,
और हाथ पैर में कील ठोक कर, लटका देने वालों को क्रुद्ध होकर शाप नही दिया। सन्त था न..
●●
उसने कहा..
ईश्वर, इन्हें माफ करना, इन्हें नही पता कि ये क्या कह रहे हैं।
जवाहरलाल- द नेपोलियन ऑफ इंडिया..
हमारी फोक्लोर में नेहरू को पासिफिस्ट माना जाता रहा है। शांति के कबूतर उड़ाता, भाईचारे के गीत गाता, पंचशील और भाई भाई की बाते करते हुए,
भारत की जमीन लुटाता शख्स...
संघी साहित्य की माने, तो सुबह नहाकर जब वे सूर्य नमस्कार को बैठते, तो जो भी पड़ोसी आकर कुछ टेरेटरी मांगता, वह तुरंत रजिस्ट्री कर देते। किसी को कोको आइलैंड दे दिया, किसी को अक्साई चिन..
केयरफुली क्राफ्टेड झूठ हैं।
●●
दौर भलेपन आदमी का था, तो नेहरू की छवि वैसी शरीफाना बनाई गई। आज धूर्तता को नमस्कार है..
जितना कमीना आदमी, उतना ही योग्य माना जाता है। तो दौर का लाभ उठाकर, नेहरू के कुछ धूर्त कारनामे बताने का सही वक्त है।
श्रीगणेश कश्मीर से।
●●
दो राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर बने देश- भारत और पाकिस्तान। आबादी के धर्म के हिसाब से, कश्मीर को पाकिस्तान से मिलना चाहिए था। सरदार पटेल, तैयार थे।
हिन्दू बहुल हैदराबाद के बदले, मुस्लिम कश्मीर छोड़ देना, उनका मत था। यह वीपी मेनन, उनके सचिव ने अपनी किताब में लिखा है।
अच्छा भला निपट जाता। लेकिन बदमाश नेहरू ने फच्चर फंसा दिया। हाथ पैर पटक कर जिद करने लगे- मुझे कश्मीर चिये,
चिये चिये, चिये..
ले भई। पटेल ने हरिसिंह को सड़काया। कश्मीर पट्टा भारत के नाम साइन कराया।
लेकिन तब तक पाकिस्तान वहां घुस गया। तो सेना भेजी, उनको भगाकर श्रीनगर जीता। आगे बढ़े, आधा जीत पाये, फिर सर्दी आ गयी। सर्द पहाड़ों पर लड़ने से सेना ने हाथ खड़े कर दिए।
सरदार पूछे- अब???
नेहरू ने हार न मानी। पट्टा हाथ मे लेकर, बाकी कश्मीर पर कब्जे के लिए यूएन गए।
वहां दांव उलट गया। UN बोला- वो एक स्टेट है, किसी राजा के बाप का माल नही, की पट्टा लिख देगा। वहाँ की पब्लिक तय करेगी किसके साथ जाना है।
याने प्लेबिसाइट की बात आई। नेहरू के माथे पर शिकन आई, लेकिन शरारत से मुस्कुराए।
बोले - ठीक, करवा देंगे।
और मरते दम तक,
घण्टा न प्लेबिसाइट कराया।
●●
लेकिन प्लेबिसाइट का प्लान बी बनाये रखा था..
याने शेख अब्दुल्ला।
वे दोनों तरफ के कश्मीर में पॉपुलर थे। वो दोनो ओर की पब्लिक को भारत के फेवर में ला सकते थे। तो उसको ललचाने के लिए इंडियन कश्मीर का प्रधानमंत्री बनवाया।
कश्मीर को 370 दिया। एकदम फुल ऑटोनमी।
रक्षा, संचार, विदेश नीति हमारी।
बाकी तो तुमयी राजा रहोगे भईया।
●●
लेकिन शेख कुछ ज्यादा ज्यादा उड़ने लगे। जितना मिला, उससे और ऑटोनमी मांगने लगे
ठीक। चलो भाई जेल..
प्रिय मित्र को जेल में ठूंस दिया।
फिर कश्मीर से 370 के आधे प्रावधान हटा दिए। मने भाई लोगों, इत्ता दुष्ट तो अमित शाह भी नही।
खैर, नेहरू ने शेख़ को दस साल जेल में रखा। इस दौरान धीरे धीरे कश्मीर की 80% ऑटोनोमी खत्म कर दी। 370 "खोखला खोखा" रह गया।
●●
जब शेख को अक्ल आ गई, तो बाहर लाकर सीएम बनवा दिया। जो आदमी पहले, प्रधानमंत्री बनके नाखुश था, अबकी बार मुख्यमंत्री बनके खुश था।
आप नोटिस कीजिए, मैनें कुछ नया नही बताया।
ये सब आपको पता है।
जरा दूसरे एंगल से।
भोले नेहरू के एंगल से।
●●
लेकिन अभी पिक्चर बाकी है दोस्त।
कश्मीर के डोगरा राजा का कब्जा, लद्दाख तक ही था। उसके आगे, उसका कोई नामलेवा न था। नेहरू ने भारत का नया नक्शा बनवाया, जिसमे भारतीय सीमा, लद्दाख से 600 किलोमीटर आगे तक दिखाई।
और फिर, लद्दाख से आगे, असल जमीनी कब्जा भी शुरू किया। इसे फार्वर्ड पॉलिसी कहते हैं।
गूगल करिये।
क्योकि यह आपको पता नही है।।
●●
ये जमीन कब्जे की पॉलिसी, नए नक्शे, चीन से तनातनी की वजह बनी। जब चीनी सेना अड़ गयी, युद्ध के हालात हुए,
तो नेहरू ने आगे बढ़ना रोक दिया। वैसे भी वे, अब तक 300 किलोमीटर आगे बढ़कर जमीन दबा चुके थे। काफी था..
तो एकदम से शांति का कबूतर बनकर "पंचशील" औऱ "हिंदी चीनी- भाई भाई" का जाप लगाने लगे।
चीन, जो शुरू से यूएन का परमानेंट मेम्बर था.. लेकिन मेम्बरशिप सस्पेंड थी, उसे वापस दिलाने को बयानबाजी भी करने लगे।
उनको पता था - UNSC के खेल दूसरे हैं। उनके बयान से माओ को UNSC, घण्टा न मिलनी।
परन्तु इन सब कृत्यों से चीन के उफान पर ठंडक पड़ गयी।
यह 1958 की बात है। याद रहे, नक्शे के अनुसार लगभग 300 किमी आगे कब्जा करने के बाद... कबूतर बनकर "पंचशील" औऱ "हिंदी चीनी- भाई भाई" का जाप लगाने लगे।
आगे वे जितना कब्जा नही कर पाए, उसे ही व्हाट्सप साहित्य में चीन को दे देना, कहा जाता है।
●●
बहरहाल, चीन से फुर्सत मिली तो जनाब, गोआ पर टूट पड़े। उसपे तो 1954 से ही दबाव बना रखा था।
याने फ्रेंच को सटिया के, 1954 में पांडिचेरी खाली कराने के बाद, वे गोआ खाली कराने को पुर्तगाल के पीछे पड़े थे। लेकिन पुर्तगाल, लातों का भूत था। बात से मानने वाला नही।
1961 में गोआ में फौजी जीत मिली, पर इतना काफी नही था। UN हमारे खिलाफ प्रस्ताव कर देता, तो गोआ लौटाना पड़ जाता।
तो दिन रात गुटनिरपेक्षता का जाप करने वाले नेहरू ने रूस से सेटिंग की। पुर्तगाली प्रस्ताव गिर गया।
यह भी आपको पता है।
दूसरे एंगल से।
●●
हर नेपोलियन का वाटरलू होता है। भारत के नेपोलियन, जवाहरलाल का वाटरलू 1962 था।
अपर्याप्त सेना, अपर्याप्त साजोसामान की बात की जाती है। सेना के पास गर्म कपड़े न होने की बात कही जाती है। ये जानिए की 1947 में भारत की सेना लगभग ढाई लाख थी।
1960 तक सेना आठ लाख हो चुकी थी। सेना पर व्यय 92 करोड़ से बढ़कर 1.07 बिलियन डॉलर हो चुका था।
कितने % की वृद्धि हुई, हिसाब करें।
हां, यह सच है कि हड़बड़ी में हरियाणा से उठाकर कश्मीर भेजी गई यूनिट्स के पास आज की तरह के आधुनिक गर्म कपड़े नही थे।
लेकिन व्हाट्सप फार्वर्ड पाठकों को लगता है कि अक्टूबर की बर्फीली रात में मेजर शैतान सिंह कच्छा बनियान पहन कर लड़ रहे थे। यह भी गलत है।
●●
नेपोलियन ने वाटरलू के बाद राज्य खोया, सम्मान नही। मगर 1962 मे नेहरू ने जमीन नही खोई, पर सम्मान खोया।
दरअसल चीन जानता था, नेहरू जादूगर है। कुछ न कुछ कर देगा। और सच मे, पुर्तगाल मामले में रूस का सहयोग लेने वाले गुटनिरपेक्ष नेहरू, अबकी अमेरिका से फ्लीट मंगा लिए।
खबर सुनते ही चीन ने एकपक्षीय युद्ध विराम किया। जीता जिताया तवांग, अरुणाचल छोड़कर भागा।
सारे इलाके खाली कर दिए।
●●
नेहरू की बदमाश बुद्धि, भारत के दिग्विजय के काम आती रही। पर यह कटु सत्य तो यह ही, कि नेहरू बदमाश थे।
दुष्ट नेहरू ने पुर्तगाल, पांडिचेरी से उनके इलाके छीने। दुनिया को गुटनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाते, खुद जब मर्जी अमेरिका या चीन को दुह लेते।
पर सबसे ज्यादा उन्होंने पाकिस्तान और चीन का दिल दुखाया। उनकी जमीन छीनी। और छीनने के लिए आगे वाली पीढ़ियों को नक्शा-क्लेम थमा गए। क्या आश्चर्य की आज, पाकिस्तान और चीन के एजेंट, उनसे नफरत करते हैं।
उन्हें गद्दार,अय्याश और बदमाश कहते हैं,
तो क्या गलत कहते हैं??
नेपोलियन को भी तो बहुत से फ्रेंच, अय्याश, गद्दार और बदमाश कहते रहे हैं।
●●
इसलिए कहा- जवाहरलाल..
इज नेपोलियन ऑफ इंडिया..
केनेडी, नेहरू और नेफा
1954 में नेहरू ने भारत एक का नया नक्शा छपाया। समुद्र तट, रेडक्लिफ लाइन पे कोई समस्या न थी।
कश्मीर में उन्होंने कश्मीर राजा के विवादित नक्शो का रेफरेंस लिया, नेफा में 1915 की शिमला कॉन्फ्रेस का..
यहाँ समस्या होने वाली थी।
●●
नार्थ ईस्ट फ्रंटियर प्रोविंस- नेफा, जो अब अरुणाचल है। यहाँ नेहरू ने सीमा मैकमैहन लाइन को दिखाया, और कश्मीर में जॉनसन लाइन को। इतिहास में इन पर अंग्रेजो को, चीन ने कभी सहमति नही दी थी।
खटपट हुई। तो 1959 में चीन का प्रपोजल था,अक्साई चिन पर जानसन लाइन वाले, महाराजा हरिसिंह का फर्जी नक्शों को छोड़, हम जमीनी वास्तविकता को स्वीकार ले।
तो बदले में वह नेफा में मैकमैहन लाइन स्वीकार लेगा।
●●
यह फेयर प्रपोजल था। रक्षामंत्री कृष्णा मेनन सहमत थे। नेहरू भी "नॉट ए ब्लेड ऑफ ग्रास ग्रोन देयर" कहकर मंशा जाहिर कर चुके थे।
लेकिन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद सहित कैबिनेट के कई मंत्री, तथा सन्सद में संघी और कम्युनिस्ट दल, एकाएक परम् राष्ट्रवादी बन गए। मिलकर अभियान छेड़ दिया।
"गंजे सिर पर सिर बाल नही उगता, तो सिर कटवा लें क्या??"- महावीर त्यागी जी का ये व्यक्तव्य पढ़ा होगा आपने..
"लड़ के लेंगे' की जिद ऐसी, कि रक्षामंत्री मेनन की, दिल्ली में चाऊ से मुलाकात भी नही होने दी गयी। वे नेगोशिएटेड सेटलमेंट के समर्थंक जो थे।
●●
ये बेसिकली हठधर्मिता थी। दुनिया के देश, विवादित सीमाये, भूमि के लेन देन से सुलझाते हैं,
या फिर युद्ध से।
कश्मीर में पाकिस्तान, शकसम घाटी में लैंड स्वेपिंग से, चीन के साथ विवाद सुलझा चुका है। नेपाल, बंगलादेश, लंका के साथ हम भी, यही सब कर चुके है।चीन के साथ भी ऐसा हो सकता था।
पर 1959 गंवा दिया गया। स्थायी दुश्मनी, और युद्ध आज नही तो कल, होना था। चीन ने मौके का इंतजार शुरू कर दिया।
●●
नेहरू के कूटनीतिक सम्पर्क, भारत के लिए कवच थे। मगर हमारी सन्सद, जनता, और अखबारों को 1961 में गोवा जीतकर लगने लगा कि हम मिलिट्री सुपरपॉवर भी हैं।
ये मुगालता था।
तो चीन ने हमले का वक्त वह चुना, जब दुनिया की निगाहे क्यूबा मिसाइल संकट में टिकी थी। याने नेहरू के अंतरराष्ट्रीय सम्पर्क, सारे बड़े विश्व नेता, क्यूबा मिसाइल क्राइसिस में व्यस्त थे।
●●
क्यूबा क्राइसिस के अगले दिन शुरू हुआ चीनी हमला, क्यूबन क्राइसिस खत्म होते ही थम गया। तुरन्त चीन ने आगे बढ़ना रोक, बातचीत की पेशकश की।
नेहरू ने ठुकरा दिया।
अब वे एस्केलेट करने के मूड में थे। अभी तक वायुसेना के इस्तेमाल नही हुआ था। अब करने के लिए, नेहरू ने अमेरिका से विमान मांगे।
●●
केनेडी ने, फिलीपींस में खड़े USS किट्टीहॉक विमानवाहक फ्लीट को भारत रवानगी का आदेश दे दिया।
USS किट्टीहॉक से उड़े प्लेन चीन पर हमला नही करते। हमला तो भारतीय प्लेन करते। लेकिन भारतीय वायुसेना छोटी थी।
तो USA के प्लेन, भारतीय वायुसेना का बैक साइड कवर करते। वे भारत मे चीन के जवाबी हवाई हमलों को रोकते।
पर इस योजना की जरूरत नही पड़ी।
●●
किटीहॉक की रवानगी की खबर सुनकर ही चीन ने एकतरफा युध्द विराम कर दिया।
अरुणाचल याने नेफा के जीते हुए तवांग वगैरह इलाके, अचानक खाली करके लौट गया।कश्मीर (अक्साई चिन) में वह पहाड़ियों की पीक पर बना रहा, लेकिन घाटियां खाली कर दी।
●●
अगर देखें, तो नेफा छोड़ना, मगर अक्साई चिन में बने रहना, चीन के उसी 1959 प्रपोजल के अनुरूप था, जिसमे वह नेफा देकर अक्साई चिन रखना चाहता था।
नेहरू ने लाखों वर्गमीटर जमीन चीन के हवाले कर दी, कहना सिरे से गलत है। जो नक्शा हम देखते है, फाल्ट उसमे है।
वो अतिवादी क्लेम है।
●●
1962 निस्संदेह, शर्मनाक था। पर जमीन का नुकसान बेहद कम रहा। जिन शिखर पर चीनी बैठे थे, उनकी घाटियों में भारतीय फ़ौज 20 साल पहले तक गश्त करती रही है।
हमने 1967, 1988 में चीन को शानदार मात दी, शांत रखा। पर चीन की दोबारा हिम्मत, अटल के 2003 के चीन के डिजास्टरस दौरे के बाद बढ़ी।
अटल ने तब जमीन नेगोशिएट करने के लिए जॉइंट वर्किंग ग्रुप बनवाया। याने हल्काई जाहिर की।अब हर साल चीन, थोड़ा थोड़ा आगे बढ़ता है।
हमारा नेता, टैंक में सवारी करते फोटो तो खिंचवाता है।लेकिन चीन का नाम लेने से डरता है।
●●
आज न अमेरिका आपके साथ है, न रूस। सेना की ऑर्डिनेंस फैक्ट्री, निजी व्यापारियों को बेच रहे है। दिहाड़ी में सैनिक भर्ती हो रहे हैं।
शहीदों के स्मारक अपने हाथों से तोड़, उसे बफर जोन बना रहे हैं। इतना कमजोर भारत शायद कभी नही देखा गया।
मगर दोष देने के लिये 1962, और नेहरू नाम का मन्त्र उपलब्ध हैं।
●●
मैं कहता हूँ कि कुछ तो शर्म और लाज अपने हिस्से भी रखिये। अपने निकम्मेपन पर लजाइये।
जनता के इतिहास अज्ञान का इतना भी लाभ उठाना ठीक नही।
नेहरू ने वीटो पॉवर,चीन को दिलवा दी?
ऐसा मिसकॉन्सेप्ट आपको भी है, तो ये पोस्ट आपके लिए..
●●
और च्यांग काई शेक का इस किस्से से गहरा नाता है।
ये शेक कोई जूस, ड्रिंक या मिल्कशेक नही इंसान का नाम है भक्तों, ध्यान से सुनो। शेक साहब 1928 से चीन के प्रेसिडेंट थे, 1974 तक।
अब बोलो ऐसे कैसे??
तो माओ कौन था..!!
अब शांति से सुनोगे, तो न समझोगे।
●●
तो च्यांग काई शेक साहब जो थे, कॉमिनतंग पार्टी के लीडर थे, जो 1928 से चीन में सत्ता में थी।
दुनिया मे अच्छी पकड़ थी। 1945 में जब दूसरा विश्वयुद्ध हुआ, तो उसके दो थियेटर थे।
पहला यूरोप, जहां जर्मनी इटली आदि के खिलाफ थी। और दूसरा- एशिया, जापान के खिलाफ़। यह तो आपको पता है।
तो जब युद्ध खत्म हुआ तो 5 विजेता देश थे। योरोप में फ़्रांस ब्रिटेन रूस, अमेरिका.. एशिया में चीन, ब्रिटेन और अमेरिका।
●●
युद्ध पश्चात शांति कायम रखने वाला एक संगठन बनाना तय हुआ- यूनाइटेड नेशन्स।
संस्था बनी, उसका चार्टर ( सम्विधान) बना। उसमे ये 5 ने वीटो पॉवर रखी अपने पास।
पबाकी के चवन्नी राइट्स महासभा और अन्य सदस्य देशों में बांट दिए। इसे विजेताओं द्वारा वर्ल्ड ऑर्डर में की गई लूट समझिए।
तो इसका मतलब, चीन 1945 से ही वीटो पॉवर था। भारत आजाद होने के पहले, नेहरू के पीएम बनने के पहले..
वीटो पॉवर वाले चीन के नेता थे- च्यांग काई शेक।
●●
और उनका तख्ता 1949 माओ ने पलट दिया।
शेक साहब बीजिंग से भागे, और फारमोसा चले गए। यूं समझिए कि कोई भारत से भागकर अंडमान चला जाये।
माओ ने शेक का पीछा न किया। तो फारमोसा याने ताइवान, अलग देश की तरह हो गया। चीन में माओ,
ताइवान में शेक।
लेकिन दोनो अपने आपको चीन का प्रेसिडेंट कहते।
●●
अब सवाल ये की यूएन की वीटो सीट में शेक बैठे या माओ। यहां बड़ा पेंच था। शीतयुद्ध शुरु हो चुका था। दुनिया खानों में बंट गयी थी। रूस कम्यूनिस्ट देश, माओ भी कम्युनिस्ट थे।
असल मे बन्दूक की जिस नाल से माओ की सत्ता निकली थी, वह बंदूक मास्को ने ही भेजी थी। ऐसे माओ को मान्यता देने से के यूएन में कम्युनिस्ट खेमा भारी हो जाता।
अमरीका ने यथास्थिति बनाये रखी। याने शेक की मान्यता को जारी रखा। इससे ताइवान को पूरा चीन होने का दर्जा मिल गया।
शेक अपनी मौत तक, चीन के प्रेसिडेंट होने के नाते, यूएन की परमानेंट सीट को एन्जॉय करते रहे।
●●
इधर 1952 की एक शाम, आईजनहॉवर नेहरू से मिले। भारत को आजाद हुए 5 साल हुए थे, रिपब्लिक बने महज 3 साल।
अभी देश कमजोर था। माओ वाला चीन पड़ोसी था। उससे सौहार्दपूर्ण मित्रता रखना पहली जरूरत थी। लेकिन हालांकि नेहरू का कद, देश के वास्तविक कद से ऊंचा था, क्योकि वे गुटनिरपेक्षता के नाम पर, वे देशों के एक बड़े समूह के नेता थे।
महासभा में उनका जलवा था। तो अमेरिकन प्रेजिडेंट ने पूछा- क्यों भैया, परमानेंट मेम्बर बनोगे??
●●
सवाल ट्रिकी था। नेहरू को विश्व राजनय की समझ थी।
1- यह सवाल, यूएन का भारत को फार्मल प्रपोजल नही था।
2- यह सवाल, यूनाइटेड स्टेटस ऑफ अमेरिका का रिपब्लिक ऑफ इंडिया को फार्मल प्रपोजल नही था।
यह एक शाम एक नेता, दूसरे नेता से कैजुअल चैट कर रहा था। यह ट्रैप हो सकता था।
ट्रैप, कोल्ड वार की राजनीति में भारत को अमेरिकी खेमे में खींचने का। इसके बाद रशिया भारत का दुश्मन हो जाएगा, चीन भारत का दुश्मन हो जाएगा, गुटनिरपेक्ष बिखर जाएगा।
भारत अमेरिकन खेमे के मान लिया जाएगा।
लेकिन फिर भी आइजनहॉवर, अकेले भारत को परमानेंट सीट दिला नही सकते। उन्हें उसे दूसरे देशों की मदद से चार्टर में बदलाव करना होता।
तो क्या दूसरे देश मदद करेंगे?? भारत चीन की जगह आये, यह रूस, चीन कम्युनिस्ट ब्लॉक होने नही देता। चीन की जगह भारत के आने के प्रस्ताव पर, रूस का वीटो लाजमी था।
चीन अभी तक दुश्मन नही बना था।उससे खुली दुश्मनी हो जाती, कम्युनिस्ट ब्लॉक के सारे देशों से भी। मने खाया पिया कुछ नही, गिलास फोड़ा बारह आना।
●●
नेहरू ने असल सवाल पूछा- क्या यूएन के चार्टर में बदलाव होने की सम्भावना है?
आइजनहॉवर ने कहा- फिलहाल कोई सम्भावना नही। नेहरू में अक्ल थी। मुस्कुराकर कहा- थैंक्स, बट नो थैंक्स ..
●●
यह किस्सा अंग्रेजी में कई इतिहासकारों और लेखकों ने लिखा जिसमे शशि थरूर भी शामिल है।
अंग्रेजी में लिखा होने के कारण, च्यांग को किसी प्रकार की काई का शेक समझने वाले भक्तों ने एक ही लाइन पकड़ ली
"नेहरू ने चीन को परमानेंट सीट दिला दी"
●●
उनके लिए किस्सा हिंदी में लिखा है।
शेक साहब 1975 तक जिये। ताइवान के फादर माने जाते है, पर खुद को सदा, पूरे चीन का शासक बताते रहे।
शेक और माओ के मरने के बाद चीन को, चीन की वीटो सीट बाइज्जत दे दी गयी।
ये नेहरू के मरने के 12 साल बाद हुआ।
दो जुड़वां देश- एक गर्भ से एक वक्त में पैदा हुए।
भारत और पाकिस्तान।
दोनों की एक ही आर्मी, एक ही कॉलेज से प्रशिक्षित अफसर। मगर पाकिस्तान में तीन मिलट्री तख्तापलट हुए, भारत मे लोकतन्त्र फला फूला।
कभी सोचा क्यों?? आज समझिये।
पाकिस्तान में क्या नही हुआ, भारत मे क्या हुआ??
●●
पाकिस्तान का सम्विधान दस साल तक लिखा न जा सका। व्यवस्था वही "पुलिस स्टेट" वाली थी, जो अंग्रेज छोड़ गए थे।
सब कुछ गवर्नर जनरल, याने जिन्ना के हाथ मे था। वो पद से ज्यादा, अपनी पार्टी और देश मे रिस्पेक्टेड होने की वजह से सुप्रीम थे।
मगर गवर्नर जनरल उम्रदराज था, बीमार भी। कायदा ठीक से बिठाने के पहले, कायदे आजम चल बसे। दाहिने हाथ लियाकत की तीन साल में हत्या हो गयी।
देश अब बन्दर ब्रिगेड के हाथ मे था, जिनका अनुभव, जिन्ना के निर्देश पर जनता में भड़काऊ भाषण, दंगे करने और गालीबाजी तक सीमित था।
पार्टी या सरकार, किसी की कोई न मानता।
●●
1953 में एंटी अहमदिया दंगे हुए। सिविल एडमिनिस्ट्रेशन फेल रहा, तो आर्मी बुलाई गई। वेल स्ट्रक्चर्ड आर्मी ने सिर्फ इसे कंट्रोल किया, बल्कि कुछ समय सिस्टमेटिकली एडमिनिस्ट्रेशन सम्भाला।
आर्मी की इज्जत बढ़ी।
आर्मी की सुनी जाने लगी।
जनरल अयूब को पाकिस्तान सरकार में जगह मिली। जब 1958 आते आते सिविल एडमिनिस्ट्रेशन पूरा कोलैप्स हो गया, देश आर्मी प्रशाशन को सौप दिया गया।
मार्शल लॉ लगा, तो पाकिस्तानी खुश हुए।
कहा माशाल्लाह लग गया।अयूब जल्द ही खुदमुख्तार तानाशाह बन गए। आर्मी के बूते राज किया, और उनका राज,
देश की तरक्की का रहा।
●●
हमारी आर्मी, 250 साल पुरानी, अंग्रेजो की बनाई हुई थी।
1857 का विद्रोह, बंगाल और बिहार के इलाकों में असरकारी रहा। ब्रिटिश ने एक नीति अपनाई, इन इलाकों के लोगो को सेना से बाहर किया।
अब आर्मी पंजाब के लोगो से, भर दी। तो 1947 में भारत की आर्मी तीन चौथाई पंजाबियों से भरी थी। याने मुसलमान, जाट, पहाड़ी और सिख्ख। आज भी सेना की नौकरी का ज्यादातर प्रचलन यहीं है।
बफर के रूप में 20% नेपाली गोरखा भर दिए।
पार्टीशन के बाद, आधे से ज्यादा पंजाब- पाकिस्तान बना। आर्मी के आधे पंजाबी, जो मुस्लिम थे, पाकिस्तान चले गए। भारत की आर्मी में पंजाबियों की % संख्या घटी, गोरखा रह गए, बाकी दूसरी रेजिमेंट्स भी।
और अब जातीय-क्षेत्रीय अनुपात देखा जाए, तो भारत की आर्मी बैलन्स यूनिट थी। ऐसी सेना में धार्मिक/क्षेत्रीय एका नही था। लेकिन पाकिस्तान आर्मी में पंजाबी भरे पड़े थे।
सिंध, खैबर, पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) का प्रतिनिधित्व सेना में, नही के बराबर था।
मार्शल लॉ मे सेना ही सरकार/ सिविल प्रशासन थी। याने अब सिविल प्रशाशन में भी सिंध, खैबर, पूर्वी पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व नही था।
कुल मिलाकर पाकिस्तान के दूसरे हिस्से पंजाबी साम्राज्य की कालोनियां बन गए।
●●
बीच बीच मे आयी डेमोक्रेटिक सरकारो ने वोट के लिए विभाजन को हवा दी। उर्दू को नेशनल लैंग्वेज घोषित कर देना, अहमदियों को नॉन मुस्लिम घोषित करना, शियाओं को दोयम दर्जे का समझना, इन सबने पाकिस्तानी सोसायटी को बारूद के ढेर पर बिठा दिया।
दंगे,आंदोलन, असंतोष... पाकिस्तान एक रखना किसी आर्म्ड फोर्स के बस की ही बात थी, तो आर्मी की जरूरत बढ़ती गयी। वही हालात आज हैं।
इस पर आर्मी को वही वित्तीय स्वतंत्रता थी, जो ब्रिटिश जमाने से चली आ रही थी। सेना, सरकारी बजट से पैसे तो लेती, लेकिन सिविलयन सरकार उसका आडिट नही कर सकती। दशकों तक पाकिस्तान का 70% नेशनल बजट आर्मी को समर्पित था।
लेकिन हिसाब लेने की औकात नही। आर्मी इस पैसे का क्या करेगी, उस पर सिविल गवर्नमेंट का दखल न तब था,
न आज है।
●●
भारत की बागडोर गांधी ने अपने घोषित उत्तराधिकारी नेहरू को सौपी। जो युवा था, कांग्रेस का चुनावी चेहरा था, समावेशी और दूरदर्शी था। वह गवर्नर जनरल नही, प्रधानमंत्री था।
कैबिनेट सिस्टम (एकमुखी सरकार नही) लेकर नेहरू चले। ढाई साल में सम्विधान बनाया। डोमिनियन स्टेटस खत्म कर, वेल ऑर्गनाइज्ड रिपब्लिक बनाया। धार्मिक समूहों के सेपरेट इलेक्टोरेट खत्म किये गए, चुनाव कराए।
और खुद भी प्रधानमंत्री पद पर ही रहे। ऐसा पद जिसका नाम सम्विधान में एक बार बस आता है। जो राजा के बराबर राष्ट्रपति को, सलाह मात्र देने के लिए होता है।
किसी दूसरे को संवेधानिक बॉस स्वीकारने का बावजूद, यह उनका निजी आभामंडल, और नैतिक स्वीकार्यता थी, जिसने सन्सद, मन्त्रिमण्डल, फर्स्ट अमंग इक्वल की परिपाटियां बिठाई और लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत किया।
उन्होंने सिविल ब्यूरोक्रेसी को मजबूत किया। तेजी से विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएं लायी। आजादी मिलते ही दस साल में विकास के मंदिर दिखने लगे। आजादी के बाद 15 साल, लोगो को किसी दमन का सामना नही करना पड़ा।
●●
कांग्रेस का संगठन, मुस्लिम लीग के उलट, बहुलता वादी था। इसमे हिदू मुसलमान, मलयालम, बंगाली, अमीर गरीब सभी थे।
तो सरकारो में सभी जाति धर्म समुदायों के लोग को अवसर मिला। कुछ को उनकी जनसाख्यिक क्षमता से ज्यादा भी, जिसे आजकल व्हाट्सप में तुष्टिकरण कहते हैं।
और हां, मंडल के चालीस साल पहले, सरकारी नौकरियों में आरक्षण भी लागू हुआ। यह भी नेहरू की देन थी।
जो मेरिट के छातीकुटवे हैं, जरा समझें, की सरकारी नौकरी आपके "कालेक्स" "करोला" और लिखने-रटने की क्षमता का इनाम नही है। रेजीम को प्रशासन में सभी समुदायों को प्रतिनिधित्व देना मजबूरी है।
ऐसी पॉलिसी, देश को अखण्ड, शांत रखने की दूरदर्शिता है
●●
पाकिस्तान एक देश-एक भाषा के नाम पर टूटा। बंगालियों पर उर्दू थोपी गई। नेहरू की दूरदर्शिता समझिए। 1956 मे भाषायी आधार पर तनाव होता दिखा, तो उस आधार पर राज्य बनाए। अपना राज्य, अपनी भाषा।
18 भाषाओं को संवैधानिक मान्यता दी।
फेयर इलेक्शन, और राज्यों में निर्वाचित सरकारें बनी। केंद्र और राज्य की सरकारों के बीच अधिकार लूटने की परंपरा नही बैठी, बल्कि सम्विधान में लिखे स्पस्ट विभाजन को क्रियान्वित होने दिया गया।
राज्य के मुख्यमंत्री को, प्रधानमंत्री के मातहत कर्मचारी के जैसे ट्रीट करने की परम्परा नही रखी ।
●●
और सेना को लेकर नेहरू प्रो एक्टिव रहे।
उनकी अपनी अंतराष्ट्रीय वकत, भारत के वजन से ज्यादा थी। वे और कृष्णा मेनन इंटरनेशनल डिप्लोमेसी के स्टार थे। तो रक्षा, सेना से अधिक कूटनीति के भरोसे डाली।
वाइसराय हाउस में पहले राजगोपालाचारी बैठे।
और फिर राजेन्द्र प्रसाद।
पर नेहरू, वे गए तीन मूर्ति भवन, जो ब्रिटिश कमांडर इन चीफ का आवास था। यह सन्देश था- सिविलयन गवरनेंट इज द बॉस..
1955 में कमांडर इन चीफ का पद खत्म हुआ।
उसकी जगह तीनों सेनाओं के कमांडर को बराबर महत्व दिया गया। प्रोटोकॉल की लिस्ट बनाई, तो उसमे राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री ऊपर रखे गए।
सेना का खर्च सीएजी के दायरे में आया। सेना किसी सिविलयन कार्य मे नही लायी जाएगी, यह स्पस्ट कर दिया गया।
●●
सेना ने शांति से पावर कट स्वीकार लिया, ऐसा नही है।
कहना नही चाहिये, पर जानना चाहिए, कि इस बदलाव के दौर के सेनाध्यक्ष, नेहरू से खफा क्यों थे।
इस दौर में कृष्णा मेनन को रक्षा मंत्री बनाया गया। नए मिलिट्री एकेडमी बनी, नई कमांड बनी। यह विस्तार के साथ साथ, सेना के भीतर पावर डिवाइड करने का तरीका भी था।
1955 से 62 का दौर मिलट्री के नजरिये से काफी विवादित है। इंटेलिजेंस ब्यूरो, जो सिविलयन खुफिया विंग बनाई थी, सेना के कुछ अफसरों पर निगाह रख रही थी।
इस वक्त सेनाध्यक्ष थिमैया अपने फेवरिट को उत्तराधिकारी बनाने के लिए सीधे राष्ट्रपति को रिकमेंड कर रहे थे। नेहरू ने दखल दिया, सीनियरिटी का प्रिंसिपल लाया।
गुस्साए जनरल ने इस्तीफा दिया, पर नेहरू की कॉल पर वापस लिया।उस दौर में सेना के जनरलों के बीच छिड़े शीतयुद्ध और गुटबाजी पर काफी रेकॉर्ड मौजूद है।
बहाने कुछ भी हों, पर सेना उस वक्त पाकिस्तान मिलट्री को ताकत पर ताकत हासिल करते, और खुद की पावर कट होते देख रही थी। इसे कंट्रोल करने के प्रयासों को एंटी नेहरू साहित्य में इस्तेमाल किया जाता है।
●●
1962 में चीन से हार के बाद सेना वृद्धि करने का निर्णय हुआ। लेकिन इसके साथ घरेलू अर्धसैनिक फोर्स भी बने।
आज 14 हमारी लाख फ़ौज है, तो 12 लाख की पैरामिलिट्री भी। मिलाकर देखें तो सेना यह दुनिया मे सबसे बड़ी है।लेकिन चतुराई से देखें, तो सेना के बराबर अर्धसैनिक बल हैं। जो सेना की कमांड से अलग है।
राज्यो के सशस्त्र बल अलग है। किसी एक अहमक अफसर के आदेश पर 25 लाख सशस्त्र लोग, सरकारी इमारतों पर कब्जा करके मिलट्री डिक्टेटर नही बिठा सकते।
●●
नीति के तहत सेना का मिलिट्री कॉन्टेक्ट मिनिमाइज किया जाता है। दंगे हो या राहत कार्य, आप CRPF, NDRF, PAC वगेरह को एक्शन में देखते है। कश्मीर जैसी जगह पर भी सेना बॉर्डर पर ही होती है। अंदर सीआरपी।
यह अलग बात कि नासमझ लोग पाकिस्तान की तर्ज पर, बात- बात में सेना बुलाने की मांग करते हैं।
नेहरू ने सेना के जनरलों को रिटायरमेंट के बाद, राजदूत बनाने की परंपरा डाली। उन्हें पिपुल कॉन्टेक्ट, याने राजनीति में उतरने की आजादी नही दी, गवर्नर नही बनाया।
प्रशासन में जगह नही दी।
●●
आज नेहरू के दिए फल खाने वाले, नेहरू को गालियां देते हुए उनके किये को पलट रहे हैं।
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का एकीकृत पद फिर बन गया है।जनरल चुनाव लड़कर मंत्री और मुख्यमंत्री बन गए हैं। रिटायर्ड जनरल, सरकार के राजनैतिक विरोधियों को, लाइव टीवी पर मां बहन की गालियां दे रहा है।
सेना का मरता जवान, सेना की सर्जिकल स्ट्राइक.... सब पब्लिक डोमेन में है, राजनीति का हॉट पॉइंट है। ओआरओपी के नाम पर उनके साथ भी खुलकर वादे और धोखे हुए हैं। 4 साल इंडियन आर्मी से ट्रण्ड लाखो यूथ को सेना से निकालकर जनता मे बेरोजगार घूमने को छोड़ने की नीति बनाई गई है।
हम भी सेना के नाम पर इमोशनल रहते हैं। सेना, एक पार्टी की उपलब्धि के रूप में इस्तेमाल हो रही है। सैनिको से छुट्टियों मे चुनाव प्रचार करवाया जा रहा है। सेना के प्रवक्ता राजनीतिक स्कोरिंग के लिए यूज किये जा रहे है।
सिविलयन प्रशासन भी समाज को बांटने, किसी धर्म को सुप्रीम, किसी को दोयम बनाने की एस्पिरेशन बांट रहा है। रायसीना हिल के ऑफिस, अब गुजरात की कालोनी बन गए है। भारत, पाकिस्तान के पद चिन्हों पर चल रहा है।
●●
ज्योतिष पर मेरा विश्वास नही।
मगर एक साथ पैदा हुए दो लोगो की कुंडली अगर एक जैसी हो सकती है, तो शायद भारत का भविष्य भी पाकिस्तान ही होना लिखा है।
प्रशासनिक समझ से विहीन,
नारेबाज और गालीबाज जनता का देश,
जब अपनी बेवकूफियों के हाथों अपनी आजादी खोएगा,
लोग अपनी गुलामी के दिनों में उस नेहरू को याद करेंगे..
जो जिंदा या मुर्दा..
भारत के पाकिस्तान बनने की राह के बीचोबीच..
दीवार बनकर खड़ा था।
वॉक्सएम्फेनजर,
जनता का रिसीवर.. ।।
रेडियो का अविष्कार तो 1874 में हो गया था, मारकोनी को 1909 में नोबेल प्राइज भी मिल गया।
मगर यह महंगी तकनीक थी, गुप्त थी। पहले विश्वयुद्ध तक रेडियो, फौजी संचार का माध्यम था। पर 1920 के बाद इसका उपयोग नागरिक सम्प्रेषण के लिए होने लगा।
तो रेडियो स्टेशन बनने लगे।
रेडियो अमीरों की शान हुआ। वैसे ही जैसे रामायण युग मे, हमारे मोहल्लों में टीवी वाले घर की शान, ऊंची होती।
★★
तो 1933 में हिटलर जी सत्ता में आ गए, औऱ इसी साल लांच हुआ वॉक्सएम्फेनजर।
हिटलर जी बड़े साइंटिफिक और इनोवेटिव जीव थे। ई मेल और पोलॉरॉयड कैमरे वाली गप तो नही मारी।
मगर किसी उद्योगपति के पर्सनल प्लेन से जर्मनी नापकर, एक ही दिन में चार-चार चुनावी रैली करने वाले, वे विश्व के प्रथम जन-नेता अवश्य थे।
हिटलर साहब की वाक कला अद्भुत थी। विकट सम्मोहक ..!! बस यूं समझिये की मोजार्ट की सिम्फनी।
हिटलर के भाषण धीमी, गम्भीर, सॉफ्ट आवाज के साथ शुरू होते। समां बंधता..
मुद्रा, भाव भंगिमा कठोर होती जाती, आवाज तीखी ऊंची, और ऊंची, और ऊंची होती जाती। कभी गिरती, नर्म होती, फिर उठती।
शब्द और भाव, गहरे, मजबूत...
भाषण आगे बढ़ता, और फिर चीखता हुआ, छाती पीटता, मुट्ठियाँ उछालता हिटलर, सुनने वालों के दिलो को अपनी आवाज के साथ गर्व, हर्ष, उम्मीद, जीत, श्रेष्ठता, ताकत और नफरत की ओर ले जाता।
और अंत.. धीमी, नरम, शांति की मांग करती एक धमकी के साथ खत्म करता। लोग मुंह बाए सुनते ...
खत्म हो गया भई।
बजाओ तालियां ..
★★★
नाजी आइडियोलॉजी, हिटलर के शब्द हर घर तक पहुंचने जरूरी थे।
बाइबिल की जगह, मीन केम्फ हर घर, लाइब्रेरी, पब्लिक प्लेस पर रखा जाना अनिवार्य था। मगर सबसे शानदार औजार तो वॉक्सएम्फेनजर था।
याने जनता का रेडियो,
जनता का रिसीवर ..
इस पर जनता नाजिस्म को रिसीव करती। सुबह, शाम, दिन रात। इसकी खासियत थी, कि सस्ता था, अफोर्डेबल था, गरीब, कामगार, मजदूर, किसान.. एक सस्ता रेडियो पाकर आल्हादित था।
ठीक वैसे, जैसे आप सस्ता मोबाइल और सस्ता डेटा पाकर पगला गए हैं।
★★★★
तो घर घर मे आया रेडियो, जो ज्यादातर वक्त चलता रहता।
काम करती गृहणी, खेत काटता मजदूर, कारखाने के फ्लोर पर, होटल के कमरे और रिसेप्शन पर। गाने आते, नाटक आते, खबरे आती, सेलेब्रिटीज से उद्घोषक की बाते होती। मनोरंजन और जानकारी का जबरजस्त खजाना.. ।
लेकिन कैसा मनोरंजन, कैसी जानकारी.. ??
वही जो गोयबल्स ने तय किया।
सूचना एवं प्रसारण मंत्री, जिसे प्रोपगेंडा मिनिस्ट्री कहा जाता, तय करती की जर्मन क्या सुनेंगे। जैसे-
● इतिहास के कार्यक्रम होते, बताया जाता कि किस तरह, ज्यूस ने हमारे महान जर्मन देश को धोखा दिया।
● विज्ञान के कार्य्रकम होते, बताते की कैसे की जर्मनी दुनिया में सबसे एडवांस हो गया है।
● धर्म के कार्यक्रम होते, बताया जाता कि किस तरह कम्युनिस्ट ( विपक्षी दल) धर्म के खिलाफ हैं।
● विदेशी मामलों पर जानकारी दी जाती। बताते कि किस तरह चेकोस्लोवाकिया, पोलैंड और दूसरे इलाकों में जर्मन जाति पर भयंकर अत्याचार हो रहे हैं।
इसके अलावे हिटलर के भाषण, उसकी वीरता, सँघर्ष और महानता के किस्से तो हर जगह थे ही।
★★
रेडियो ने चार साल में जर्मन्स को एक ऐसी मनः स्थिति में ला दिया, जिसमे उन्हें लगने लगा कि वे विश्व मे श्रेष्ठतम जाति हैं, जो राज करने को बनी है।
मगर आज तक उस पर सारी दुनिया ने अत्याचार किया है। उसे देश के भीतर यहूदियों ने धोखा दिया है। बस जर्मन जाग जाए, तो सारी दुनिया से पर भारी पड़ सकते हैं।
★★★
युध्द के दौरान जर्मन जनता को अंत तक अपनी जीत का यकीन था। इसलिए, कि रेडियो बता रहा था।
राजधानी में, अचानक रूसी फौज का घुसना, बर्लिन वासियों के लिए शॉकिंग था। रेडियो तो बता रहा था कि हिटलर, अपने चमत्कार से बाजी पलट रहा है।
★★
अपनी श्रेष्ठता और हिटलर पर भरोसे की अफीम में, कभी हार और उसके परिणामों पर जर्मन्स ने विचार ही नही किया था। देश खत्म हो चुका है, उन्हें पता नही था।
तो जब सोवियत फौजें उसके बंकर से कुछ किलोमीटर दूर थी। प.पू. हिटलर जी ने श्रद्धेय गोयबल्स जी को अपना वारिस घोषित किया।
इस तरह रेडियो राजा ने, रेडीयो मन्त्री को कुर्सी देकर, रेडियो पर अपनी आस्था जताई, और आत्महत्या कर ली।
★★
नए चांसलर, श्रद्धेय श्री गोयबल्स जी के रेडियो स्टेशन नष्ट हो चुके थे। जनता के रिसीवर पर, मन की बातें सुनने वाला देश, खंडहर हो चुका था।
हिटलर की कुर्सी पर बीस घण्टे बैठने के बाद, गोयबल्स ने अपने 6 छोटे बच्चो को जहर देकर मारा। फिर बीवी को शूट किया,
फिर खुद को।
★★
जनता का रिसीवर। मौत और बर्बादी का रिसीवर । चेक कीजिये, एक पीस आपके घर मे तो नही।
अरे हां। आजकल उसे टीवी कहते हैं।
मने क्या करोगे आप !!
अगर अंटी में साढ़े चार हजार करोड़ हों???
●●
मैं तो एक आइलैंड खरीदूंगा।
एक बढ़िया रिजॉर्ट टाइप बंगला बनाऊंगा। मने प्राइवेट बीच, पूल, कॉटेज, गार्डन। घर, परिवार, दोस्तो सहित- छप्पक छप्पक छप्प!!
फिर एक ठो हवाई पट्टी और एक छोटुक से 8 सीटर जेट प्लेन। कतहूँ आना जाना हो, ऑफिस, धंधा-एपोइंटमेंट- घूमा घूमी.. ओहि में चले जायँगे।
लेकिन इसके बाद भी हजार पन्द्रह सौ करोड़ बच जाएंगे। उसमे से सौ करोड़ रख के, बाकी इस पोस्ट को पढ़ने वालों में बांट दूंगा।
छोटा आदमी, छोटी सोच।
●●
अल्फ्रेड नोबेल को इत्ते पैसे मिलते, तो वो एक इंटरनेशनल प्राइज रखते।
मने सारे पैसे एक फंड बनाकर एक ट्रस्ट के मैनेजमेंट में छोड़ देते।
एंडोमेंट फंड, याने मूल कभी नही छुवा जाएगा। लेकिन ब्याज की इफरात राशि से पूरी दुनिया मे साइंस, टेक्नॉलजी, इकनामिक्स और शांति के लिए काम करने वालो को प्रोत्साहित पुरुस्कृत और सम्मानित किया जाए।
आने वाले सौ से ज्यादा साल दुनिया के टॉप ब्रेन का सिर्फ एक सपना हो- एल्फ्रेड नोबल की शक्ल लगा वो पदक पाना।
●●
सोचिये- एक मनुष्य के नाम की अमर स्मृति, उसके जाने के 100 साल बाद भी,
हर साल.. !! साल दर साल.. इं
सानी रेस में पैदा होने वाले हर एक बेस्ट टैलेंट का यही ख्वाब !!! काश.. कि अल्फ्रेड नोबेल की शक्ल लगा वो पदक मिल जाये।
दुनिया में सर्वश्रेष्ठ होने का सबूत मिल जाये। नोबेल साधारण आदमी, मामूली इन्वेंटर था। थोड़ा पैसा ही था न उसके पास।
उसी से अमर हो गया, अपने से बेहतर लोगो के लिए भी ख़्वाब हो गया।
शानदार आदमी, शानदार सोच।
●●
मगर किसी मानसिक रूप बीमार, प्रदर्शनप्रिय, हाही, भुक्खड़, छुटकी सोच के आदमी को इतना पैसा मिल जाये तो क्या करेगा।
अजी, तंग गली के बाजू में 4000 स्क्वेयर फुट जमीन लेगा।
उसके ऊपर ऐड़ेंग बेड़ेग डिजाइन का मकान बनाएगा।
जिसमे 26 मंजिल हो, लेकिन हाइट 40 मंजिल बराबर हो।
जिसमे चार मंजिल में तो 100 ठो कार रखने का स्पेस हो।
छत पे तीन हैलीपेड हों,
सिनेमा हॉल हो,गेस्ट रूम हो, अपना एयर ट्राफिक कंट्रोल हो। ओपन टेरेस गार्डन हो, और एक स्विमिंग पूल हो।
जिसमे गंदे दांतो वाला दाढ़ीवान, और एक थुलथुल गंजा गुज्जू, रोज सुबह छप छप खेलने आते हों।
(उनको बुलाकर अपने पूल में नहलवाने की कास्ट एक्स्ट्रा है)
●●
सबै चीज घर मे है।
तो कहीं निकलना नही। मने पिक्चर देखने जाना नही। पार्क में घूमने जाना नही। दौड़ा दौड़ी ट्रेडमिल में कर लेते हो।
सब तो घरे में बनाए हो ससुर।
सामान ,राशन, कपड़े, लत्ते, सब तुम्हारे घर मे दुकानदार दे जाते होंगे। कंजस्टेड शहर है, तो फरारी दौड़ा सकते नही।
तो कहां जाओगे बे ...
70 ठो कार लेकर।
●●
और कहाँ उड़ोगे एक साथ तीन हेलीकॉप्टर में, मने अजय देवगन की तरह एक एक चोपर पे एक एक टांग रखके उड़ोगे तो भी एक चौपर एक्स्ट्रा बच जाएगा।
कित्ता बड़ा बैडरूम होगा, कित्ती बड़ी बेड होगी, की लोट लोट के, दौड़ दौड़ के सब तरफ सोते होंगे।
मने ई का बवासीर बनाये हो यार ?
●●
पर इसमे एक कमी है।
प्राइवेट श्मशान नही है।
फिर भी, दुनिया मे सबसे बड़े पगलैटि अगर कहीं है, तो यही है, यहीं है यहीं है।
नकली आदमी,
नकली सोच...
दर्द नही हो रहा था .. जरा भी नही !!!
हल्का हो गया था, फैल रहा था हर ओर, हर तरफ, मैं
उपर उठता जा रहा था ।
जादुई अहसास था ये ....
~~~
कुछ मिनटो पहले, जमीन पर था। अपने पैरों से चलता हुआ। थका सा, बूढें पैर, दो कन्धों का सहारा लेता हुआ मै अस्सी बरस के तन को लेकर चला। प्रार्थना मण्डप को .... सामने बहुत से लोग थे।
कोई झुका, मै उसका चेहरा देख न पाया, पर जैसे ही वो उठा, एक अंगारा मेरे सीने मे धंस गया।
फिर दूसरा ...
तीसरा!!!!
गिर पड़ा मै, दर्द हुआ था ... तेज, सूई की तरह चुभता, आग की तरह जलाता हुआ। चेतना घटने लगी, कोलाहल था।
किसी ने मेरा सर गोद मे रख लिया। गर्म गर्म सा कुछ बदन पर चल रहा था, बह रहा था। खून था शायद ...
हे राम।
हे राम ...
राम
~~~~
फिर जरा भी दर्द नही। हल्का हो गया था, फैल रहा था हर ओर, हर तरफ, उपर उठता जा रहा था .... जादुई अहसास था !!
नीचे देखता हूं, वहां लोग मुझे घेरकर बैठे हैं। विलाप कर रहे हैं... अरे क्यो रोते हों??? उधर कोई हमलावर पकड़ लिया गया है। कह रहे हैं मुसलमान है ..., या कि हिंदू है??
नहीं, उफ, फिर वही बाते ..
इंसान है वो, बस एक आदमी है। डरा हुआ आदमी ... उसे डर है उसकी कौम खत्म हो जाएगी, उसका देश खत्म हो जाएगा। उसका डर असली है, मानवीय है, प्राकृतिक है।
ये डर मुझे भी था।
फिर इसी डर से निडरता की यात्रा की है। यही यात्रा सिखाई,हर शख्स को जो मेरे समीप आकर बैठा।
धर्म सिखाया मैंने...
●●●
धर्म वह है, जो तुम्हे झूठे भय से आजाद करता है। प्रेम अजातशत्रु बनाता है, तुम्हे दूसरों से सुरक्षा देता है।और अहिंसा, दूसरोँ को तुमसे सुरक्षित करती है।
प्रेम- अहिंसा ही धर्म है। हमारे-तुम्हारे बीच का ये कृत्रिम डर, ये खतरा.. सत्य, प्रेम और अहिंसा से ही खत्म होगा। कोई दूसरा मार्ग है ही कहां ??
तो सुनो!! नाथूराम से, किसी गोडसे से मुझे शिकवा नही। बड़ा अहसान किया उसने.. मुक्त किया बूढे शरीर से, और बिखरा दिया।
गांधी का ये आकार, ये विस्तार .. केवल किसी गोडसे की गोलियों से गुजरकर ही बन सकता था।
●●
तो मै चाहता हूं, और गोलियां चलाओ।
रोज मारो मुझे, हर दिन ... मेरे सीने से रक्त का फव्वारा छूटे। क्योकि ये दर्द लाखो सीने महसूस करते है। मेरा संदेश पीढियों के पार पहुंचता है। हर बार नया होकर, बुलंद आवाज मे फैलता है। गांधी के उपदेशों से, गाधी का लहू, कहीं ज्यादा ताकतवर बन गया है।
फिर नीचे देख रहा हू। मेरे सीने की रक्तधार अब जम गई है। लोग कह रहे हैं, गांधी नही रहा।
पर कहीं नही गया, मै हूं ... यहीं हूं।
●●
हवा बन गया हूं।
फैल रहा हूं भारत की फिजां मे, देश और दुनिया मे। हर शहर, हर गांव हर गली मे फैल गया हूं। लोग सांसों मे भर रहे है, मै धमनियों मे दौड़ रहा हूं ... उनकी चेतना का, आत्मा का अंश हूं।
अब मै नए शरीरों मे हूं। अनगिनत हूं ... अमर हूं। अब कैसे पीछा छुड़ा सकते हो? लड़ सकोगे, खुद से..??
अनचाहे ही, तुम्हारे भीतर जो हूं..!!!
बाप, खुद बाप बनने के बाद समझ आता है।
कहीं पढ़ा था,कि पिता-पुत्र के सम्बंध वक्त के साथ बदलते हैं। कम उम्र का बच्चा पिता को आइडोलाइज करता है, उसके जैसा बनना चाहता है।
लेकिन निजी वैयक्तिकता विकसित होते ही, सबसे पहला विद्रोह भी उसी से करता है।
●●
क्योकि किशोरवय बालक के पास आलोचना का आसानी से उपलब्ध..
और सबसे "सेफ टारगेट" पिता है। बाप की हेयरस्टाइल, कपड़े, सोच, तौर तरीक़े, लुक्स, उसकी आदतें.. किशोरावस्था में सब पिछड़ा, औऱ अनुपयोगी लगता है।
बेटा पिता के ठीक उलट जाकर कुछ करना चाहता है। खुद के तरीके, आजमाना चाहता है।
●●
भगतसिंह वही बेटा है।
किशोरवय है, उच्छृंखल है। आदर्श ऊंचे हैं, तरीक़े क्रांतिकारी। क्योकि एवोल्यूशन का धैर्य नही, उसे तो फटाफट रिवोल्यूशन चाहिए।
वो रूस जैसी क्रांति चाहता है। राजा को, राज्य को, उसकी व्यवस्था और सड़े गले सिस्टम को उखाड़ फेंकना चाहता है। इसलिए की व्यवस्था विदेशी है, इम्पीरियलिस्ट है, शोषक है।
वो सत्ता को डराकर, विस्फोट से बदलाव लाना चाहता है। मगर गांधी जानते हैं, कि हिंसा सिर्फ लक्षित को खत्म नही करती ..
उसके परिवेश को भी बर्बाद करती है।
●●
यह परिवेश,राजव्यवस्था है। गांधी को अंग्रेजो से इस व्यवस्था को लेना है, हस्तगत करना है। इसे दुश्मन की थाती मानकर नष्ट नही करना है।
थोड़ी देर लगे, मगर धैर्य से !!
बिना तोड़े फोड़े, अपने हाथ मे लेकर, बड़े जतन से बदलना है। इस व्यवस्था को ही स्वराज बनाना है, सुराज बनाना है।
पॉलिश करना है।
जनोन्मुख बनाना है।
●●
यह परिवेश हमारा समाज भी है। इसे भी टूट से रोकना है। ये समाज जिसमे पहले से ही नफरत भरी है। आपस मे धर्म, जाति, अश्पृश्यता, क्षेत्रीय-सांस्कृतिक-अलगाव, आर्थिक असमानता की गहरी गहरी खाईयां है।
इन फॉल्ट लाइंस के नीचे खौलता लावा है। सोता हुआ, दानव पहले अंग्रेजो के खिलाफ जगा तो दोगे। लेकिन फिर ये तुरन्त ही उधर मुड़ेगा, जिन चेहरों से सदियों की अदावत है।
गांधी को मालूम है, बारूद के ढेर पर बैठे समाज के नेता को चिंगारी की वकालत नही करनी चाहिए।
गांधी ने मोपला देखा था। इसकी पुनरावृत्ति से डरते थे। इसलिए वे हिंसा के जिन्न को चौरीचौरा मे निकलते देख, आंदोलन रोक देते थे।
देर से सही, मगर गांधी को भारत छिन्न भिन्न नही चाहिए।
●●
याने गांधी दूर की सोचता है।
पिता है न.. और परिवक्व होने पर भगत भी वह बात समझने लगते हैं।
जेल में बैठे भगतसिंह जानते हैं कि वे किवदंती बन चुके हैं, लेजेंड हैं, मकबूल हैं, सुपूजित हैं। युवा उन्हें देख रहा है, उनके जैसा बनना चाह रहा है।
अगली पीढ़ी के बच्चो को अब वे पिता की तरह सलाह देते हैं। वे हिंसा के पैरोकार के रूप में याद नही किया जाना चाहते। जेल में उनकी लेखनी, अब उसी अहिंसा की तजवीज करती हैं, जो गांधी बरसों से कर रहे है।
वे युवाओं को जवाहर को आइडोलाइज करने की सलाह देते हैं। वो धर्म जाति और क्षेत्रीयता से उपर उठने का आवाहन करते है।
वे खुद को हिंसा का समर्थक माने जाने से इनकार करते हैं। उनका यह विकास, ये बदलाव जेल की चहारदीवारी में, किताबो के बीच, जीवन के आखरी महीनों में होता है।
●●
पर अफसोस, जेल से बाहर उनका लेजेंड तो उस फांसी से ही पनपा, जो हिंसा की उपज थी।
तो विडंबना है, ये भगत का दुर्भाग्य है, कि वे लोकप्रिय धारणा में आज भी हिंसा, हड़बड़ी और हमलावर सोच का प्रतीक हैं।
मौजूदा दौर में फासिज्म उनकी इसी पॉपुलर इमेज का फायदा उठा रहा है। उसे गांधी को उखाड़ फेंकने के लिए चिमटे की तरह इस्तेमाल कर रहा है। भारत में गुस्से, बदला और हिंसा को प्रतिष्ठित करने के उसने दो औजार चुने हैं।
पहली है श्रीमद्भागवत गीता,
और दूसरे- भगतसिंह..
●●
किशोर, अविकसित मेधा के बाहुल्य वाले आज के भारत मे, भगत को गांधी के खिलाफ खड़ा करना बेहद आसान हो गया है।
वह पूछता है- तो क्या आजादी चरखा चलाने से मिली थी??
गुस्से से पगलाई, मिनटों में सब पलट देने, पेल देने, ठोक देने, ठीक कर देने की इच्छुक यह पीढ़ी भगत के बम से अपना तारतम्य तो जोड़ पाती है।
लेकिन गांधी की अहिंसा से नही।
●●
पर गांधी, मेच्योर्ड एज का दर्शन है।
और ये एक यंग नेशन है।अधीर औऱ हिंसक है। जैसे जैसे उम्र बढ़ेगी, परिवार, समाज की जिम्मेदारियां, सुसंचालित व्यवस्था औऱ हिंसा विहीन, नॉर्मल जीवन का महत्व भी समझ आएगा।
जब एक बार उसे गांधी से दूरी का नतीजा दिख जाएगा।
●●
और गांधी वो वह दिल मे फिर स्थापित करेगा। कहीं ज्यादा एहतराम करेगा।
क्योकि बाप से, बापू से रिश्ता जब सुधरता है, दरअसल दूरी से भुगते हुए नतीजों की प्रतिक्रिया में ही होता है। फिर बाप , खुद बाप बनने के बाद समझ आता है।
और फिर, बहुत याद आता है।
काफी ऊँचाई पर यह ठंडी सी जगह है।
पीटर औऱ मरिट्ज़ को पसन्द आयी। यहां जमीन का एक टुकड़ा लेकर बसना चाहते थे। लेकिन आसपास रहने वाले जुलु कबीलों की मर्जी के बगैर वहां रहा नही जा सकता था।
पीट रेटिफ और गर्ट मरिट्ज़ ने जुलु चीफ से मिलने का निर्णय किया। सन्देश भेजा तो अनुमति मिल गयी। उन्हें भोज पर बुलाया गया। बात सुनी गई।
और काट डाला गया।
यह 1830 के आसपास की बात है। इस जगह पर बसी बस्ती पीटरमारितज़बर्ग के नाम से जानी गयी थी। एक रेल लाइन यहां से बनी, और गुजरी। कोई 63 साल बाद एक ठंडी रात को एक ट्रेन...
इस ट्रेक से गुजर रही रही थी।
◆◆◆
फर्स्ट क्लास केबिन में एक भारतीय वकील बैठा था। उस केबिन में एक अंग्रेज की सीट थी। काले आदमी के साथ वह भला कैसे बैठ सकता था। सो टीटी को बुला लाया।
टीटी ने उस काले को समझाने की कोशिश की। लेकिन काला आदमी तो बड़ी बड़ी बातें करने लगा। कहा कि उसमे इंगलैंड से बैरिस्टरी पास की है। बार का मेम्बर है।
उसके पास फर्स्ट क्लास का वैलिड टिकट है। वह कतई थर्ड क्लास में जाकर न बैठेगा। दुबले पतले इस काले आदमी की हिमाकत देखकर टीटी के गुस्से का ठिकाना न रहा।
ट्रेन इस वक्त पहाड़ चढ़ रही रही थी। पीटर मारितज़बर्ग स्टेशन सामने था। गाड़ी ठहरी।
तो टीटी ने उस काले आदमी को ट्रेन से उतार दिया। सामान फेंक दिया।
ट्रेन चल पड़ी।
◆◆◆◆
मोहनदास करमचंद गांधी ट्रेन को गुजरते देखते रहे। फिर सामान समेटकर आगे बढ़े। वह अपमान, वह ठंडी रात, वह वीरान स्टेशन, वेटिंग रूम..
"मैं अपनी जान के लिए डरा हुआ था। उस अंधेरे वेटिंग रूम में गया। वहां एक गोरा भी था। मैं उससे डरा हुआ था। मेरा कर्तव्य क्या है??
मैंने पूछा अपने आपसे?? क्या मैं भारत लौट जाऊं?? या मैं ईश्वर को अपने साथ, अपना सहायक जानकर आगे बढूँ, औऱ सामना करूं उसका जो किस्मत ने मेरे ललाट पर लिखा है?
मेरी सक्रिय अहिंसा, असहयोग का उस दिन जन्म हुआ"
◆◆◆◆
सात जून 1893 की रात एक नए आदमी का जन्म हुआ।
महात्मा गांधी ने आगे कभी लिखा- आई वाज बोर्न इन इंडिया, बट आई वाज मेड इन साउथ अफ्रीका।
वह दौर था, जब ब्रिटेन के राज में सूरज नही डूबता था। भारत उस राज का क्राउन ज्वेल था। काले वकील ने वह ताज उतार लिया।
15 अगस्त 1947 में वह कहानी पूरी हुई, जिसकी शुरुआत 7 जून 1893 को पीटर मारितज़बर्ग स्टेशन से हुई थी।
◆◆◆◆
वेटिंग रूम अब एक म्यूजियम है। गांधी की महक वहां ताजी है।
उस मगरूर गोरे, उस घमंडी टिकट चेकर को कोई नही जानता। लेकिन ट्रेन से उतारे गए उस काले वकील को दुनिया सलाम करती है।
उनकी मूर्ति पीटर मारितज़बर्ग के स्टेशन पर आज भी लगी है। जब उनकी जन्मभूमि से ...
उनका नाम मिटाने की कोशिशें चल रही है।
सुपर कम्युनिस्ट लाल बहादुर शास्त्री ..!!!
3 जनवरी 1966 को शास्त्रीजी शांति समाधान के लिए ताशकंद गए. उस समय ताशकंद बहुत ठंडा था।
रूसी नेता एलेक्सेई कोसीजिन ने महसूस किया कि शास्त्री का कोट मध्य एशिया की बर्फीली सर्द हवाओं से लड़ने के लिए पर्याप्त नहीं था।
कोसिजिन ने शास्त्री जी तो एक रूसी कोट, मित्रता के उपहार के रूप में दिया।
●●
अगली सुबह, जब देखा कि शास्त्री पुराना खादी कोट पहने हुए थे. उन्होंने पूछा कि क्या उन्हें ओवरकोट पसंद नही आया।
शास्त्रीजी ने बताया- कोट गर्म और बहुत आरामदायक है. उसे मैंने अपने साथ आए एक कर्मचारी को दिया है जो इस यहां पहनने लायक कोट नहीं लाया था।
मैं निश्चित रूप से आपके उपहार का उपयोग ठंडे देशों में भविष्य के दौरे के दौरान करूंगा.’
●●
कोसिजिन ने इस घटना को भारतीय प्रधान मंत्री और पाकिस्तानी राष्ट्रपति के सम्मान में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में, स्वागत भाषण के दौरान सुनाया।
कोसिजिन ने टिप्पणी की, ‘हम कम्युनिस्ट हैं.. लेकिन प्रधानमंत्री शास्त्री एक "सुपर कम्युनिस्ट" हैं.’
●●
आज शास्त्रीजी का निर्वाण दिवस है।
जन्मदिन उनका 2 अक्टूबर को होता है। इसका फायदा उठाकर, शास्त्री की शख्सियत से गांधी को ढंकने की कोशिश होती है।
गांधी के जन्मदिन पर कुछ लिखो, तो शास्त्री को का नाम उछालने वाले सारे वही होते हैं, जो नेहरू से सरदार को बेहतर बताते है।
जो लेफ्टिस्ट सुभाष को गांधी से बेहतर बताते है। जो कम्युनिज्म के आदर्शों से लबरेज, और लेनिन के मुरीद भगतसिंह की मौत के लिए, गांधी पर लांछन लगाते हैं।
और फिर सारे लोग चौपाल पर खड़े होकर कम्युनिज्म और वामपन्थ को गाली औऱ एब्यूज की तरह इस्तेमाल कर रहे होंगे। देशद्रोही, गद्दार और नक्सली बता रहे होंगे।
●●
शुरुआत में जेनएयू के परिप्रेक्ष्य में कम्युनिस्ट शब्द को गाली के रूप में देते, भाजपाई सम्बित को कन्हैया के साथ एक डिबेट में देखा था। अब यह एक आम गाली हो चुकी है।
वो मुद्दा जेनएयू में गुंडागर्दी, और गुंडों के साथ पुलिस के सहयोग का था। लेकिन दोनो माओ और मुसोलिनी के नाम पर एक दूसरे को दुत्कार रहे थे।
●●
रास्ट्रवाद मुसोलिनी का ठेका नही, कम्युनिज्म माओ का ठेका नही, समाजवाद हिट्लर का ठेका नही,
हिंदुत्व आरएसएस का ठेका नही।
दुनिया ने राष्ट्रवाद को गांधी के नजरिये से देखा है। हमने समाजवाद लोहिया के नजरिये से देखा है। और उस रात, रशिया ने कम्युनिज्म को लाल बहादुर शास्त्री के नजरिये से देखा।
यही बेसिक फर्क है।
नजर का.. नजरिये का
और आइकन का ..
इसलिए तो उस दिन कोसिजिन को कहना पड़ा- कि हम कम्युनिस्ट हैं, लेकिन प्रधानमंत्री शास्त्री..
वे "सुपर कम्युनिस्ट" है।
मैं राजीव से बात करना चाहता हूँ..
रात के 3 बजे, मालदीव के राष्ट्रपति ने इसरार की। थके हुए, मगर बेहद कृतज्ञ गयूम का सम्पर्क, सेटेलाइट फोन से राजीव से कराया गया।
राजीव उस रात सोए नही थे। उन्हें इस कॉल का इंतजार था।
●●
दिल्ली में राजीव से गयूम की मुलाकात तय थी, मगर अपरिहार्य कारणों से उनका दौरा स्थगित हो गया था। इसकी खबर विरोधियों को नही थी।
श्रीलंका में बैठे गयूम के विरोधी अरबपति ने सरकार पलटने की योजना बना रखी थी। लंकाई चीतों से डील सेट थी। गयूम दिल्ली में होते, माले में हमला होता।
भाड़े के लड़ाके, हाईजैक किये शिप से माले उतरे। बहुत से इसके पहले ही, आम वेशभूषा में माले पहुँच गए थे। 4 नवंबर 1988 की रात हमला हुआ।
●●●
छोटा सा शहर- आप एयरपोर्ट, टेलीफोन एक्सचेंज, सेक्रेट्रीटीएट जैसी आधा दर्जन बिल्डिंग कब्जा कर लें, तो सत्ता आपकी हुई। भाड़े के विद्रोही कब्जा कर चुके थे।
लेकिन राष्ट्रपति को भी तो हिरासत में लेना होगा। वे अपने पैलेस में नही थे। हमले की खबर से वे कहीं छिप गए।
और वहीं से अमेरिका से मदद मांगी। मगर डिएगो गार्सिया से मदद आने में कुछ दिन लगते। श्रीलंका और पाकिस्तान से मदद मांगी।
पाकिस्तान ने क्षमता न होने का बहाना किया, श्रीलंका चीतों से उलझना नही चाहता था। तो ब्रिटेन से मदद मांगी। थैचर ने सलाह दी- भारत से मदद मांगो।
●●
राजीव कलकत्ता में थे, जब खबर आई। रक्षा और विदेश मंत्रालय की संयुक्त बैठक रखी गयी।राजीव सीधे एयरपोर्ट से वहीं पहुचें।
आर्मी, नेवी, एयरफोर्स का एक संयुक्त ऑपरेशन तय किया गया। नाम - ऑपरेशन कैक्टस
कई योजना बनी, बिगड़ी। पैराट्रूपर्स उतारने की बात सोची गयी, मगर माले इतना छोटा की ज्यादातर सैनिक, समुद्र में गिर जाते।
फिर एक डेयरिंग योजना बनी।
●●
शाम होते होते आगरा से हैवी एयरक्राफ्ट, फौजी, साजोसामान, जीपें लेकर प्लेन माले चला। और सीधे हुलहले एयरपोर्ट पर उतर गया। घुप्प अंधेरे में ये लैंडिंग जानलेवा हो जलती थी।
तुरन्त ही फौजी और जीपें बिखर गए। एयरपोर्ट थोड़ी बहुत सँघर्ष के बाद कब्जे में आ गया। इतने में और विमान उतर गए।
कुछ ही घण्टो में माले में विद्रोहियों की लाशें बिखरी पड़ी थी। खेल खत्म हो गया था।
सेफ हाउस में छिपे गयूम से माले के भारतीय राजदूत मिले। बताया कि विद्रोह कुचल दिया गया है। वे सेफ हैं।
राजीव को मदद की गुहार लगाए महज सोलह घण्टे हुए थे। त्वरित मदद से अभिभूत, थके हुए, मगर बेहद कृतज्ञ गयूम ने राजदूत से कहा - मैं प्रधानमंत्री राजीव से बात करना चाहता हूँ..
●●
इसके बाद, मालदीव एक स्ट्रेटजिक एसेट के रूप में भारत का ठिकाना बना। हिन्द महासागर में भारत को एक मजबूत ताकत बनाने में, वहां क्रिएट किया गया फौजी ठिकाना, हमे थाह देता रहा। तीन दशक तक ..
जब तक कि घर मे घुसकर मारने की बकैती नेशनल टीवी पर करने वाले,
औरो के बाथरूम में ताक झांक करने वाले..
दूसरो के स्वतंत्रता संग्राम में खुद को सेनानी बताने के शौकीन,
पड़ोसियों नाकाबंदी कर क्षुद्र ब्लैकमेलिंग करने वाले मूर्ख को, हमने राजीव के जूतों में फिट न कर दिया।
●●
दस साल पहले जिस व्यक्ति के राज्याभिषेक में समारोह में सभी सार्क देशों के नेता, लाइन लगाकर हाथ मिलाने आये थे..
तब मेरे,आपके, हिंदुस्तान की जनता के निर्णय से एक नई आशा भारत में ही नही, पूरे उपमहाद्वीप में फैली थी।
सबको लगा, कुछ बड़ा होने वाला है..
दस बरस बाद, सिर्फ निराशा है। उम्मीदों का बादशाह, बौना जोकर साबित हुआ है।
पदानुकूल बड़प्पन त्यागकर, क्षुद्र हरकतों से, छिछोरे समर्थकों की तालियां हासिल तो हुई। मगर पद , देश का वकार, इसके स्ट्रेटेजिक इंटरेस्ट, इसकी गरिमा का जनाजा निकल गया है।
●●
हाल यह है कि पाकिस्तान ही नही नेपाल, श्रीलंका, भूटान भी चीन को गोद मे जा बैठे है। ताजा ताजा मालदीव उसमे मिल चुका है। माले से भारतीय बेस खाली करवाया जा चुका है।
और हमारा छबीला राजा, लक्षद्वीप में बैठकर मालदीव को चिढा रहा है। उसके छल्ले लक्षद्वीप को मालदीव से बेहतर टूरिस्ट डेस्टिनेशन बनाने की देशभक्ति बेच रहे हैं।
हद्द है..
●●
इस दौर में राजीव की रह रह कर याद आती है। वो गरिमा, वो गम्भीरता याद आती है।
काश यह शख्स अगर 10 साल जिया होता। तब दुनिया की हर बड़ी ताकत दिल्ली में फोन लगाकर कहती..
- मैं राजीव से बात करना चाहता हूँ..
❤️
ये महान दृश्य है...
आजादी की बेला, बरसों का स्वप्न, खुली हवा में सांस, औऱ उपर लहराता तिरंगा. सोचने में आता है कि फहराने वाले के मस्तिष्क में क्या चल रहा होगा?
●●●
वह जो नीचे खड़े हैं, तिरंगे को देख रहे हैं, नेहरू को देख रहे हैं। उनका दृश्य सीमित है. विशाल असलियत दूसरी ओर से दिखती है.
क्योकि ऊंचे किले की प्राचीर पर खड़े होकर, दूर तक दिखता है...
ये विशाल जनसमूह !!
जो वोटर नही, कार्यकर्ता और समर्थक नही, मुग्ध श्रोता भी नही।
उन्मादित गर्वीलों का जमावड़ा नहीं है, ये दीन हीन, आर्थिक- सामाजिक रूप से निचुड़ चुका राष्ट्र है.
अंगभंग के ताजे रिसते घाव के साथ, घिसटते हुए भी जश्न मनाने आया है. वो खड़ा होकर तिरंगे की लहरों के संग डोल रहा है. अपने देश, अपने नेता की जयकार कर रहा है.
यह डराता है.
अगर आप मनुष्य हैं, तो डराता है।
आशा से भरी लाखों आंखों का केंद्रबिंदु होना आसान नही होता. क्या नेहरू, दबाव महसूस कर रहे थे?
●●●
इस किले से कुछ दूर ही, हथियारों के साथ कुछ लोग, आग लगा रहे हैं, घाव बांट रहे हैं. शिकार खोज रहे हैं. उनकी भी एक विचारधारा है.
या शायद नहीं है….
कुछ का आक्रोश है, कुछ के लिए मौका है. औरों के घाव में अपनी मजबूती देखने की हुनक है.
क्या नेहरू का दिमाग, उस धुएं के गुबार पर गया?
या कैबिनेट की अगली बैठक को सोच रहे थे?
देश ये आजाद हुआ है, बना नहीं है...
सीमाएं तय नहीं, देश के भीतर 500 देश हैं. त्रावणकोर, जूनागढ़, हैदराबाद, राजपूताना, कश्मीर.. दर्जन भर दूसरे भी अलगाव चाहते हैं. बाहर और भीतर की सीमाओं पर तनाव है।
पर सेना नहीं है, खुद उसमे बंटवारा चल रहा है. मुट्ठी भर हथियार, दर्जन भर जहाज, और फौजी..
उनका भी रेजीमेंट दर रेजिमेंट बंटवारा होना है…..कुछ पाकिस्तान जाएंगे, कुछ इंग्लैंड.
राज्य नहीं है, पुलिस नहीं है, अफसर भी आधे इंग्लैंड लौट रहे हैं. जहां थोड़ी कुछ व्यवस्था है, अभी पक्की नहीं है….
नियम नहीं बने, कोई विधान नहीं है. चारो ओर धुंधलका, आतुर आंखों की आशायें, धुआं..
और जलते मांस की गंध..
●●●
ऊबे जवाहर ने क्या, ऊपर तिरंगे को देखा होगा?
पिता तो नहीं रहे, तो पितातुल्य के पैरों में बैठकर कुछ सोचा जाये. पूछा जाये- इसकी गिरहें कहाँ से सुलझाना शुरू करूँ, बताओ न बापू.
पर वो निठुर भी इस वक्त पास नहीं ..
दूर बैठा है, हजारों मील.. कलकत्ता की हैदर मंजिल. मियांवली की झुग्गी बस्ती में पनाह लिया वो वृद्ध, आजादी से उत्साहित नहीं. दंगे रोकने के लिए एक मुसलमान के घर सोया है.
गांधी दिल्ली आज नहीं लौटेंगे…
कल भी नहीं….अगले हफ्ते भी नहीं….वो दंगाग्रस्त इलाकों जाएंगे. जलती बस्तियों के बीचोबीच, नंगे पैर घूमेंगे.
इसलिए कि जिस धरती पर इतना खून मिला हो, उस पर चप्पल पहनकर कैसे चलें!!
●●●
नेहरू ने फिर तिरंगे की ओर देखा होगा, और ताकत बटोरकर उन टिमटिमाती आंखों के सामने, वे मशहूर शब्द कहे होंगे!
रात को जाग कर लिखा भाषण, पढ़ा होगा। भीतर जलता हुआ दीपक जैसे सामने औरों को रोशन करे.
भाषण खत्म होता है.
सामने खड़े लाखों हाथ उठते हैं. तालियां बजाते है...जलसा खत्म।
यह तसवीर ले ली जाती है.
●●●
जिसे आज आप देख रहे हैं, पचास, सौ या दो सौ साल बाद भी यह तसवीर देखी जाएगी. जो दिखता है, वो तो सब देखेंगे. जो नहीं दिखता, कुछ ही लोग देख सकेंगे.
आपने देखा??
यह महान दृश्य है.
❤️
EVM और सैम पित्रोदा!
सैम पित्रोदा, भारत में दूरसंचार क्रांति के जनक हैं. सैम का पूरा नाम सत्यनारायण पित्रोदा हुआ करता था, जो अमेरिका में काम करने के दौरान चेक पर बड़ा नाम होने के चलते बदल कर सैम कर दिया गया.
सैम 1980 में अमेरिका में दुनिया की पहली डिजिटल कंपनियों में से एक विस्कॉम स्विचिंग में काम कर रहे थे. आगे चलकर सैम इस कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट बन गए. इसमें उनकी हिस्सेदारी भी हो गई.
भारत में बहुत से लोग जब ‘कारसेवक’ बनने की तैयारी कर रहे थे. पढ़ाई-लिखाई से दूर जनता को हिंदू बनाने में लगे थे, तब सैम इस कंपनी को 40 लाख डॉलर में बेच चुके थे. उसके बाद वह भारत आते हैं. भारत से जो कुछ लिया था, उसे लौटाने का फ़ैसला करते हैं. अपनी पूरी शक्ति से काम में जुट जाते हैं.
1984 में सैम 10,000 रुपये की तनख़्वाह ठुकरा देते हैं. उनको लगता था, देश ने उनको बहुत कुछ दिया है. वह देश को देने में यक़ीन रखते हैं, बदले में कुछ लेने में नहीं. उनके पास शानदार तकनीकी शिक्षा थी और अमेरिका में काम करने का अनुभव भी. लेकिन वह अमेरिका में उस भविष्य को छोड़कर आए थे, जो उनको अरबों रुपये की संपदा का मालिक बना सकता था. यह लगभग वही समय था, जब कुछ लोग ‘एन्टायर पॉलिटिकल साइंस’ से MA की परीक्षा पास कर रहे थे. गुजरात यूनिवर्सिटी का ऐसा दावा है. इस डिग्री से देश पर राज करने की तैयारी हो जाती है.
जिन लोगों ने अपने घरों में टेलीफ़ोन लगवाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटे हैं. जो दूरदराज़ के गांवों से तहसीलों और जिलों तक एक फ़ोन करने के लिए भटकते थे, सैम पित्रोदा का असली अर्थ वही समझ सकते हैं.
सैम भारत के सबसे प्रमुख तकनीकी विशेषज्ञों में से हैं. मशीनों और तकनीक के बारे में हमारे मुक़ाबले नि:संदेह अधिक जानकारी रखते हैं. इसलिए EVM मशीन के बारे में उनके विचारों और सुझाव को सुनना ज़रूरी है. @sampitroda
1. EVM को अपने हिसाब से कंट्रोल किया जा सकता है। उसमें दख़ल संभव है.
2. भारत में इस समय उपयोग की जा रही ईवीएम मशीन स्टैंड अलोन मशीन नहीं है.
3. ईवीएम मशीन के साथ जब वीवीपैट मशीन को जोड़ा गया था, तभी से समस्या शुरू हुई. वीवीपैट एक अलग डिवाइस है जिसमें हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर होता है.
4. वीवीपैट को ईवीएम से जोड़ने के लिए एक स्पेशल कनेक्टर इस्तेमाल किया जाता है. इसे एसएलयू कहते हैं. यह एसएलयू बहुत से सवाल खड़े करता है.
5. एसएलयू कनेक्टर ही वीवीपैट में यह दिखाता है कि किस बटन से भाजपा को वोट मिला किस बटन से कांग्रेस को और किस बटन से अन्य को. वोटिंग से पहले इसे प्रोग्राम किया जाता है.
6. एसएलयू जोड़ने के बाद ईवीएम स्टैंड अलोन मशीन नहीं रह जाती. इसमें हर तरह के वह काम किए जा सकते हैं, जिनकी बात हो रही है.
7. इसलिए हम चाहते हैं कि वीवीपैट से जो पर्ची निकलती है, वह अभी थर्मल प्रिंटर से निकलती है और उसे कुछ हफ्ते तक ही सुरक्षित रखा जा सकता है, उसकी जगह ऐसा प्रिंटर इस्तेमाल किया जाए, जिससे निकली पर्ची को अगले 5 साल तक सुरक्षित रखा जा सके.
8. दूसरा बिंदु यह है कि यह पर्ची केवल कुछ समय के लिए ही वोटर को ना दिखाई दी जाए, बल्कि एक कागज पर प्रिंट होकर उसे मिले, जिसे वह अलग से रखे एक बॉक्स में वोट के रूप में डाल सके. यह बॉक्स किसी भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस से जुड़ा ना हो.
9. उसके बाद बक्से में डाली गई वोट की पर्चियों की गिनती की जाए.
10. भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों के टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ कह रहे हैं कि ईवीएम में निश्चित तौर पर कुछ समस्या है, लेकिन भारतीय निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं.
11. एक प्रोफेशनल होने के नाते मैं कह रहा हूं कि जरूरी नहीं है कि हेराफेरी की ही गई हो, लेकिन मुझे पूरी आशंका है कि ईवीएम में हेराफेरी की जा सकती है. मैं इस बात को स्वीकार नहीं कर सकता कि ईवीएम में सबकुछ ठीक है. ईवीएम को लेकर विश्वास का संकट खड़ा हो गया है.
12. राजनीतिक दलों को EVM के खिलाफ आंदोलन चलाना चाहिए. हस्ताक्षर अभियान चलाना चाहिए. जागरुकता अभियान चलाना चाहिए. जरूरत पड़े तो नौजवानों को इसके खिलाफ सड़क पर उतरकर आंदोलन करना चाहिए.
13. राजनीतिक दलों को ईवीएम से चुनाव के बहिष्कार के विकल्प पर भी विचार करना चाहिए.
14. राहुल गांधी ईवीएम के मुद्दे को लेकर गंभीर हैं. इस पर मेरी उनसे बातचीत हुई है. यह स्वीकार करना संभव नहीं है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में EVM से छेड़छाड़ के बिना राहुल अमेठी से लोकसभा चुनाव हार गए.
16. मैं जल्द ही तकनीकी विशेषज्ञों के साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने EVM पर एक प्रेस कांफ्रेंस करने की योजना बना रहा हूं.
#SenseWithSam #EVM
इतिहास जो भुलाया नहीं जा सकता :-
साल था 1971
'अगर भारत पाकिस्तान के मामले में उसकी नाक में उंगली करेगा तो अमेरिका अपनी आंख नहीं फेर लेगा,भारत को सबक सिखाया जाएगा"
-रिचर्ड निक्सन.
'भारत अमेरिका को दोस्त मानता है। बॉस नहीं। भारत अपनी किस्मत खुद लिखने में सक्षम है। हम जानते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार प्रत्येक के साथ कैसे व्यवहार करना है?"
- इंदिरा गांधी
भारतीय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने ठीक यही शब्द व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के साथ बैठकर, आंखों से आंख मिलाकर बिना पलक झपकाए व्यक्त किये थे।
अपनी आत्मकथा में हेनरी किसिंजर जो उस समय अमरीका के NSA और सेक्रेटरी आफ स्टेट थे, ने इस ब्योरे को दर्ज़ किया है।
वह दिन था जब भारत-यू.एस संयुक्त मीडिया संबोधन को इंदिरा गांधी ने रद्द कर दिया था, जो अपने ही अनोखे अंदाज में व्हाइट हाउस से चली गईं थीं।
किसिंजर ने इंदिरा गांधी को उनकी कार में छोड़ते हुए कहा था, "मैडम प्रधानमंत्री, आप को नहीं लगता है कि आप को राष्ट्रपति के साथ थोड़ा और धैर्य के साथ काम लेना चाहिए था "।
इंदिरा गांधी ने उत्तर दिया, "धन्यवाद, श्रीमान सचिव, आपके बहुमूल्य सुझाव के लिए,एक विकासशील देश होने के नाते, हमारी रीढ़ सीधी है - और सभी अत्याचारों से लड़ने के लिए पर्याप्त इच्छाशक्ति और संसाधन हैं। हम साबित करेंगे कि वे दिन लद गए जब हजारों मील दूर बैठी कोई "शक्ति" किसी भी राष्ट्र पर शासन कर सकती है और अक्सर उसे नियंत्रित कर सकती है।"
जैसे ही उनका एयर इंडिया बोइंग वापसी में दिल्ली के पालम रनवे पर उतरा , इंदिरा गांधी ने विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को तुरंत अपने आवास पर बुलाया। बंद दरवाजों के पीछे एक घंटे की चर्चा के बाद वाजपेयी जल्दी-जल्दी लौटते दिखे. इसके बाद यह ज्ञात हुआ कि वाजपेयी संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे।
बीबीसी के डोनाल्ड पॉल ने वाजपेयी से सवाल पूछा, "इंदिरा जी आपको एक कट्टर आलोचक के रूप में मानती हैं। इसके बावजूद, क्या आप को नहीं लगता की आप संयुक्त राष्ट्र में बोलते हुए मौजूदा सरकार के रुख़ के पक्ष में होंगे। ?"
वाजपेयी ने प्रतिक्रिया दी थी कि "एक गुलाब एक बगीचे को सजाता है, और बगीचे को सजाने का काम लिली भी करती है । सभी इस विचार से घिरे हुए हैं कि वे व्यक्तिगत रूप से सबसे सुंदर हैं। जब उद्यान संकट में पड़ता है, तो सभी को उसकी रक्षा करनी होती है । मैं आज बगीचे को बचाने आया हूं। इसे भारतीय लोकतंत्र कहा जाता है।"
परिणामी इतिहास हम सभी जानते हैं।
अमेरिका ने पाकिस्तान को 270 प्रसिद्ध पैटन टैंक भेजे। उन्होंने विश्व मीडिया को यह दिखाने के लिए बुलाया कि ये टैंक विशेष तकनीक के तहत बनाए गए थे, और इस प्रकार अविनाशी हैं। इरादा बहुत साफ था। यह बाकी दुनिया के लिए एक चेतावनी संकेत था कि कोई भी भारत की मदद न करे।
अमेरिका यहीं नहीं रुका।
भारत को तेल की आपूर्ति करने वाली एकमात्र अमेरिकी कंपनी बर्मा-शेल को बंद करने के लिए कहा गया । उन्हें अमेरिका द्वारा भारत के साथ अब और व्यापार बंद करने के लिए सख्ती से कहा गया था।
उसके बाद भारत का इतिहास केवल वापस लड़ने के बारे में है। इंदिरा गांधी की तीक्ष्ण कूटनीति ने सुनिश्चित किया कि तेल यूक्रेन से आए।
सिर्फ एक दिन तक चली एक लड़ाई ने इन 270 पैटन टैंकों को नष्ट कर दिया। नष्ट किए गए टैंकों को प्रदर्शन के लिए भारत लाया गया था जो राजस्थान के गर्म रेगिस्तान आज भी एक गवाह के रूप में खड़े हैं जहां यू.एस का गौरव नष्ट हो गया था।
इसके बाद अठारह दिनों तक चले युद्ध की परिणति में पाकिस्तान से 1.0 लाख युद्धबंदी बनाये गए । मुजीबर रहमान लाहौर जेल से रिहा हुए।
मार्च का महीना था - इंदिरा गांधी ने भारतीय संसद में बांग्लादेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी।
वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को 'मां दुर्गा' कहकर संबोधित किया ।
इन घटनाओं के नतीजे इस प्रकार हैं-
-भारत की अपनी तेल कंपनी, अर्थात इंडियन ऑयल अस्तित्व में आया।
-भारत ने दुनिया की नजरों में खुद को ताकतवर राष्ट्र के रूप में सिद्ध किया।
-भारत ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का नेतृत्व किया।
इसका नेतृत्व निर्विवाद था।
हालांकि ये सारी घटनाएं लोग भूल गए हैं । मगर इतिहास आज भी बुलंद खड़ा है जिसको आगे वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाना चाहिए।