सनातन धर्म में होलिका दहन और होली केवल पर्व नहीं बल्कि जीवन-दर्शन का गहरा संदेश हैं।
पहले भीतर की बुराई जलाओ (होलिका दहन) और फिर बाहर जीवन को प्रेम के रंगों से भर दो (होली)।
तेरे हृदय की ध्वनि हूँ मैं,
तेरे अस्तित्व से ही मेरा अस्तित्व है।
मैं किसी ऐसी सुबह की प्रतीक्षा में नहीं हूँ
जो केवल सूर्योदय से पहचानी जाए।
जब उषा की कोमल आभा
मेरे विचारों में उतरती है..
और मन में
शांत विश्वास का संचार कर देती है,
तब समझ लेती हूँ—
प्रभात समय नहीं, चेतना का नाम है।
हर रात्रि के पश्चात
प्रभात में नई कली प्रस्फुटित होती है,
क्योंकि उजास
घड़ी से नहीं,
संकल्प से जन्म लेता है।
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