@WasimAkramTyagi@RuhullahMehdi पहली बात तो किसी भी celebraty को चुनाव में टिकट देना ही नहीं चाहिए इनका जनता या किसी विचारधारा से कोई सरोकार नहीं होता ये राजनीति में आते है तो सिर्फ और सिर्फ अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए
@M__Rkhan आज डिबेट देखना के बाद ये बात समझ में आई की ऐसा ही डिबेट अगर हर subject और हर टॉपिक पर होने लगे तो वो दिन दूर नहीं जब कुछ ही सालों में भारत का डंका विश्व में बजेगा डिबेट का असली मतलब आज समझ मे आया scientist aur philosopher ऐसे नहीं पैदा होत
इधर एक बात तो हुई कि लोगों में एफआईआर का डर ही ख़त्म हो गया । जब ज़रा ज़रा सी बात पर एफआईआर होंगी,तो काहे का डर । कोई I love mohammed कह देगा और इसपर एफआईआर हो जाएगी,इतना हल्कापन कभी नही देखा था । चार लड़के आपके घर के बाहर नारेबाज़ी करेंगे,आपपर एफआईआर हो जाएगी । बीस लड़के सोशलमीडिया पर आपको ट्रोल करेंगे,आपपर एफआईआर हो जाएगी । आपके घर पर हरे रंग का झंडा लगा देख,कोई की भावना आहत होगी,तो आपपर एफआईआर हो जाएगी । असल में हमारे यहाँ भावना एफआईआर प्रधान हो गई है ।
हमने बड़ा बदलाव होते देखा है । पहले अगर एफआईआर हो जाए या दरवाज़े पुलिस आ जाए,तो बड़ा बुरा माना जाता था । अब कोई भी इसका बुरा नही मानता । यहां तक हो गया है कि अगर किसी मुसलमान, दलित या फिर पिछड़े पर एफआईआर हुई है, तो लोग तुरन्त समझ जाते हैं कि यह बदले की या नफरत की कार्यवाही में कई गई है । अब कोई भी आदमी एफआईआर में नामज़द इंसान से परहेज़ नही करता,बल्कि उसके प्रति हमदर्दी रखता है । लोग चुपचाप कहते हैं कि देखो,बेचारा फंसा दिया गया ।
वैसे भी जब इतना हल्कापन होगा, मामला कोर्ट जाएगा, तो वहां से रफा दफा होगा । हाँ थोड़ा वक़्त और लाख दो लाख रुपये ज़रूर खर्च हो जाएंगे । अब एफआईआर जिनपर होती है, उन्हें ही खरा माना जाता है । यह तो हर उस दौर की पहचान है,जब कोई ज़ालिम ताक़त में हो । क्योंकि तब ज़ालिम के चाबुक से तक़लीफ़ ज़रूर होती है मगर शर्म नही आती । ज़ालिम का चाबुक तो मोहर देता है कि,जब सब खामोश थे,तब यह बोला था । ऐसे बोला था कि ज़ालिम कांप गया था ।
मुझे दुःख है कि एफआईआर की गम्भीरता इस तरह खत्म हो गई । अब सबको पता है कि किसी को भी,कभी भी फंसाया जा सकता है । कोई भी कभी भी सलाखों की तरफ चला जाएगा । अब न एफआईआर डराती है और न ही सलाखें और न ही कोई ऐसी कार्यवाही,जिसे बदले की तरह इस्तेमाल किया गया हो ।
हमारे जानने वाले एक दवा व्यापारी नकली दवाओं के लिए पकड़े गए ।।पहले यह होता, तो उनसे कोई न मिलता मगर अब हर एक कह रहा, उनकी जाति ऐसी है कि ढूंढ ढूंढ कर परेशान किये जा रहे हैं । बेचारे फंसा दिए गए । मुझे नही पता कि वह गुनहगार हैं या नही मगर हुक़ूमत पर इतना अविश्वास पहले कभी नही देखा था । लोग समझ रहे हैं कि उन्हें डंडों से हांका जा रहा है । जो जितनी जल्दी एफआईआर करेगा,जितनी जल्दी हाफ एनकाउंटर करेगा,उसके सितारे उतने बढ़ेंगे ।।जो इसमें तफ्तीश की तरफ बढ़ेगा,वह पिछड़ जाएगा । यह कमाया है कथित शख्त ज़ीरो टॉलरेंस ने की तफ्तीश शून्य,कार्यवाही पूरी ।
बहुत पुराना समय याद आ गया । जब एक खाकी वर्दी का सिपाही आ जाता,तो गांव का गांव खाली हो जाता । फिर हमारे पुरखे आए, उन्होंने बिना हाथ उठाए,चरखा पकड़ा और कहा कि इनसे मत डरो । जेल से मत डरो । अदालत में रहम की भीख मत मांगो । अंग्रेज़ो की हथकड़ी तो आभूषण है । निडर बनो और इनसे बेखौफ होकर बात करो । तब क्या हुआ,सलाखें भर गई,जेल जाना सम्मान बन गया । एफआईआर वह दस्तावेज़ हो गया,जो आपकी इज़्ज़त की गवाही देता । यह भी तो हमने देखा है, वह भी हज़ारों साल पहले नही,बल्कि कुल सत्तर अस्सी साल पहले ।
यही वक़्त फिर लौट रहा है । जब ज़रा ज़रा बात पर एफआईआर होंगी । एक उंगली उठने पर एनकाउंटर होंगे । टीवी में बैठा एंकर पूरे समाज पर मुकदमे करवा देगा । सोशलमीडिया का ट्रोल सरदार किसी को भी कानूनी जकड़ में भेज देगा । तो क्या होगा । लोग डरना छोड़ देंगे,बल्कि छोड़ चुके हैं । अब तो एफआईआर आपकी इज़्ज़त का दस्तावेज़ और जेल आपकी गवाही है कि आप सही दिशा में थे ।
हम बार बार कह रहे कि घड़ी घड़ी एफआईआर,शिकायत,जेल,एनकाउंटर, हाफ एनकाउंटर,इनसे कोई भी चीज़ सुधरेगी नही बल्कि बिगड़ेगी । हुक़ूमत का इकबाल मारने से नही,मारे जाने के खौफ से चलता है । रोज़ मारने वाले बाप से इंसान बग़ावत कर देता है, तो आप तो खैर आप हो । इन्हें इतना हल्का न करो कि अपराधियों से भी इसका डर निकल जाए । तफ्तीश और समय को ज़रा सा अपना लीजिये,वरना आपकी ही कमज़ोरी सबपर ज़ाहिर होगी ।
हर बात पर एफआईआर,हर एक के द्वारा की गई एफआईआर,भीड़ के हुवा हुवा करते ही एफआईआर,किसी भी झंडे या नारे पर एफआईआर से आप तुरंत तो अपने आप को बचा सकते हैं मगर यह रास्ता नही है । समझाने और समझने को अहमियत दीजिये,बातचीत कीजिए । एक बातचीत सैकड़ो एफआईआर से भली है । इसकी गम्भीरता को समझिये ।
I Love mohammed पर की गई एफआईआर रद्द हों और ऐसी हर कोशिश,जिसमें बात हो सके । उसपर भी रद्द हों,एफआईआर की अहमियत मत घटाइये...