सीमांत क्षेत्र की माटी में केवल रेत के कण ही नहीं है, बल्कि संघर्ष, संवेदनाएं, रिश्तों की गहराई और अनगिनत अनकही कहानियां भी बसी हैं। इसी मिट्टी की महक और मानवीय संवेदनाओं को शब्दों में पिरोने का सुंदर प्रयास किया है हमारे क्षेत्र के युवा लेखक श्री बृजपाल चारण ‘बाजी’ ने अपनी पुस्तक ‘सरहद की धूल’ में......
यह पुस्तक सीमांत जीवन के उन पहलुओं को सामने लाती है, जहाँ प्रेम और मित्रता के साथ सामाजिक रूढ़ियां, जातिगत दीवारें और परिस्थितियों से संघर्ष भी मनुष्य की यात्रा का हिस्सा बनते हैं। पुस्तक की विषयवस्तु पाठक को केवल कहानी से नहीं जोड़ती, बल्कि उसे अपने आसपास के समाज और रिश्तों को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए भी प्रेरित करती है।
सीमांत क्षेत्र की धरती और यहां के लोगों की भावनाओं से मेरा गहरा जुड़ाव रहा है। ऐसे क्षेत्र से निकलकर साहित्य के माध्यम से अपनी माटी, समाज और संवेदनाओं को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाना निश्चित रूप से सराहनीय प्रयास है।
श्री बृजपाल चारण ‘बाजी’ को इस साहित्यिक प्रयास के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि ‘सरहद की धूल’ पाठकों के मन में अपनी अलग छाप छोड़ेगी और सीमांत क्षेत्र की आवाज़ को साहित्य के माध्यम से नई पहचान प्रदान करेगी।
सीमांत की मिट्टी से निकली कहानी, अब शब्दों के सफर पर…
‘सरहद की धूल’ निश्चित रूप से पढ़े जाने योग्य कृति है।
फ़ितूर उम्र का मोहताज नहीं होता बस उसके मायने बदलते रहते हैं। कभी खिलौनों में, कभी मोहब्बत में, कभी रुतबे में… और कभी उस रुतबे से परे अपनी ही ज़िंदगी को जी लेने की जिद में।
मानवेंद्र सिंह जसोल जसवंत सिंह के ज्येष्ठ पुत्र। राजपूताना की मिट्टी से उठे, मेयो कॉलेज की शिक्षा, विदेशों में अध्ययन, भारतीय सेना में कर्नल, फिर राजनीति में सांसद और विधायक। बाड़मेर जैसलमेर की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई, BJP से कांग्रेस फिर बीजेपी तक का सफर तय किया।
2024 का दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर वह दर्दनाक हादसा जिसमे चित्रा सिंह का निधन, खुद और बेटे हमीर घायल। जीवन का एक अध्याय वहीं थम गया।
लेकिन जीवन ठहरता नहीं। 61 वर्ष की उम्र में उन्होंने दूसरा अध्याय खोला, दूसरी शादी। कानून इसकी इजाज़त देता है, पर समाज अक्सर सवालों से घेर लेता है। जसोल परिवार में भी मतभेद उभरे: परंपराएं, रिश्तों की मर्यादा और निजी फैसले आमने-सामने आ खड़े हुए। सोशल मीडिया पर बहस, परिवार की असहमति और चर्चा का तूफान।
लेकिन असली सवाल यही है कि क्या इंसान को अपनी ज़िंदगी अपने फैसलों से जीने का हक नहीं, चाहे उम्र कोई भी हो?
अधिकतर लोग समाज की खींची लकीरों में ही चलते रहते हैं, रुतबे और रिश्तों के डर से। मानवेंद्र सिंह ने वह लकीर पार कर दी।
सवाल उठेंगे, चर्चाएँ होंगी, शायद आलोचनाएँ भी। लेकिन जिंदगी की किताब में नया पन्ना खुल चुका है और इस बार मानवेन्द्र सिंह का फ़ितूर समाज से ज्यादा अपनी आवाज़ सुन रहा है।
ना हमनें कभी ग़लत का साथ दिया ना देंगे
इसी नीति के तहत शिव फतेह किया था और जब #मनिहारी में इसी समाज की महिलाओं के साथ हुए अन्याय के विरोध में पुलिस थाने का घेराव और किसी ने नहीं बल्कि इसी #रवि में किया..!
बहुत जल्द आ रहा हैं वो देवका @RavindraBhati__