चलिए इस चर्चा को और थोड़ा आगे बढ़ाते हैं!
राम मंदिर निर्मा�� का रास्ता तब साफ हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने भगवान रामलला विराजमान के पक्ष में फैसला सुनाया। लेकिन क्या आपको पता है कि 1989 से पहले हिंदू पक्षकारों में से किसी ने भी विवादित जमीन पर दावा नहीं किया था।
गोपाल सिंह विशारद ने राम जन्मभूमि पर पूजा की अनुमति मांगी। निर्मोही अखाड़ा ने मंदिर प्रबंधन अपने हाथ में सौंपने की मांग की थी। तात्कालीन गृहमंत्री और कांग्रेस नेता बूटा सिंह ने अपनी कानूनी समझ का इस्तेमाल करते हुए विश्व हिंदू परिषद (VHP) को बहुत महत्वपूर्ण सुझाव दिया।
जब राम मंदिर आंदोलन जोर पकड़ने लगा और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विवादित परिसर का ताला खुलवा दिया तब तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता शीला दीक्षित के जरिए विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल को संदेश भेजा। सरदार बूटा सिंह ने दीक्षित के जरिए सिंघल को बताया कि हिंदू पक्ष की ओर से दाखिल किसी मुकदमे में जमीन का मालिकाना हक नहीं मांगा गया है और ऐसे में उनका मुकदमा हारना तय है। उसके बाद रामलला को पक्षकार बनाया गया था। @chitraaum @VinodAgnihotri7
https://t.co/yldF4eXk8o
चलिए इस चर्चा को और थोड़ा आगे बढ़ाते हैं!
राम मंदिर निर्माण का रास्ता तब साफ हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने भगवान रामलला विराजमान के पक्ष में फैसला सुनाया। लेकिन क्या आपको पता है कि 1989 से पहले हिंदू पक्षकारों में से किसी ने भी विवादित जमीन पर दावा नहीं किया था।
गोपाल सिंह विशारद ने राम जन्मभूमि पर पूजा की अनुमति मांगी। निर्मोही अखाड़ा ने मंदिर प्रबंधन अपने हाथ में सौंपने की मांग की थी। तात्कालीन गृहमंत्री और कांग्रेस नेता बूटा सिंह ने अपनी कानूनी समझ का इस्तेमाल करते हुए विश्व हिंदू परिषद (VHP) को बहुत महत्वपूर्ण सुझाव दिया।
जब राम मंदिर आंदोलन जोर पकड़ने लगा और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विवादित परिसर का ताला खुलवा दिया तब तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता शीला दीक्षित के जरिए विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल को संदेश भेजा। सरदार बूटा सिंह ने दीक्षित के जरिए सिंघल को बताया कि हिंदू पक्ष की ओर से दाखिल किसी मुकदमे में जमीन का मालिकाना हक नहीं मांगा गया है और ऐ��े में उनका मुकदमा हारना तय है। उसके बाद रामलला को पक्षकार बनाया गया था। @chitraaum @VinodAgnihotri7
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एक और पेपर लीक।
एक और परीक्षा रद्द।
इस बार महाराष्ट्र का TET।
देश की शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को वसूली क��� सिस्टम बना दिया गया है, जिससे देश का हर युवा असुरक्षित है।
यह सिर्फ पेपर लीक नहीं,
यह युवाओं के भविष्य की चोरी है।
भरत तिवारी मुठभेड़ के सोशल मीडिया में वायरल वीडियो देखे हैं।अगर वो सच हैं तो लोकतंत्र प�� कलंक है जब आत्मसमर्पण के बाद किसी को गोली मारी गई।इस पर बिहार की राजनीति गर्म है।ऐसी प्रतिक्रिया पहले फ़र्ज़ी मुठभेड़ों पर होती तो भरत की मौत नहीं होती।ये मुठभेड़ों के गौरवगान का नतीजा है।
सत्ता के अहंकार मे�� डूबी मोदी सरकार अब इस मुकाम पर पहुँच गई है कि अपने अधिकारों, निष्पक्ष परीक्षाओं और सुरक्षित भविष्य की मांग करने वाले छात्रों को ही शिक्षा मंत्री “आतंकवादी” कह रहे हैं।
ज़रा सोचिए - जिसकी नाकामी से इतने पेपर लीक हुए, जिसके राज में 20 बच्चों ने जान दे दी, जिस��े करोड़ों युवाओं का भविष्य अंधेरे में धकेल दिया - वो आज पीड़ित बच्चों और उनकी आवाज़ उठाने वालों को “दहशतगर्द” बता रहा है।
पर यह कोई नई बात नहीं: अन्नदाता किसानों को "आंदोलनजीवी और परजीवी" कहा। सवाल पूछने वाले को “Anti-National” कहा। और अब युवाओं को “दहशतगर्द।”
जो भी सरकार से सवाल पूछे - उसे देशद्रोही बता दो, यही इनकी पूरी राजनीति है।
धर्मेंद्र प्रधान जी, देश के करोड़ों युवाओं से तुरंत माफ़ी माँगि�� और अपनी नाकामियों के लिए इस्तीफ़ा दीजिए।
और रही मेरी बात - आप मुझ पर जितने चाहें हमले कर लीजिए। मैंने कोटा में कहा था, और फिर कहता हूँ: यह शिक्षा व्यवस्था आज सिर्फ़ एक वसूली तंत्र बन गई है। मैं इसे ऐसे ही नहीं रहने दूँगा।
हर बच्चे को सस्ती, अच्छी शिक्षा और निष्पक्ष परीक्षा मिले - इस आवाज़ को उठाना मैं कभी बंद नहीं करूँगा।
#ChhatronKiGoonj
#ChhatraJodo
प्रेस वार्ता में रौशन आनंद सर ने अपने भाई की मृत्य�� की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग करते हुए मामले को CBI को सौंपने क�� अपील की।
साथ ही उन्होंने यह भी मांग रखी कि सत्य को पूरी तरह सामने लाने के लिए उनके भाई का पुनः पोस्टमॉर्टम कराया जाए।
देश के हर युवा से मेरी एक बात - आज इस देश में मेहनत का फल नहीं, सपने देखने की सज़ा मिलती है।
हर पेपर लीक, हर रद्द परीक्षा, हर अधूरी भर्ती - सिर्फ़ सिस्टम की विफलता नहीं, लाखों सपनों पर प्रहार है।
मैं जानता हूँ आप थक चुके हैं। ग़ुस्से में हैं। पर याद रखिए - जब सरकार सुनने को तैयार न हो, तब आवाज़ ऊँची करनी पड़ती है।
इसलिए मैं आप सबको बुला रहा हूँ - 17 जून, कोटा। छात्रों की गूंज।
आइए, मिलकर एक ऐसी हुंकार बनें जिसे अनसुना करना नामुमकिन हो। कोटा से शुरुआत - फिर देश के हर कोने तक।
ये आपके भविष्य की लड़ाई है। और मैं आपके साथ हूँ।
🗓️ 17 जून | छात्रों की गूंज | कोटा महारैली
#ChhatronKiGoonj
Compromised PM के राज में एक भारतीय होने का मतलब दुर्गति है।
विदेशी ताकत हमारे नागरिकों को मारती है। हमारी सरकार एक आज्ञाकारी नौकर की तरह चुप-चाप आदेश मान लेती है - और हमारे नागरिक सड़ने के लिए छोड़ दिए जाते हैं।
इस भारतीय को घर लाइए। अभी।
अमेरिकी हमलों में तीन भारतीय नाविकों की हत्या के चंद दिन बाद - न अफ़सोस, न माफ़ी। उल्टा, अमेरिका ने आदेश देना जारी रखा है।
उनके शब्द पढ़िए: “अमेरिकी सेना के आदेश तुरंत मानें।” कोई उल्लंघन “बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
एक आज़ाद देश इस तरह की भाषा कभी नहीं सहेगा। लेक���न हमारे Compromised PM? चुप। एक आज्ञाकारी नौकर की तरह सुनते हैं, और आदेश मान लेते हैं।
Compromised PM देश के सम्मान की रक्षा नहीं करेगा - क्योंकि जो देश का अपमान करते हैं, वो उन्हीं के वश में हैं।
History has been written today.
On 10 June 2026, Hon'ble Prime Minister Narendra Modi ji completes 4,399 consecutive days in office, surpassing the 4,398 days of India's first Prime Minister, Pandit Jawaharlal Nehru ji, to become the longest continuously serving elected Prime Minister in the history of our Republic.
Pause for a moment and reflect on what this truly means.
India is not a nation in the ordinary sense. It is a civilisation of 1.4 billion souls. A land of 22 scheduled languages and hundreds of dialects; of many faiths, castes, communities and creeds; of countless regions and walks of life, living side by side. We are the world's largest democracy, with an electorate of nearly 98 crore, more than the people living in all of Europe. This makes ours perhaps the most complex electoral exercise across the globe.
And yet, out of these 1.4 billion people, the same leader has been entrusted with the nation: again, and again, and again. 2014. 2019. 2024. Three successive mandates from the people of India, each one a renewed act of faith.
To win the trust of so vast and diverse a nation even once is remarkable. To win it three times over, without a break, is extraordinary.
Consider, too, how different the two eras are. Pandit Nehru ji earned his mandate in the formative decades of the Republic, an age of one-party dominance in which the Congress towered over a young and fragmented opposition. Narendra Modi ji has earned his in a far more demanding democracy: the age of coalitions, of powerful regional forces and fierce multi-party competition. And he has met that challenge in full: winning absolute majorities in his own right in 2014 and 2019 (the first single-party majorities since 1984), and then forging and leading a victorious coalition in 2024. To command the trust of so fiercely contested a nation, mandate after mandate, is by any measure the harder achievement.
On this historic occasion, I bow to the wisdom of the Indian voter and salute the Hon'ble Prime Minister's tireless devotion to the nation.
May he be blessed with robust health and a long life, and may the people of Bharat grant him many more mandates in the service of our motherland.
@narendramodi
#तथ्य@PMOIndia के तौर पर @narendramodi और #JawaharLalNehru की तुलना बेमानी है। नेहरू जी के सामने न विरोध था, न विपक्षी थे, न जनता की अकांक्षाएं थीं, न विदेशी साजिशें थीं और सबसे बड़ी बात अंग्रेज भी उनके ही पक्ष में थे और मोदी जी के लिए सारी चुनौतियाँ थीं/हैं। मोदी जी की उपलब्धि बहुत बड़ी है।
अगर खान आपको शिक्षक लगता है? अगर अभिनय आपको शिक्षक लगता है, अगर अवध ओझा आपको शिक्षक लगता है तो फिर आपने शिक्षकों से नहीं लंपटों से शिक्षा पाई है.. डिजिटल माध्यम में भी एक से बढ़कर एक अच्छे शिक्षक हैं लेकिन ये तीनों ड्रामेबाज़ हैं .. देश की बदहाल शिक्षा व्यवस्था की उपज … ये माफिया हैं .. इनकी भाषा सुनिए .. ये सब ढोंग करते हैं।
CBSE अध्यक्ष - ट्रांसफ़र।
CBSE सचिव - ट्रांसफ़र।
एक-सदस्यीय “जाँच” समिति - गठित।
और असल ज़िम्मेदार, धर्मेंद्र प्रधान - सुरक्षित।
अधिकारियों को हटा दिया। मंत��री को बचा लिया।
यह जवाबदेही नहीं - यह cover-up है।
हमारी माँग आज भी वही है: शिक्षा मंत्री को बर्ख़ास्त किया जाए और स्वतंत्र न्यायिक जाँच हो - ये मांगें कोई मोदी सरकार की एक महीने पुरानी अंदरूनी फ़ाइल नहीं जो यूं ही भुला दी जाए।
अगर प्रधानमंत्री को 18.5 लाख CBSE छात्रों की परवाह होती - धर्मेंद्र प्रधान जी कब के हटाए जा चुके होते।
लो आ गए भौंकने वाले…!
अभी तक जो या तो मैं बैठे थे या फिर सरकार के बचाव में खड़े थे अब उनको भी क्रेडिट चाहिए। चल भाग यहां से…🤬
अरे मीडिया में बैठे … तुम्हे असल में पत्रकारिता का औचित्य को सार्थक करना है तो शिक्षा मंत्री का रिजाइन मांग।
ये आदमी नालायक है, हटाओ इसे।