एकमेव
पन्थ अछि अनन्त,गन्तव्य धाम एक विविध मतहु रहितहु,मन्तव्य नाम एक पद-पदार्थ लक्ष,रसक लक्ष्य अन्तिमे एक,द्रव्य द्रवित ज्योति गतिक, शक्ति अन्त एक। दर्शन ओ दृश्य एक,दर्शक समतूल स्पर्शन ओ स्पृश्य एक,स्पर्शक अनुकूल हरिजन ओ हर जन जत जनक-जन्ध मूल चाहिअ सौजन्य धन्य जन्म कर्म तूल।।
जलद-जलधि नद - नदी न, सलिल सेक टा
वर्तिका न, व्यंजनिका न, तडित वेग टा
व्यजन - अनुरंजन स्वर - स्वरित अक्षरे
प्रणव एक ओंकार, विदित त्र्यक्षरे।७।
कथा कते, विधा कते, व्यथा क एकते
प्रथा कते तथापि मूल एक टेकते
कवि क कवित अगनित प्रतिभैक अंचले
छवि क अंग अमित रंग - टीप चंचले।८।
व्यक्ति ओ समाज मे न द्वन्द्व भावना
लोकतन्त्र, व्यक्ति-यन्त्र ऐक्य साधना
समष्टि व्यप्टिवाद एतै एक - प्राणता
भेद मे अभेद, अभेदो क भिन्नता।5।
बिन्दु संयुता एतै तरगिणी स्वयं
सिन्धु संगता एतै पयस्विनी स्वयं
मेघ बिन्दु, अद्रि रेणु, कीर्णता स्वयं
व्यष्टि मे समष्टि केर पूर्णता स्वयं।6।