कायदे आजम मो . जिन्ना,गांधी जी की तरह गुजराती बनिया थे । उनकी जाति खोज़ा थी । खोजा ख्वाजा से बना है । उनके दादा का नाम प्रेमजी भाई मेघजी ठक्कर था । उनकी जाति लोहना थी । यह एक सर्वश्रेष्ठ बनिया जाति थी । मो . जिन्ना के दादा का मछली का बहुत बड़ा व्यापार था । लोहना जाति शाकाहारी थी । इसलिए सारे लोहना ने मिलकर प्रेमजी भाई मेघ जी ठक्कर का बिरादरी में ' 'हुक्का - पानी' बंद कर दिए । उस समय लोहना जाति का Diaspora पूरी दुनिया मे फैला था । हर जगह उनके पास धन और व्यापार के साथ - साथ पोलिटिकल गैलरी में पकड़ थी । प्रेमजी भाई मेघ जी ठक्कर, बिरादरी के दबाव में आकर बहुत बड़ा मछली का व्यापार त्याग दिया । फिर भी उन्होंने ने उन्हें बिरादरी में वापस नहीं लिया।
बॉयकाट से तंग आकर , प्रेमजी भाई मेघजी ठक्कर के पुत्र जिन्ना भाई पूंज ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया , खोजा बन गए । वह मोहम्मद ज़िन्ना के वालिद ( पिता) थे । खोजा शिया मुसलमान थे ,जो धार्मिक नेता आगा खान के नेतृत्व में इस्लाम धर्म ग्रहण किए थे । आगा खान ईरान से आए एक ईमाम थे । उन्होंने धर्म परिवर्तन कराया और उस शाखा का नाम खोजा था।
➡️ निष्कर्ष मो . जिन्ना एक पीढ़ी पहले गुजराती हिंदू बनिया थे । अगर धर्म परिवर्तित नहीं किया होता तो वे महात्मा गांधी के विरोधी न होकर घनश्याम दास बिड़ला की तरह परम भक्त और अनुयायी होते।
➡️ अंतिम निष्कर्ष यह है कि दो गुजराती बनियों की 'गोतिया - गदर' में हिंदुस्तान और पाकिस्तान बन गया । एक तरफ गुजराती हिंदू बनिया महत्मा गांधी थे तो दूसरी तरफ गुजराती मुस्लिम बनिया थे मो. जिन्ना। मो . जिन्ना ने पंजाबी जाट मुस्लिम के कंधे पर बंदूक रख कर चलाया तो गांधी ने बंगाली ब्राह्मण और कायस्थों ( भद्र लोक ) के कंधे पर रखकर बंदूक चलाया।
🍁 Suffer कौन किया देश का अवाम खासकर दलित और जोगेंद्र नाथ मंडल ❗
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🍁🍁🍁🍁🍁🍁इसे जरुर पढें ☑️
एक Historical fact है ।
बंगाल का पहला स्वतंत्र नवाब थे मुर्शीद कुली खान ( Murshid Kuli khan ) !
➡️ मुर्शीद कुली खान का असली नाम था सूर्य नारायन मिश्रा।
➡️ इनको बंगाल का नवाब 1700 ई. के आस पास औरंगजेब ने बनाया था ।
➡️ औरंगजेब के कमजोर पड़ते ही उन्होंने बंगाल पर कब्जा कर लिया और खुद को स्वतंत्र घोषित कर लिया ।
➡️ 1700 में मुर्शीद कुली खान औरंगजेब के पोता अजीम-उ- शाह जो बंगाल के सूबेदार के बीच भयंकर विवाद हुआ । सूर्य नारायन मिश्रा उर्फ मुर्शीद कुली खान औरंगजेब और उनके पोते के बीच विवाद बढ़ाकर फायदा लेना में कामयाब रहे । विवाद यह था कि मुर्शीद कुली खान ने कहा कि जो रिवन्यू कलेक्ट होगा वह सीधे औरंगजेब को भेजेगा, अजीम -उ -शाह को नहीं देगा । जाहिर सी बात है कि यह बात किसी सूबेदार वह जब उसी खानदान को हो पसंद नहीं आयेगा। अजीम - उ - शाह ने ढाका( राजधानी ) में हत्या करने की कोशिश की । मुर्शीद कुली कान बच गये और मकसूदाबाद ( मुर्शिदाबाद) चले आए । औरंगजेब ने बीच बचाव किया और कहा कि तुम (मुर्शीद कुली खान) यहीं रहो और अजीम - उ - शाह को सूबेदारी से बेदखल कर दिया।
➡️ अब सूर्य नारायण त्रिपाठी उर्फ मुर्शीद कुली खान ने सबसे पहले क्या किया ?
सबसे पहले जिस शहर में आया , उस शहर का नाम बदल दिया। उसे मक्शुदाबाद से बदल कर मुर्शिदाबाद कर दिया । मक्शुदाबाद को भागीरथी नदी पर सबसे पहले अकबर के समय एक बहुत बड़ा व्यापारी मक्शुस खान ने सराय और दुकान - बजार बनाकर विकसित किया था । इसलिए इसका नाम मक्शुदाबाद पड़ा। यूरोपियन लोग इसे Maxidabad लिखते थे।
➡️ सूर्य नारायन मिश्रा उर्फ मुर्शीद कुली खान ने दूसरा काम किया जितने भी जमींदारी/ जागिरदारी खालसा ( सरकारी) जमीन थी , मुसलमान जमींदारों से छीन कर उच्च वर्णी हिंदु जमींदारों के हाथ मे दे दिया। जमींदारी की जगह इजारेदारी व्यवस्था लागू की।
➡️ मुर्शीद कुली खान उर्फ सूर्य नारायन मिश्रा के दांया और बांया हाथ उच्च वर्ण वाले बन गए -
1 ) रघुनंदन जो एक ब्राह्मण क्लर्क था , मुर्शीद कुली खान का जमींदारों का मुख्य अधिकारी बना ।
2 ) रघुनंदन का भाई रामजीवन जमींदारों पर निगरानी रखने वाला अधिकारी बना ।
3 ) आलम चंद ( भूपाल रॉय ) चीफ फाइनेंस ऑफिसर बने ।
4 ) चीफ कानूनगो दर्पण रॉय बने
5 ) जगत सेठ चीफ बैंकर बने
इस तरह के तमाम सवर्ण मुर्शीद कुली खान के अधिकारी बने । बंगाल अब सवर्णों के कब्जे में था ।
➡️ सवाल है इस इतिहास से क्या सबक मिला?
➡️ एक ब्राह्मण ने अपना धर्म बदला, लेकिन ईमान बेईमान ही रहा । धर्म बदलने के बाद भी वह अंदर से नहीं बदला। वह अंदर से ब्राह्मण ही रहा और वर्ण - व्यवस्था आग्रही। कमाल की बात है कि उसने कुछ सृजित नहीं किया, बल्कि धीरे - धीरे सारी विकसित की हुई चीजों को हड़प लिया, अपने दखल में ले लिया, Appropriate कर लिया।
🍁 बाकी हम दलित कहानी पढ़ते रहें कि मुसलमान आने के बाद दलितों ने धर्म परिवर्तन किया क्योंकि उनको अश्पृश्यता से निजात मिली। यह पूरी बकवास बात है । इंडिया में पहली बार मुस्लिम बनने वाले दो ब्राह्मण थे । 🍁
इसलिए इतिहास पुनः पढ़िए, धर्म परिवर्तन दलितों ने नहीं ब्राह्मणों और सवर्णों ने किया है । आपको गांव के गांव मुस्लिम त्यागी मिल जायेंगे ,जाट मिल जाएंगे, राजपूत मिल जाएंगे, यहां तक की हुसैनी ब्राह्मण भी ,बिहार में भूमिहार भी । लेकिन चमार , पासी,राजभर , दुसाध,अहिर ... मुस्लिम नहीं मिलेंगे गांव के गांव मुस्लिम। अवर्णों में जिसने भी धर्म बदला ,धर्म के साथ अपना नाम और ईमान भी बदल लिए ।
लेकिन सवर्णों ने अपना चोला बदला,धर्म बदला, लेकिन ईमान नहीं । अंदर से हैं सवर्ण और वर्णाश्रम आग्रही । इसी के अनुसार बोलते, लिखते और सोचते हैं ।
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सबसे बड़ा झूठ है , संस्कृत ब्राह्मणों की भाषा है ❗
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➡️ जब संविधान सभा राष्ट्रीय भाषा विवाद चल रहा था तो बाबा साहब डा. अंबेडकर ने संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव दिया।
➡️ सवाल है कि बाबासाहेब ने ऐसा क्यों किया होगा ? क्या उन्हें पता नहीं था कि संस्कृत ब्राह्मणों की भाषा है ? ब्राह्मणों ने इसी भाषा में अपने सारे ग्रंथ लिखे हैं । वेद से लेकर पुराण तक । इसी भाषा में दलितों का सबसे ज्यादा नुक्सान किया है । यह वह भाषा है जो उनके ही वर्ण व्यवस्था में चौथा स्तंभ शूद्रों को पढ़ने पर प्रतिबंधित था ? फिर उन्होंने संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए क्यों कहा ?
➡️ चलिये, मान लिया कि उन्होंने कहा ! उनपर सवाल हम बाद में करेंगे, इसका विरोध ब्राह्मणों ने ही क्यों किया? आर के धुलेकर और पुरूषोतम दास टंडन ने इसका विरोध किये, खुद पंडित जवाहर लाल नेहरु ने कहा कि इतने पुराने संस्कृत को राष्ट्रभाषा नहीं बना सकते जिसे उस समय भी केवल Ellite class ही पढ़ता लिखता था , आज भी केवल 1 % से कम लोग संस्कृत जानते हैं । तब बाबासाहेब ने कहा कि हम भाषा ट्रांसफर का 15 साल टाइम रखते हैं , जब तक सबलोग संस्कृत नहीं सीख लेते,तब तक अंग्रेजी में काम करेंगे।
➡️ लेकिन फिर भी सवर्णों ने नहीं माना और इस प्रस्ताव को निरस्त कर अंग्रेजी और Indigenous language को मान्यता दी । मतलब ब्राह्मण खुद संस्कृत को Indigenous language नहीं मानते थे ❗
🍁 कल्पना कीजिए 🍁
अगर ➡️ संस्कृत राष्ट्रभाषा बन जाता तो क्या क्या होता?
1️⃣ स्कूल में सारी किताबें संस्कृत में होती , हम न्यूटन से लेकर फैराडे का रूल संस्कृत में पढ़ते, फ्रांस और रूस की क्रांति संस्कृत में पढ़ते ।
2️⃣ समाचार संस्कृत में छपता, टीवी पर बहस संस्कृत में होती, सोशल मिडिया पर संस्कृत तैरती। कोई गाली दे ही नहीं पाता।
3️⃣ शादी - ब्याह, पूजा - हवन , कथा - व्रत में पंडीज्जी को बुलाने की जरुरत ही नहीं पड़ती।
4️⃣ मंदिरों में केवल ब्राह्मण नहीं होते ।
5️⃣कोर्ट - कचहरी में संस्कृत में बहस होता , जज - कलक्टर संस्कृत में आदेश पारित करते । संस्कृत की श्रेष्ठता खत्म हो जाती । सबसे बड़ी बात - संस्कृत सब कोई शुरु से पढ़ता - 99 % अबादी। क्योंकि इसमें किसी को महारत हासिल नहीं थी । तब संस्कृत वह आधार होता, जिसमें मेरिट की असली परीक्षा हो जाती। क्योंकि कोर्ट और प्रशासन की भाषा - फारसी,अंग्रेजी में कुछ वर्ग अव्वल हो चुके थे , उनका भाषा के नाम पर प्रभुत्व और महत्व खत्म हो जाता। कोर्ट - कचहरी में केवल कायस्थ और ब्राह्मण नहीं दिखते। क्योंकि उन्हें भी शुरु से संस्कृत पढ़ना पड़ता।
☑️खैर जो नहीं होना था ,वह नहीं हुआ । लेकिन संस्कृत ब्राह्मणों की भाषा कैसे हैं ? यह तो सवाल है ⬇️
1️⃣ संस्कृत का पहला प्रमाण रूद्रदमन जो एक शक राजा था,के काल में पहली बार देखने को मिलता है । यह अभिलेख प्रथम शताब्दी का बताया जाता है । अब शक कोई ब्राह्मण तो थे नहीं , अगर उनके काल में संस्कृत विकसित हुआ तो यह ब्राह्मणों की भाषा कैसे हुआ । गुप्त काल जो संस्कृत के लिए स्वर्ण युग माना जाता है , वह भी ब्राह्मणों का काल नहीं था ।
2️⃣ अगर संस्कृत ब्राह्मणों की भाषा होती तो पुष्यमित्र शुंग जो खुद एक ब्राह्मण था , उसके पूरे वंश के शासन काल में कोई भी अभिलेख संस्कृत में नहीं मिलते। उसके सारे अभिलेख पाली और ब्राह्मी लिपि मे मिलती है ।
3️⃣ संस्कृत अगर ब्राह्मणों की भाषा होती तो संस्कृत के ग्रंथों के रचयिता अपने लिखे पर दावा करते । जैसे मनुस्मृति: -अगर मनु ने लिखी होती तो वह दावा करता कि यह रचना मेरी है और मैंने इस जगह पर , यहां पर बैठ कर , इस सन ई . में , चैत्र मास,शुक्ल पक्ष द्वितीया को यह ग्रंथ पूर्ण रुप से कंप्लीट किया। लेकिन,वेद हो या पुराण,कोई रचयिता सामने नहीं आता। मतलब यह प्रचलित मूल्यों और कहानियों का बाद में निरूपण और विरूपण है । विशुद्ध चोरी का माल और हड़पने की संस्कृति।
5️⃣ फिर सवाल है कि संस्कृत को किसने विकसित किया ?
जवाब है ➡️ संस्कृत क्या, प्राकृत और पाली भी राजकीय परियोजना थी । राज तंत्र ने इसे विकसित किया,जिससे विविधता वाले बोलियों की जगह एक Standard भाषा और लिपि अधिग्रहित हो । चूंकि ब्राह्मण राजतंत्र के बहुत करीब रहे हैं ,इसलिए उन्होंने इन भाषाओं और लिपियों को हड़प लिया और अपना मिल्कियत बनाया।
बाबासाहेब इस मिल्कियत और अधिकार को तोड़ना चाहते थे । इसलिए उन्होंने इसे राष्ट्रभाषा बनाने की मांग की जिसे ब्राह्मणों ने ही ठुकरा दिया।
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दलितों के लिए पेरियारवाद कितना उपयोगी है ❓
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मेरा बहुत सिंपल सवाल है - ई वी रामास्वामी पेरियार दक्षिण के महापुरुष हैं । वे हिंदु थे - उनके समर्थक आज भी हिंदु हैं । उन्हें हिंदू नास्तिक कह सकते हैं । जैसे ब्राह्मण कम्युनिस्ट - ब्राह्मण पहले होते हैं , कम्युनिस्ट बाद में । पेरियार भगवान को नहीं मानते थे ,वे उच्चवर्णीय हिंदु देवी - देवताओं को चप्पल - जूते से पीटते हुए जूलूस निकालते थे । यह अलग बात है कि उन्होंने दलितों के आंदोलन को appropriate करते हुए ,एक स्वस्थ बहस को नकरात्मक वृत्ति में परिवर्तित कर दिया । दक्षिण में वैसे भी विष्णु,राम , कृष्ण , इंद्र , ब्रह्मा की कोई पहचान नहीं थी । इन देवताओं को नकारात्मक रुप में प्रचारित कर स्थापित करने का श्रेय पेरियार को जाता है । दक्षिण वाले मुरूगन उर्फ कार्तिक को जानते थे और शिव - पार्वती की पूजा करते थे । शिव , पार्वती और कार्तिक भी North Indian हैं । उनका विरोध तो South वाले नहीं करते ?! लिंगायत समुदाय खुद शिवलिंग की पूजा करता है । लिंगायत,लिंग से ही बना है । फिर राम ,कृष्ण , इंद्र , विष्णु, ब्रह्मा के नाम पर उतर भारत और हिंदी के खिलाफ आंदोलन का क्या औचित्य?!
➡️ जहां तक भाषा की बात है, शिवजी बनारस के हैं , भोजपुरी उनसे ज्यादा बेहतर कौन जानता होगा, कैलास पर्वत जाकर उन्होंने भले ही नेपाली या चाइनीज सीख लिया हो , लेकिन Original भोजपुरी भाषी थे। उनका विरोध तो दक्षिण वाले नहीं करते?! न पेरियार ने किया है !
➡️ सवाल यह भी है कि दक्षिण से शिव - पार्वती और मूरूगन का धार्मिक आस्तित्व डिलीट कर दिया जाए तो दक्षिण में धर्म के नाम पर क्या बचेगा?
तथ्य है कि तमिलनाडु उर्फ द्रविड़ भी उतने ही धार्मिक है जितना यूपी और बिहार वाले। आज भी सबसे ज्यादा मंदिर तमिलनाडु में है और सबसे कम मंदिर यूपी और बिहार में । क्योंकि यूपी और बिहार में मंदिर का कल्चर रहा ही नहीं । उतर भारत मे जितने भी मंदिर है सब ग्यारहवीं - बारहवीं सदी के बाद के हैं । तथ्य है कि उतर भारत मे मंदिर बना , लेकिन मुसलमानों के आने के बाद । मुसलमानों के आने के बाद राजपूत सत्ता में आए और उन्होंने मंदिर बनवाया।
➡️ उसके पहले पूरा उतर भारत अवर्ण प्रदेश था , अवर्णों और आज के दलितों का शासन था । हारने के बाद उन्हें , राजनीतिक,समाजिक और सांस्कृतिक रुप से अछूत बना दिया गया।
🍁जब बात है वर्ण और अवर्ण का तो पेरियार के आंदोलन के बाद अवर्णों उर्फ दलितों की स्थिति तमिलनाडु में क्या है ,इस पर विचार होना चाहिए :-
➡️ तमिलनाडु के 38 में से 37 जिलें एस सी / एस टी एट्रोसिटीज के लिए संवेदनशील घोषित हैं।
➡️ करीब 2000 मामले एस सी / एस टी एट्रोसिटिज के हर साल दर्ज होते हैं । चार्जशीट रेट 85 % है , Conviction rate मात्र 12 % ,जबकि नेशनल Conviction rate 33 % है ,यूपी का Conviction रेट 67 % है ।
🍁सवाल है कि पेरियार को मानने वाला प्रदेश में दलितों/ आदिवासियों पर अत्याचार क्यों होते हैं , कौन करता है ?
AIDMK और DMK दोनो पेरियार के द्रविड़ आंदोलन की पैदाईश हैं, दोनों राजनीतिक रुप से नास्तिक हैं , राम ,कृष्ण जैसे पौराणिक देवी - देवताओं में आस्था नहीं रखते, ब्राह्मण विरोधी हैं ।
लेकिन यह राज्य दलितों के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाता है । अंग्रेजों द्वारा दलितों के दिये पंचम लैंड को जबरी कब्जा कर रखा है ।
फिर नास्तिक, वैदिक और पौराणिक देवताओं का विरोध का क्या मतलब ? जब उस आसमानता वाली व्यवस्था को ही मानना है जिसे वर्णवादी संस्कार और धर्म कहते हैं ?
इसलिए मेरा मानना है कि दलितों के लिए द्विज कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट की तरह पेरियार और वादी भी उसी तरह अनुपयोगी हैं जैसे दलितों का नास्तिक बन जाने के दुराग्रह के साथ नवबौद्ध।
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ब्राह्मण जब से पढ़ाई - लिखाई शुरु हुई ,तब से पढ़ रहा है । यह भी कहते हैं रहे कि हमारे अलावा जो पढ़ेगा,वह पापी है ,उसे नरक भोगना होगा ।
मतलब जब से सृष्टि बनी तब से ब्राह्मण पढ़ रहा है ,फिर भी ब्राह्मणों के यहां न न्यूटन पैदा हुए ,न रदरफोर्ड और न ही राइट ब्रदर , क्योंकि वह धरती को छोड़ स्वर्ग की खोज में हर युग में भटकते रहे । अगर उनकी पढ़ाई की साल की गणना करें तो चार युग में कितने साल होते हैं ,खुद निकाल लिजिए।
जो लाखों करोड़ों वर्षों से पढ़ रहा है वह दलितों को चुनौती देता है कि पढ़ाई में हमसे मुकाबला करो । वह भी हमारे भेदभाव की नीति का सामना करते हुए !
दलित तो मात्र सत्तर साल से पढ़ रहा है , ज्यादा से ज्यादा मैकाले की शिक्षा नीति के बाद , करीब 150 साल पहले से ।
यह लेबल प्लेयिंग नहीं है , हमें भी लाखों और करोड़ो बर्ष पढ़ने दो । अपने सौ - दौ धार्मिक पुराण और महाग्रंथ लिख लेने दो । हमारे भगवान और स्वर्ग बना लेने दो ।उसके बाद मुकाबले की बात करेंगे ।
70 साल और चार युग की कोई तुलना है ?
तब तक आरक्षण तो रहेगा । बिना राजकीय सरंक्षण के तुम भी कहां ब्राह्मण और पुरोहित रह पाते ? इतने युगों तक ?
पढ़ने और पढ़ाने की बात ही अलग है ।
आरक्षण को लेकर इतना सेंटी होने की जरुरत नहीं है । मेरिट रुपी रोग का यहीं दवाई है फिलहाल 🌹
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वर्णवादी नौकरी पर बात नहीं करते ! नौकरी पक्की होनी चाहिए , सरकारी होना चाहिए , कांट्रैक्ट पर नहीं होना चाहिए , स्वास्थ्य बीमा होना चाहिए , अच्छे स्कूल, अच्छी पढ़ाई,बिना शुल्क, सर्वसुलभ पढ़ाई होना चाहिए , कोचिंग और प्राइवेट स्कूल नहीं होना चाहिए । सारे ग्रेजुएट को सरकारी नौकरी होना चाहिए । इन पर इनका कोई ज्ञान नहीं ,लेकिन दलितों का आरक्षण नहीं होना चाहिए ,इसपर इनका जुबान लंबी हो जाती है , ठीक उस गिरगिट की तरह जो शिकार जीभ से करता है और हमला होने की आशंका पर रंग बदल लेता है ।
अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता।
मनुना मानवेंद्र या पुरी निर्मिता स्वयम् ।।६।।
बालकांड ,पंचम सर्ग श्लोक 6 ,वाल्मिकी रामायण ।
अर्थ है - कोशल एक जनपद है ,उसमे अयोध्या नाम की नगरी है ,जो समस्त लोकों में विख्यात है । इस पुरी को स्वयं महराज मनु ने बनाया और बसाया है ।
- वाल्मिकी रामायण
मनु का अस्तित्व को नकारने वाले के लिये यह तथ्य देखना चाहिए । हालांकि किस सन - सताब्दी में बनवाया था , यह आपको खुद अनुमान लगाना पड़ेगा ।
@Profdilipmandal 1942 में एडल्ट फ्रेंचाइजी थी ,आप अभी भी लोगों को मूर्ख बना रहे हैं और पब्लिक को चुतिया समझते हैं । 1942 में सेपरेट इलेक्टरॉल था और मुसलमान केवल मुसलमान को ही वोट कर सकता था । वह हिंदू कंस्टीचुएंशी में वोट डाल ही नहीं सकता था । सवाल आप उल्टा करके जवाब उल्टा प्रोड्यूस करते हैं !