Arif Khan was caught selling sugarcane juice mixed with meat pieces in Bharatpur, Rajasthan.
A customer detected a foul smell and found meat in the ice box used for the juice.
Locals Hindus demolished the shop and handed two Muslim youths over to the police
भारत में ट्रेन लाने का श्रेय किसको प्राप्त है, अंग्रेज? बिलकुल नहीं, नाना जगन्नाथ शंकर सेठ वो पहले व्यक्ति है जिन्होंने इसके लिए पहल शुरू की थी
नाना स्वर्णकार परिवार में जन्मे ��े और व्यवसाई घराना होने के कारण वे धन संपदा से काफी संपन्न भी थे
इंग्लैंड में जब ट्रेन पहली बार चली तो ये पूरी दुनिया की हेडलाइन बन जाती है, ये खबर जब नाना तक पहुंची तो उन्हे लगा ये ट्रेन उनके गांव, शहर में भी चलनी चाहिए
अब नाना जी कोई आम व्यक्ति तो थे नहीं उनका व्यवसाय बहुत बड़ा था, उनका प्रभाव इससे समझ सकते है कि कई अंग्रेज अफसर उनके सानिध्य में रहते थे
उन्होंने कई विश्वविद्यालय खोले थे जिस���े कई महान क्रांतिकारियों ने बाद में इसमें शिक्षा को ग्रहण किया, उन्होंने लड़कियों के लिए मुंबई में पहला स्कूल खोला। नानाजी अपने स्कूलों में अंग्रेजी के साथ संस्कृत पढ़ाने की भी व्यवस्था की थी
1843 में वे अपने पिता के दोस्त जमशेद ��ीजोभोय उर्फ जेजे के पास गए और इंडियन रेलवे का अपना आइडिया उन्हे बताया, भारत में ट्रेन चलने के आइडिया से सुप्रीम कोर्ट के जज थॉमस और ब्रिटिश अधिकारी स्किन पैरी काफी खुश थे
सबको नाना का आइडिया शानदार लगा इसके बाद तीनो ने मिलकर इंडियन रेलवे एसोसिएशन को बनाया, उससे पहले अंग्रेजो का रेलवे के प्रति ऐसी कोई योजना नहीं थी
जब नाना और जेजे जैसे प्रभावी व्यक्तियों ने ईस्ट इंडिया कंपनी को अपना सुझाव दिया, तो उन्होंने काफी सोच विचार के बाद सरकार को इसमें काम करने के लिए कहा।
इन्होंने मुंबई के बड़े बड़े व्यापारियों को इस प्रोजेक्ट से जोड़ते हुए ग्रेट इंडियन रेलवेज नाम की कंपनी बनाई
ये सपना 1853 में पूरा हुआ, जब मुंबई से थाणे की ट्रेन चली, इसमें नाना जी और जेजे भी यात्री के रूप में सवार रहे
वास्तव में हम दूसरो की एक एक बात जानते है पर अपनो के ��ोगदान को जानने की दूर की बात है सुनना भी पसंद नही करते।
>अरविंद केजरीवाल अपने बेटे और बेटी को जंतर-मंतर पर नहीं भेजेंगे
>प्रशांत भूषण अपने बच्चों को जंतर-मंतर नहीं भेजेंगे
>ध्रुव राठी जर्मनी से जंतर-मंतर नहीं आएंगे
>अर्पित शर्मा जर्मनी से जंतर-मंतर नहीं आएंगे
>प्रकाश राज अपने बच्चों को जंतर-मंतर नहीं भेजेंगे
> सोनम वांगचुक अपने परिवार के बच्चों को जंतर-मंतर नहीं भेजेंगे
>प्रिय��का वाड्रा अपने बच्चों को जंतर मंतर पर नहीं भेजेंगे
>अखिलेश यादव अपने बच्चों को जंतर मंतर पर नहीं भेजेंगे
>संजय सिंह अपनी बेटी को जंतर मंतर में नहीं भेजेंगे
>> *कोई भी विपक्षी नेता अपने बच्चों को सीजेपी द्वारा बुलाए गए विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए जंतर-मंतर नहीं भेजेगा ।*
*वे जानते हैं कि अगर वे अपने बच्चों को भेजते हैं और अगर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाती है, तो उन्हें पासपोर्ट नहीं मिलेगा और वे पढ़ाई, छुट्टी या नौकरी के लिए देश से बाहर नहीं जा पाएंगे !!*
*वे मध्यम वर्गीय परिवारों और बच्चों को आंदोलन में शामिल होने के लिए उकसाएंगे और उनका करियर बर्बाद कर देंगे!!*
This is Insane.
Muslims in the UK are demanding the St. George’s Cross be removed from England’s flag because the Christian symbol offends them.
The backlash across Britain has been massive. Brits are rising up to defend their national flag and heritage with zero apologies.
This is what happens after years of mass immigration with zero demand for assimilation. You don’t move to a country and then try to erase its identity.
The people have had enough. It’s time for authorities to stop appeasing every demand and actually defend British culture and values.
वह वही रामभद्राचार्यजी हैं, जिन्होंने वेदों और पुराणों के उद्धरणों के साथ सर्वोच्च न्यायालय में भगवान राम के पक्ष में गवाही दी थी।
विचार सुप्रीम कोर्ट का था... तुलसीपीठ के संस्थापक और पद्मविभूषण प्राप्त करने वाले रामभद्राचार्यजी, जो श्री राम जन्मभूमि के पक्ष में एक वादी के रूप में उपस्थित थे ... विवादित स्थल।
जज की कुर्सी ने तीखे सवाल के साथ पूछा, "आप लोग हर चीज में वेदों से सबूत म���ंगते हैं... तो क्या आप वेदों से सबूत दे सकते हैं कि श्री राम का जन्म अयोध्या में उस स्थान पर हुआ था?"
रामभद्राचार्यजी (जो प्रज्ञाचक्षु हैं) ने एक क्षण भी गँवाए बिना कहा, "मैं दे सकता हूँ सर", ... और उन्होंने ऋग्वेद की गैमिनीय संहिता से उद्धृत करना शुरू किया जिसमें सरयू नदी के विशेष स्थान से दिशा और दूरी दी गई है। श्री राम जन्मभूमि तक पहुँचने के लिए बिल्कुल सही।
कोर्ट के आदेश ने गैमिनिया संहिता की ���ांग की और उसमें जगद्गुरु द्वारा निर्दिष्ट संख्या खोली गई और सभी विवरण सही पाए गए। जिस स्थान पर श्री राम जन्मभूमि का स्थान दिया गया है वह ठीक विवादित स्थल है। और जगद्गुरु के बयान ने फैसले को हिंदुओं की ओर मोड़ दिया।
न्यायाधीश ने स्वीकार किया, "आज मैंने भारतीय ज्ञान का चमत्कार देखा। एक व्यक्ति जो भौतिक आंखों से रहित है, वह वेदों और शास्त्रों की विशाल मात्रा से उद्धरण कैसे दे रहा है? दैवीय शक्ति के अलावा और क्या है?"
महज दो महीने की उम्र में ही उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी और आज वे 22 भाषाएं जानते हैं और उनके द्वारा 80 ग्रंथ लिखे गए हैं....Read News
ऋषिकेश में गंगा नदी में कुछ हिंदू राफ्टिंग कर रहे थे जब उन्होंने नदी के बीच में तेज धारा में फंसकर डूब रही एक गाय को देखा।
वे हिंदू तुरंत गाय को बचाने के लिए आगे बढ़े, उसकी जान बचाई, उसे नदी से बाहर खींच लिया और अपनी राफ्टिंग बोट पर बिठा लिया।
बाद में, उन्होंने इसे नदी किनारे एक सुरक्षित स्थान पर सुरक्षित छोड़ दिया।
यह हिंदू धर्म की सुंदरता है - हिंदू जानवरों के प्रति क्रूरता नहीं दिखाते, बल्कि उनका संरक्षण करते हैं और उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं।
Scary how meticulously planned this operation was. 10 gym owners, including gang leaders Imran and Khaliluddin, befriended 50 Hindu women visiting gyms, recorded videos, blackmailed them, forced them to convert, then sexually exploited them.
They are calling this Gym Jihad.
शरीर से मांस का एक-एक कतरा गल चुका था। पसलियां बाहर आ गई थीं। हिलने-डुलने तक की ताकत नहीं बची थी।
जब अंग्रेजों ने देखा कि यह 25 स��ल का लड़का टूट नहीं रहा, तो उन्होंने जबरदस्ती नाक में नली ठूंसकर दूध पिलाने की कोशिश की। वह नली खाने की नली की जगह फेफड़ों में चली गई।
दूध फेफड़ों में भर गया। वो तड़पते रहे, खून की उल्टियां करते रहे, लेकिन अनशन नहीं तोड़ा।
13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में एक क्रांतिकारी ने अपने प्राण त्याग दिए। 63 दिन... जी हाँ, 63 दिन तक बिना अन्न का एक दाना खाए।
इतिहास के पन्नों में अक्सर हम भगत सिंह की फांसी की बात करते हैं, लेकिन उस साथी को ��ूल जाते हैं जिसने भगत सिंह की बाहों में दम तोड़ा था।
आज हम बात कर रहे हैं 'यतींद्र नाथ दास' की, जिन्हें दुनिया 'जतिन दा' के नाम से जानती थी।
पेशे से वो बम बनाने में माहिर थे, लेकिन उनका हथियार बना उनका अपना शरीर।
वो चाहते तो माफी मांग सकते थे, खाना खा सकते थे। लेकिन मांग सिर्फ एक थी - "भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ जानवरों जैसा सलूक बंद करो।"
अंग्रेजों को लगा कि भूख इसे तोड़ देगी। लेकिन उन्हें ���हीं पता था कि यह शरीर मिट्टी का नहीं, फौलाद का बना है।
जब जतिन दा की हालत बिगड़ने लगी, तो अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। जेल के डॉक्टर और सिपाहियों ने उन्हें दबोच लिया। नाक से नली डाली। दर्द से वो चीखते रहे, लेकिन उनका संकल्प नहीं डिगा।
उनकी शहादत की खबर जब बाहर आई, तो पूरा देश रो पड़ा था।
कहा जाता है कि जब उनका शव लाहौर से कलकत्ता ले जा��ा जा रहा था, तो हर स्टेशन पर हजारों लोग फूल लेकर खड़े थे। कलकत्ता में उनकी अंतिम यात्रा में 6 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए।
सुभाष चंद्र बोस ने खुद उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया था।
लेकिन आज? आज कितने लोग उस 63 दिन की तपस्या को याद करते हैं?
मरते वक्त जतिन दा ने कहा था, "मैं कोई साधु नहीं हूँ, मैं बस एक साधारण इंसान हूँ जो अपने देश की गरिमा के लिए मरना चाहता है।"
आजादी चरखे से आई या बिना खड्ग-ढाल के, य��� बहस का विषय हो सकता है। लेकिन यह सच है कि आजादी की नींव में जतिन दा जैसे नौजवानों की गल चुकी हड्डियां गड़ी हैं।
हमें यह आजादी खैरात में नहीं मिली, इसके लिए किसी ने अपनी जवानी के 63 दिन भूखे रहकर कुर्बान किए हैं।
हर भारतीय का कर्तव्य है कि वो जाने कि जिस हवा में वो सांस ले रहा है, उसकी कीमत क्या थी।
इस जानकारी को साझा करें ताकि आ��े वाली पीढ़ियां जान सकें कि असली 'हीरो' कौन थे।
यह पोस्ट केवल उन भूले-बिसरे नायकों को नमन करने के लिए है।
The Indian Holocaust- This must go viral
Hitler did not come to India - Then who put 20000 Indian Army Soldiers in Gas Chambers??
The Britishers did- 1930 British Holocaust on Indians for 10 years suspected to have killed over 20000 soldiers
This story won’t give you goosebumps. 🇮🇳💔
It will leave you in silence.
History often speaks of wars, but stays silent about what happened behind closed doors.
In the 1930s and 1940s, soldiers of the British Indian Army were taken to military testing programs linked to Porton Down.
Inside controlled gas chambers in Rawalpindi, Indian Army soldiers were exposed to mustard gas.
Not in battle.
In experiments.
They were made to stand inside sealed chambers wearing minimal clothing so the effects on skin, eyes, and lungs could be studied.
What they endured was not warfare—it was observation.
Hundreds were exposed.
Many suffered severe burns. Many developed long-term respiratory and eye damage. Some were hospitalized for weeks.
Consent was not truly informed. Within the structure of colonial military authority, refusal was not realistically possible.
For years, this remained hidden from public view.
Later reporting, including by The Guardian, brought fragments of this truth into light.
This was not a battlefield.
This was controlled human experimentation done in the name of research.
And the people inside those chambers were Indian Army soldiers who had no real choice in what they were part of.
Some parts of history are not meant to give chills.
They are meant to leave you with silence.
पैरों ने साथ छोड़ दिया, मगर हौसले अब भी खड़े हैं…🫡
माँ खुद चल नहीं सकती, फिर भी बच्चे का भविष्य थामे ज़मीन पर घिसटते हुए उस�� स्कूल पहुँचा रही है।🥺
ये सिर्फ एक तस्वीर नहीं, एक माँ की ममता, दर्द और त्याग की ऐसी कहानी है जो पत्थर दिल को भी पिघला दे। ❤️🇮🇳
लेकिन बिटिया को एक ट्राइसाइकिल भी नसीब नहीं हो सका!!!
When Shri KAMARAJ was CM, he had 7 Ministers In his Cabinet.
Mr KAKKAN was one among them in the Cabinet. He was given the following portfolis:
HOME
PWD
AGRICULTURE
IRRIGATION
ANIMAL HUSBANDRY
POLICE
JAILS PRISON
FINANCE
EDUCATION
LABOUR
PROHIBITION.
He was
Cabinet Minister for 10 years.
While touring, he used to wash his clothes ( self).
Once he toured Trichy.
He missed the train.
Next train was in the next morning.
He never approached anyone including the railway staff.
He just SLEPT ON THE RAILWAY PLATFORM BENCH.
In the midnight, railway police woke him up with the POLICE LATHIS. The police asked him who are you?
You cannot sleep here. Go away.
He replied “ Sir. My name is KAKKAN. I am the Minister for the Police and Home department. I will leave once the train arrives in the morning.
The POLICEMEN WERE SHOCKED. Sir OUR APOLOGIES TO YOU. FORGIVE US.
Sir you can stay in the FIRST CLASS WAITING ROOM.
He replied. No. This comfort is sufficient for me. And slept on the platform bench.
Police guarded him till he got into his train.
Today is his BIRTHDAY. Can we expect such simple and honest Ministers today.
कहाँ गए वो लोग।
Credits - Harish Shetty
साल 1973 पाकिस्तान के पेशावर–रावलपिंडी रोड पर 22 नंबर माइलस्टोन के पास एक व्यक्ति बस से उतरा। नाम-इब्राहिम। पहनावे, हावभाव, भाषा-सब कुछ बिल्कुल एक पाकिस्तानी मुसलमान जैसा। होटल में ठहरना, पहचान-पत्र सब ��ुछ पूरी तरह ठीक ।
लेकिन पाकिस्तान की इंटेलिजेंस अधिकारियों की नज़र से वह बच न सका । शक के आधार पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया । पूछताछ शुरू हुई । पहले सामान्य पूछताछ, फिर शुरू हुआ अमानवीय अत्याचार।
इब्राहिम से कहा गया— "कबूल कर तू भारतीय जासूस है।"
लेकिन इब्राहिम ने मुंह नहीं खोला ।
यह ‘इब्राहिम’ वास्तव में भारतीय सेना का पूर्व जवान काश्मीर सिंह (Kashmir Singh) थे— जो ��ात्र 400 रुपए के मासिक कॉन्ट्रैक्ट पर अपना नाम, धर्म, पहचान सब बदलकर दुश्मन देश में घुस गए थे ।
35 वर्षों का नरक....😥😥
गिरफ्तारी के बाद उस पर जो अत्याचार हुए, वह सुनकर रूह कांप जाती है ।
पहले कुछ महीनों तक थर्ड डिग्री टॉर्चर—नाखून उखाड़ना, बिजली के झटके देना, कोई तरीका नहीं छोड़ा गया ।
फिर भी उनके मुंह से देश का राज न निकल सका ।
उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई, लेकिन उन्हें फाँसी देने की बजाय जेल की अ��धेरी काल कोठरी में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया ।
अविश्वसनीय....लगातार 17 साल उन्हें एक अकेले सेल में जंजीरों से बांधकर रखा गया ।
हाथ–पैर बेड़ियों में, हिलने–डुलने तक की जगह नहीं।
साढ़े तीन दशक तक उन्होंने न आसमान देखा, न सूरज, न किसी इंसान का चेहरा ।
जेलकर्मी उन्हें ��ागल समझते थे।
वे खुद भी मानसिक संतुलन खोने लगे थे ।
लेकिन उनका मन—इस्पात जैसा मजबूत।
उन्हें पता था—एक शब्द भी बोल दिया तो देश का नुकसान होगा, परिवार की इज़्ज़त जाएगी।
घर पर इंतज़ार जब वह पकड़ा गया, उनकी पत्नी परमजीत कौर की गोद में तीन छोटे बच्चे थे,सबकी उम्र 10 वर्ष से कमपति लापता ।
सभी ने कहा—काश्मीर सिंह मर चुका है,पर एक व्यक्ति ने यकीन नहीं खोया—परमजीत।
उन्होंने न सफेद साड़ी पहनी, न च��ड़ियाँ तोड़ीं।
उन्हें विश्वास था पति जीवित है और एक दिन जरूर लौटेगे ।
1986 में पाकिस्तान ने जब कुछ भारतीय बंदियों की सूची जारी की, तब पता चला कि काश्मीर सिंह ज़िंदा हैं, लेकिन फाँसी के कैदी के रूप में। इसके बाद भी बीत गए 22 साल।
मुक्ति और सत्य 2008 ....
पाकिस्तान के मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी (Ansar Burney) लाहौर जेल का निरीक्षण करने गए। वहाँ उन्होंने एक कमजोर, जर्जर, लगभग मानसिक रूप से टूट चुके बूढ़े व्यक्ति को देखा।
पता लगाने पर मालूम हुआ...यह व्यक्ति बिना किसी न्याय प्रक्रिया के 35 वर्षों से जेल में है।
मानवीय आधार पर बर्नी ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ से उसकी रिहाई की सिफारिश की।
मुशर्रफ़ ने मंज़ूरी दे दी।
4 मार्च 2008.....
वाघा बॉर्डर......
35 वर्षों बाद एक कांपते कदमों वाला बुजुर्ग भारत की सीमा में प्रवेश करते हैं ।
उन्हें लेने खड़ी थी उनकी पत्नी और उसके बच्चे
सीमा पार करते ही काश्मीर सिंह ने वह बात कही, जिसे सुनकर सब स्तब्ध रह गए।
अब तक उन्होंने खुद को मानसिक रूप से अस्थिर या साधारण नागरिक बताया था ।
लेकिन भारतीय धरती पर कदम रखते ही गर्व से बोले—
"मैं भारतीय जासूस था। मैंने अपना फ़र्ज़ निभाया है। उन्होंने मुझे 35 साल कैद में रखा, लेकिन मेरे मुंह से एक शब्द भी नहीं निकलवा पाए ।
एक कीमतहीन देशभक्ति...अज्ञात व्यक्ति...
एक ऐसा इंसान, जिसने मात्र 400 रुपए के बदले अपनी पूरी जवानी, जीवन के 35 साल, पाकिस्तान की अंधेरी कोठरी में कुर्बान कर दिए।
17 साल जंजीरों में रहा।
काश्मीर सिंह साबित कर गए देशभक्ति की कोई कीमत नहीं होती, यह खून में होती है।
Source
১/ Wikipedia: Kashmir Singh
২/ BBC: "A powerful Indian love story"
৩/ The Times of India: "Kashmir Singh released from Lahore jail"
৪/ Hindustan Times: "Kashmir Singh comes home after 35 yrs"
When the Government of India announced the Padma Shri for Dr. Tapan Kumar Lahiri,
the protocol required him to travel to Rashtrapati Bhavan in New Delhi to receive the honor from the President.
However, Dr. Lahiri was hesitant to go. His reasoning was simple: "If I go to Delhi, who will look after my patients in the OPD?" For him, a day away from the hospital wasn't a holiday; it was a day his patients—many of whom traveled from Bihar and rural UP—would go untreated.
Finally he did go given the prestige associated with the event.
Who is Dr Tapan Lahiri?
Dr. Tapan Kumar Lahiri is a legendary Indian cardiothoracic surgeon and professor commonly referred to as the "Saint of BHU". Dr. Lahiri has done FRCS and MCh and working in BHU.
Dr. Lahiri’s commitment to the poor is extraordinary.
In 1994, when his salary (including allowances) exceeded ₹1 lakh, he stopped taking it entirely, directing the university to use the funds for the treatment of underprivileged patients.
After retiring in 2003, he continued this practice with his pension. He keeps only enough to cover two simple meals a day and donates the remainder to the BHU patient fund.
Even in his 80s, he has been known to walk to the hospital at 6:00 AM daily, carrying a simple bag and a black umbrella, to check on his patients.
As he says
"With the grace of Lord Vishwanath and Maa Annapurna, I will keep serving patients till my last breath."
कारगिल युद्ध के समय चोटी पर बैठे पाकिस्तानी सैनिकों को सप्लाई देने के लिए पाकिस्तान ने चार विशाल सप्लाई कैंप बना रखे थे
और वह कैंप उन सैनिकों को गोला बारूद से लेकर खाना पीना सप्लाई करते थे और वह सप्लाई कैंप के आसपास कई मिसाइल लॉन्चिंग सिस्टम बनाए गए थे
भारत के लिए इन सप्लाई कैंप को नष्ट करना जरूरी था लेकिन जैसे ही भारत का कोई विमान इन पर बम गिराने के लिए जाता था उसके पहले ही मेड इन अमेरिका की स्ट्रिंगर मिसाइल या कोई अन्य मिसाइल उसे विमान को गिरा देती थी
आप लोगों को विंग कमांडर नचिकेता याद होंगे जिनके विमान को पाकिस्तान ने नष्ट कर लिया था और आठ दिन तक य��द्ध बंदी बना दिया था
भारत को अपने कुल आठ विमान खोने पड़े और भारतीय सेना ने कह दिया कि जब तक हम इन रसद और हथियार सप्लाई डिपो को नष्ट नहीं करेंगे तब तक हम चोटियों पर बैठे पाकिस्तानी सैनिकों को अलग-अलग नहीं कर सकते
लेकिन उस समय भारत के पास ऐसी कोई टेक्नोलॉजी नहीं थी जिसके द्वारा भारत ने नष्ट कर सके
भारत को चाहिए लाइटनिंग पॉड और लेजर गाइडेड मिसाइल जो दोनों भारत के पास उसे वक्त नहीं थे
फिर ऐसे ���ें भारत का मित्र ��ेश इजराइल सामने आया उसने लेजर गाइडेड बम दिए लाइटनिंग पोड दिए ताकि बम वर्षक विमान चला रहे पायलट को सटीक लोकेशन मिले
और उन बम में जीपीएस कोऑर्डिनेटर फिट किए गए उस वक्त भारत के पास अपनी जीपीएस टेक्नोलॉजी नहीं थी और अमेरिका ने भारत को जीपीएस कोऑर्डिनेट्स देने से मना कर दिया था
लेकिन इसराइल ने अपनी टेक्नोलॉजी के द्वारा खुद सप्लाई कैंपस के जीपीएस कोऑर्डिनेटर निकालकर लेजर गाइडेड बम में फिट क��� दिए थे
और वह सारे बम लगभग 2000 किलो के थे जिन्हें मिराज विमान में लगाना था
और उसके लिए विमान को मॉडिफाई करना जरूरी था
फिर इजरायल के कई इंजीनियर आए ग्वालियर एयर बेस पर मिराज विमान को इसराइल के इंजीनियर ने मॉडिफाई किया और उसमें वह लेजर गाइडेड बम और लाइटनिंग पॉड लगाए गए
मिराज बेहद ऊंचाई पर उड़ते हुए रात के अंधेरे में चुपचाप वह बम गिरा देता है और उन बम में विशेष तरह के कैमरे लगे थे ऐसे कमरे जो ह���ारों मीटर ऊंचाई से नीचे का एक थर्मल इमेज बना रहे थे कुल छह बम गिराए गए और पाकिस्तान का पूरा कैंप चोटियों पर बैठे सैनिकों को हथियार गोला बारूद और खाना ��प्लाई करता था वह नष्ट हो गए सभी हथियार नष्ट हो गए उनके सारे मिसाइल वहां रखे सब कुछ नष्ट हो गया
और यह चोट पाकिस्तान को इतनी बड़ी चोट थी कि उसी पल यह तय हो गया कि अब यह युद्ध तीन दिन से ज्यादा नहीं चलेगा
क्योंकि सैनिकों को मिलने वाली सभी सप्लाई खत्म हो गई और वही हुआ
तो इसीलिए याद रखना इसराइल ने भारत को ऐसे ऐसे वक्त पर मदद किया है जब रूस और अमेरिका जैसे देश ने भी भारत को मदद करने से इनकार किया है
उधर एक अवाज निकलती है और लाखों सिर सजदे मे झुक जाते है,,,
इधर मैं " जय श्री राम " लिखता हुं, कुछ हिंदू पोस्ट पढ़कर साइड से निकल जाते है,,,
जय श्री राम...।।।🚩🙏
इंडिया टुडे कनक्लेव में लौरा लूमर को बुलाया गया था ये घोर भारत विरोधी है , राजदीप को लगा था कि सही समय है मोदी विरोध में कुछ बोलेंगी पर लौरा लूमर ने इस्लाम की सच्चाई बताई , बेचारा राजदीप बौखला गया । खैर लौरा की बात जो आज समझ जायेगा वो अपने भविष्य बचा लेगा
Dear Mr. Modi, I am deeply disappointed in you.
Manmohan Singh sat quietly for 10 years.
No hugging.
No smiling.
No inaugurating.
Just silence.
Beautiful.
Dignified.
We were top 5 worst performing economies.
What great days those were.
Nehru had the right idea.
Non-alignment, talk to no one.
Build nothing.
Beg Britain.
Ask America.
We had colonial character.
But you?
You went to Israel.
Hugged Netanyahu.
Signed trade deals.
Came back.
Opened India's FIRST semiconductor plant.
In Gujarat.
While Iran and Israel were exchanging missiles.
Sir.
Have you no shame?
A responsible PM watches the news.
Never leaves his official residence.
You built a chip factory.
Middle East on fire.
Dollar crumbling.
Trump threatening half the planet.
Russia bleeding.
UN has issued 47 strongly worded statements.
And you are in Meerut.
82 km. 180 kmph.
Delhi to Meerut in under an hour.
Nehru took 17 years to build a steel plant.
You built a rapid rail corridor in 4.
Insulting Indian standards of performance.
I hope you lose the next election.
Look at Rahul Gandhi Ji.
He wants reservations in private sector.
Would he do this to us?
Shameful, Mr. Modi.
January.
Laughing with world leaders.
February.
Brahmaputra bridge, 6 lanes.
March 1.
Puducherry AND Madurai.
Same Sunday.
₹7,000+ crore.
One day.
Do you not rest?
Do you not grieve?
Manmohan Singh would have rested.
Manmohan Singh would have grieved.
Manmohan Singh would have called a press conference and said nothing.
We miss that energy.
You built a runway inside a national highway.
Near the border.
Fighter jets can land on it.
Direct provocation to poor Bangladesh.
Manmohan Singh would never.
8 states.
60 days.
₹50,000+ crore.
3 national firsts.
India is supposed to be a developing country.
We have a reputation to protect.
Ask Pakistan.
Ask Bangladesh.
We should be importing chips, not making them.
We should write 5-year plans that take 15 years.
We should hold candlelight vigils.
Not commission highways.
Nehru wrote books about it.
Manmohan Singh stayed silent.
You built it.
That is your problem, Mr. Modi.
No shame.
No grief.
No silence.
Trade Deals.
Bridges.
Trains.
Factories.
Semi-Conductors.
AI Sovereign Platforms.
Hospitals.
Runways.
Corridors.
Campuses.
While the world burns, India constructs.
Please become a Compromised PM.
We do not like this 24/7 Development PM.
Disgusting.
Boring.
Jai Rahul Gandhi Ji.