वकील भी जानते है,कुलदीप सेंगर फर्जी केस का सच
मेरे यहाँ मुख्य 2 मुख्य फैक्ट हैं:-
पहला फैक्ट - जब शशि सिंह को लेकर पीड़िता ने ये कहा कि मुझे शशि सिंह कुलदीप सेंगर के पास लेकर गई थी,फिर मेरे साथ ग़लत हुआ,लेकिन कोर्ट ने शशि सिंह को बरी कर दिया है कि शशि सिंह शामिल ही नहीं है इस प्रकरण में वो नहीं लेकर गई तो फिर ये केस तो यही झूठा साबित हो गया
दूसरा फैक्ट- जब कुलदीप सेंगर पर पोस्को लगाया गया तो मुझे ये बताओ जिन तीन लड़को पर ढाई महीने पहले गैंगरेप का आरोप लगा था तो उन पर पॉस्को क्यो नहीं लगाया गया ,उन्हें क्यो बरी किया गया?
क्या ढाई महीने पहले पीड़िता बालिग थी ?
@DeepikaBhardwaj
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भारत का ये पहला केस है जिसमे मीडिया द्वारा घोषित अपराधी कुलदीप सेंगर नार्को टेस्ट की माँग कर रहा है ..
लेकिन तथाकथित पीड़िता नार्को टेस्ट के लिए साफ़ मना कर रही है ….
अगर पीड़िता के साथ ग़लत हुआ है तो नार्को टेस्ट के लिए मना क्यों कर रही है ??
दिल्ली हाई कोर्ट ने कुलदीप सिंह सेंगर की सजा को निलंबित करने का फैसला बहुत ही तकनीकी कानूनी आधार और तथ्यात्मक बिंदुओं पर लिया है। कोर्ट ने माना कि निचली अदालत और CBI ने कानून की व्याख्या और सबूतों को समझने में गंभीर चूक की है।
1. मोबाइल फोन का रहस्य (गिरना vs. मिलना)
CBI/पीड़िता की कहानी में सबसे बड़ा झोल: पीड़िता ने कहा था कि घटना वाले दिन (4 जून 2017) जब वह कुलदीप सेंगर के घर गई थी, तो रेप के बाद उसका मोबाइल फोन और सिम कार्ड छीन लिया गया था या गिर गया था।
CDR (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) का सच: कोर्ट में पेश किए गए कॉल रिकॉर्ड्स कुछ और ही कहानी बयां कर रहे थे। रिकॉर्ड्स से पता चला कि जिस सिम/फोन को 'खोया' या 'छीना' हुआ बताया गया, वह घटना के बाद भी एक्टिव था।
उस नंबर से कई कॉल किए गए थे।
हाई कोर्ट का सवाल: कोर्ट ने माना कि अगर फोन छीन लिया गया था, तो वह एक्टिव कैसे था? और अगर पीड़िता के पास फोन था, तो उसने तुरंत पुलिस या परिवार को फोन क्यों नहीं किया? यह घटनाक्रम शक पैदा करता है।
2. केस दर्ज कराने में देरी
कानून में रेप जैसे मामलों में अगर FIR दर्ज कराने में बहुत देरी होती है, तो ठोस कारण बताना होता है। यहाँ यही सबसे बड़ी कमी रही।
कथित घटना: 4 जून 2017
पहली शिकायत (जो पुलिस को दी गई): अगस्त 2017 (लगभग 2 महीने बाद)।
सेंगर का नाम गायब: सबसे हैरानी की बात यह थी कि जब पीड़िता ने पहली बार पुलिस में शिकायत की, तो उसमें कुलदीप सिंह सेंगर का नाम ही नहीं था।
शुरुआती शिकायत में आरोप 'शुभम सिंह' और नीरज तिवारी एवं अन्य लोगों पर लगाए गए थे।
सेंगर का नाम और रेप का आरोप बहुत बाद में (अगस्त में) जोड़ा गया।
हाई कोर्ट का तर्क: कोर्ट ने माना कि यह बाद में सोची-समझी साजिश हो सकती है। जब इतनी बड़ी घटना हुई, तो मुख्य आरोपी का नाम पहली शिकायत में क्यों नहीं था? यह देरी और नाम का बाद में जुड़ना संदेह पैदा करता है कि कहीं किसी के कहने पर (Political rivalry) तो ऐसा नहीं किया गया।
3. बयानों में बार-बार बदलाव
पीड़िता ने अलग-अलग समय पर अलग-अलग बयान दिए, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठे।
धारा 164 का बयान (मजिस्ट्रेट के सामने):
पहले बयान में पीड़िता ने कहा था कि उसे अगवा किया गया था और बेचा गया था, लेकिन उसने सेंगर द्वारा रेप की बात साफ तौर पर नहीं कही थी।
बाद में उसने अपना बयान बदला और कहा कि सेंगर ने रेप किया था।
मेडिकल हिस्ट्री में चुप्पी: जब घटना के बाद पीड़िता का मेडिकल चेकअप हुआ, तो उसने डॉक्टर को रेप के बारे में या सेंगर के बारे में कुछ नहीं बताया। आमतौर पर पीड़िता डॉक्टर को सबसे पहले सच बताती है।
ट्रायल कोर्ट की गलती: निचली अदालत ने इन बदलते बयानों को नजरअंदाज कर दिया और माना कि पीड़िता डरी हुई थी। लेकिन हाई कोर्ट का मानना है कि बयानों में इतना बड़ा बदलाव (आरोपी का नाम ही न होना और फिर आ जाना) सामान्य नहीं है और इसे गंभीरता से देखा जाना चाहिए था।
4. पीड़िता की नाबालिग होने पर संदेह
ट्रायल कोर्ट ने यह मान लिया था कि पीड़िता नाबालिग थी, लेकिन हाई कोर्ट ने इसमें जांच की कमी पाई।
CBI/ट्रायल कोर्ट की गलती: उम्र साबित करने के लिए दस्तावेजों की ठीक से जांच नहीं की गई।
हाई कोर्ट की टिप्पणी: रिकॉर्ड पर तीन अलग-अलग दस्तावेज हैं: A. स्कूल का ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC)। B. स्कूल का एडमिशन रजिस्टर और 3.मेडिकल ओसिफिकेशन टेस्ट (हड्डी की जांच)।
इन तीनों में अलग-अलग जन्म तिथियां हैं। स्कूल रिकॉर्ड में लिखी जन्मतिथि 2001 को मिटाकर दोबारा लिखा गया था।
हर मेडिकल टेस्ट के हिसाब से पीड़िता घटना के वक्त 18 साल से ऊपर (बालिग) थी। एक में वह 19 साल से ऊपर थी।
ऐसे में अगर वह बालिग साबित होती हैं, तो पूरा पॉक्सो एक्ट ही केस से हट जाएगा। हाई कोर्ट ने इसे विचारणीय मुद्दा माना।
5. कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) और लोकेशन की अनदेखी
ट्रायल कोर्ट की गलती: ट्रायल कोर्ट ने मोबाइल टावर लोकेशन (CDR) के सबूतों को ज्यादा महत्व नहीं दिया था।
तथ्य: सेंगर के वकीलों ने सबूत पेश किए कि घटना के समय सेंगर की मोबाइल लोकेशन उस जगह (माखी गांव) पर नहीं थी, बल्कि वहां से 15-16 किलोमीटर दूर उनके ऑफिस या किसी समारोह में थी।
पीड़िता ने कहा था कि उनके साथ 8 से 8:30 बजे के बीच रेप हुआ। ऐसे में 30 मिनट में 15 किलोमीटर आकर रेप करना और फिर 15 किलोमीटर जाकर एक मीटिंग अटेंड करना संभव नहीं है।
हाई कोर्ट का रुख: हाई कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने लोकेशन के सबूतों को खारिज करने में जल्दबाजी की। अपील के दौरान इस पर गहराई से सुनवाई की जरूरत है।
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उन्नाव केस हो या हाथरस दोनों जगह देखने को मिला है कि खुद आरोपी आगे आकर सीबीआई जांच, नार्को टेस्ट, हर तरह की पुछताछ के लिए तैयार है। लेकिन पीड़ित पक्ष नहीं।
ये कैसे पिडित है?
भारत का न्यायिक सिस्टम देखिए कि यहां आरोपी ही खुद निर्दोष साबित होने के लिए अपनी नर्कों टेस्ट कराने का आग्रह करता है।
कुलदीप सेंगर की पत्नी ने इसकी मांग की थी। CBI को वे अपनी सहमति भी दे चुके थे। सीबीआई टेस्ट के लिए दिल्ली लाने वाली भी थी। अंत में टेस्ट अटक गया।
अब सवाल है कि टेस्ट क्यों नहीं हुआ। सीबीआई ने इसकी जरूरत नहीं समझी या कोर्ट ने इसकी इजाजत नहीं दी या राजनीतिक प्रेशर था या कुछ और, इसको लेकर मीडिया रिपोर्ट में तथ्य साफ नहीं हैं।
अंत में दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट के डिस्ट्रिक्ट जज धर्मेश शर्मा ने फैसला दिया कि सेंगर की जब तक सांसें रहेंगी, तब तक वो जेल में रहेंगे। 25 लाख का जुर्माना भी लगाया था।
अब सवाल ये भी है कि जिस रेप केस में झोल नजर आ रहा है, उस अपराध को अगर कुलदीप ने अंजाम दिया ही नहीं तो वो पीड़िता की पिता की हत्या क्यों करवाएंगे?
मामला पेचीदा है। ये आसान नहीं है।
दोनों ही बेवकूफो वाली हरकत करके एक दूसरे पर किचड उछाल रहे हैं। जिसका अब कोई औचित्य नहीं है। क्योंकि अब न तो दोनों की दादागिरी चल रही है नाही दोनों राजनीति में सक्षम है। पुराने गिले शिकवे भुलाकर दोनों साथ नहीं आ सकते हैं तो कम से कम एक दुसरे पर लांछन लगाना बंद कर दे इसमे भलाई है।