राम कबहुँ प्रिय लागिहौ जैसे नीर मीनको ?
सुख जीवन ज्यों जीवको, मनि ज्यों फनिको हित, ज्यों धन लोभ-लीनको ।।
ज्यों सुभाय प्रिय लगति नागरी नागर नवीनको ।
त्यों मेरे मन लालसा करिये करुनाकर ! पावन प्रेम पीनको ।।
मनसाको दाता कहैं श्रुति प्रभु प्रबीनको ।
तुलसिदासको भावतो, बलि जाउँ दयानिधि ! दीजै दान दीनको ।।
हे श्रीरामजी ! मुझे क्या कभी आप ऐसे प्यारे लगेंगे, जैसा मछलीको जल प्यारा लगता है, जीवको सुखमय जीवन प्यारा लगता है, साँपको मणि प्रिय लगती है और अत्यन्त लोभीको धन प्यारा लगता है ?
अथवा जैसे नवयुवक नायकको स्वभावसे ही नवयुवती चतुरा नायिका प्यारी लगती है, वैसे ही हे करुणाकी खानि! मेरे मनमें केवल आपके प्रति पवित्र और अनन्य प्रेमकी ही एक लालसा उत्पन्न कर दीजिये ।
वेद कहते हैं कि प्रभु मनमानी वस्तु देनेवाले हैं और बड़े ही चतुर हैं (बिना ही कहे मनकी बात जानकर उसे पूरी कर देते हैं)। हे दयानिधे! मैं आपकी बलैया लेता हूँ, इस दीन तुलसीदासको भी उसकी मनचाही वस्तुका दान दे दीजिये ।
!! मेरे राम !!
ओ परम्!
हाँ, तुम्हारा ही रचा मैं
तुम ही तो बसे हो मुझमें
सुनता हूँ निशि-वासर गूँज
प्रतिक्षण तुम्हारी ही
सपनों में भी तुम ही तो आते मेरे
अब
तुमसे विदा भला कैसे संभव?
!! मेरे राम !!
@RailMadad
PNR NO. 8827953716
मैं नागपुर के लिए सफर कर रहा हूं, यहां पर कोच में जो भी चादर और तकिया उपलब्ध कराई जा रही है वो हद से ज्यादा गंदी हैं।
क्या रेलवे अब इन्सानों को जानवर समझने लगी है।
@RailMinIndia
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मैं नागपुर के लिए सफर कर रहा हूं, यहां पर कोच में जो भी चादर और तकिया उपलब्ध कराई जा रही है वो हद से ज्यादा गंदी हैं।
क्या रेलवे अब इन्सानों को जानवर समझने लगी है।
"जाउं कहां तजि चरन तुम्हारे"
पूज्यपाद गोस्वामी श्री तुलसीदास जी महाराज कहते हैं कि हे नाथ! आपके चरणों को छोड़कर और कहां जाऊं? संसार में 'पतित-पावन' नाम और किसका है? आपकी भांति दीन-दुःखियारे किसे बहुत प्यारे हैं?
!! मेरे राम !!
*"कहु केहि कहिय कृपानिधे! भव-जनित बिपति अति"*
पूज्यपाद गोस्वामी श्रीतुलसीदास जी महाराज कहते हैं कि हे करुणानिधान! इस संसार-जनित भारी विपत्ति का दुःखड़ा आपको छोड़कर और किसके सामने रोऊं? इन्द्रियां तो सब अपने-अपने विषयों में आसक्त होकर उनके लिए व्याकुल हो रही हैं।
हे प्रभो! आप करुणा के समुद्र हैं, आपमें असीम करुणा है। अब आपको छोड़कर और किससे अपनी परेशानी कही जाए? किसी दूसरे से अगर कहा तो वो हंसेगा, दोष देगा और दस जगह बुराई ही गायेगा पर परेशानी से तो छुड़ा नहीं पायेगा। इस कारण दूसरे से कुछ भी कहने में हानि ही है।
लगता है कि दिखते हो
पर ... नजर नहीं आते ...
दुनिया में नहीं हो
पर ... हृदय की गहराइयों में धड़कनों के साथ हर पल धड़कते हो ...
मेरी आंखों की नमी का अर्थ तुम हो
शायद ... तुम भी कर रहे होगे मुझे कहीं से याद
जीवित हूं तो जीवित सा रहूंगा
पर ... तुम्हारी कमी हर पल चुभती है।
दूर हो पर ... मौजूद से रहते हो हर पल
याद बनकर ... मेरी धड़कनों में समाये हुए हो
मिलइ न जगत सहोदर भ्राता
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई।
करुना सागर कीजिअ सोई ।।
हे करुणा के सागर प्रभु !! जिस प्रकार से आपका मन प्रसन्न होना है, कृपा करके वैसा ही हमें करने की शक्ति दीजिये।
आपकी इच्छा ही हमारा मार्ग है ओर वही हमारा धर्म है।
!! मेरे राम !!