बाड़मेर में गरीब और आदिवासी परिवारों के आशियाने तोड़े जाने की घटनाएँ बेहद चिंताजनक हैं। किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई से पहले प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, वैकल्पिक आवास और बच्चों-महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। हम मांग करते हैं कि प्रशासन तत्काल प्रभावित परिवारों की सहायता करे और मानवीय दृष्टिकोण अपनाए। विकास और कानून के नाम पर गरीबों को बेघर करना किसी भी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती।
इतना बल अगर पेपर लीक को रोकने में लगाया होता तो कॉक्रोचेस अपने घर पर ही होते आज!
धर्मेंद्र प्रधान को बचाने के लिए इतनी पुलिस भेजी है - क्यों इस सरकार को युवाओं से ज़्यादा अपने एक incompetent मंत्री से प्यार है?
छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले के हढ़ीग्राम गांव में आदिवासी महिलाएं और बच्चे आज भी पत्थरों के बीच जमा गंदा पानी भरने को मजबूर हैं।
एक ओर सरकार विकास और नक्सलवाद के खात्मे के दावे कर रही है, दूसरी ओर आदिवासी समुदाय स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष कर रहा है।
यदि आदिवासी क्षेत्रों में लोगों को पत्तों और गंदगी से भरे पानी पर निर्भर रहना पड़े, तो सरकारी आंकड़े और भाषण जमीनी सच्चाई को नहीं छिपा सकते।
विकास का असली पैमाना सत्ता के दावे नहीं, बल्कि लोगों के जीवन की गुणवत्ता है।
ये लोग अपनी आस्था के प्रतीक राम को लूट सकते हैं तो बुद्ध इनके क्या लगते हैं?
इसलिए सरकार बौद्ध गया महाविहार भूमि का प्रबंधन , ब्राह्मणों से छीनकर तुरंत बौद्ध समुदाय को दें।
प्रधानमंत्री मोदी जनता को "देशभक्त मितव्ययिता" का पाठ पढ़ाते हैं। पेट्रोल-डीजल बचाने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और सादगी से जीवन जीने की सलाह देते हैं। लेकिन जब उनके वीआईपी आयोजनों की बात आती है, तो सरकारी संसाधनों के खुले इस्तेमाल और भव्य तैयारियों पर ये उपदेश कहीं दिखाई नहीं देते। क्या मितव्ययिता सिर्फ आम नागरिकों के लिए है? देश जानना चाहता है कि कथनी और करनी के बीच इतनी बड़ी दूरी क्यों है?
Mining at Bhansi Deposit-4, Dantewada continues despite Adivasi opposition. Ignoring Gram Sabhas and undermining Fifth Schedule protections is not development, it is the dispossession of Indigenous communities for corporate gain.
प्रतापगढ़ धरना प्रदर्शन कर रहें लोगों के खिलाफ सुहागपूरा CI का बर्ताव देखिए 👇
एक अधिकारी का काम होता है लोगों को शांत करना लेकिन यहां CI साहब भड़काने में विश्वास रखते है ऐसे अधिकारी तत्काल प्रभाव में बर्खास्त होने चाहिए "@RajPoliceHelp#सुहागपूरा_CI_बर्खास्त_करो@NiyuddhaguruM
उत्तर प्रदेश में ललितपुर जिले के महारा गांव में सहरिया आदिवासी परिवारों को उनकी बस्ती और ग्राम पंचायत की भूमि से बेदखल करने की कोशिश की जा रही है। विरोध करने पर मारपीट, गाली-गलौज, महिलाओं के रास्ते बंद करने और बस्ती में आग लगाने जैसी घटनाएं सामने आई हैं। क्या उत्तर प्रदेश में आदिवासियों का जल, जंगल, जमीन और सम्मान सुरक्षित है? प्रशासन निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई करे।
झारखंड के कोडरमा जिले के नीमाडीह गांव में आदिवासी परिवार आज भी नदी की रेत में गड्ढे खोदकर पीने का पानी जुटाने को मजबूर हैं। 2026 में भी यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। जल, जंगल और जमीन के असली संरक्षकों को पीने का पानी तक न मिलना व्यवस्था की विफलता है।
आदिवासी समुदाय आज देशभर में अपने जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और अस्तित्व को बचाने की आख़िरी लड़ाई लड़ रहा है। दुखद यह है कि जब आदिवासियों के अधिकारों पर हमला होता है, तब उनके पक्ष में मजबूती से खड़े होने वाले लोग बहुत कम दिखाई देते हैं। ऐसे समय में हम जैसे कुछ लोग ही उनकी आवाज़ को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
18 घंटे काम करने का दावा अपनी जगह, लेकिन शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और महंगाई पर नतीजे क्या हैं?
नेता की मेहनत नहीं, जनता की ज़िंदगी बेहतर हुई या नहीं — असली पैमाना यही है।
झारखंड के रांची स्थित नगड़ी में आदिवासी किसान अपनी पुश्तैनी जमीन बचाने के लिए सड़कों पर हैं। ₹4000 करोड़ से अधिक की RIMS-2 परियोजना के नाम पर 100 एकड़ से अधिक कृषि भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे ग्रामीणों का सवाल है क्या विकास आदिवासियों की जमीन और आजीविका छीनकर होगा? जिन समुदायों ने सरकार पर भरोसा किया, आज वही अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलनरत हैं। विकास और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन बनाना सरकार की जिम्मेदारी है।
ये तस्वीर गुजरात के आदिवासी बहुल दाहोद जिले की है, जहां आदिवासी लोग आज भी जानवरों के साथ एक ही गड्ढे का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं, जबकि BJP 'हर घर नल से जल' का ढिंढोरा पीटती है। आदिवासी इलाकों को सिर्फ वोट बैंक समझने की राजनीति अब बेनकाब हो चुकी है।