बिहार के मधुबनी में जब #कबीरमार्गियों का सम्मेलन किया, तो हमें पता है, एक-एक ₹ जमा करने में कितनी मशक्कत करनी पड़ी। संकटकाल के लिए सहेजे मुड़े-टुडे नोट जमा हुए। भोजन के लिए घरों से आटा-दाल-चावल-भाजी एकत्र की गई। गांव की महिलाओं, पुरुषों ने मिलकर दोनों वक्त का भोजन बनाया। कोई कैटरिंग सर्विस नहीं।
यकीन नही है तो फेसबुक पर मेरे मित्र कबीरमार्गी #सन्त_मनमोहन_साहेब भी मौजूद हैं, उनसे दरयाफ्त कर सकते हैं। जहां तक मुझे जानकारी है, आयोजन के लिए मनमोहन जी ने काफी कर्ज भी लिया। जिसे कई साल तक चुकाते रहे
इस सम्मेलन में हर आस्था समाज के लोग मौजूद थे। आदरणीय अशोक सिंघल जी, राज्यपाल रहे आरिफ मोहम्मद खान, पटना साहिब के प्रमुख जत्थेदार इकबाल सिंह साहब..रामानन्दी संप्रदाय के संत।
एक बात और हुई। स्वयं जाकर भारत में इस्लाम के प्रतिष्ठित नाम #मौलाना_वहीदुद्दीन_साहब को न्योता दिया। मौलाना साहब दिल्ली के निजामुद्दीन दरगाह के करीब रहते थे। दो-चार साल हुए इंतकाल हुए।
लेकिन मौलाना साहब इस बात पर अड़ गए, मंच से हम केवल कुरान की बात करेंगे। मेरा अनुरोध था, समागम #कबीरमार्गियों का है तो सन्त कबीर पर कुछ पंक्तियां जरूर हो। लेकिन मौलाना साहब नहीं माने, जाहिर है इस्लाम में कबीर साहब के लिए तनिक गुंजाइश नहीं है, सो कबीर साहब खारिज हो गए। तो यह #हिन्दू_मुस्लिम_भाईचारे का फलसफा कम से कम मुझे ना सिखाएं।
इसका दूसरा पहलू भी है, जब हम लोकसमाज का समागम करते हैं, लोकसमाज के साथ मिलकर, तो अंजुरी में #धन नहीं होता। ना कोई #प्रायोजक मिलता है।
कबीरमार्गियों के सम्मेलन से मुझे एक दृष्टि मिली, जंतर-मंतर, ट्रैक्टर-ट्रॉली अभियान..सोशल मीडिया पर लाखों युवा बटोरना, हजारों लोगों के भोजन का प्रबंध! टेंट-तिरपाल, महंगी गाड़िया..महंगे फोन.. बिना #प्रायोजक संभव ही नहीं।
दिल्ली में जो कुछ भी हो रहा है, इसमें "भारत के लोग" नहीं है। कम से कम मेरे लिए तो अनजान हैं। मेरे लिए अपरिचित हैं।
यदि किसी नेता ने नकल माफियाओं की
100% संपत्ति जब्त करने, नागरिकता खत्म करने और 01 वर्ष में आजीवन कारावास देने के लिए कानून बनाने की मांग किया हो तो नाम बताइए
@PMOIndia@HMOIndia
पेपर लीक कैसे रुकेगा?
शिक्षा मंत्री के इस्तीफा देने से या
नकल माफियाओं की 100% संपत्ति जब्त करने, नागरिकता खत्म करने और 01 वर्ष में आजीवन कारावास/फांसी देने से?
@PMOIndia@narendramodi
लोग देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं। सतह पर देखने से इस पूरे प्रकरण का वास्तविक उद्देश्य स्पष्ट नहीं दिखता, परंतु...
तिलचट्टों जैसी बेचैनी और हड़बड़ाहट ने मुझे भी आश्चर्यचकित कर दिया।
मैं स्वयं भी धर्मेंद्र प्रधान को इस मामले में छूट देने के पक्ष में नहीं था।
उन्होंने कहीं न कहीं विफलता दिखाई है।
उनकी कार्यप्रणाली की कठोर समीक्षा होना स्वाभाविक है।
किन्तु तभी मेरे मन में एक प्रश्न उठा।
इतनी अधीरता क्यों?
बोस्टन क्यों?
जर्मनी क्यों?
और सबसे महत्वपूर्ण—
अभी क्यों?
जून 2026 ही क्यों?
तब मैंने गहराई से पड़ताल आरंभ की।
जो तथ्य सामने आए, उनका प्रश्नपत्र लीक से बहुत कम संबंध था।
उनका संबंध था धन से।
बहुत अधिक धन से।
धर्मेंद्र प्रधान की मेज़ पर तीन महत्वपूर्ण निर्णय लंबित थे।
जिन पर जुलाई–अगस्त 2026 में निर्णय होना प्रस्तावित था।
ऐसे तीन निर्णय, जो भारतीय शिक्षा व्यवस्था की दिशा ही बदल सकते थे।
निर्णय–1
एनसीईआरटी की नई पाठ्यपुस्तकें।
कक्षा 9 से 12 तक।
नए गणित पाठ्यक्रम में शुल्ब सूत्रों को सम्मिलित किया गया है।
एक ऐसा विचार, जिसे कुछ लोग अत्यंत असुविधाजनक मानते हैं।
क्योंकि यह भारतीय बच्चों को यह बताता है कि गणित की परंपरा इस भूमि पर भी विकसित हुई थी।
यूरोप द्वारा उस ज्ञान की कथा पर अपना स्वामित्व स्थापित करने से बहुत पहले।
नया इतिहास पाठ्यक्रम इससे भी एक कदम आगे बढ़ता है।
आर्य आक्रमण सिद्धांत —
बाहर।
सिंधु–सरस्वती सभ्यता —
अंदर।
भारत की अपनी ऐतिहासिक कथा।
पुनः भारत को लौटाई गई।
निर्णय–2
15 मई 2026।
सीबीएसई का परिपत्र जारी हुआ।
कक्षा 9 से तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य।
जिनमें कम-से-कम दो भारतीय भाषाएँ हों।
निर्णय–3
एनटीए के लिए के. राधाकृष्णन समिति के सुधार।
विकेन्द्रित परीक्षाएँ।
प्रौद्योगिकी की दृष्टि से आत्मनिर्भर व्यवस्था।
जहाँ विफलता का कोई एकमात्र बिंदु न हो।
और हेरफेर का भी कोई एकमात्र अवसर न हो।
अब वास्तविक प्रश्न पूछिए।
यदि ये तीनों परिवर्तन लागू हो जाएँ,
तो सबसे अधिक नुकसान किसे होगा?
सबसे पहले शिक्षाजगत के कुछ प्रतिष्ठित संस्थानों को देखिए।
हार्वर्ड।
एसओएएस, लंदन।
कोलंबिया।
शिकागो।
ऐसे अनेक विभाग, जिनकी शैक्षणिक संरचना आर्य प्रवासन (Aryan Migration) की अवधारणा पर आधारित है।
कथित रूप से लगभग 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर के वार्षिक अनुदान दाँव पर हैं।
इसके बाद विदेशी विश्वविद्यालय।
ब्रिटेन।
अमेरिका।
ऑस्ट्रेलिया।
जहाँ भारतीय छात्रों से प्रतिवर्ष लगभग 3.7 अरब अमेरिकी डॉलर की आय होती है।
करीब 18 लाख भारतीय विद्यार्थी।
यदि भारत की शिक्षा व्यवस्था सुदृढ़ होती है,
आत्मविश्वास बढ़ता है,
और बौद्धिक आत्मसम्मान पुनर्स्थापित होता है,
तो विदेश जाने वाले विद्यार्थियों की यह धारा धीरे-धीरे सिमट सकती है।
इसके बाद आता है कोचिंग उद्योग।
पहले चिंता उत्पन्न करो।
फिर आशा बेचो।
और यही क्रम दोहराते रहो।
आज लगभग ₹58,000 करोड़ का उद्योग।
जिसके 2028 तक ₹1,33,995 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है।
यह व्यवस्था सीमित अवसरों पर आधारित है।
और अंग्रेज़ी-प्रधान परीक्षाओं पर भी।
यदि एनटीए विकेन्द्रित हो जाए,
और भारतीय भाषाओं का विस्तार हो,
तो इस पूरे आर्थिक ढाँचे की बुनियाद डगमगाने लगती है।
एलन।
आकाश।
फिटजी।
बायजूज़।
रेज़ोनेंस।
दृष्टि आईएएस।
और इनके अतिरिक्त हजारों छोटे संस्थान।
वैश्विक निवेशकों ने इस पूरे तंत्र में अरबों रुपये का निवेश किया है।
न दान के लिए।
न देशभक्ति के लिए।
केवल प्रतिफल के लिए।
इसके बाद आता है गैर-सरकारी संगठनों (NGO) का तंत्र।
आक्रोश का उद्योग।
अनुदानों का चक्र।
ऐसी वैचारिक कथा, जो तभी तक जीवित रहती है जब तक भारत बौद्धिक रूप से दूसरों पर निर्भर बना रहे।
यदि बच्चों को उनका अपना इतिहास
सही और प्रमाणिक रूप में पढ़ाया जाने लगे,
तो वह स्थापित विमर्श स्वयं ही दम तोड़ने लगेगा।
अनुदान कथाओं का अनुसरण करते हैं।
और कथाएँ बदलती हैं,
तो अनुदान भी उनके साथ चले जाते हैं।
यदि इन सभी पक्षों को एक साथ जोड़कर देखा जाए,
तो एक रूढ़िवादी अनुमान के अनुसार
लगभग ₹3 लाख करोड़ का आर्थिक हित दाँव पर है।
अर्थात् 35 अरब अमेरिकी डॉलर से भी अधिक।
यह केवल विचारों का संघर्ष नहीं,
बल्कि आर्थिक अस्तित्व की लड़ाई है।
कथित रूप से भारत जिस व्यवस्था को बदलने जा रहा था,
वास्तविक संघर्ष उसी के विरुद्ध था।
शायद इसी कारण व्यंग्य और मीम बनाने वाली पूरी मशीनरी अचानक सक्रिय दिखाई दी।
इसी कारण 6 जून को विरोध प्रदर्शनों ने गति पकड़ी।
शैक्षणिक सत्र प्रारंभ होने से पहले।
और सुधारों के अपरिवर्तनीय बनने से पहले।
C2
सोनम वांगचुक के परिवार की डिमांड और कोर्ट के ऑर्डर पर उन्हें AIIMS से मेदांता शिफ्ट किया जा रहा है।
यही है इन वामपंथियों की ख़ूबसूरती -
देश की जनता के लिए इन्हें हर चीज सरकारी चाहिए, और ख़ुद के लिए इन्हें एकदम कॉर्पोरेट हॉस्पिटल चाहिए।
मतलब इन्हें देश के नंबर एक हॉस्पिटल पर भी विश्वास नहीं है- एकदम फ्रॉड लोग है।
IAS-IPS की तरह JEE, NEET, CLAT परीक्षा दो स्टेज में आयोजित करना चाहिए
दो स्टेज में परीक्षा आयोजित करने पर पेपर लीक की संभावना बहुत कम होती है
@PMOIndia@narendramodi
इंदिरा गांधी ने पोखरण में परमाणु बम का परीक्षण कर वैश्विक ताकत में भारत की दावेदारी दर्ज कराई।
उधर, लोकनायक जयप्रकाश के नेतृत्व में सत्ता पलटने का आंदोलन शुरू हो गया। नाम दिया गया #संपूर्ण_क्रांति..! क्रांति का अर्थ ही है तख्ता पलट।
आज मुद्दा @FCRA है। कथित बौद्धिकों के अस्तित्व का सवाल! बुनियाद नहीं, शिखर खतरे में हैं।
प्रधानमंत्री निवास के प्रवेश द्वार पर राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और 100 से ज्यादा सांसदों का धरने प्रदर्शन पर बैठ जाना, यह भारत में बेहद खतरनाक ट्रेंड की शुरुआत है। यह मामला सिर्फ राजनीति से नहीं जुड़ा, बल्कि देश में अराजकता पैदा करने की साजिश का हिस्सा लगता है यह।
मत भूलिए कि बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल सहित कई देशों में इस तरह प्रदर्शन की शुरुआत करके नेताओं के घरों पर हमले और आगजनी हुई है। कांग्रेस की मंशा क्या है ?
घायल हुए आंदोलनकारियों से अस्पताल जा कर सब दलों के नेता मिल आए हैं --- ये अच्छा कदम है ----लेकिन अब घायल हुए पुलिसकर्मियों की भी कुछ सुध ली लेनी चाहिए ----वे भी इस देश की संतानें हैं ----
प्रदर्शन करने वाले युवा एक बात दिमाग में बैठा लें। कल यदि उच्च शिक्षा या बेहतर चाकरी के लिए विदेश जाना चाहेंगे, संभव है #वीजा ना मिले।
क्योंकि हर देश का अधिकार है, किसको वीजा दे या नहीं! और इस मामले में मानवाधिकार या ऐसी कोई दलील नहीं चलती। वीजा मिलता है, आपके बारे में दिए गए इंटेलिजेंस की रिपोर्ट से।
आज हर देश, खासकर #पश्चिमी_देश वीजा, वर्क परमिट को लेकर लगातार सख्त होते जा रहे हैं। हाल ही सऊदी अरब जैसे इस्लामिक मुल्क ने भी वर्क परमिट पर अपने नियमों को बेहद कड़ा कर दिया है। हर मुल्क #गन्दगी बाहर फेंक रहा है।
यह समय हरेक देश के लिए #राष्ट्र_प्रथम का है। यहां आरक्षण, अपंग, मानवता, नकल, गरीबी, न्यूनतम समर्थन मूल्य सरीखे मुद्दों का कोई मोल नहीं।
#राष्ट्र_प्रथम के साथ स्वयं को #प्रथम पर रखकर निर्णय करें।
जो तुम्हारी कथा दोहराए वो स्वतंत्र…जो ज़मीन का सच दिखाए, वो “गोदी”
आंदोलन तब तक ही जनांदोलन रहता है, जब तक वह असहमति और स्वतंत्र पत्रकारिता…दोनों का सम्मान करता है। जिस दिन कैमरे से डर लगने लगे, उस दिन आत्ममंथन आंदोलन को करना चाहिए, पत्रकार को नहीं….
आज मेरी सहयोगी के साथ जो हुआ, वह केवल एक पत्रकार के साथ अभद्रता नहीं है वह उस लोकतांत्रिक संस्कृति पर हमला है जिसमें पत्रकार का काम घटनास्थल से सच दिखाना होता है न कि किसी पहले से निर्धारित पटकथा का हिस्सा बनना।
आज अब तक प्रदर्शन में कुल मिलाकर 50 पुलिस वाले घायल हुए है।
ये भी किसी Gen Z के पिता , माता , भाई, बहन ही रहे होंगे।
परंतु ये बेचारे विक्टिम कार्ड नहीं खेल पायेंगे तो इन पर राजनीति नहीं होगी।
उधर से अब्दुल गैंग पत्थरबाजी कर गया है इन कोकरोचो की आड़ में।
राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से कहा है कि वरिष्ठ अधिकारियों की एक नई SIT बनायें , जिसमें पिछली SIT के अधिकारी भी शामिल किए जाएं--- कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई मामले का राजनीतिकरण न करे ---यह साधारण आर्थिक अपराध का मामला है , जांच एजेंसियां अपना काम करें ------
Some advance toward greatness, others return to it. We Indians do both.
Congratulations, @PawanKChandana and the entire @SkyrootA team on the great success of Vikram-1, making India only the third country in the world after USA and China with private orbital launch capability.
सामने जवान बेटे की निर्जीव देह पड़ी थी… और एक अंग्रेज अफसर ने ठंडी आवाज़ में कहा— “बस एक बार कह दे कि ये तेरा बेटा है… फिर इसे अग्नि देने की इजाजत मिल जाएगी।” उस एक वाक्य ने जैसे एक बाप के सीने को चीर दिया, लेकिन जो जवाब आने वाला था… उसने इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया।
यह कहानी है उस पिता की… जिसने अपने दिल को पत्थर बना लिया, लेकिन देश का सिर झुकने नहीं दिया। यह कहानी है मास्टर अमीरचंद की, जिनका नाम आज भी बहुत कम लोग जानते हैं, लेकिन जिनका त्याग किसी भी बड़े बलिदान से कम नहीं था।
8 मई 1915… दिल्ली की जेल… और एक ऐसा दृश्य, जिसे याद कर आज भी रूह कांप जाती है। एक तरफ अंग्रेजों का अत्याचार था… दूसरी तरफ एक पिता का अटूट साहस।
मास्टर अमीरचंद पेशे से एक साधारण अध्यापक थे, लेकिन उनके भीतर आज़ादी की ऐसी ज्वाला जल रही थी जो हर डर को खत्म कर दे। लाला हरदयाल और रासबिहारी बोस जैसे क्रांतिकारी भी उन्हें सम्मान से देखते थे। जब लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनी, तो उस योजना के पीछे उनकी भूमिका भी अहम थी।
अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। लेकिन उनकी निर्दयता यहीं नहीं रुकी… उन्होंने उनके जवान बेटे को भी पकड़ लिया। उस मासूम को इतनी क्रूर यातनाएँ दी गईं कि उसने जेल की अंधेरी कोठरी में ही दम तोड़ दिया। एक पिता के लिए इससे बड़ा दुःख क्या हो सकता है?
अंग्रेजों को लगा कि अब वो टूट जाएंगे। उन्होंने सोचा कि जब एक बाप अपने बेटे की लाश देखेगा… तो वह सब कुछ बता देगा। वे उन्हें उस कोठरी में ले गए जहाँ उनका बेटा निर्जीव पड़ा था… ठंडा… खामोश… और हमेशा के लिए दूर।
उस पल जैसे समय ठहर गया। एक पिता की नजर अपने बेटे के चेहरे पर टिक गई। वही चेहरा… जिसे उसने कभी अपने हाथों से सहलाया था, जिसे उसने अपने कंधों पर बैठाकर दुनिया दिखाई थी। आँखें नम हो उठीं… दिल भीतर ही भीतर चीख पड़ा… लेकिन होंठ अब भी खामोश थे।
अंग्रेज अफसर ने फिर कहा— “बस मान लो कि ये तुम्हारा बेटा है… इसे सम्मान से अंतिम संस्कार दे दो।” वह चाहते थे कि एक पिता की ममता उसकी मजबूती को तोड़ दे।
लेकिन उस दिन… एक पिता नहीं, एक क्रांतिकारी खड़ा था। उन्होंने अपनी आँखों के आँसू अंदर ही रोक लिए… और पत्थर जैसे स्वर में कहा— “यह मेरा बेटा नहीं है… मैं इसे नहीं पहचानता।”
उस एक वाक्य में एक पिता का पूरा दिल टूट गया… लेकिन देश का सिर ऊँचा हो गया। उन्हें पता था कि अगर आज वह भावनाओं में बह गए, तो उनके साथियों की जान खतरे में पड़ जाएगी और आज़ादी की लड़ाई कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए उन्होंने अपने ही बेटे को दुनिया के सामने “लावारिस” बना दिया।
सोचिए… कैसा दिल होगा उस इंसान का? जिसने अपने खून को भी देश के लिए त्याग दिया… जिसने अपने ही जिगर के टुकड़े को पहचानने से इनकार कर दिया… ताकि देश की लड़ाई जिंदा रहे।
8 मई 1915… फांसी का दिन भी आ गया। जब उन्हें फांसी के फंदे की ओर ले जाया जा रहा था, तो उनके चेहरे पर डर नहीं… बल्कि एक अजीब सी शांति थी। जैसे उन्होंने सब कुछ पहले ही त्याग दिया हो।
उन्होंने फंदे को देखा… उसे चूमा… और अंतिम बार कहा— “मैंने अपना सब कुछ भारत माता को दे दिया… अब यह जीवन भी उसी का है।”
और फिर… एक और बलिदान इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। लेकिन समय के साथ हम उस नाम को भूलते चले गए… उस दर्द को भूलते चले गए… उस त्याग को भी, जिसने हमें आज़ादी की सांस दी।
आज सवाल सिर्फ इतना है— जिस बाप ने अपने बेटे के शव को छूने का अधिकार तक छोड़ दिया, ताकि हम आज खुले आसमान में सांस ले सकें… क्या हम उसका नाम भी याद रखते हैं?
अगर यह कहानी पढ़कर आपके दिल में भी हलचल हुई हो… तो इसे यूं ही मत जाने दीजिए। इस महान पिता को एक सलाम जरूर लिखिए, “वंदे मातरम्” जरूर कहिए, और इस कहानी को आगे बढ़ाइए… क्योंकि शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि शब्दों से नहीं, याद रखने से मिलती है।
कक्षा 12 की उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षा में नकल की थी। कुंजी, गाइड सब कुछ था मेरे पास। लेकिन यह नहीं पता था कि देखकर लिखना कहां से कहां तक है?
आखिर में निगरानी कर रहे टीचर का सहयोग लेकर उत्तर लिखे। उस श्रध्देय शिक्षक ने बताया, इस प्रश्न के उत्तर में यहां से यहां तक लिखो! पेन से निशान भी बनाकर दिया। अलबत्ता कॉपी जमा करते समय टीचर ने आशीर्वाद जरूर दिया, बेटा! तेरा भविष्य उज्ज्वल है! नकल विधा से ही हम जैसे लाखों छात्रों का भविष्य उज्ज्वल हो सका।
हकीकत तो यह है, विद्वत जगत में विचरता हर बौद्धिक भीतर से खोखला है। खासकर आभासी पटल पर। जो जितना बुढा गया है, वह उतनी ऊंची फेंक रहा है।
कहना यह है, आज जब #पेपर_लीक और पेपर लीक के बहाने सत्ता को अस्थिर करने का महाभियान चल रहा है तो इसमें #मुसाहिब_बौद्धिकों ने #शिक्षा का सवाल भी खड़ा कर दिया है।
अपनी जो भी पढ़ाई-लिखाई हुई, "इलाहाबाद विश्वविद्यालय" पहुंच कर हुई। शिक्षित होने का एक नया अर्थ मिला। ढाई दशक कथित राष्ट्रीय पत्रकारिता में भी रहा। हिंदी, अंग्रेजी दोनों में। फिर भी शिक्षित कभी नहीं हो पाया। आज भी नहीं हूं।
मेरा अपना अनुभव कहता है, परीक्षा को खुला छोड़ दो। किताब, कुंजी, गाइड, सब कुछ लेकर छात्र परीक्षा में बैठें। संभव है मेरी बात आपको सिरफिरी या बेतुकी लगे।
यह दायित्व परीक्षकों का है कि #प्रश्नपत्र ऐसा बनाएं, जिनके उत्तर वही छात्र पुस्तकों से खोज सकें, जिन्होंने पुस्तकों को ठीक से पढ़ा हो! जिन्हें पता हो, यह प्रश्न वहां से पूछा गया।
बस दो काम कीजिए..
■ एक-दो नहीं सैकड़ों किस्म के प्रश्नपत्र सेट बनें।
■ दूसरे परीक्षा की समयावधि इतना कम रखें कि छात्र या तो उत्तर लिख ले या उत्तर खोज ले।
आखिर कब तक शिक्षा और परीक्षा को #बांधते रहेंगे? एक बार परीक्षा और छात्र को #बंधनमुक्त करके देख लीजिए।
अरे भाई! शिक्षा क्या, व्यवस्था का हर अंग सड़ चुका है। #पैबंद लगाकर कब तक काम चलाओगे?
क्यों @Wangchuk66 जी, सही कहा या गलत?
@narendramodi@dpradhanbjp