सरकारी बिजली निगमों में टेक्निकल और मंत्रालयिक संवर्ग के साथ ही इंजीनियरिंग संवर्ग की भर्ती प्रक्रिया सुस्त।
भर्ती प्रक्रिया को तेज करने के लिए सभी योग्य साथी इस ट्वीट की ज्यादा से ज्यादा retweet और @shyamraj08 को ज्यादा से ज्यादा फॉलो करे।
#बिजली_निगमों_में_भर्ती_करो
प्रशासन के साथ हर संभव सहयोग के पश्चात भी जयपुर मेट्रो के कर्मचारियों के लिए 10 वर्ष से अधिक समय तक पद्दोन्नति नियम नहीं बनने के बाद तथा OPS अन्य सरकारी करमचारियो की भाति लागू करने के लिये आज अंततः विरोध के साथ धरना देने को मजबूर हो गए हैं। @RajCMO@ashokgehlot51@JaipurMetro
पत्नी के अंतिम संस्कार व तेरहवीं के बाद रिटायर्ड पोस्टमैन मनोहर गाँव छोड़कर मुम्बई में अपने पुत्र सुनील के बड़े से मकान में आये हुए हैं।
सुनील बहुत मनुहार के बाद यहाँ ला पाया है यद्यपि वह पहले भी कई बार प्रयास कर चुका था किंतु मां ही बाबूजी को यह कह कर रोक देती थी कि 'कहाँ वहाँ बेटे बहू की ज़िंदगी में दखल देने चलेंगे यहीं ठीक है
सारी जिंदगी यहीं गुजरी है और जो थोड़ी सी बची है उसे भी यहीं रह कर काट लेंगे ठीक है न'
बस बाबूजी की इच्छा मर जाती पर इस बार कोई साक्षात अवरोध नहीं था और पत्नी की स्मृतियों में बेटे के स्नेह से अधिक ताकत नहीं थी , इसलिए मनोहर बम्बई आ ही गए हैं
सुनील एक बड़ी कंस्ट्रक्शन कम्पनी में इंजीनियर है उसने आलीशान घर व गाड़ी ले रखी है
घर में घुसते ही मनोहर ठिठक कर रुक गए गुदगुदी मैट पर पैर रखे ही नहीं जा रहे हैं उनके दरवाजे पर उन्हें रुका देख कर सुनील बोला - "आइये बाबूजी, अंदर आइये"
"बेटा, मेरे गन्दे पैरों से यह कालीन गन्दी तो नहीं हो जाएगी"
- "बाबूजी, आप उसकी चिंता न करें। आइये यहाँ सोफे पर बैठ जाइए।"
सहमें हुए कदमों में चलते हुए मनोहर जैसे ही सोफे पर बैठे तो उनकी चीख निकल गयी - अरे रे! मर गया रे!
उनके बैठते ही नरम औऱ गुदगुदा सोफा की गद्दी अन्दर तक धँस गयी थी। इससे मनोहर चिहुँक कर चीख पड़े थे।
चाय पीने के बाद सुनील ने मनोहर से कहा - "बाबूजी, आइये आपको घर दिखा दूँ अपना।"
- "जरूर बेटा, चलो।"
- "बाबू जी, यह है लॉबी जहाँ हम लोग चाय पी रहे थे। यहाँ पर कोई भी अतिथि आता है तो चाय नाश्ता और गपशप होती है। यह डाइनिंग हाल है। यहाँ पर हम लोग खाना खाते हैं। बाबूजी, यह रसोई है और इसी से जुड़ा हुआ यह भण्डार घर है। यहाँ रसोई से सम्बंधित सामग्री रखी जाती हैं। यह बच्चों का कमरा है।"
- "तो बच्चे क्या अपने माँ बाप के साथ नहीं रहते?"
- बाबूजी, यह शहर है और शहरों में मुंबई है। यहाँ बच्चे को जन्म से ही अकेले सोने की आदत डालनी पड़ती है। माँ तो बस समय समय पर उसे दूध पिला देती है और उसके शेष कार्य आया आकर कर जाती है।"
थोड़ा ठहर कर सुनील ने आगे कहा,"बाबूजी यह आपकी बहू और मेरे सोने का कमरा है और इस कोने में यह गेस्ट रूम है। कोई अतिथि आ जाए तो यहीं ठहरता है। यह छोटा सा कमरा पालतू जानवरों के लिए है। कभी कोई कुत्ता आदि पाला गया तो उसके लिए व्यवस्था कर रखी है।"
सीढियां चढ़ कर ऊपर पहुँचे सुनील ने लम्बी चौड़ी छत के एक कोने में बने एक टीन की छत वाले कमरे को खोल कर दिखाते हुए कहा - "बाबूजी यह है घर का कबाड़खाना। घर की सब टूटी फूटी और बेकार वस्तुएं यहीं पर एकत्र कर दी जाती हैं। और दीवाली- होली पर इसकी सफाई कर दी जाती है। ऊपर ही एक बाथरूम और टॉइलट भी बना हुआ है।"
मनोहर ने देखा कि इसी कबाड़ख़ाने के अंदर एक फोल्डिंग चारपाई पर बिस्तर लगा हुआ है और उसी पर उनका झोला रखा हुआ है। मनोहर ने पलट कर सुनील की तरफ देखा किन्तु वह उन्हें वहां अकेला छोड़ सरपट नीचे जा चुका था।
मनोहर उस चारपाई पर बैठकर सोचने लगे कि 'कैसा यह घर है जहाँ पाले जाने वाले जानवरों के लिए अलग कमरे का विधान कर लिया जाता है किंतु बूढ़े माँ बाप के लिए नहीं। इनके लिए तो कबाड़ का कमरा ही उचित आवास मान लिया गया है। नहीं.. अभी मैं कबाड़ नहीं हुआ हूँ। सुनील की माँ की सोच बिल्कुल सही था। मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था।'
अगली सुबह जब सुनील मनोहर के लिए चाय लेकर ऊपर गया तो कक्ष को खाली पाया। बाबू जी का झोला भी नहीं था वहाँ। उसने टॉयलेट व बाथरूम भी देख लिये किन्तु बाबूजी वहाँ भी नहीं थे वह झट से उतर कर नीचे आया तो पाया कि मेन गेट खुला हुआ है उधर मनोहर टिकट लेकर गाँव वापसी के लिए सबेरे वाली गाड़ी में बैठ चुके थे उन्होंने कुर्ते की जेब में हाथ डाल कर देखा कि उनके 'अपने घर' की चाभी मौजूद थी उन्होंने उसे कस कर मुट्ठी में पकड़ लिया चलती हुई गाड़ी में उनके चेहरे को छू रही हवा उनके इस निर्णय को और मजबूत बना रही थी और घर पहुँच कर चैन की सांस ली
दोस्तों,जीवन मे अपने बुजुर्ग माता पिता का उसी प्रकार ध्यान रखे जिस प्रकार माता पिता बचपन मे आपका ध्यान रखते थे,क्योकि एक उम्र के बाद बचपन फिर से लौट आता है इसलिए उस पड़ाव पर व्यस्त जिंदगी में से समय निकाल कर उन्हें भी थोड़ा समय दीजिये,अच्छा लगेगा।
आज जयपुर में #बिजली कर्मचारियों की इंटर डिस्कॉम स्थानांतरण की मांग करने को लेकर किये गए प्रदर्शन में राजस्थान बिजली वर्कर्स फैडरेशन (एटक) के प्रदेश अध्यक्ष बनवारी लाल सांथा का जोरदार हल्लाबोल।
इच्छुक कर्मचारियों के लिए सरकार इंटर डिस्कॉम हेतु नीति बनाये। @RajCMO@AmarjeetAITUC
ये तस्वीरें भले ही देखने में आपको फ़िल्मी लगे परंतु ये फ़िल्मी नही है। ये तस्वीरें हमारे देश के अंडमान एवं निकोबार दीप समूह में रहने वाली #जारवा जनजाति की है।
50 हजार साल पहले अफ्रीका से भारत आई इस जनजाति में अब करीब 400 लोग ही बचे हैं और वे अभी भी लगभग उसी तरीके से रहते हैं जैसे हजारों साल पहले आदिमानव रहते थे। जारवाओं की आदिम संस्कृति को संरक्षण देने के उद्देश्य से उन्हें राज्य में विशेष दर्जा मिला हुआ है एवं पुलिस को उनके मामलों में दखल देने की इजाजत नहीं है। कच्चा माँस खाने वाले एवं बिना वस्त्र के रहने वाले इस जनजाति के लोग बहुत ही क्रूर एवं हिंसक है एवं वर्तमान आधुनिकता से कोशों दूर है।
मेरा माननीय मुख्यमंत्री @ashokgehlot51 जी से आग्रह है की विद्युत विभाग में कार्यरत कर्मचारियों व अधिकारियों की इंटर डिस्कॉम में स्थानांतरण की नीति जल्द से जल्द बनाई जाये , जिससे बिजली कर्मचारियों को राहत प्रदान हो।
#Jaipur: बिजली कर्मियों के इंटर डिस्कॉम स्थानान्तरण का मामला
पिछले 8 दिनों से जारी है बिजली कर्मियों का अनिश्चितकालीन धरना, संघर्ष समिति ने आज की मंत्री रमेश मीना से मुलाकात, पंचायतीराज मंत्री मीना को बताई बिजली कर्मियों की पीड़ा...
@rameshmeena63@RajGovOfficial@TonkZiya