‘मुख्य’ कह रहे हैं ‘कुछ नहीं हुआ’; दूसरी तरफ़ ‘अपर’ बिन आँख मिलाए, गोलमोल-टालमटोल अंदाज़ में कह रहे हैं ‘कुछ था’।
झूठ के संग यही सबसे बड़ी समस्या होती है कि उसके दो रूप हो सकते हैं। भाजपाई शासन-प्रशासन पहले मिल बैठकर तय कर ले कि सच को छुपाने के लिए झूठा बयान क्या देना है, नहीं तो ‘दो-बयानी’ से झूठ की कलई खुल जाती है और जनता के बीच ��नकी खिल्ली उड़ती है साथ ही शासन-प्रशासन को नज़र चुरा कर बात करनी पड़ती है।
भाजपाई शासन-प्रशासन, झूठ बोलने के लिए एक व्हाट्सएप ग्रुप बना ले।
जब जन सभाओं में बुलडोज़र देखने को मिले तो याद रखना ,,, ये वही बुलडोजर है जो नौजवान बेरोज़गार किसान पीड़ित और ख़ास तौर पर PDA समाज के अरमानो और सपनों पर चलेगा ,,,
#बिहार_विधानसभा_चुनाव@yadavtejashwi को लाओ
@yadavakhilesh ज़िंदाबाद
राजनीति के सुंदीकरण का श्रेय सिर्फ मा अखिलेश यादव जी को जाता है ,,, जिन्होंने स्वास्थ शिक्षा रोज़गार और इंफ्र��स्टेक्चर पर काम किया ,,, वही महिलाओं के सुरक्षा के लिए 1090 जैसी ज़रूरी सेवा दी जो आज भी काम आ रही है ,,,
फिर से मा #AkhileshYadav जी को लाना है ,,,
सपा सरकार में बना प्रदेश का पहला अत्याधुनिक मार्डन काउ मिल्क प्लांट भाजपा सरकार ने इसलिए बंद कर दिया है जिससे कि वो पिछले दरवाज़े से इसे बेचकर बीच में मुनाफ़ा कमा सके।
भाजपा गोपालक विरोधी है।
प्रिय निर्यातकों
हम सब जानते हैं कि टैरिफ़ की वजह से उप्र का निर्यात बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
- प्रतिशोधात्मक टैरिफ़ भाजपा सरकार की नाक़ामयाब नीतियों का परिणाम है, उसका ख़ामियाज़ा निर्यातक व उन पर निर्भर बाक़ी व्यवसाय यथा पैकिंग व ट्रांसपोर्ट उद्योग तथा कामगार-कलाकार-शिल्पकार व उनके परिवार क्यों भुगते।
- बनारसी साड़ी से लेकर, कार्पेट उद्योग, पीतल उद्योग, ताला व हार्डवेयर उद्योग, चमड़ा उद्योग, इत्र उद्योग, स्पोर्ट्स उद्योग, फूड व प्रोसेस्ड प्रॉडक्ट्स, स्टोन-मार्बल उद्योग, रेडीमेड गारमेन्ट्स, मूंज, ज़री जरदोज़ी, होम फ़र्निशिंग, बांस, सुनारी, बिंदी, वुड प्रॉडक्ट्स, शज़र पत्थर शिल्प, सिरेमिक, लकड़ी के खिलौने, घुंघरू-घंटी, आयरन फैब्रिकेशन, कांच उद्योग, जूट वॉल हैंगिग, इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स, टेराकोटा, हींग, हैंडमेड पेपर, सॉफ़्��� ट्वॉयज, केला फ़ाइबर, एल्यूमीनियम बर्तन, चिकनकारी, फ़र्नीचर, गौरा पत्थर शिल्प उत्पाद, तारकशी, मेटल क्रॉफ्ट आइटम्स, बांसुरी, हैंडलूम व हस्तशिल्प के अरबों-खरबों रूपये के प्रॉडक्ट्स बीच समंदर जहाज़ों में फँसे पड़े हैं।
- उप्र के निर्यातक तबाही के कगार पर खड़े हैं।
- एक्सपोर्ट्स का पेमेंट साइकल बिगड़ गया है।
- निर्यातकों के सप्लायर्स और वेंडर्स अलग से परेशान हैं।
- यही वो समय है जब सरकार स��मने आए और ODOP के तहत आनेवाले सभी उत्पादों को विशेष राहत प्रदान करे व अन्य प्रॉडक्ट्स को भी सुरक्षा-कवच प्रदान करे, जिससे कि वो विदेशी पाबंदियां से अपने को बचा पाएं।
- अगर सरकार ऐसा नहीं करती है तो लाखों निर्यातकों का काम-कारोबार ठप हो जाएगा और करोड़ों लोग बेरोज़गार हो जाएंगे।
- इससे प्रदेश में बेरोज़गारी की समस्या और भी विकराल रूप से लेगी।
- सरकार अगर इस कठिन समय में प्रदेश के उद्योगों को स���ायता और संरक्षण प्रदान नहीं करेगी तो फिर सरकार के होने का क्या मतलब रह जाएगा।
ये समय हर भेद को भूलकर एकजुट होकर, बात-बात पर दबाव बनाकर चंदा वसूलनेवाली भाजपा सरकार के सामने अपनी मांगों को पुरज़ोर तरीक़े से रखने और मनवाने का है।
हम आपके साथ हैं क्योंकि ये लाखों परिवारों की आजीविका और जीवनयापन का विषय है। साथ ही ये उप्र में उद्योग-कारोबार व निवेश के भविष्य का भी सवाल है। सरकार के पास ऐसे कई उ��ाय हैं, जिनसे वो इस ‘टेरिफ़ाइंग टैरिफ़ इमर्जेंसी’ के बुरे असर से प्रदेश के निर्यातकों को बचाने के लिए मदद कर सकती है।
हम फिर दोहराते हैं :
दरअसल कमी कोष की नहीं सोच की है।
हम आपके साथ हैं!
आपका
अखिलेश
#ODOP
#TerrifyingTariffEmergency
इस दुखद घटना के लिए बस इतना ही कहना है कि बदइंतज़ामी और भ्रष्टाचार में लिप्तता इतनी भी न हो कि किसी की जान चली जाए।
स्वास्थ्य मंत्री के संज्ञान में ये बात अगर आए तो पीड़ित परिवार को उनका बेटा तो वापस नहीं करवा सकते लेकिन मुआवज़ा देकर कुछ तो पश्चाताप कर सकते हैं।
और कुछ नहीं कहना है।
गोरखपुर के दौरे के दौरान, उप्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष व वरिष्ठ समाजवादी नेता श्री माता प्रसाद पांडेय जी एवं श्री लाल बिहारी यादव जी पर असामाजिक तत्वों का हमला घोर निंदनीय है।
यदि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के जन संपर्क एवं जन समस्याओं की सुनवाई पर सत्ता संरक्षित अराजकतत्वों तत्वों द्वारा प्राणघातक प्र���ार होगा तो ये अराजकता का राज ही कहलाएगा।
आरोपियों के विरुद्ध पक्षपातहीन कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो अन्यथा ये माना जाएगा कि ये ‘हाता नहीं भाता और पीडीए नहीं लुभाता’ का एक ऐसा प्रकरण है जिसके पीछे सोची-समझी साज़िश रची गयी थी।