पहले मोदी जी 8 बजे आते थे,
अब 11 बजे वीडियो अपलोड कर रहे हैं...
कहीं ऐसा तो नहीं कि ChatGPT ने भी सलाह दे दी हो—
"सर, इंस्टाग्राम का एल्गोरिदम इसी टाइम ज़्यादा खुश रहता है!" 😄
#modivideo
रोटी जली तो जली, लेकिन सिकी खूब
यानी जिस दांव से विपक्ष सरकार को घेरना चाहता था, उसी ने नई राजनीतिक संभावनाओं की आग को हवा दे दी
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन रणनीति अगर भावनाओं से ज़्यादा सुर्खियों पर टिक जाएतो राजनीतिक नुकसान भी उसी अनुपात में होता है
अगर राजनीति को शतरंज मानें, तो कई बार एक चाल पूरे खेल का गणित बदल देती है।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद जो घटनाक्रम सामने आया, उसने विपक्ष की रणनीति पर कई सवाल खड़े कर दिए। जिस आंदोलन से सरकार को घेरने की उम्मीद थी, चर्चा अब उसके राजनीतिक असर पर ज़्यादा होने लगी।
अगर इसका सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ किसी नए चेहरे या नई ताकत को मिलता है, तो नुकसान सबसे पहले उन दलों का होगा जो उसी वोट बैंक पर दावा करते रहे हैं।
राजनीति का नियम भी बड़ा दिलचस्प है—
दूसरे को घेरने निकले थे, लेकिन खुद ही घेरे में आ गए।
और तभी याद आती है वह पुरानी कहावत—
आंदोलन का उद्देश्य छात्रों के हितों की रक्षा होना चाहिए, न कि किसी पार्टी की राजनीति को आगे बढ़ाना।
छात्रों का मुद्दा, छात्रों का ही रहने दीजिए। इसे राजनीतिक लाभ का माध्यम नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य का सवाल समझिए
#संसद_मार्च#राहुल_गांधी#लोकतंत्र#धर्मेंद्रप्रधान
जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन छात्रों के भविष्य और अधिकारों से जुड़ा मुद्दा है। इसे किसी भी राजनीतिक दल की शक्ति-प्रदर्शनी या राजनीतिक मंच नहीं बनाया जाना चाहिए।
यदि विपक्षी दल, चाहे राहुल गांधी हों, अरविंद केजरीवाल हों, अखिलेश यादव हों या कोई अन्य नेता, छात्रों के आंदोलन को
अपनी राजनीतिक लड़ाई का माध्यम बनाते हैं, तो यह छात्रों के मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने का काम करेगा।
छात्रों की आवाज़, छात्रों की ही रहनी चाहिए। राजनीतिक दल यदि समर्थन देना चाहते हैं तो बिना श्रेय लेने की कोशिश किए छात्रों की मांगों के साथ खड़े हों।
देश के छात्र केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस समाधान चाहते हैं। उम्मीद है कि आपके इस प्रयास से सरकार और संबंधित पक्ष छात्रों की समस्याओं पर गंभीरता से विचार करेंगे और जल्द सकारात्मक निर्णय लिया जाएगा।
छात्रों का भविष्य सबसे पहले — राजनीति बाद में।
@RahulGandhi#JantarMantar
धन्यवाद राहुल गांधी जी।
प्रधानमंत्री आवास के बाहर छात्रों के समर्थन में स्वयं धरने पर बैठने के लिए आपका आभार। आपसे विनम्र निवेदन है कि इस मुद्दे को पूरी मजबूती से उठाते रहें और छात्रों की आवाज़ को सरकार तक प्रभावी ढंग से पहुँचाएँ।
यह विषय किसी राजनीतिक दल की जीत या हार का नहीं, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य का है। इसलिए इस पर राजनीति से ऊपर उठकर केवल छात्रों के हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जब तक छात्रों की मांगों का न्यायपूर्ण और स्थायी समाधान नहीं निकलता, तब तक उनके साथ मजबूती से खड़े रहिए
@JaikyYadav16 यह बात एकदम सही है छात्रों के आंदोलन को एकदम से बर्बाद करके रख दिया इन कुछ नेता बनने की चाह रखने वाले लोगों के कारण और हमारे देश की पॉलीटिकल पार्टी
इससे स्पष्ट होता है कि इस आंदोलन का उद्देश्य छात्रों की समस्याओं का समाधान कम और अपनी पहचान बनाना अधिक था।
यदि वास्तव में छात्रों के लिए संघर्ष करना है, तो सबसे पहले ईमानदारी, धैर्य और निरंतरता अपने भीतर लानी होगी।
आज जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, वह अत्यंत निंदनीय है। इतने दिनों तक धरने पर बैठने के बाद भी, जो लोग छात्रों की आवाज़ उठाने का दावा कर रहे थे, वे मात्र 20 दिनों में ही अपना धरना समाप्त करके चले गए।
छात्रों को भड़काकर अपनी राजनीति चमकाने और अपनी समर्थक मंडली तैयार करने का प्रयास किया
मेरा मानना है कि यह काम कॉकरोच जनता पार्टी और उससे जुड़े राजनीतिक लोगों द्वारा किया गया। पूरा प्रदर्शन छात्रों के हित से अधिक एक राजनीतिक प्रदर्शन जैसा दिखाई दिया।
न तो वे सरकार के सामने अपनी बात प्रभावी ढंग से रख पाए और न ही किसी ठोस परिणाम तक पहुँच सके।
"आज का दृश्य देखकर ऐसा लगा मानो संसद के बाहर विरोध प्रदर्शन कम और विपक्ष की राजनीति ज़्यादा दिखाई दे रही हो। नारे बुलंद थे, कैमरे मौजूद थे, बयान लगातार दिए जा रहे थे, लेकिन जनता यह भी जानना चाहती है कि इन सबके बीच समाधान कहाँ है।
जनता चाहती है कि सत्ता जवाबदेह रहे और विपक्ष भी रचनात्मक भूमिका निभाए। अगर संसद के भीतर बहस कम और बाहर प्रदर्शन ज़्यादा होने लगे, तो लोकतंत्र का असली उद्देश्य अधूरा रह जाता है। लोकतंत्र की ताकत केवल विरोध में नहीं, बल्कि सार्थक बहस, जवाबदेही और समाधान निकालने की क्षमता में है।
लोकतंत्र में विरोध करना हर दल का अधिकार है, लेकिन जब हर मुद्दे का जवाब केवल प्रदर्शन, पोस्टर और प्रेस कॉन्फ़्रेंस बन जाए, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उद्देश्य समाधान है या सिर्फ़ राजनीतिक संदेश देना।