इस नौजवान की बात केवल एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं की बेचैनी की आवाज़ है।
केवल "ट्रिलियन इकोनॉमी" के नारे लगाने से देश खुशहाल नहीं हो जाता। असली सवाल यह है कि विकास का लाभ किसे मिल रहा है? जब देश की बड़ी हिस्सेदारी की संपत्ति कुछ ही लोगों के हाथों में सिमट जाए और करोड़ों लोग शिक्षा, रोज़गार और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हों, तब चमकते आँकड़ों के पीछे छिपी सच्चाई को भी देखना होगा।
Pellet guns, lathis and tear gas were used against students peacefully protesting in Delhi.
I met 19-year-old Sahil Lochab. Shot with pellets, he may lose an eye. His “crime”? Demanding an end to paper leaks and a fair future for our students.
@AmitShah ji, I have two questions:
1. Did you approve the use of lethal force, including pellet guns, against students? If not, who did?
2. Were the men in plain clothes beating students with lathis police personnel or volunteers? Who authorised their deployment?
Desh jawab maang raha hai.
गोदी मीडिया चिढ़ता रहे पर जो हो रहा है वो कई सालों से हम जो मेहनत कर रहे हैं उसका परिणाम है। और जो आपके साथ हो रहा है वो आपकी हरकतों का। तमाम स्वतंत्र पत्रकार ऐसे ही स्नेह महसूस करते हैं। कभी कभी कैमरे पर रिपोर्ट करते वक्त रिकॉर्ड हो जाता है ।
यही हम सबकी पूंजी है और ये फ़ीलिंग क्या है ना आप लोग कभी नहीं समझ पाओगे। बस इतना समझ लो, चैन की नींद इसी से आती है।
उन सभी को साधुवाद जो डटे हैं, और पत्रकारिता की साख बचाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं । मेरी टीम जो कैमरे के पीछे रहती है उसका दिल से धन्यवाद। अंकित, आशीष, यश, अरविंद आप लोगों के बिना ये सब कभी मुमकिन नहीं हो पाता। ❤️
व्यंग साहित्य की सबसे ऊंची विधा है।
और हास्य अभिनय सबसे कठिन।
बिना अश्लीलता, बिना मूर्खता, शारीरिक कमी, रंग, धर्म, वस्त्र का मजाक बनाये, और बिना गालियां, नाटकीयता, असभ्यता के अनायास हंसा देना..
बिना विद्रूप, सिर्फ वास्तविक घटनाओं को क्रमबद्ध जोड़कर आम जिंदगी से हास्य निकाल देना, विरोधाभास से मस्ती खोज निकालना ...
सबसे कठिन कला है।
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हिंदुस्तानी हंसी में इसका स्पर्श परसाई के दौर में कुछ लोग कर पाए। सिनेमा में गुलजार ने वह ऊंचाई छुई है। इसका मौजूदा दौर में थोड़ा आभास, आप शेखर सुमन के नए और पुराने प्रोग्रामो के वीडियोज से ले सकते हैं।
जेन जी ने इस आंदोलन को कटुता से दूर- हास्य और मजाक से जो भर दिया, उसकी सफलता का यह सबसे बड़ा राज है।
हंसी की शक्ति से स्टेट की माइटी ब्रूटल फोर्स को भोथरा कर देने की कला, हमने पहले कभी देखी नही। ये लोग आंदोलन को भी सीरियस नही लेते, दमन को भी नही लेते, नेता और उसके कुचक्रों से को सीरियस नही लेते।
हंसी में उड़ा देते हैं।
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हंसा दिया, डर हवा हो गया।
शत्रु में भी वात्सल्य उमड़ आया।
भला इससे बड़ा गाँधीत्व क्या है?? नए दौर के भगतसिंह, बम नही , जोक फेंकते हैं। कोई पुलिस, कानून, आईटी सेल या उनका विश्वव्यापी संगठन-
इनका मुकाबला नही कर सकता।
संघी तो क्या खाक ही करेंगे।
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हंसी की ताकत को समझिए।
यह वीडियो देखिये, ठहाके लगाइये।
और इस पीढ़ी के हास्यबोध पर गर्व कीजिये।
😍😍😍🥰🥰🥰🥰
विपक्ष के नेताओं, खासकर राहुल गांधी, को हास्य का पात्र बनाने के लिए वर्षों तक सैकड़ों करोड़ रुपये की राजनीतिक और प्रचारात्मक ताकत झोंकी गई।
लेकिन समय का चक्र बड़ा दिलचस्प होता है...
कहते हैं, कर्म का हिसाब देर से सही, मगर होता ज़रूर है।
आज हालात ऐसे हैं कि जिन लोगों ने दूसरों का मज़ाक उड़ाकर राजनीति की, वही विश्वगुरु महामानव खुद देशभर में चर्चा और व्यंग्य का विषय बने हुए हैं—और इसके लिए किसी को अलग से एक रुपया भी खर्च नहीं करना पड़ा।
कर्मफल का हिसाब कभी अधूरा नहीं रहता।
रिपोस्ट जरुर करे दोस्तों।
#कर्मफल #राजनीति #लोकतंत्र #RahulGandhi #IndiaPolitics #ViralPost #Trending
#जंतर_मंतर_ब्रेकिंग_न्यूज
देशवासियों सबसे बड़ा मुद्दा और सबसे पहले इस्तीफ़ा तो इनका
नितिन गड़गिरी जी @nitin_gadkari का लेना चाहिए था छात्र आंदोलन के कारण एथेनॉल मुद्दा को भूल गए लेक़िन अब ऐलान हो चुका है 31 जुलाई को वापस जंतर मंतर पर आंदोलन करने का
गाड़ी मार्च गांधी मार्च वाला आंदोलन का तो सबको आना है ज्यादा से ज्यादा
इसका इस्तीफ़ा लेने का कारण पूरी देश की जनता जान लो एथेनॉल पॉलिसी 20% नीति देश की 22 करोड़ गड़ियो को कबाड़ बना दी हैं जो 2023 से पहले की है और उसके बाद कि गाड़िया भी कबाड़ बन रही है पेट्रोल में मिलावटी के कारण
इसलिए जनता की कड़ी मेहनत की गड़ियो को ऐसे ही कबाड़ बनने थोड़ी दिया जाएगा माईलेज कम होता जा रहा है गड़ियो के रबड़ इंजन चौक हो रहे हैं तो इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा।
इसलिए सबसे ज्यादा लोग एक साथ आकर 2023 से पहले की गड़ियो के लिए E 10,E5 का विकल्प चाहे और 2023 के।बाद वाली गड़ियो के लिए पेट्रोल पंप पर हो रही मिलावटी को रोकना चाहिए
पूरी दुनिया का एकलौता आंदोलन जिसमे
लाठीचार्ज को मैडल समझा गया, खुद पुलिस से पूछते रहे की वाटर कैनन और टियर गैस की व्यवस्था नही की क्या ?
बड़ी बड़ी एजेंसियां इस आंदोलन को डिकोड नही कर पाई
यह पहली बार है कि देश में शिक्षा के मुद्दे पर इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ है।
इस सरकार की सबसे बड़ी स्ट्रेंथ थी—डर।
लेकिन इन नए बच्चों ने उसी डर को मीम बना दिया है।
ये जेनरेशन सरकार, सिस्टम और पुलिस को एकदम ही सीरियसली नहीं ले रहे हैं।
पूरे सोशल मीडिया को कॉमेडी शो बना दिया है।
रील्स भरी पड़ी हैं।
सरकार को लगा था कि किसानों, ड्राइवरों या दूसरे आंदोलनों की तरह ये भी एक-दो दिन बाद रोज़ी-रोटी के लिए घर लौट जाएंगे। लेकिन यहाँ तो उल्टा हो गया।
सरकार ने इन्हें रील्स से निकलकर रियल लाइफ़ में डेमोक्रेसी जीने का मौका दे दिया।
सरकार और पूरा सिस्टम इनकी भाषा ही नहीं समझ पा रहा। दोनों के बीच इतना बड़ा जनरेशन गैप है कि लगता है पहले 4–6 महीने की "Gen-Z Language Workshop" करनी पड़ेगी।
मिलेनियल्स धड़ाधड़ डोनेशन कर रहे हैं। बोल रहे हैं। "भाई, हमारे कंधों पर बैठो, खाओ-पीओ और सिस्टम की बैंड बजा दो।
असल में मिलेनियल्स भी इसी शिक्षा व्यवस्था से बुरी तरह परेशान थे, लेकिन वे पुरानी पीढ़ी और उसकी मर्यादाओं के बीच फँसे हुए थे। ये वाली Gen-Z? इन्हें किसी की परवाह ही नहीं।
इन्होंने पूरी पार्टी और सरकार के IT सेल का गेम ही बिगाड़ दिया है। उन्हें कबाड़ा बना दिया है। इनके कंटेंट के सामने किसी का नैरेटिव टिक ही नहीं पा रहा।
मंत्रियों और सांसदों के ऑफिशियल पेज कमेंट सेक्शन में भर-भरकर ट्रोल हो रहे हैं। पूरा नैरेटिव वहीं पलट जा रहा है।
गोदी मीडिया को ये घुसने ही नहीं दे रहे हैं जबकि वे इस फोमो मे रील्स काटने के लिए लालायित बैठे हुए हैं।
इधर सरकार समर्थकों को भी आड़े हाथ ले रहे हैं। ऐसा ही रहा तो ये गोदी मीडिया की तरह समर्थकों का भी जीना मुश्किल कर देंगे। उनके भी अच्छे दिन आने वाले हैं। प्रोटेस्ट में जो भी समर्थक आ रहा है उसको ही पीट दे रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने भी इस दौर में जितनी ऑनलाइन आलोचना झेली है, शायद पहले कभी नहीं झेली होगी।
इनके लिए यह आंदोलन अब सिर्फ़ प्रोटेस्ट नहीं, बल्कि डेमोक्रेसी फेस्ट और डेमोक्रेसी की लाइव क्लास बन चुका है। और मज़े की बात यह है कि इस क्लास से कोई बंक मारना ही नहीं चाहता।
हर सीरियस बात, हर भाषा और हर एक्शन को इन्होंने मीम कल्चर में बदल दिया है। सामने वाले को समझ ही नहीं आ रहा कि इन्हें डील कैसे किया जाए। डिकोड कैसे करें।
अब यह आंदोलन सोनम, दीपक, दास या किसी एक चेहरे के हाथ में नहीं रह गया। यह पूरी तरह डिसेंट्रलाइज़ हो चुका है।
उधर पुरानी पीढ़ी के बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, प्रकाश राज जैसे नाम इनमें से बहुतों के लिए लगभग अप्रासंगिक हैं। वे उन्हें पहचानते तक नहीं।
पुलिस से जाकर पूछते हैं ये लाठी कितने में आती है, कोई पुलिस से पूछता है पुलिस अंकल नास्ते में मैगी मिलेगी क्या !
जब मूड होता है नाचने लगते है, आंदोलन स्थल देखते ही देखते किसी क्लब में बदल जाता है !
ये वो जनरेशन है जिसकी आँखों डर नही है, ये आंदोलन नये नये नारों और नए नए मीम के लिए याद रहेगा !
इस जनरेशन की भाषा समझ पाना भी सरकार के लोगों को मुस्किल है, इन्हें राजनीती से कोई लेना देना नही है इन्हें इनके हक़ से लेना देना है !
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इन्होंने अपनी ही भाषा में आंदोलन को FOMO Event बना दिया है। अगर आज प्रोटेस्ट मिस कर दिया, तो लगता है कुछ बड़ा मिस कर दिया।
इनके लिए इस आंदोलन में आने का मतलब है कि गंगा नहा लिया।
और लाठी तो ये मेडल की तरह मान रहे
आज प्राइम टाइम पर कुछ न्यूज़ चैनलों की हैडलाइन हो सकती है.
1. देश चौंका, दुनिया हैरान, आलोचक परेशान इस्तीफ़ा निकला मास्टरस्ट्रोक.
2. इस्तीफ़े से विपक्ष घबराया
त्याग या तीर?
क्या यह 2047 की तैयारी है?
3.🚨 BREAKING: इस्तीफ़ा नहीं, 56 इंच की रणनीति.
4.देश चौंका, विपक्ष सन्न इस्तीफ़े से पलट गया पूरा खेल.
5.मास्टरस्ट्रोक या महा-मास्टरस्ट्रोक? देश जानना चाहता
है.
6.विपक्ष खुश क्यों? क्योंकि वह असली खेल समझ ही नहीं पाया.
7. त्याग की राजनीति या राजनीति का त्याग? जवाब देगा सिर्फ़ हमारा चैनल!
8.इस्तीफ़ा देकर भी छा गए! विरोधियों की बढ़ी बेचैनी
देखिए EXCLUSIVE इस्तीफ़े से कैसे काँप उठीं विपक्षी पार्टियाँ.
9. क्या यह इस्तीफ़ा नहीं, विपक्ष के लिए बिछाया गया राजनीतिक चक्रव्यूह है?
10.देशहित में लिया गया ऐतिहासिक फैसला,आलोचक फिर हुए बेनकाब.
11.रातों-रात बदल गया सियासी गणित विशेष विश्लेषण 9 बजे.😂
जेन ज़ी मदर के तजुर्बे से सीखिये मोदी कुछ.
ये जंतर मंतर से बिना इस्तीफ़ा लिये जायेंगे नहीं. इन पर हिंदू मुसलमान, गोदी मीडिया का कुछ असर नहीं पड़ने वाला.
वहां खड़े पुलिसवालों से पूछिये, लाठीचार्ज के बाद अब उनका ये क्या हाल कर रहे हैं 😀
इस लड़के का पिता BJP से राज्यसभा सांसद है, इसलिए इसके दोस्त इसको ट्रोल करते हैं और फ्रेंडग्रुप से निकाल चुके हैं।
बोल रहा है ग़लती मेरे बाप की है सजा मुझे क्यों दे रहे हो।
बच्चे का दुःख समझ में आ रहा है, मगर समझने की बात है कैसे उलट हालात बन चुके हैं🥹।
मैं इस आदमी को थोड़ा जानता हूँ, इनका नाम अजीत अंजुम @ajitanjum है। 'थोड़ा' इसलिए, क्योंकि इन्हें पूरी तरह कब जाना जाए, कब आंका जाए, यह मेरी समझ से बाहर है।
यह इंसान पता नहीं क्या है! जिस दिन पता चलेगा, मैं इन पर लिखूँगा। एक दोस्त ने कहा था कि तुम तब तक ही खुद को ज्ञानी समझना, जब तक तुम किसी एडिटर से नहीं मिले हो। किसी एडिटर से मिलने के बाद तुम्हारा यह भ्रम टूट जाएगा कि तुम्हें चीज़ों की समझ है।
लेकिन यह आदमी एडिटर भी है, रिपोर्टर भी है, एंकर भी है और न जाने क्या-क्या है! जैसा कि मैंने पहले ही लिखा है कि जब पूरी तरह जानूँगा, तो विस्तार से लिखूँगा।
आज जो जीत हुई है और जीत तक पहुँचने के लिए जो संघर्ष हुआ है, इस आदमी ने इस उम्र में भी उस संघर्ष को लोगों की आँखों तक पहुँचाया है। पत्रकारिता में इतनी बेहतरीन उपलब्धियां हासिल करने के बाद भी, शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जो इनकी तरह ख़बरों के पीछे पागल रहता हो।
यह आदमी हर उम्र, हर धर्म, हर जाति में इस तरह कैसे घुल-मिल जाता है, मुझे इसकी अभी समझ नहीं है। आज जब हर जगह यह चल रहा है कि इस पत्रकार को धन्यवाद, उस पत्रकार को धन्यवाद... तब मैं इस इंसान को धन्यवाद कहता हूँ। इनको देखकर, हैरानी के साथ-साथ मुझे इनकी चिंता भी रहती है।
खैर... जब भी लगता है कि मैं इस आदमी को थोड़ा समझ रहा हूँ, ये मुझे चौंका देते हैं। पूरे सीजेपी (CJP) आंदोलन में यह इंसान मुझे एक परिपक्व पत्रकार लगा जो 'Gen-Z' बन गया था, जो 'Gen-Z' के मुद्दों को हम तक पहुँचा रहा था।
मैं इस इंसान की ऊर्जा और इनके पागलपन का कायल हूँ।
नरेंद्र मोदी जी,
झोला उठाने का टाइम आ गया है। देश के छोटे-छोटे बच्चे आपका मजाक उड़ा रहे हैं। ऐसे तमाम वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं। आपकी सरकार का इकबाल खत्म हो चुका है। आप नैतिक रूप से सत्ता में बने रहने का अधिकार खो चुके हैं। जनभावना आपके खिलाफ है। खुद से पद त्याग दीजिए, शायद यह एक बात इतिहास में आपको उचित जगह दिला सकती है कि आपने अंततः जनभावनाओं का सम्मान किया।
यह देश बुरी तरह निराश है और आपसे मुक्ति चाहता है। आप रोज जितने पैंतरे अपना रहे हैं, वे काम के नहीं हैं। झोला उठा लीजिए, देश का भला हो जाएगा।
सादर 🙏
बहन राहुल गांधी पहले भी ठीक बयान देते और आज भी ठीक देते हैं वह तो एक घटिया आईटी सेल उनके बयान को घटिया तरीक़े से
एडिट करके पेश करता है और गोदी मीडिया उनका पूरा साथ देती है
चलो फिर भी अच्छा लगा जनता की आंखे तो खुल रही है राहुल गांधी जी की लेकर
राहुल गांधी को 'पप्पू' कहने वालों को युवाओं ने दिया जवाब !
देशभर के आंदोलनकारियों के सूचनार्थ!
भाजपा और उनके संगी-साथियों के दुर्व्यवहार, दुर्वचनों और हिंसा को सब देख लें। इनका दुस्साहस देखिए कि अभी युवाओं को वचन दिए हुए चंद घंटे भी नहीं हुए हैं और ये भाजपाई अपने इतिहास को दोहराते हुए फिर से धोखा दे रहे हैं। भाजपा के ये संस्कारी नेताजी अपने शीर्ष नेतृत्व के दिये गये आश्वासन की सरेआम धज्जियाँ उड़ा रहे हैं और वीडियो भी बना रहे हैं। अब क्या ये भी डबल इंजन की टकराहट के कारण हो रहा है।
तुरंत गिरफ़्तारी हो!
भाजपाई तो अपने वचन के भी सगे नहीं हैं।
भरोसे का विलोम भाजपा!
अब इनको Insta इंफ्लूएंसर बनना है।
किसी ने बता दिया है कि आज की पीढ़ी Instagram पर ज्यादा एक्टिव है। उसके बाद ये इंस्टा पगलू बन गए हैं। कैबिनेट मीटिंग में इंस्टा, रोज आधी रात को इंस्टा... जीवन में बस इंस्टा इंस्टा..
आधी रात को वीडियो पोस्ट कर रहे हैं कि आपने कल के वीडियो को जो प्यार दिया उसके लिए thank you Freinds.
एक इस्तीफा ले नहीं पा रहे, एक पेपर करवा नहीं पा रहे, प्रधानमंत्री बन नहीं पा रहे, इंफ्लूएंसर बनेंगे।
आपका सरनेम कहाँ से आया...
बहुत सारे सरनेम हमारे गौत्र नहीं हैं, किसने शुरू किया? यह कोई ज़्यादा पुराना नहीं है।
शर्मा, वर्मा, चौधरी, पटेल.... ये सब सिर्फ़ 150 साल पुराने हैं, कोई पुश्तैनी परंपरा नहीं।
इसे शुरू किया था अंग्रेज़ों ने, आपकी नाक नापकर दिए, टैक्स वसूलने के लिए दिए गए यह उपनाम।
जिसे इन नामों पर नाज़ हो, हक़ीक़त जान लें; यह अंग्रेज़ों द्वारा एक तरह का अपमान था जिसे आज आप शान समझते हैं।
भारत में गौत्र चलते थे, सरनेम नहीं।
1871 में देश में पहली जनगणना हुई थी। सबके जाति-धर्म-पेशा लिखने की कवायद थी, जो कामयाब नहीं हुई।
1881 में दूसरी कोशिश हुई, हर्बर्ट रिज़ले इसके कमिश्नर बने।
नाक और खोपड़ी के साइज़ नापकर नई तरकीब लगाई गई।
नाक की चौड़ाई और सिर के साइज़ पर समाज को विभक्त कर दिया गया।
#IndianHistory
ये सिर्फ आंदोलन नही कर रहे,
ये पूरा राजनितिक कैरियर खराब कर रहे हैं उनका !
इतिहास में ऐसा याद किया जायेगा उन्हें !
भाजपा के जीवन की सबसे बड़ी गलती साबित होने वाली है ये !
पहले A+B का Whole Square... अब एक से बढ़कर एक क्रिएटिव आइडिया! 😄
छात्रों की क्रिएटिविटी का कोई पैमाना नहीं है।
ये लाठी से कम, दिमाग और व्यंग्य से ज़्यादा लड़ रहे हैं।
ऐसे आइडियाज़ का जवाब IT Cell नहीं दे पा रही 😀😀😀😀
तुम पूछते हो - "चौथी फेल नहीं तो कौन?"
हमने हमेशा कहा - भारत के करोड़ों लोग जिन्होंने भारत को बनाया है। जो रोज खून पसीना बहाते हैं। जो इसे थामे हुए हैं। वे ही इसे संभालेंगे, संवारेंगे।
इस युवक को सुनिए, यह कोई भावुक उद्गार नहीं है। युवाओं की पीड़ा है लेकिन कहने में एक सलीका है। ऐसे करोड़ों योग्यतर नौजवानों का भविष्य उनके चंगुल में फंस गया है जिनको यह देश सिर्फ ढो रहा है।