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भारत में नदियों को 'मां' कहते हैं, फिर भी इन्हें गंदा करते हैं। विदेशों में नदियों को मां नहीं कहते, लेकिन वहां ये साफ़ रहती हैं। अगर नदियों को ‘मां’ कहने से कोई फायदा नहीं हो रहा, तो क्या हमारी पूजा और धर्म सिर्फ दिखावा नहीं बन गया है?
हिडमा अगर नक्सली था, तो मैं भी नक्सलवाद का कड़ा विरोध करता हूँ।
लेकिन एक सवाल हर किसी को सोचना चाहिए
फिर जनता के बीच वह ‘हीरो’ क्यों बना?
उसके अंतिम समय में इतनी भीड़ क्यों उमड़ी?
मेरी समझ यह कहती है कि सच्चे आदिवासी जंगल, नदी, पहाड़ प्रकृति के किसी भी हिस्से के विरुद्ध नहीं जाते।
वे कभी गलत व्यक्ति का अंधसमर्थन नहीं करते।
उनकी खुद्दारी, आत्मसम्मान और अस्तित्व इनसे वे कभी समझौता नहीं करते।
और जब उन्हें लगता है कि देश की सुरक्षा, या जल–जंगल ज़मीन पर संकट है, तो वही आदिवासी हिडमा जैसे लोगों का विरोध भी करते हैं और अगर हालात मजबूर करें तो हथियार उठा कर सच के साथ खड़े हो जाते हैं।
यहाँ मुद्दा सिर्फ़ एक हिडमा का नहीं है।
मुद्दा उन अनगिनत बेगुनाह आदिवासियों का है, जो सालों से बिना वजह मारे जा रहे हैं
जिन्हें जबरन नक्सली बताकर ख़त्म कर दिया जाता है,
जिनकी आवाज़ सुनी नहीं जाती, और
जिनका दर्द आँकड़ों में गुम हो जाता है।
मैं बात उन सबकी कर रहा हूँ
जिन्हें न्याय कभी मिला ही नहीं,
जिनकी कहानी किसी रिपोर्ट में जगह नहीं पाई,
और जो केवल इसलिए मारे गए क्योंकि
उनके हिस्से का जंगल, जमीन और अधिकार किसी को पसंद नहीं था।
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