रिज़र्वेशन नहीं तो फिर क्या? क्या मेरिट से नियुक्त होते हैं वाइस चांसलर्स और जज?
सुनें हमारे नए शो 'साम दाम दंड भेद' के दूसरे एपिसोड में आरक्षण के मामले पर @RTIExpress को.
“जो सच बोलेंगे, मारे जाएँगे…”
राजेश जोशी की इस कविता को शायद उत्तर प्रदेश में अब यूँ पढ़ना पड़े—
“जो सच बोलेंगे, FIR के शिकार हो जाएँगे!”
‘ज़मीनी खबर’ के पत्रकार @amityadavbharat पर हुई FIR इसी डरावनी प्रवृत्ति की एक और मिसाल है। सवाल यह है कि आख़िर उनका गुनाह क्या है? सरकारी स्कूलों की ख़स्ताहाल स्थिति कैमरे पर दिखा देना? बच्चों की शिक्षा और बदहाल व्यवस्था पर सवाल उठा देना? या फिर क़लम, किताब और सच की बात करना?
अगर स्कूलों की तस्वीर अच्छी है, तो कैमरे से डर कैसा? और अगर तस्वीर ख़राब है, तो उसे दिखाने वाले पत्रकार पर FIR क्यों?
लोकतंत्र में पत्रकार का काम सरकार की वाहवाही करना नहीं, सत्ता से सवाल करना है। सच दिखाने वाले कैमरे और सवाल पूछने वाली क़लम पर मुक़दमे दर्ज होने लगें, तो यह केवल एक पत्रकार को डराने की कोशिश नहीं होती—यह हर उस आवाज़ के लिए संदेश होता है जो सत्ता से असहज सवाल पूछने की हिम्मत करती है।
स्कूलों की बदहाली छिपाने से शिक्षा नहीं सुधरेगी। FIR से सवाल ख़त्म नहीं होंगे।
यूपीएससी इंटरव्यू पैनल बिल्कुल निष्पक्ष नहीं है।
ब्राह्मण जाति की अपाला मिश्रा मुख्य परीक्षा में 816 अंक लाती हैं,जबकि अनुसूचित जाति की रिया डाबी मुख्य परीक्षा में 859 अंक।
अनुसूचित जाति की रिया डाबी मुख्य परीक्षा में ब्राह्मण जाति की अपाला मिश्रा से 43 अंक अधिक लाती हैं।
इधर इंटरव्यू में ब्राह्मण जाति की अपाला मिश्रा को 215 अंक दिए जाते हैं,वहीं अनुसूचित जाति की रिया डाबी को 162 अंक दिये।
अनुसूचित जाति की रिया डाबी को इंटरव्यू में अपाला मिश्रा से 53 अंक कम दिए।
अगर अनुसूचित जाति की रिया डाबी को इंटरव्यू में 200 अंक भी दिए होते, तो रिया डाबी UPSC में AIR-1 प्राप्त करतीं।
यूपीएससी का इंटरव्यू पैनल अनुसूचित जाति के साथ भेदभाव करता है।
इसलिए मैं कहता हूँ कि सवर्णों की ईमानदारी से तो मेरिट बनती नहीं,बल्कि द्रोणाचार्यों के द्वारा बना दी जाती है।
“चाय खतरे में है मित्तर, चीनी पहुँच गई सत्तर” पंक्ति में बहु-स्तरीय व्यंजना है लेकिन इस वाक्य भर से जो सत्ता ऐसी विचलित हो जाए कि नौकरी से सस्पेंड कर दे - वो वाक़ई बहुत डरी हुई सत्ता है और ख़तरे में ही है.