सरकार जब भी किसी बड़े संकट के सामने खड़ी होती है तो उसका सबसे आसान रास्ता यही होता है कि जिम्मेदारी से भागो और फैसला ऐसा दो जिससे शोर तो बहुत मचे लेकिन हल कुछ न निकले। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सहारा लेकर आवारा कुत्तों को शेल्टरों में डालने की बात करने वाली सरकार को ज़रा यह तो बताना चाहिए कि क्या हमारे देश में इतने शेल्टर मौजूद हैं? क्या इन शेल्टरों में ��ंसानों की तरह इन बेजुबानों के लिए खाना-पानी, दवाई और देखभाल की व्यवस्था होगी? या फिर यह सिर्फ़ एक दिखावे का कदम है जिससे सड़कों से नज़र हटाकर समस्या को दीवारों के पीछे बंद कर दिया जाए।
सरकार की यह नीति न तो मानवीय है और न ही व्यावहारिक। आज तक न नसबंदी का ठोस कार्यक्रम चला, न टीकाकरण की पूरी व्यवस्था बनी, न ही एंटी-रेबीज़ वैक्सीन अस्पतालों में समय पर मिलती है। जब बच्चे अस्पतालों में दवा के अभाव ���ें तड़पते हैं और नागरिक रोज़ डर के साये में जीते हैं, तब सरकार अदालत के आदेश का हवाला देकर खुद की नाकामी छुपा रही है। यह मामला असल में सरकार की संवेदनहीनता और कर्तव्यहीनता को उजागर करता है।
ऊपर से विडंबना देखिए, यही सरकार हर मंच पर गाय माता–गाय माता का जाप करती है, खुद को गोभक्त बताती है लेकिन न गोशालाओं में गायों की हालत सुधरी, न सड़क पर बेसहारा घूम रही गायों को चारा-पानी और इलाज मिलता है। हजारों-लाखों गायें कूड़े के ढेर से पॉलिथीन खाकर दम तोड़ रही हैं और सरकार सिर्फ़ भाषणों में उनकी पूजा करती है। जिस देश में गाय माता की देखभाल तक सरकार नहीं कर पा रही, वहां इतनी बड़ी तादाद में कुत्तों के लिए खाने, दवाई और शेल्टर की व्यवस्था क��ना क्या सिर्फ़ एक और ढकोसला नहीं है ?
असलियत यही है कि सरकार न इंसानों की सुरक्षा की गारंटी दे पा रही है, न जानवरों की देखभाल कर पा रही है, और इस पूरे मामले ने उसकी दोहरी राजनीति और जिम्मेदारी से भागने की आदत को फिर उजागर कर दिया है।
उठाइए अपना कैमरा बनाईए ये ठीक करके दिखाओ बोलते हुए बनाओ क्रिएटिव रील ,
और उसमें अपने अगल बगल आस पड़ोस के खराब इंफ्रा को रिकॉर्ड करते हुए ,
अपने विधायक , सांसद और अधिकारियों को पॉजिटिव और कंस्ट्रक्टिव में #YeThikKarkeDikhao बोलते हुए टैग कीजिए ,
नेता और अधिकारी सक्रिय हो रहे हैं, बहुत जल्द ये नेशनवाइड कैंपेन बनेगी ।
बिजली विभाग के जेई की संपत्ति नेताओं से टक्कर लेती है — आइए थ्रेड के माध्यम से समझते हैं कि कैसे बिजली बिल के नाम पर ये आम जनता को धीरे-धीरे निचोड़ते हैं।
#yethikkarkedikhao
यह एक बहुत जरूरी और अनदेखा मुद्दा है – भारत में गुटखा , पान मसाला और थूक की वजह से गंदगी के कारण रेलवे स्टेशन , बस अड्डों और पब्लिक प्लेसेज़ की सफाई पर करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं।
आईए थ्रेड के माध्यम से पूरा माजरा और बेवफुफो के घटियापन से पैसे की बर्बादी को समझते है। >>>>
भारत में सड़क निर्माण का ठेकेदारों वाला SOP
• काम हमेशा बारिश में शुरू होगा
• पहले सड़क खोदो फिर बिजली की लाइन काटो
• बिजली विभाग पर ठीकरा फोड़ दो
• सड़क आधी-अधूरी बनाओ
• दो दिन में याद आएगा सीवर तो ��िर से खोदो
• सीवर डालकर फिर से सड़क बनाओ
• फिर याद आएगी पानी की पाइपलाइन तो फिर से खोदो
• अब इंटरनेट केबल वाले खोदेंगे
• नाली बनाओ पर ढलान उल्टी रखो ताकि पानी घरों में घुसे
• मैनहोल बिना ढक्कन के छोड़ दो, जनता रास्ता ढूंढ ही लेगी
• फुटपाथ बनाओ मगर बीच में खंभा लगाओ
• गड्ढों वाली सड़क पर ज़ेब्रा क्रॉसिंग पेंट कर दो
• सबसे घटिया सामग्री लगाओ ताकि जल्दी टूटे
• एक जेसीबी और दस आदमी खड़े रहने के लिए रखो
• मलबा हटाओ मत, वही नई सड़क की नींव बनेगा
• सुरक्षा के नाम पर टूटी बाल्टी और लाल गमछा बांध दो
• उद्घाटन से पहले सड़क चमकाओ क्योंकि विधायक जी को फीता काटना है
• सड़क एक हफ्ते में फटे तो अच्छा है, अगला बजट मिलेगा
• जनता शिकायत करे तो बोल दो "हमारा नहीं, विभाग का काम है"
• साल में चार बार खोदना ज़रूरी है, हर बार नया ब��ाना होना चाहिए
• सड़क बनेगी, टूटेगी, फिर बनेगी, सबको रोजगार मिलेगा, इसी को तो विकास कहते हैं
आज सरकार गाड़ियों की आयु तय कर रही है, कल आपके घर में फ्रिज, एसी और कंप्यूटर की आयु तय
करेंगे। सब साले बिके हुए लोग हैं जो अकारण ही, विज्ञान और शोध का हवाला दे कर, गाड़ी का प्रदूषण चेक कर के कार्य करने की जगह कार की आयु तय कर रहे हैं।
सड़क और पुल की आयु चेक नहीं करते? जो बनते ही छेद हो जा रही है? बिजली दस बार कटेगी दिन में, ताकि इन्वर्टर और बैटरी वालों का उद्योग बढ़ता रहे।
कुछ दिन में सरकार लोगों को फाँसी न देने लगे कि आप औसत आयु से अधिक दिन जीवित रह कर संसाधनों पर दवाब उत्पन्न कर रहे हैं।
सही डॉक्टर का चुनाव कैसे करें:
1.अगर किसी भी क्लिनिक या अस्पताल का प्रचार कोई social media influencer कर रहा हो तो वहाँ कभी न जाएँ।
याद रखें, मार्केटिंग के एक-एक पैसे का बोझ मरीजों पर ही पड़ता है।
अगर किसी भी क्लिनिक को प्रचार के लिए influencer की ज़रूरत पड़ रही है तो वहाँ डॉक्टरों का स��तर न्यूनतम होगा।
2.ज़्यादातर Google रिव्यू फेक रहते हैं। उस पर आँख बंद कर भरोसा न करें।
3.मरीज को क्या बीमारी है, वो बीमारी क्यों हुई, इलाज के क्या-क्या उपाय हैं, इलाज न कराने से क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं —
ये सारी जानकारी अगर डॉक्टर न दें या न दे पाएँ तो second opinion लीजिए।
4.किसी भी डॉक्टर का अगर अपना फार्मेसी है तो वो चाहेंगे कि आप वहाँ से दवाई लें।
ये चाहने में कोई दिक्कत नहीं।
लेकिन “दवाई यहीं मिले��ी” या “दवा यहीं से लेनी पड़ेगी” — अगर वो ये कहते हैं तो इसमें दिक्कत है।
फिर डॉक्टर बदल लीजिए।
इसी तरह अगर कोई डॉक्टर कहे कि बस उनके यहाँ की लैब की रिपोर्ट ही मान्य होगी तो ऐसे डॉक्टर से बचें।
5.इलाज की गारंटी देने वालों से दूर रहिए।
ज़्यादातर वे गड़बड़ निकलते हैं।
6.Second opinion लेने की बात पर अगर कोई डॉक्टर भड़क उठे तो वो डॉक्टर ठीक नहीं।
7.ज़्यादातर समय, ख़ासकर ICU में गंभीर मरीज के बारे में लोग अक्सर डॉक्टर से सवाल करते हैं कि मरीज़ कब तक ठीक हो जाएँगे।
इस सवाल का जवाब किसी डॉक्टर के पास नहीं होता। वो भविष्यवक्ता नहीं हैं कि भविष्यवाणी करें।
मरीज़ की स्थिति कैसी है और जो इलाज चल रहा है उससे स्थिति में क्या बदलाव आ रहा है —
अगर डॉक्टर ये अच्छे से बता रहे हैं तो ठीक है।
8.डॉक्टर की डिग्री ज़रूर देखें।
डिग्री अच्छे से उनके पर्चे पर लिखी होनी चाहिए।
9.इलाज के खर्च को लेकर पारदर्शिता होनी चाहिए।
10.अगर डॉक्टर कोई जाँच या दवा लिखते हैं तो ��़रूर पूछें कि वो जाँच किस लिए लिखी जा रही है।
अच्छे डॉक्टर ज़रूर बताएँगे कि किस जाँच या किस दवा का क्या उद्देश्य है।
ये सारी चीज़ें प्राइवेट प्रैक्टिस कर रहे डॉक्टरों पर लागू होती हैं।
सरकारी अस्पतालों में समय के अभाव के कारण डॉक्टर ज़्यादा समय नहीं दे पाते,
लेकिन जो बुनियादी चीज़ें हैं वो उन्हें भी देनी चाहिए।
"अब बात सिर्फ एक भर्ती की नहीं रही... बात अब उस ज़ुल्म के खिलाफ़ आवाज उठाने की है, जिसने राजस्थान के लाखों युवाओं के सपनों को रौंदा है।"
मैं हनुमान बेनीवाल, वो बेटा हूं इस मिट्टी का, जो न कभी किसी सत्ता से डरा, न कभी अपने जमीर से स��झौता किया। हर बार जब भी राजस्थान के किसी भी कोने में,किसी भी युवा पर अन्याय हुआ, मैंने आवाज़ उठाई—चाहे मुझे सदन से निकाल दिया गया हो, या मेरी आवाज़ दबाने की हर संभव कोशिश की गई हो।
25 मई को फिर एक इम्तिहान है—मेरा नहीं, आपका ।
ये आपकी तक़दीर, आपके भविष्य और आपकी आवाज़ का इम्तिहान है।
मुझे पता है, कोई जाति का नाम लेकर आपको रोकने आएगा... कोई धर्म की दीवार खड़ी करेगा... कोई कहेगा कि ‘क्या फर्क पड़ता है��। लेकिन मैं आपसे एक सवाल पूछता हूं—क्या आपकी बेरोजगारी जाति देखकर आती है? क्या पेपर लीक धर्म देखकर होते हैं? क्या सपनों की क़ीमत पार्टी देखकर तय होती है? नहीं।
तो फिर अब और चुप क्यों?
मैंने अपना सब कुछ दांव पर लगाया है—कभी संसद में लड़ा, कभी सड़कों पर उतरा, कभी जेल गया, कभी धमकियों से गुज़रा... सिर्फ इसलिए ताकि जब आप लड़ने को तैयार हों, तो कोई हनुमान बेनीवाल आपके साथ खड़ा हो।
अब मैं आपसे मांगने आया हूं—अपने लिए नह��ं, बल्कि आपके उस भविष्य के लिए जिसे बार-बार कुचला गया।
25 मई को जयपुर की सड़कों पर सिर्फ भीड़ नहीं चाहिए, हर कदम में वो आक्रोश चाहिए जो एक नई व्यवस्था की नींव रखे।
मैं इंतज़ार करूंगा उन आंखों का जिनमें उम्मीद हो, उन आवाज़ों का जिनमें हिम्मत हो, और उन कदमों का जो इस व्यवस्था की नींद तोड़ सकें।
आइए... मेरे साथ...
पार्टी व झंडे का भेद भूलकर,
सिर्फ और सिर्फ अपने हक़ की लड़ाई के लिए।
अगर अब नहीं जगे,
तो ��िर ��भी मत कहना कि कोई लड़ा नहीं।
आपका साथी -
हनुमान बेनीवाल
ईरान की इस बहादुर लड़की के चर्चे पूरी दुनिया में हो रहे हैं।
तेहरान के विज्ञान और अनुसंधान विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रही इस छात्रा को वहां के प्रशासन द्वारा हिजाब पहनने को लेकर परेशान किया गया। जो कि ईरान में आम बात है।
इसके विरोध में उसने कैंपस में कपड़े उतार कर ट��लने लगी।
कहा जा रहा है इस घटना के बाद कैंपस से सुरक्षा बलों द्वारा इस लड़की को उठा कर किसी अज्ञात स्थान पर ले जाया गया है। उसके साथ बुरी तरह से मार पीट भी की गई है।
फिलहाल वो कहां है किस हालात में है किसी को नहीं पता।
ईरान में दमघोंटू कट्टरपंथी इस्लामिक शासन द्वारा थोपे गए मध्ययुगीन नियमों के खिलाफ इस छात्रा ने इतना बहादुरी भरा कदम उठाया। यह जानते हुए भी कि इस साहस की कीमत उसे अपनी जान देकर ��ुकानी पड़ सकती है, उसने यह जोखिम करोड़ो महिलाओं के लिए उठाया।
भारत से लेकर पूरी दुनिया में महिला अधिकारों का ढिंढोरा पीटने वाले तथाकथित चैंपियन यहां चुप्पी साध लेते हैं। वैसे लोगों का पाखंड इसी तरह के मामले में बेनकाब होता है।