यह तस्वीर बाबा साहब आंबेडकर की नहीं है। यह महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बचपन की है, जो 1957-58 के आसपास लातूर में ली गई थी। उनके बेटे धीरज देशमुख और भांजे ने पुष्टि की है। कई फैक्ट-चेक्स (आज तक, विश्वास न्यूज) ने इसे गलत बताया। आंबेडकर के छोटी उम्र के कोई सत्यापित फोटो मौजूद नहीं। सबसे पुरानी तस्वीरें 1910 के दशक की छात्र काल की हैं।
दलित नेता दलितों का नेता और ब्राह्मण नेता पूरे समाज का नेता ?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह नैरेटिव सबसे ज्यादा बहुजन समाज को नुकसान पहुंचा रहा है.
चंद्रशेखर आजाद ने भी एक बड़ी लोकसभा सीट पर जीत दर्ज की, कुल 5,12,552 वोट प्राप्त किया.
आजाद समाज पार्टी के नेता हैं. UP के 2027 के आगामी विधानसभा चुनाव सभी 400 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है.
लेकिन मीडिया ने चंद्रशेखर आजाद को उस तरह प्रोजेक्ट नही किया जैसे प्रशांत किशोर को कर रही है.
प्रशांत किशोर ने एक छोटी सी विधानसभा में 64,151 वोट पाकर जीत हासिल की है. मीडिया ऐसे गुणगान कर रहा मानो प्रशांत किशोर इस देश के बहुत बड़े नेता हैं. इस मानसिकता को जातिवाद कहा जाता है.
धर्मेंद्र प्रधान को ग्लोबल सोशल मीडिया कंपनी मेटा खा गयी।
ओड़िसा के एक सीधे-सादे, ईमानदार, कर्मठ आदमी के साथ अन्याय हुआ है।
पोस्ट लगातार वायरल करके मेटा ने प्रधान के ख़िलाफ़ देश में माहौल खड़ा कर दिया। ऐसे वायरल पोस्ट के क्रिएटर्स को करोड़ों की आमदनी कराई गई। प्रधान के खिलाफ रील बनाना बड़ा बिज़नेस हो गया था। विपक्ष जिस लहर पर सवार हुआ, वह लहर सोशल मीडिया में बनी थी।
अब मेटा के सॉरी बोलने का क्या फ़ायदा? नुक़सान हो चुका है।
ये भी तब हुआ जब प्रधान, पेपर लीक के बिना, नीट का रि-एग्ज़ाम सफलता पूर्वक करा चुके थे। प्रधान ने अफ़सरों और कोचिंग माफिया के नेक्सस को आख़िरकार कंट्रोल कर लिया था। पेपर सेटर टीचरों को लॉकडाउन में रखने की शुरुआत हो चुकी थी।
अगले साल कंप्यूटर से नीट कराने की घोषणा हो चुकी थी।
जब समाधान हो चुका था, तब ख़ासकर इंस्टा के ज़रिए, माहौल बिगाड़ा गया। बेचारे युवा फ़ोमो और MIA के शिकार बने।
मैं निजी तौर पर धर्मेंद्र प्रधान जी की किसी महत्वपूर्ण भूमिका में वापसी की कामना करता हूँ।
वे यूजीसी के षड्यंत्रकारियों से भी लड़ रहे थे, जो सामाजिक कटुता फैलाने में लगे थे, ताकि प्रधान की बदनामी हो।
वे बहुत कठिन जगह पर थे। कांग्रेस के जमाने का मंत्रालय का तंत्र टूटा नहीं है।
@dpradhanbjp@narendramodi
“यदि जाति समाप्त किए बिना आरक्षण समाप्त नहीं किया जा सकता, तो उसी तर्क से लिंग, भाषा, राज्य और धर्म भी समाप्त कर देने चाहिए।”
यह तुलना पहली नज़र में आकर्षक लग सकती है, लेकिन तार्किक और संवैधानिक दृष्टि से इसमें कई गंभीर खामियाँ हैं।
1. यह False Analogy (मिथ्या समानता) है
पोस्ट मानकर चलती है कि जाति = लिंग = भाषा = राज्य = धर्म।
जबकि ये सभी सामाजिक श्रेणियाँ अलग प्रकृति की हैं:
जाति: जन्म से तय, ऐतिहासिक रूप से श्रेणीबद्ध (hierarchical) व्यवस्था, जिसमें सामाजिक बहिष्कार और वंशानुगत पेशे जुड़े रहे।
लिंग: जैविक/सामाजिक पहचान।
भाषा: संचार का माध्यम।
राज्य: प्रशासनिक इकाई।
धर्म: आस्था और विश्वास का विषय।
इनकी उत्पत्ति, उद्देश्य और सामाजिक प्रभाव अलग-अलग हैं। इसलिए इनके बीच सीधी तुलना तर्कसंगत नहीं है।
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2. मूल तर्क को गलत समझाया गया है (Strawman)
आरक्षण समर्थक सामान्यतः यह नहीं कहते कि:
“इधर जाति खत्म तो आरक्षण खत्म।”
बल्कि तर्क यह है:
जब तक जाति-और उसपर आधारित संरचनात्मक असमानता और उससे उत्पन्न वंचना बनी हुई है, तब तक उसके उपचार (affirmative action) की आवश्यकता बनी रहेगी।
यह एक कारण-परिणाम (cause-effect) का तर्क है, न कि “जाति को हमेशा बनाए रखो” वाला तर्क।
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3. लिंग का उदाहरण तो मुंह ऊपर करके ख़ुद के मुंह पर थूकने जैसा है
यदि महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव है तो समाधान क्या है?
महिलाओं को समाप्त करना?
या भेदभाव समाप्त करना?
भारत में महिलाओं के लिए:
पंचायतों में आरक्षण,
मातृत्व लाभ,
कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न विरोधी कानून,
जैसी नीतियाँ बनाई गईं।
किसी ने यह नहीं कहा कि “महिलाएँ समाप्त कर दो।”
यानी समाधान पहचान मिटाना नहीं, बल्कि भेदभाव हटाना है।
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4. भाषा वाला उदाहरण भी गलत है
यदि किसी भाषा के लोगों के साथ भेदभाव हो:
तो समाधान होगा:
भाषाई अधिकार देना,
शिक्षा उपलब्ध कराना,
प्रशासनिक संरक्षण देना।
न कि सभी भाषाएँ समाप्त कर देना।
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5. धर्म वाला उदाहरण भी गलत
यदि धार्मिक भेदभाव हो:
जैसे मंदिरों में sc st प्रवेश वर्जित तो कानून बना कर उस भेदभाव को उखाड़ फेकना।
अनुच्छेद 25–28 धार्मिक स्वतंत्रता देते हैं।
लेकिन कई कर्मकांडी प्रैक्टिस को क़ानून से समाप्त भी किया है।
न कि धर्म समाप्त करना।
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6. राज्य वाला उदाहरण भी असंगत
राज्य प्रशासनिक इकाइयाँ हैं।
यदि किसी राज्य के लोगों के साथ भेदभाव हो:
तो समाधान
समान विकास,
वित्तीय सहायता,
विशेष पैकेज,
हो सकता है।
राज्य समाप्त करना समाधान नहीं।
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7. आरक्षण का उद्देश्य “जाति बचाना” नहीं है
संविधान के अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4), 16(4A), 46 आदि का उद्देश्य ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से वंचित समूहों को अवसर उपलब्ध कराना है।
आरक्षण का आधार यह है कि कुछ समुदायों को समान अवसर नहीं मिले, इसलिए सीमित सकारात्मक उपाय किए जाएँ।
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8. गलत निष्कर्ष (Non Sequitur)
पोस्ट का तर्क है:
पहचान के कारण भेदभाव होता है।
इससे निष्कर्ष निकालता है:
इसलिए पहचान समाप्त कर दो।
यह निष्कर्ष तर्कसंगत रूप से निकलता ही नहीं।
उसी तर्क से:
चोरी होती है → संपत्ति समाप्त कर दो।
सड़क दुर्घटना होती है → सड़कें समाप्त कर दो।
इंटरनेट पर अपराध होते हैं → इंटरनेट समाप्त कर दो।
स्पष्ट है कि समस्या का कारण और समाधान अलग-अलग हो सकते हैं।
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निष्कर्ष
इस पोस्ट की मुख्य कमजोरी यह है कि यह False Analogy, Strawman और Non Sequitur जैसी तार्किक त्रुटियों पर आधारित है।
यदि कोई यह तर्क देता है कि “भेदभाव है, इसलिए पहचान मिटा दो”, तो वही तर्क लिंग, भाषा और धर्म पर भी लागू नहीं होता। सामान्यतः लोकतांत्रिक समाजों में समाधान पहचान को समाप्त करना नहीं, बल्कि भेदभाव को कम करना और समान अवसर सुनिश्चित करना माना जाता है।
नोट: पोस्ट करने वाला जातिय घृणा, कुंठित मानसिकता से पीड़ित घोर डिप्रेशन ग्रसित अवांछित तत्व है जो बेतुके कुतर्को से हास्य का पात्र बन गया है।
En Sudán, el genocidio prosigue ante el silencio de los medios de comunicación, las milicias terroristas de las RSF, respaldadas por Emiratos y el imperio occidental, mataron a esta madre delante de su hijo.
Si este video fuese de Ucrania o de cualquier pais europeo daría la vuelta al mundo, pero como es Sudán ni siquiera te informan sobre el genocidio en curso.
Recordar que esta guerra empezó después de que el gobierno de Sudán acordara una base naval de Rusia en el pais, además de por el saqueo masivo del oro que Emiratos lleva a cabo en el pais.