मानव या तो प्रेम में कविता लिखता है या कविता में प्रेम,
लेकिन जब वो प्रेम और वियोग के द्वंद में फंसा होता है तब उसका हृदय दहकता है, उस समय वो कविता नहीं लिकता, वो उन्हें भस्म कर लेता है अपने अंदर और तब तक भस्म करता है जब तक हृदय की दाहक समाप्त न हो जाए।