In India, if you are a Muslim and kill a rat, you will be arrested and your house can be bulldozed.
But if you are not a Muslim, you can roast and barbecue rat and eat it, and the police won't touch you.
Being a Muslim isn't easy in india.
मोदी सरकार एक मजबूत बहुमत की सरकार रही है, लेकिन पिछले 12 साल में सिस्टम उतना ही कमजोर हुआ है।
मोदी सरकार ने संस्थाओं को मारा नहीं, बस उन्हें खोखला कर दिया है, जो न अब जिंदा हैं, न मरे हुए। हर साल आप इनका जन्मदिन मना सकते हैं, जो किसी काम की नहीं बचीं।
जापान, जर्मनी और ब्रिटेन.... सही मायने में ये तीन असल महाशक्तियां हैं। अमेरिका, ब्रिटेन से और रूस, जर्मनी की बौद्धिक और कार्मिक उपलब्धि से उपजे हैं।
पिछले 500 सालों में इन तीनों देशों के समाज की तरक्की की वजह अकेला इनका कार्मिक अनुशासन नहीं है, बल्कि सबसे बड़ी वजह बलिदान है।
जो व्यक्ति व्यावहारिक जीवन में बलिदान नहीं कर सकता, उसको इन तीनों देशों के समाज में आज भी बहिष्कार झेलना पड़ता है। इसी के चलते इन तीनों देशों के लोग हमें काफी घमंडी नजर आते हैं।
भारत में चुनाव जीतना कोई मुश्किल काम नहीं है; जनता को जो जितने बड़े लालच के ख्वाब दिखा देगा, वह वोट पा लेगा। जनता ने आज तक किसी भी राजनीतिक दल से विकास की योजनाओं का प्रारूप मांगा ही नहीं।
80 साल में भारत के विकास की गाथा इतनी बदसूरत है कि कोई गौर से देख ले तो आंखें मवाद से भर जाएं।
शिक्षा बेहद महंगी है, बिना रिश्वत किसी विभाग में काम नहीं होता और नौकरियां सिफारिश के बिना संभव नहीं हैं।
वोट का बटन दबा देने से समस्याएं नहीं सुलझतीं, वोट अधूरा अधिकार है। वोट से चुने हुए व्यक्ति को वापस बुलाना असंभव है। हमारे सिस्टम के मालिक राजनीतिक दल बन गए हैं।
आप सत्ताधारी पार्टी की गोद में बैठे हैं, तो पुलिस आपको सुरक्षा देगी और बैंक लोन देगा और वह वापस मांगते हुए भी डरेगा।
आसान काम तालियां बजवाते हैं, यही तरकीब हमारे राजनीतिक दलों का मूल मंत्र है। लोगों की जिंदगी मुश्किल कामों से बदलती है।
हमारा समाज मुश्किल कामों को हाथ में लेने वालों को सिर्फ़ गालियां देना जानता है।
मक्कारी और निकम्मेपन की खुराक हमने राजनीति से रोजाना ग्रहण की है। घटिया मानदंडों की मानसिकता आपको भय से भर देती है।
हमारे पास निष्पक्ष कुछ भी नहीं है न मीडिया, न कोर्ट, न संस्थाएं। अवैज्ञानिक दृष्टिकोण से त्रस्त सोच में सुधार का ज़िक्र करते ही वकीलों और पत्रकारों की सोच को लोग अपना लेते हैं।
मौजूदा मोदी सरकार ने तो इसमें धर्म और इतिहास का मसाला भी मिला दिया है। इस बासी व्यंजन को जो खाता है, वह हमारे सिस्टम की तरह ही बीमार हो जाता है।
गर्दा उड़ गया मितरों
चक्का जाम हो गया फ्रांड्स,
दिल्ली का सिस्टम हैंग हो गया
हर तरफ तिरंगा ही तिरंगा,
वोट चोरों के खिलाफ रामलीला मैदान में पूरा देश ही जैसे उमड़ पड़ा हो,
जितने लोग रामलीला मैदान में थे, उससे दस गुना लोग आसपास की सड़कों पर मौजूद थे,
उम्मीद दस लाख लोगों के आने की थी,
लेकिन 35 लाख लोग दिल्ली में उमड़ पड़े,
पिछले तीन दशक में देश ने रामलीला मैदान में ऐसी रैली नहीं देखी थी,
अब वोट चोरों को नींद ना आएगी,
एनिमल जैसी एक फिल्म हमारे समाज को कम से कम 10 साल पीछे लेकर जाती हैं।
: विकास दिव्यकीर्ति
I agree इसी फेहरिस्त में कबीर सिंह, केजीएफ और तमाम फिल्में आती हैं✊
The chair in which Smt. Meira Kumar sat during today’s public impeachment proceedings against the CEC was once occupied by the first Prime Minister of India, Shri Jawaharlal Nehru, the great-grandfather of Shri Rahul Gandhi and Smt. Priyanka Gandhi.
It was Nehru Ji’s chair throughout his tenure as Prime Minister. It witnessed some of the most consequential decisions in our nation’s history and carries the weight of that legacy.
Today, in that very chair, invoking the spirit of Nehru Ji, Smt. Meira Kumar, former Speaker of the Lok Sabha, pronounced Gyanesh Kumar Gupta unfit to continue as the Chief Election Commissioner of India.
Gyanesh Kumar Gupta has been rejected by the people of India. It is only a matter of time before he goes.