नरेंद्र मोदी के वित्त सचिव रहे सुभाष चन्द्र गर्ग ने फर्जी जीडीपी आंकड़ों की पोल खोल दी
असल में जीडीपी 7.8% नहीं, 2.6% है। आंकड़ों में हेरफेर करके झूठ परोसा जा रहा है। वह भी विदेशी धरती से। मतलब अब हमारा झूठ भी इंटरनेशनल हुआ और हम बन गए झूठ के विश्वगुरु।
भगवा पहने ये लोग मटन काट रहे हैं किसी की भावनाएं तो आहत नहीं हो रहीं ना
अच्छा याद आया भावनाएं तो non veg की दुकान खुलने से ही आहत होती है ना
कपड़े से पहचानो अगर यहां पर कोई मुस्लिम होता तो लाखों अंध भक्तों की धार्मिक भावना आहत हो जाती...
कांवड़ यात्रा के नाम पर DJ का शोर और धर्म के नाम पर खुलेआम अश्लील तमाशा!
छि:, धर्म को बदनाम कर रहे हैं ये.
लेकिन BJP को यही Gen Z तो पसंद है, इनके ऊपर पुष्प वर्षा होती है और इनका असामाजिक हरकतें करने का दुस्साहस बढ़ता है.
महिला, पुरुष और बच्चों, सब अपनी-अपनी सीट ख़ाली करो, हम कांवड़िए हैं, हमारे ऊपर मुख्यमंत्री और पुलिस अफ़सर, हेलीकॉप्टर से फूलों की वर्षा करते हैं..🤐
मुसलमानों को इनसे अनुशासन सीखना ��ाहिए! 😂
Location: Narhar, Azamgarh, Uttar Pradesh
"We are Bajrang Dal; we will tear everyone apart."
During a Christian prayer meeting at a house, members of Bajrang Dal arrived, created a disturbance, beat the pastor, abused him, and behaved indecently toward the women.
@NANDLALMAURYA@TrueStoryUP@SamsungMobile जिसमें गंदगी की वजह कैंसर और भी बहुत सारी बीमारी पनपती है उस बेकार चमड़े को कट कर निकाल दिया जाता है इसलिए हिन्दू लकड़ियां औरत musalman को ज्यादा पसंद करती हैं क्यों कि चिकना और साफ़ होता है, जितने भी हिन्दू Dr. होते हैं सब कटा लेते हैं उन्हे मालूम है
आज इलाहाबाद हाई कोर्ट में जौहर यूनिवर्सिटी के फाउंडर मोहम्मद आज़म ख़ान और उनके बेटे पूर्व विधायक अब्दुल्लाह आज़म की जमानत की मांग की जाने वाली याचिका पर सुनवाई होनी थी लेकिन जस्टिस विक्रम डी चौहान ने सुनवाई के व���़्त ख़ुद को सुनवाई से अलग कर मामले को मुख्य न्यायधीश को ट्रांसफर कर दिया।
जज साहब ने 15 जुलाई को सुनवाई की थी और अगली तारीख़ 6 अगस्त दे दी, आज़म ख़ान के वकीलों और परिजनों ने 20 दिन इंतिज़ार किया और आज अदालत पहुंचे तो जज साहब ने बिल्कुल मौके पर ख़ुद को सुनवाई से अलग कर लिया, जज साहब चाहते तो मामले को पिछली तारीख़ यानी 15 जुलाई को ही इस मामले से अलग कर सकते थे ताकि अब तक मामला की सुनवाई हो जाती, लेकिन साहब ने ऐसा नहीं किया क्योंकि मामले को खींचना भी था।
ख़ैर जज साहब की मामले से दूरी बनाने की मजबूरी जो भी रही हो लेकिन साफ़ जाहिर है कि अदालतों में सरकारों का खौफ़ है, इसलिए जज अब मामलों से दूरी बनाना ही बेहतर विकल्प समझते हैं, और यह दूरी उन्हीं केसों में बनाई जाती हैं जिनमें पहली ही सुनवाई में जमानत देने का आधार बनता हैं लेकिन दबाव के कारण जज फ़ैसले देने का भी फैसला नहीं ले पा रहे हैं, और फैसला लिया जाता है तो मामलों से दूरी बनाने का।
यह पहला मामला नहीं जब किसी जज ने आज़म ख़ान और उनके बेटे के मामले की सुनवाई से दूरी बनाई हो, इससे पहले 21 नवंबर 2025 को यतीमखाना केस में भी जो कि आज़म ख़ान से ही जुड़ा हुआ था, उसकी सुनवाई से भी जज समीर जैन ने ख़ुद को अलग कर मामले को मुख्य न्यायधीश क�� पास भेज दिया था।
साबित हैं जज साहब आज़म ख़ान के मामले को भांप चुके हैं जिसमें आज़म ख़ान और उनके बेटे को बरी या जल्द जमानत देने के अलावा कोई रास्ता नहीं था, लेकिन जज साहब ने जमानत न देकर ख़ुद को मामले की सुनवाई से अलग कर मुख्य न्यायधीश के पास भेजना मुनासिब समझा। अगर जज साहब को इस मामले से ख़ुद को अलग ही करना था तो अलग होने वाला फैसला कई महीनों में क्यों लिया गया? क्यों न ख़ुद को मामले की शुरुआत या जब मुख्य न्यायधीश ने अदालत में भेजा था उसी दौरान क्यों नहीं लौटाया गया? अब नागरिक अदालतों का नहीं बल्कि अदालत ही नागरिकों का समय बर्बाद करती हैं, अदालत का नागरिक समय बर्बाद करता है तो अदालत द्वारा नागरिकों पर जुर्माना और FIR तक दर्ज कर देती हैं लेकिन नागरिकों अगर अदालत ही नागरिकों का समय बर्बाद करें तो किस पर जुर्माना और किस पर FIR होनी चाहिए यह भी अदालतों को बताना चाहिए।
@RMeena24428@Zubair99778 जो जैसा होता है वो दूसरे के बारे में waisa ही सोच रखता है जैसे तू है सूअर और मुर्ख गंदगी 80% साले तुम सब खुद कटे होते हो बीमारी की वजह से, नीच कहीं का थू थू थू थू