नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होंटों पर
लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं
उड़ते फिरते हैं तितलियों की तरह
कब से बैठा हुआ हूँ मैं जानम
सादा काग़ज़ पे लिख के नाम तिरा
बस तिरा नाम ही मुकम्मल है
इस से बेहतर भी नज़्म क्या होगी!
@Naazishnaaz@Izhar_e_Khayal@sailaaab
वो हम से दूर होते जा रहे हैं
बहुत मग़रूर होते जा रहे हैं
बस इक तर्क-ए-मोहब्बत के इरादे
हमें मंज़ूर होते जा रहे हैं
'शकील' एहसास-ए-गुमनामी से कह दो
कि हम मशहूर होते जा रहे हैं
#lafzii#shayari@dard_aai_dil@Gulzar_sahab
ज़िंदगी उन की चाह में गुज़री
मुस्तक़िल दर्द-ओ-आह में गुज़री
रहमतों से निबाह में गुज़री
उम्र सारी गुनाह में गुज़री
मैं वो इक रहरव-ए-मोहब्बत हूँ
जिस की मंज़िल भी राह में गुज़री
इक ख़ुशी हम ने दिल में चाही थी
वो भी ग़म की पनाह में गुज़री...
#lafzii@dard_aai_dil@Gulzar_sahab