Always Remain Optimistic and Enthusiastic.
True optimism does not arise from favorable circumstances; it arises from the knowledge of who you truly are. According to Advaita Vedānta, our real nature is not the body or the restless mind, but the eternal, pure, limitless Ātman- one with Brahman, the Infinite Reality. Therefore, no external challenge can diminish your true Self.
Life brings both joy and hardship, success and failure. Accept every experience with faith, courage, and equanimity, knowing that each event is part of the Divine order and an opportunity for inner growth. What appears today as an obstacle may tomorrow reveal itself as God’s hidden grace.
Adi Shankaracharya teaches that fear arises from duality, while the realization of Oneness brings unshakable peace and strength. When you know that the Lord pervades all existence and that your own Self is ever free, hope naturally replaces anxiety, and enthusiasm becomes your way of life.
Walk forward with gratitude, unwavering faith, and joyful determination. Let your thoughts be noble, your actions selfless, and your heart anchored in the eternal Truth.
Remain optimistic. Remain enthusiastic. Remain established in the Self. “अहं ब्रह्मास्मि” I am Brahman. “तत्त्वमसि” Thou Art That.
When you live in this wisdom, every challenge becomes a step toward Self-realization, every moment becomes Divine grace, and every day becomes an expression of the Infinite.
#AvdheshananadG_Quotes
#oneness #AdvaitVedanta #nonduality
।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः
य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सञ्चुकोचान्तकाले
संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः।।२।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
उपनिषद्-साहित्य का समग्र प्रयोजन मनुष्य को बाह्य जगत् की बहुलता से उठाकर उस परम अद्वितीय सत्य के साक्षात्कार तक पहुँचाना है, जो समस्त अस्तित्व का मूलाधार है।
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र उसी परम तत्त्व का महिमामय उद्घोष है। यहाँ ‘रुद्र’ शब्द किसी सीमित देवता का द्योतक नहीं, अपितु उस परम ब्रह्म का वाचक है, जो समस्त विश्व का कारण, अधिष्ठान, नियन्ता तथा अन्तःस्थित आत्मस्वरूप है।
भगवान् आदि शंकराचार्य इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि यहाँ रुद्र का अर्थ सर्वव्यापक परमात्मा है। ‘रुद्र’ वह है जो अज्ञान, दुःख, शोक और संसारबन्धन का निवारण करता है। जो जीवों के रुदन का अन्त करता है, वही रुद्र है। अतः यहाँ रुद्र कोई सीमित सत्ता नहीं, बल्कि स्वयं परब्रह्म का द्योतक है।
मन्त्र का प्रथम वाक्य- "एको हि रुद्रः” सम्पूर्ण अद्वैत वेदान्त का सार है। उपनिषद् यहाँ उद्घोष करता है कि सत्य केवल एक है। उसके अतिरिक्त दूसरी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। यह वही उद्घोष है जो छान्दोग्योपनिषद् में “एकमेवाद्वितीयम्” के रूप में प्रकट हुआ है और बृहदारण्यकोपनिषद् में “नेह नानास्ति किञ्चन” के रूप में।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार बहुलता केवल व्यवहारिक स्तर पर प्रतीत होती है; परमार्थतः एक ही चैतन्य सर्वत्र व्याप्त है। जिस प्रकार अनेक तरंगें समुद्र से पृथक् नहीं हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् ब्रह्म से पृथक् नहीं है। जीव, जगत् और ईश्वर का भेद अज्ञानजन्य है; ज्ञान की दृष्टि से सर्वत्र एक ही सत्य विद्यमान है।
मन्त्र का अगला पद “न द्वितीयाय तस्थुः” अत्यन्त गहन दार्शनिक अर्थ रखता है। इसका आशय है कि उस परम सत्ता के समकक्ष, उसके समान या उसके अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतन्त्र सत्ता नहीं ठहर सकती। द्वैत का सम्पूर्ण आधार अविद्या है। जब तक मनुष्य नाम-रूपों में उलझा रहता है, तब तक उसे अनेकता दिखाई देती है; किन्तु जब ज्ञान का प्रकाश उदित होता है, तब वह अनुभव करता है कि सम्पूर्ण अस्तित्व एक अखण्ड चैतन्य की अभिव्यक्ति है।
यहाँ उपनिषद् किसी सम्प्रदायगत एकेश्वरवाद का प्रतिपादन नहीं कर रहा, बल्कि अद्वैत की परम दार्शनिक अनुभूति का उद्घाटन कर रहा है। यह एकत्व केवल धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार का विषय है।
इसके पश्चात् मन्त्र कहता है- “य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभिः”। अर्थात् वही एक परमात्मा अपनी विविध शासनशक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों का नियमन करता है। भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वायु, दिशा, काल, कर्म और प्रकृति - सभी उसी परम सत्ता के अधीन कार्य करते हैं।
ब्रह्माण्ड में जो आश्चर्यजनक अनुशासन दिखाई देता है, वह किसी अन्धे संयोग का परिणाम नहीं है। ग्रहों की गति, ऋतुओं का क्रम, जन्म और मृत्यु का विधान, कर्मफल का अचूक नियम तथा प्रकृति की समस्त शक्तियाँ उस एक परम चेतना के शासन में कार्यरत हैं। यही कारण है कि उपनिषद् उसे ‘ईश्वर’ और ‘अन्तर्यामी’ कहकर सम्बोधित करते हैं।
मन्त्र का अगला भाग “प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति” विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यहाँ उपनिषद् यह उद्घोष करता है कि वह परमात्मा केवल विश्व का बाह्य नियन्ता नहीं है, अपितु प्रत्येक प्राणी के हृदय में अन्तर्यामी रूप से स्थित है।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अद्वैत में ईश्वर कोई दूरस्थ सत्ता नहीं है। वह प्रत्येक जीव के अन्तःकरण का प्रकाश है। वही देखने वाले की दृष्टि है, सुनने वाले की श्रुति है, विचार करने वाले की बुद्धि है और अनुभव करने वाले की चेतना है। कठोपनिषद् का वचन स्मरणीय है-
“एषः सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते।”
अर्थात्, यह आत्मा सभी प्राणियों में गुप्तरूप से स्थित है। यही कारण है कि आत्मज्ञान का मार्ग बाहर नहीं, भीतर की ओर जाता है। परमात्मा की प्राप्ति किसी स्थान-विशेष में नहीं, अपितु अपने आत्मस्वरूप में होती है।
मन्त्र आगे कहता है- “सञ्चुकोच अन्तकाले”। भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार प्रलयकाल में वही परमात्मा सम्पूर्ण नाम-रूपात्मक जगत् को अपने भीतर समेट लेता है। जिस प्रकार मकड़ी अपने द्वारा निर्मित जाल को पुनः अपने भीतर समेट लेती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण विश्व अन्ततः उसी परम ब्रह्म में लीन हो जाता है।
यहाँ प्रलय का अर्थ केवल ब्रह्माण्डीय विनाश नहीं है। यह उस सत्य का भी संकेत है कि सम्पूर्ण नाम-रूप अनित्य हैं। जो कुछ उत्पन्न हुआ है, वह परिवर्तनशील है और जो परिवर्तनशील है वह अन्ततः अपने कारण में विलीन हो जाता है। केवल ब्रह्म ही नित्य है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद्
— - - श्रीअमरनाथ यात्रा - - —
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशीस्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥
आज जम्मू-कश्मीर के माननीय उपराज्यपाल श्री मनोज सिन्हा जी द्वारा पवित्र श्री अमरनाथ जी की यात्रा के शुभारम्भ से पूर्व प्रथम जत्थे का विधिवत् पूजन-अर्चन कर ध्वजारोहण एवं प्रस्थान कराना, तवी तट पर भव्य तवी आरती तथा प्रकाश एवं ध्वनि कार्यक्रम का शुभारम्भ करना केवल एक मात्र धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि भारत की सनातन आत्मा, सांस्कृतिक एकात्मता और भगवान् शिव की उपासना के प्रति अखण्ड श्रद्धा का दिव्य उद्घोष है।
यह यात्रा देवाधिदेव महादेव भगवान् बाबा श्रीअमरनाथ का हिम से प्रकट दिव्य शिवलिङ्ग का दर्शन ही नहीं है; यह तप, त्याग, आस्था, साहस, समर्पण और आत्मोन्नति की परम पवित्र यात्रा है। हिमालय की दिव्य कन्दराओं में स्थित यह तीर्थ अनादिकाल से करोड़ों श्रद्धालुओं को यह संदेश देता आया है कि श्रद्धा से कठिन मार्ग भी सरल हो जाते हैं और भगवान शिव-कृपा से जीवन अमृतत्व की दिशा में अग्रसर होता है।
यही वह पावन भूमि है जहाँ भगवान् आशुतोष ने माँ पार्वती को अमरत्व का परम रहस्य सुनाया था। इसीलिए बाबा बर्फानी का यह धाम सनातन परम्परा में अत्यन्त विशिष्ट, दिव्य और लोकमंगलकारी माना गया है। यहाँ पहुँचने वाला प्रत्येक श्रद्धालु केवल दर्शन नहीं करता, वह अपने भीतर विश्वास, संयम, भक्ति और आत्मबल की नवीन ज्योति प्रज्वलित करता है। भगवान् श्रीअमरनाथ जी यात्रा भारत की सांस्कृतिक एकता का जीवंत प्रतीक है। विविध भाषाओं, प्रदेशों, परम्पराओं और जीवन-पद्धतियों से आए श्रद्धालु जब एक स्वर में “हर-हर महादेव” का उद्घोष करते हैं, तब समस्त भारत एक ही आध्यात्मिक चेतना में स्पन्दित दिखाई देता है। तवी तट पर जलती दीप-ज्योतियाँ, शिवनाम के मंगलमय स्वर और श्रद्धालुओं का उमंगपूर्ण आगमन जम्मू-कश्मीर को पुनः भक्ति, शान्ति और राष्ट्रीय समरसता के पावन प्रकाश से आलोकित कर रहा है।
माननीय उपराज्यपाल श्री मनोज सिन्हा जी के नेतृत्व में यात्रा की सुरक्षा, सुविधा, स्वच्छता, अनुशासन और श्रद्धालुओं की सेवा के लिए किए जा रहे प्रयास अत्यन्त अभिनंदनीय हैं। उनके संवेदनशील नेतृत्व में श्रीअमरनाथ जी यात्रा केवल सुगम और सुव्यवस्थित ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक गरिमा और सांस्कृतिक गौरव से परिपूर्ण बन रही है।
समस्त सनातन जगत को श्री अमरनाथ जी यात्रा के शुभारम्भ की हार्दिक बधाई, मंगलकामनाएँ और अनन्त शुभाशंसाएँ। भगवान् भोलेनाथ की कृपा से प्रत्येक श्रद्धालु की यात्रा सुरक्षित, सफल, पुण्यमयी और कल्याणकारी हो। बाबा बर्फानी सबके जीवन में शान्ति, शक्ति, साहस, सद्भाव, आरोग्य और आत्मप्रकाश का दिव्य आलोक भरें।आइए, हम सब इस पावन अवसर पर प्रार्थना करें कि देवाधिदेव महादेव भगवान् शिव की कृपा से सम्पूर्ण विश्व में शान्ति, करुणा, समरसता और धर्ममय जीवन का विस्तार हो।
असितगिरिसमं स्यात्कज्जलं सिन्धुपात्रे
सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः॥
@manojsinha_@OfficeOfLGJandK@JmuKmrPolice
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#जय_बाबा_अमरनाथ
।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
“य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वाँल्लोकानीशत ईशनीभिः ।
य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ।।१।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
उपनिषदों का समस्त ईश्वरीय साहित्य मानव-चेतना की उस महायात्रा का इतिहास है, जिसमें साधक दृश्य से अदृश्य की ओर, परिवर्तनशील से नित्य की ओर और बहुलता से अद्वैत की ओर अग्रसर होता है। उपनिषद् का यह मन्त्र उसी दिव्य यात्रा का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सोपान है। यहाँ ऋषि उस परम सत्य का उद्घाटन करते हैं, जो सम्पूर्ण जगत् की विविधता के भीतर एकमात्र अविच्छिन्न सत्ता के रूप में विराजमान है।
भगवत्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस मन्त्र को केवल ईश्वर की स्तुति के रूप में नहीं, अपितु ब्रह्मविद्या के गहनतम रहस्य के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार यह मन्त्र सम्पूर्ण वेदान्त का सार प्रस्तुत करता है कि सत्य एक है, वही ब्रह्म है, वही ईश्वर है, वही आत्मा है और वही सम्पूर्ण विश्व का अधिष्ठान है।
मन्त्र का प्रथम शब्द “एकः” सम्पूर्ण उपनिषद् के हृदय की धड़कन है। यह ‘एक’ संख्या का बोधक नहीं, अपितु अद्वितीय सत्ता का संकेतक है। यह वह एकत्व है, जिसके अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। यही कारण है कि उपनिषद् उद्घोष करते हैं- “नेह नानास्ति किञ्चन”। जहाँ ज्ञान का प्रकाश है, वहाँ द्वैत का अस्तित्व नहीं रहता। भिन्नता केवल नाम और रूप की है; तत्त्वतः सम्पूर्ण अस्तित्व एक ही चैतन्य की अभिव्यक्ति है।
मन्त्र में परमात्मा को “जालवान्” कहा गया है। भगवान आदि शंकराचार्य इस शब्द की व्याख्या मायाशक्ति से सम्पन्न ईश्वर के रूप में करते हैं। यह सम्पूर्ण विश्व एक विराट् रहस्य है। इसकी अनन्त विविधताएँ, असंख्य जीव, असंख्य लोक, काल का अखण्ड प्रवाह, जन्म और मृत्यु का चक्र ये सभी उसी परम सत्ता की मायाशक्ति के विलक्षण प्रपञ्च हैं। किन्तु यह माया परम सत्य नहीं है; वह ब्रह्माश्रिता है। वह स्वयं प्रकाशित नहीं, अपितु ब्रह्म के प्रकाश से प्रकाशित है। जैसे स्वप्न स्वप्नद्रष्टा पर आश्रित होता है, वैसे ही यह जगत् ब्रह्म पर आश्रित है।
भगवत्पादाचार्य के अनुसार ईश्वर केवल सृष्टिकर्ता ही नहीं, वरन् सम्पूर्ण विश्व का अन्तर्यामी नियन्ता भी है। मन्त्र में “ईशनीभिः” शब्द इसी शासनशक्ति की ओर संकेत करता है। सूर्य का नियत पथ पर चलना, ऋतुओं का परिवर्तन, ग्रहों का संतुलन, कर्मफल का अचूक विधान और जीवन के प्रत्येक स्तर पर विद्यमान व्यवस्था ये सब किसी अन्धे संयोग का परिणाम नहीं हैं। इनके पीछे एक सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी चेतना कार्यरत है। वही विश्व का अन्तःस्थ नियन्ता है, जिसे उपनिषद् “अन्तर्यामि” कहते हैं।
मन्त्र आगे कहता है- “य एवैक उद्भवे सम्भवे च।” अर्थात् वही एक परमात्मा सृष्टि के उद्भव में भी है और उसकी स्थिति में भी। वेदान्त के अनुसार कारण और कार्य वस्तुतः अभिन्न हैं। जिस प्रकार मिट्टी से बने असंख्य पात्र अन्ततः मिट्टी ही हैं, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म का ही नाम-रूपात्मक विस्तार है। सृष्टि ब्रह्म से पृथक् कोई सत्ता नहीं है। ब्रह्म ही कारणरूप में सत्य है और जगत् उसी का कार्यरूप प्रतीत होने वाला नाम-रूपात्मक प्रपञ्च है।
यहीं से भगवान आदि शंकराचार्य का अद्वैत अपने सर्वोच्च शिखर पर पहुँचता है। यदि सम्पूर्ण जगत् का आधार एक ही ब्रह्म है, तो जीव भी उसी ब्रह्म से भिन्न नहीं हो सकता। जीव की पृथकता केवल अज्ञानजन्य है। जब मनुष्य स्वयं को शरीर, मन और बुद्धि तक सीमित मानता है, तब वह संसार, दुःख और मृत्यु के बन्धन में पड़ जाता है। किन्तु जब आत्मज्ञान के द्वारा उसे अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है, तब वह जान लेता है कि वह सीमित जीव नहीं, अपितु वही अनन्त चैतन्य है जो समस्त विश्व में व्याप्त है।
इसीलिए मन्त्र का उपसंहार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है- “य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।” जो इस सत्य को जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं। यहाँ अमृतत्व का अर्थ किसी स्वर्गलोक की प्राप्ति नहीं है और न ही शरीर की अनन्त आयु। अमृतत्व का वास्तविक अर्थ है- अविद्या का पूर्ण क्षय और आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठा। जब ज्ञानी यह अनुभव कर लेता है कि उसका वास्तविक स्वरूप जन्म और मृत्यु से परे है, तब उसके लिए मृत्यु का भय सदा-सर्वदा समाप्त हो जाता है।
यही कारण है कि उपनिषदों की समस्त साधना का लक्ष्य बाह्य जगत् की उपलब्धियाँ नहीं, अपितु आत्मस्वरूप की अनुभूति है। मनुष्य का परम पुरुषार्थ न धन है, न यश, न भोग और न स्वर्ग; उसका परम पुरुषार्थ उस एकमेवाद्वितीय सत्य का साक्षात्कार है जो समस्त लोकों का आधार, समस्त शक्तियों का स्रोत और समस्त अस्तित्व का अन्तिम तत्त्व है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद् #अद्वैत_वेदान्त
#स्वाध्याय #भगवत्पादाचार्य
Awakening to the Infinite Self in the Light of Advaita vedanta.
Human life is not an accidental occurrence in the vastness of the cosmos, nor is it merely a biological phenomenon governed by the forces of nature. According to the eternal wisdom of the Upaniṣads, illumined by Bhagavatpāda Adi Shankaracharya, human birth is a rare and sacred opportunity- a divine gateway to realize the highest Truth. The purpose of life is not merely to accumulate wealth, power, or worldly success, but to awaken to the knowledge of one’s own true nature, which is eternal, pure, limitless, and ever free.
The greatest tragedy of human existence is not suffering itself, but ignorance (Avidyā) of who we truly are. Forgetting our real identity, we begin to identify ourselves with the body, the mind, the intellect, emotions, possessions, relationships, achievements, and failures. We declare, “I am weak,” “I am unhappy,” “I am incomplete,” while the scriptures proclaim an entirely different truth.
The Upaniṣads thunder with the immortal declarations:
“तत्त्वमसि” Thou Art That.
“अहं ब्रह्मास्मि” I am Brahman.
“अयमात्मा ब्रह्म” This Self is Brahman.
“प्रज्ञानं ब्रह्म” Pure Consciousness is Brahman. These Mahāvākyas are not philosophical theories or poetic expressions. They are direct revelations of Reality. They declare that the innermost Self of every being is none other than Brahman- the Infinite, Absolute Reality.
Bhagavatpāda Shankaracharya repeatedly teaches that the individual soul is never truly separate from the Supreme. Separation exists only because of ignorance, just as a rope appears to be a snake in dim light. The snake was never real; only the rope existed. Similarly, bondage is not an objective reality- it is a superimposition upon the ever-free Self.
You are not a limited mortal striving to become divine.
You are the Divine Reality appearing to be limited through ignorance.Your essential nature is not weakness but infinite strength. Not fear, but fearlessness. Not sorrow, but eternal bliss. Not limitation, but boundless Consciousness.
The world may define you by your name, profession, nationality, possessions, social identity, or personal history. Yet none of these constitute your real Self. They belong only to the ever-changing personality, while your true nature remains forever untouched by birth and death, success and failure, praise and blame.
Adi Shankaracharya declares in the immortal Nirvāṇa Ṣaṭkam:
मनोबुद्ध्यहङ्कार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायु:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
“I am neither the mind nor the intellect, neither the ego nor memory. I am not the senses, nor the elements of nature. I am Pure Consciousness, Absolute Bliss. I am Shiva, the Infinite Self.” This is not a statement of arrogance; it is the highest expression of humility. It is the complete dissolution of the false ego into the limitless Reality.
Within every human heart shines an inexhaustible treasure of divine wisdom. This wisdom is not acquired from outside; it is uncovered through Self-knowledge. Just as the sun never ceases to shine though hidden by passing clouds, the light of the Self is never diminished by ignorance. The clouds of attachment, fear, desire, anger, pride, and delusion merely conceal what has always been present.
The spiritual journey is therefore not the attainment of something new. It is the removal of ignorance. It is not becoming Brahman. It is realizing that one has never been anything other than Brahman. Every act of meditation, every sincere prayer, every moment of selfless service, every discipline of the mind, every act of compassion, and every contemplation upon the teachings of the scriptures gradually purifies the heart. As the mind becomes tranquil, the mirror of consciousness becomes clear, reflecting the eternal Self without distortion.
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
यो देवो अग्नौ योऽप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश ।
य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः ।।१७।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - द्वितीयोऽध्यायः)
यह दिव्य मन्त्र सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त परमात्मा की सर्वान्तर्यामी सत्ता का अत्यन्त मधुर, काव्यमय और दार्शनिक उद्घोष है। यहाँ उपनिषद् हमें उस अद्वैत सत्य की अनुभूति कराता है कि अग्नि में, जल में, औषधियों में, वनस्पतियों में और सम्पूर्ण विश्व में जो एक ही दिव्य सत्ता विद्यमान है, वही परम ब्रह्म है। यह मन्त्र केवल प्रकृति-स्तुति नहीं, अपितु समस्त दृश्य जगत् में ब्रह्म की अनुभूति कराने वाला उपनिषद् का दिव्य ध्यान है।
भगवद्पादाचार्य भगवान् आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के आलोक में यह मन्त्र जीव और जगत् के पीछे स्थित उस एकमेव चैतन्य की ओर संकेत करता है जो स्वयंप्रकाश, सर्वव्यापक और सर्वाधार है। उपनिषद् यहाँ किसी सीमित देवता की उपासना नहीं करा रहा, बल्कि उस परम देव की ओर साधक का ध्यान आकृष्ट कर रहा है, जो समस्त नाम-रूपों में व्याप्त होकर भी उनसे परे है।
मन्त्र का प्रारम्भ होता है- “यो देवो अग्नौ” जो देव अग्नि में स्थित है। वैदिक परम्परा में अग्नि केवल भौतिक अग्नि नहीं, अपितु प्रकाश, ऊर्जा, यज्ञ, ज्ञान और जीवनशक्ति का प्रतीक है। अग्नि अन्धकार को हटाती है, शीत को दूर करती है और रूपान्तरण की शक्ति रखती है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार अग्नि में जो तेज, ऊष्मा और प्रकाश है, उसका वास्तविक आधार ब्रह्म ही है। अग्नि स्वयं स्वतन्त्र सत्ता नहीं; वह ब्रह्म की अभिव्यक्ति है। जिस प्रकार दीपक का प्रकाश उसके बिना नहीं हो सकता, उसी प्रकार अग्नि का अस्तित्व भी परम चैतन्य के आधार पर ही सम्भव है। अतः अग्नि की उपासना अन्ततः उस ब्रह्म की उपासना है, जो अग्नि के माध्यम से प्रकाशमान है।
मन्त्र कहता है कि “योऽप्सु” जो जल में स्थित है। जल जीवन का आधार है। वह शीतलता, शुद्धता, करुणा और प्रवाह का प्रतीक है। जल में जो जीवनदायिनी शक्ति है, जो तृप्ति है, वह भी उसी परमात्मा का प्रकाश है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि “रसोऽहमप्सु कौन्तेय।” हे अर्जुन ! जल में जो रस है, वह मैं हूँ। शाङ्करभाष्य के अनुसार परमात्मा प्रत्येक वस्तु में उसके अस्तित्व और चेतना के रूप में स्थित है।
इसके पश्चात् मन्त्र कहता है कि “यो विश्वं भुवनमाविवेश” जिसने सम्पूर्ण विश्व में प्रवेश किया है। यहाँ “आविवेश” शब्द अत्यन्त गूढ़ है। इसका अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म कहीं बाहर था और बाद में जगत् में प्रवेश किया। अद्वैत वेदान्त के अनुसार ब्रह्म सर्वदा सर्वत्र विद्यमान है। “प्रवेश” का तात्पर्य है- नाम और रूपों के माध्यम से उसी एक सत्ता का प्रकट होना।
तैत्तिरीयोपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य स्मरणीय है- “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्।” उसने सृष्टि करके उसी में प्रवेश किया।
भगवद्पाद आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि यह प्रवेश वास्तव में उपाधियों के माध्यम से प्रतीति मात्र है। जैसे एक ही सूर्य अनेक जलाशयों में प्रतिबिम्बित होकर अनेक प्रतीत होता है, वैसे ही एक ब्रह्म समस्त जीवों और वस्तुओं में विविध रूपों में दिखाई देता है।
मन्त्र का अगला भाग- “य ओषधीषु यो वनस्पतिषु” अत्यन्त सौन्दर्यमय और पर्यावरणीय आध्यात्मिकता से पूर्ण है। औषधियों और वनस्पतियों में भी वही परमात्मा स्थित है। यहाँ उपनिषद् यह शिक्षा देता है कि प्रकृति केवल भोग की वस्तु नहीं, बल्कि दिव्य सत्ता का सजीव प्राकट्य है। वनस्पतियों में जो जीवन है, वृद्धि है, पुष्पों की सुगन्ध है, वृक्षों की छाया है, अन्न की पोषणशक्ति है- वह उसी परमात्मा की अभिव्यक्ति है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार चेतना का प्रकाश समस्त जीवन में अन्तर्निहित है। विभिन्न उपाधियों के कारण जीवन की अभिव्यक्ति अलग दिखाई देती है, किन्तु मूल सत्ता एक ही है।
यह मन्त्र मानव को प्रकृति के प्रति श्रद्धा, करुणा और संवेदनशीलता का संदेश देता है। यदि अग्नि में, जल में, वृक्षों में और औषधियों में भी वही परमात्मा है, तो प्रकृति का अपमान वास्तव में दिव्यता का अपमान है।
अन्त में मन्त्र कहता है- “तस्मै देवाय नमो नमः” उस देव को बारम्बार नमस्कार है। यह नमस्कार किसी बाहरी देवता के प्रति भयवश नहीं, बल्कि उस परम सत्य के प्रति आत्मसमर्पण है, जो समस्त अस्तित्व का आधार है। जब साधक यह अनुभव करता है कि सम्पूर्ण जगत् उसी एक ब्रह्म की अभिव्यक्ति है, तब उसके भीतर गहन विनय, श्रद्धा और अद्वैत दृष्टि का उदय होता है। शाङ्करवेदान्त में नमस्कार का सर्वोच्च अर्थ अहंकार का विसर्जन है। जब “मैं” और “मेरा” का सीमित भाव समाप्त होता है, तब केवल ब्रह्म ही शेष रहता है। वही ज्ञान है, वही भक्ति है और वही मोक्ष है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद्
--- "सद्विचार : आत्मशुद्धि से ब्रह्मसाक्षात्कार तक !" ---
भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य कहते हैं कि मानव जीवन का सम्पूर्ण वैभव उसके बाह्य साधनों में नहीं, अपितु उसके अन्तःकरण की पवित्रता में निहित है। मनुष्य जैसा चिन्तन करता है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व निर्मित होता है; जैसा उसका व्यक्तित्व होता है, वैसे ही उसके कर्म होते हैं; और जैसे कर्म होते हैं, वैसी ही उसकी जीवन-यात्रा तथा अन्ततः उसकी आध्यात्मिक गति होती है। अतः यह कहना अत्युक्ति नहीं कि विचार ही जीवन का मूल बीज हैं, और सम्पूर्ण व्यक्तित्व उसी बीज का विकसित वृक्ष है।
भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त में मानव जीवन का परम लक्ष्य किसी नवीन वस्तु की प्राप्ति नहीं, अपितु अपने नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, स्वप्रकाश आत्मस्वरूप का साक्षात्कार है। किन्तु यह आत्मज्ञान अशुद्ध, चञ्चल और विषयासक्त मन में उदित नहीं होता। शास्त्र उद्घोष करता है -
“ज्ञानस्योत्पत्तौ चित्तशुद्धिरेव मुख्यं साधनम्।” अर्थात् आत्मज्ञान की अभिव्यक्ति का प्रधान साधन चित्त की निर्मलता है। और चित्त की निर्मलता का प्रथम सोपान है - सद्विचार।
सद्विचार केवल सकारात्मक सोच नहीं है; वह सत्याभिमुख चिन्तन है। वह मन को विषयों से हटाकर विवेक, वैराग्य, करुणा, समत्व, श्रद्धा, आत्मनिष्ठा और ब्रह्मभाव की ओर प्रवृत्त करता है। सद्विचार मनुष्य को सीमित अहंकार से उठाकर सार्वभौमिक चेतना की अनुभूति की ओर ले जाता है।
भगवान् आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि संसार का समस्त दुःख आत्मा में नहीं, अपितु अविद्या से उत्पन्न देहाभिमान में स्थित है। जब मनुष्य स्वयं को शरीर, मन अथवा अहंकार मान लेता है, तभी राग, द्वेष, भय, मोह, ईर्ष्या, असन्तोष और अशान्ति जन्म लेते हैं। किन्तु जब विवेक जागृत होता है और मन बार-बार श्रुति के महावाक्यों का मनन करता है, तब धीरे-धीरे यह भ्रान्ति दूर होने लगती है कि “मैं सीमित हूँ।”
अद्वैत वेदान्त उद्घोष करता है -
“ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।” यही विचार मानव जीवन का सर्वोच्च सद्विचार है। इससे उच्चतर कोई चिन्तन नहीं हो सकता। जब यह भाव अन्तःकरण में प्रतिष्ठित हो जाता है कि समस्त प्राणियों में एक ही आत्मा विद्यमान है, तब किसी के प्रति द्वेष शेष नहीं रहता। जहाँ अद्वैत-दृष्टि है, वहाँ विभाजन नहीं; जहाँ आत्मैक्य का अनुभव है, वहाँ हिंसा नहीं; जहाँ ब्रह्मभाव है, वहाँ अहंकार नहीं।
अतः मन को निरन्तर ऐसे विचारों से अनुप्राणित करना चाहिए, जो उसे उसके वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाएँ। भय के स्थान पर निर्भयता, शिकायत के स्थान पर कृतज्ञता, निराशा के स्थान पर आशा, स्वार्थ के स्थान पर सेवा, द्वेष के स्थान पर करुणा और भेदबुद्धि के स्थान पर आत्मैक्य की भावना का निरन्तर अभ्यास ही चित्तशुद्धि का वास्तविक साधन है।
भगवत्पादाचार्य साधनचतुष्टय में विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व को आत्मविद्या का आधार बताते हैं। इन सभी का पोषण सद्विचारों से ही होता है। सद्विचार विवेक को जागृत करते हैं; विवेक वैराग्य को पुष्ट करता है; वैराग्य मन को अन्तर्मुख बनाता है; अन्तर्मुख मन श्रवण, मनन और निदिध्यासन में स्थिर होता है; और अन्ततः वही मन ब्रह्माकारवृत्ति का आश्रय बनकर आत्मसाक्षात्कार का माध्यम बनता है।
मनुष्य का मन एक पवित्र उपवन है। उसमें जो बीज बोए जाते हैं, वही भविष्य में फलस्वरूप प्रकट होते हैं। यदि उसमें श्रद्धा, सत्य, संयम, क्षमा, करुणा, सेवा, समत्व, ब्रह्मचिन्तन और आत्मविवेक के बीज रोपे जाएँ, तो जीवन दिव्य गुणों से पुष्पित हो उठता है। यदि उसमें अविद्या, अहंकार, राग, द्वेष और विषयासक्ति का संवर्धन किया जाए, तो वही मन बन्धन, क्लेश और अशान्ति का कारण बन जाता है।
अतः प्रतिदिन अपने विचारों का निरीक्षण करना भी एक उत्तम कोटि की साधना है। सद्ग्रंथों का स्वाध्याय, उपनिषदों का मनन, भगवद्गीता का चिन्तन, भगवत्पादाचार्य के भाष्यों का अध्ययन, सत्संग, मौन, आत्मपरीक्षण तथा ईश्वर-स्मरण ये सब मन को दिव्यता की दिशा में उन्नत करते हैं।
धीरे-धीरे साधक अनुभव करता है कि सद्विचार केवल नैतिक जीवन का आधार नहीं, अपितु ब्रह्मविद्या का प्रवेशद्वार हैं। विचारों की निर्मलता अन्ततः विचारातीत मौन में परिणत होती है। जहाँ मन शान्त हो जाता है, वहाँ आत्मा का स्वप्रकाश स्वरूप स्वयं प्रकट हो जाता है। वही अद्वैत का परम अनुभव है; वही मोक्ष है; वही परम आनन्द है।
अतः सदा स्मरण रखें कि सद्विचार से चित्त निर्मल होता है। निर्मल चित्त में आत्मज्ञान का उदय होता है। आत्मज्ञान से अविद्या का नाश होता है और अविद्या के पूर्ण निवृत्त होने पर वही जीव अपने नित्य ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार करता है।
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।। "श्वेताश्वतर" उपनिषद् ।।
एषो ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः
पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अन्तः ।
स एव जातः स जनिष्यमाणः
प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः।।१६।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - द्वितीयोऽध्यायः)
यह दिव्य मन्त्र अद्वैत वेदान्त की उस परम अनुभूति का घोष है, जिसमें सम्पूर्ण जगत्, समस्त दिशाएँ, समस्त काल और समस्त प्राणियों के भीतर एक ही परमात्मा का अखण्ड, सर्वव्यापक और सर्वान्तर्यामी स्वरूप प्रकाशित होता है। यह मन्त्र केवल ईश्वर की सर्वव्यापकता का वर्णन नहीं करता, अपितु जीव, जगत् और ब्रह्म के अद्वैत सम्बन्ध का अत्यन्त सूक्ष्म उद्घाटन करता है। भगवद्पादाचार्य के भाष्य के आलोक में यह मन्त्र आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता के महान् रहस्य को उद्घाटित करता है।
मन्त्र का प्रारम्भ होता है- “एषो ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः” अर्थात् यह वही देवस्वरूप परमात्मा है, जो समस्त दिशाओं में व्याप्त है। पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व, अधः कोई दिशा ऐसी नहीं जहाँ वह न हो। यहाँ “देव” शब्द उस स्वयंप्रकाश चैतन्य का द्योतक है, जो समस्त जगत् को प्रकाशित करता है। भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार यह देव कोई सीमित देवता नहीं, बल्कि वह परम ब्रह्म है जो सबका आधार, सबका अन्तरात्मा और सबका प्रकाशक है। उपनिषद् बार-बार यह उद्घोष करता है कि परमात्मा किसी एक स्थान, रूप, मन्दिर, लोक या आकाश में सीमित नहीं है। वह सर्वत्र है, क्योंकि वही समस्त अस्तित्व का अधिष्ठान है। जैसे घट, पात्र, गृह और पर्वत सभी में एक ही आकाश व्याप्त रहता है, वैसे ही समस्त प्राणियों और वस्तुओं में वही एक ब्रह्म व्याप्त है। भिन्नता केवल नाम और रूप की है; तत्त्वतः सबमें वही एक चैतन्य प्रतिष्ठित है।
“पूर्वो ह जातः” यह पद अत्यन्त गम्भीर दार्शनिक संकेत देता है। इसका तात्पर्य है कि समस्त सृष्टि से पूर्व भी वही परमात्मा विद्यमान था। जगत् की उत्पत्ति से पहले न नाम थे, न रूप, न काल, न भेद केवल ब्रह्म ही था। छान्दोग्योपनिषद् का महान् वाक्य स्मरणीय है - “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्।” हे सौम्य ! यह सब सृष्टि के पूर्व केवल सत् ही था।
भगवान् आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म न तो किसी अन्य कारण से उत्पन्न हुआ है और न ही उसमें कोई परिवर्तन आता है। वही कारणरूप से प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में वह सदा निरुपाधिक, निर्विकार और अद्वैत है। जगत् की उत्पत्ति भी अन्ततः अविद्या की दृष्टि में ही है; परमार्थतः केवल ब्रह्म ही सत्य है। मन्त्र आगे कहता है- “स उ गर्भे अन्तः” वही परमात्मा गर्भ के भीतर स्थित है। यह कथन परमात्मा की अन्तर्यामित्व-शक्ति को प्रकट करता है। वह केवल विराट् विश्व में ही नहीं, अपितु सूक्ष्मतम जीव में भी विद्यमान है। गर्भस्थ शिशु में जो जीवन-स्पन्दन है, जो चेतना है, जो अस्तित्व है- वह उसी परमात्मा का प्रकाश है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- “अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।” हे अर्जुन ! मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ। शाङ्करभाष्य के अनुसार आत्मा कभी बाहर से शरीर में प्रवेश नहीं करती; वह तो सर्वदा साक्षिरूप से विद्यमान है। शरीर उत्पन्न होते हैं और नष्ट हो जाते हैं, किन्तु आत्मा नित्य है। जैसे सूर्य अनेक जलपात्रों में प्रतिबिम्बित होकर अनेक प्रतीत होता है, वैसे ही एक ही चैतन्य अनेक जीवों के रूप में प्रतीत होता है। “स एव जातः स जनिष्यमाणः” यहाँ उपनिषद् समय की समस्त सीमाओं को भंग कर देता है। जो उत्पन्न हो चुका है, जो वर्तमान में है, और जो भविष्य में उत्पन्न होगा- सब वही है। अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों काल उसी में स्थित हैं। वह काल से परे है, किन्तु काल उसी के आधार पर अनुभव होता है।
आदि शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धान्त में ब्रह्म नित्य वर्तमान है। उसमें न भूत है, न भविष्य; केवल अखण्ड सत्ता है। काल की धारणा मन और बुद्धि की वृत्ति में है, आत्मा में नहीं। अतः जो ज्ञानी आत्मा में स्थित हो जाता है, वह कालातीत शान्ति का अनुभव करता है।
मन्त्र का अन्तिम भाग- “प्रत्यङ् जनास्तिष्ठति सर्वतोमुखः” अत्यन्त अद्भुत और रहस्यमय है। “प्रत्यङ्” का अर्थ है- अन्तर्मुख, अन्तरात्मारूप। परमात्मा प्रत्येक प्राणी के भीतर अन्तर्यामी रूप में स्थित है। वह बाहर से देखने योग्य कोई वस्तु नहीं, बल्कि स्वयं देखने की शक्ति का आधार है। नेत्र उसी से देखते हैं, मन उसी से सोचता है, बुद्धि उसी से निर्णय करती है।
“सर्वतोमुखः” उसका मुख सर्वत्र है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि उसके अनन्त भौतिक मुख हैं, बल्कि यह कि समस्त प्राणियों के माध्यम से वही देखता, सुनता, बोलता और अनुभव करता है। गीता का विश्वरूप इसी सत्य का विराट् प्रतीक है।
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