@awasthi4305 अभी तक का उनका कार्यकाल बडा सुलझा हुआ रहा है तो फिर से उनको जिम्मेदारी देने के लिये ये काफी है बाकी गोविंद डोटासरा या उसकी जाती वाले को लगा दिया होता तो अब तक कई पेपर चोरी हो चुके होते
*छत्रपति शिवाजी और संभाजी महाराज को आगरा कैद से निकालने में मिर्जा राजा जयसिंह और रामसिंह की भूमिका थी।*
राजस्थान अभिलेखाकार में उपलब्ध दस्तावेज से यह स्पष्ट होता है कि औरंगजेब की कैद से छत्रपति शिवाजी और संभाजी महाराज को निकालने में मिर्जा राजा जयसिंह और रामसिंह की महत्वपूर्ण भूमिका थी। मराठा छत्रपति के आगरा से निकलते ही मुगल सम्राट औरंगजेब ने दक्षिण में स्थित मिर्जा राजा जयसिंह को एक फरमान लिखा जो शायद समय के साथ नष्ट हो गया। परंतु उस फरमान के अंशों अर्थात् संक्षिप्त नोट राजस्थान स्थित पर्शियन दस्तावेजों में मिलता है। मुगल बादशाह, मिर्जा राजा को लिखते हैं -
’’तुमने इतनी मुश्किल से शिवा को पकड़ा परंतु तुम्हारे बेटे (रामसिंह) ने उसको भगा दिया। मेरी इच्छा हो रही है कि इसकी खाल उधेड़कर आगरा की गलियों में घुमाऊं, परन्तु तुम हमारे सबसे विश्वस्त मनसबदार हो, इसलिए मैं इसके सारे मनसब छिनकर इसको पदच्युत कर रहा हूं और तुम अल्लाह का शुक्रिया अदा करो कि तुम्हारे बेटे को इतनी कम सजा मिली।’’
स्रोत : राजस्थान अभिलेखाकार, बीकानेर।
यह शोध मेरे द्वारा निदेशक, राजस्थान राज्य अभिलेखागार के पद पर रहते हुए किया गया है ।
University of Delhi
University of Oxford
University of Cambridge
University of Georgia
University of Bristol
University of Houston
University of Pune
University of Exeter
British Museum
SOAS University of London
University of Pennsylvania
The University of Edinburgh
University of Mumbai
Jawaharlal Nehru University (JNU) New Delhi
अजमेर में राजस्थान की सुन्दरता का नजारा देखने को मिला है जहां देश भर में लोग धर्म के नाम पर लड़ने को अड़े हुए हैं यहां मुस्लिम समुदाय के लोग गऊ को राष्ट्रमाता करने की माँग @dharmendainc
के नेतृत्व में कर रहे हैं , यह तस्वीर राजस्थान की वर्षों पुरानी एकता की सद्भाव की है ।
अजमेर में राजस्थान की सुन्दरता का नजारा देखने को मिला है जहां देश भर में लोग धर्म के नाम पर लड़ने को अड़े हुए हैं यहां मुस्लिम समुदाय के लोग गऊ को राष्ट्रमाता करने की माँग @dharmendainc
के नेतृत्व में कर रहे हैं , यह तस्वीर राजस्थान की वर्षों पुरानी एकता की सद्भाव की है ।
लक्ष्मी कुमारी चूंडावत को याद करते हुए एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है कि राजस्थान के पूर्व राजसी परिवारों में उनके मूल्यों के आईने में कौन टिकता है? राजघराना केवल वंश, महल, शस्त्र, वंशावली और स्मृति-चिह्नों से नहीं बनता; राजसी होना एक नैतिक अनुशासन भी है। उसमें लोक-लाज होती है, प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व होता है, भूखे मनुष्य के सामने अपने वैभव को छोटा मानने की संस्कृति होती है।
लक्ष्मी कुमारी चूंडावत के जीवन में यह राजसी गरिमा केवल पहनावे या संबोधन में नहीं थी, वह व्यवहार में थी। कहा जाता है कि रात को जब वे ब्यालू (व्याळू वह भोजन होता है, जो सूरज छिपने के समय किया जाता हैं। राजस्थान में डिनर या देर रात का भोजन नहीं, यही दिन छिपने के समय का भोजन हुआ करता था। मूल शब्द व्याळू है। इससे ब्याळू बना है।) करने बैठती थीं, उससे पहले गढ़ का द्वारपाल ऊँची आवाज़ में हेला देता था, “राणी सा भोजन जीम रहीं हैं, नगर में अगर कोई भूखा है तो गढ़ पधार जाए और भोजन कर ले।” इसके बाद मुनादी होती थी कि नगर में कितने लोगों ने भोजन नहीं किया। जिन्हें भोजन नहीं मिला होता, उन्हें गढ़ बुलाया जाता, आदर से बैठाकर भोजन करवाया जाता और जब सबका पेट भर जाता, तब रानी लक्ष्मी कुमारी चूंडावत स्वयं भोजन करती थीं।
आज हम इसे लोकतंत्र को तो कहते हैं, लेकिन उसमें तो उस राजतंत्र की वे बातें भी नहीं हैं, जो इन्सानियत के पायों पर खड़ा होता था।
यही राजधर्म था। यही लोकधर्म था। यही वह मर्यादा थी जिसमें राजसीपन सत्ता का प्रदर्शन नहीं, करुणा का अनुशासन बन जाता था। आज जब अनेक राजपरिवार राजनीति में हैं, सामाजिक जीवन में हैं, स्मृति और प्रतिष्ठा के मंचों पर हैं, तब यह पूछा जाना चाहिए कि क्या वे केवल अपने पूर्वजों की तलवारें, तस्वीरें और उपाधियाँ लेकर चलते हैं या उन मूल्यों की थाली भी साथ रखते हैं जिसमें पहले भूखे का हक़ है और बाद में अपना निवाला?
लक्ष्मी कुमारी चूंडावत इसलिए बड़ी थीं कि वे राजघराने से थीं, यह बात अधूरी है। वे इसलिए बड़ी थीं कि राजघराने से होकर भी वे लोक की तरफ खड़ी थीं। उनके लिए गढ़ का दरवाज़ा केवल वैभव का प्रवेश-द्वार नहीं था, भूखे मनुष्य के लिए सम्मान का खुला द्वार था। आज के समय में यही कसौटी है: वंश बड़ा नहीं बनाता, मूल्य बड़ा बनाते हैं।
इस भूली हुई बात की याद लोकेंद्रसिंह की इस पोस्ट से याद आई। शुक्रिया दोस्त।
@crosschat_wala
इस तरह की टिप्पणी जयपुर वालों को प्रतिक्रिया करने के लिए भी उकसाती है ,जयपुर वाले लोग क्षेत्रवाद , खांपवाद और जातिवाद की बीमारी से ग्रस्त होते तो इनको ऐसी बाते करने के लिए मेटेरियल नहीं मिलता पाता और हरावल में खड़े कच्छवाहों के पीछे खड़े हो टिप्पणी नहीं कर पाते।
राजेन्द्र सिंह भियाड़ जैसे लोग भी अब बाड़मेर की आबोहवा में खराब होने को हैं।
भियाड साहब जैसे लोग अक्सर समझदारी वाली बातें करने के लिए जाने जाते थे लेकिन कल महाराणा प्रताप के बहाने उन्होंने पहली बार वर्गीय टिप्पणी कर दी।
लेकिन क्या कर सकते हैं जब पूरा बाड़मेर ही "मुन्ना भैया" बना हुआ है तो भियाड़ साहब उसमें कहां बचने वाले हैं।