आज इस UGC बिल का सबसे ज्यादा विरोध वही लोग कर रहे है जो कल तक नारा लगाते थे.
"जात-पात की करो विदाई हम सब हिंदू भाई-भाई"
एक बिल ने सारा पोल खोल दिया हिंदुत्व का नारा बुलंद करने वालो का।
#We_support_UGC_Act
अगर ये नियम पहले होते,
तो शायद रोहित वेमुला और डॉ. पायल ताडवी
आज हमारे बीच होते।
UGC के नए नियम
बराबरी, गरिमा और जवाबदेही की बात करते हैं—
और इसी से जातिवादी सोच डरती है।
#We_support_UGC#JusticeInCampus#सामाजिक_न्याय
जनगणना की अधिसूचना में जाति का कॉलम तक नहीं है, गिनेंगे क्या। जातिगत जनगणना भी भाजपा का जुमला है। भाजपा का सीधा फ़ार्मूला है, न गिनती होगी, न आनुपातिक आरक्षण-अधिकार देने का जनसांख्यिकीय आधार बनेगा। जातिगत जनगणना न करना पीडीए समाज के ख़िलाफ़ भाजपाई साज़िश है।
आज भाजपा पर भरोसा करनेवाले अपने को ठगा हुआ ही नहीं बल्कि घोर अपमानित भी महसूस कर रहे हैं। भाजपा में जो कार्यकर्ता व नेता अब तक जातिगत जनगणना करवाने का दावा कर रहे थे, वो अब अपने समाज में मुँह दिखाने लायक नहीं बचे। वो अब गले से भाजपाई पट्टा और घरों, दुकानों, वाहनों से भाजपा का झंडा उतारने के लिए मजबूर हैं।
पीडीए को अपने मान-सम्मान, आरक्षण और अधिकार की लड़ाई ख़ुद लड़नी होगी।
अब जब विरोध होगा तो ‘छलजीवी भाजपा’ फिर कहेगी ये टाइपिंग मिस्टेक हो गयी। भाजपा अब इतनी बुरी तरह एक्सपोज़ हो गयी है कि सबको मालूम है कि अपने गलत मंसूबों के भंडाफोड़ होने के बाद आगे क्या करेगी। दरअसल ये भाजपाई चालाकी नहीं, भाजपाई बेशर्मी है।
अब शब्दकोशों में ‘वचन-विमुखी’ भाजपा का मतलब ‘धोखा’ लिख देना चाहिए।
पहरुओं रहना सावधान! #जाति_जनगणना का इतिहास ही धोखों और साज़िशों से भरा है, इसलिए समय रहते अतिरिक्त सजगता ज़रूरी है.
मैंने इसी वजह से अपनी किताब #जाति_जनगणना के आख़िरी पन्नों में साज़िशों और संभावनाओं—दोनों—के बारे में साफ़-साफ़ लिखा है। इतिहास गवाह है कि सबसे बड़े धोखे हमेशा बड़े वादों के साथ आए हैं। इसलिए किताब पढ़िएगा, सवाल करते रहिएगा और जागते रहिएगा—कहीं ऐसा न हो कि जाति जनगणना के नाम पर एक और बड़ा धोखा हो जाए।
किताब का लिंक- https://t.co/eN9h4D3nwq
क्या देश के OBC समाज के साथ भारतीय जनता पार्टी फिर से कोई बड़ा खेल करने वाली है? सजग हो जाइए, वरना आपका हक़, अधिकार और सम्मान मार लिया जाएगा—और आपको पता भी नहीं चलेगा।
मैंने इसी वजह से अपनी किताब #जाति_जनगणना के आख़िरी पन्नों में साज़िशों और संभावनाओं—दोनों—के बारे में साफ़-साफ़ लिखा है। इतिहास गवाह है कि सबसे बड़े धोखे हमेशा बड़े वादों के साथ आए हैं। इसलिए किताब पढ़िएगा, सवाल करते रहिएगा और जागते रहिएगा—कहीं ऐसा न हो कि जाति जनगणना के नाम पर एक और बड़ा धोखा हो जाए।
किताब का लिंक- https://t.co/eN9h4D3nwq
UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में “Equity Committee” का प्रावधान किया है—SC, ST के साथ OBC को भी इसमें शामिल किया गया है। यह फैसला यूँ ही नहीं आया। UGC खुद मानता है कि अब तक के “लचीले प्रावधान” कैंपसों में जातिगत अन्याय और भेदभाव को कम करने में नाकाम रहे हैं। और यह सिर्फ़ एक दावा नहीं, बल्कि आधिकारिक आँकड़ों से साबित सच्चाई है।
UGC के अनुसार 2019-20 से 2023-24 के बीच उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 118% से ज़्यादा बढ़ी हैं—173 से बढ़कर 378 तक। यह साफ़ बताता है कि समस्या “छिटपुट घटनाओं” की नहीं, बल्कि संरचनात्मक (structural) है। जब उत्पीड़न बढ़ रहा हो, तब सिर्फ़ जागरूकता, पोस्टर या संवेदनशीलता कार्यशालाओं से काम नहीं चलता; सख़्त, समयबद्ध और जवाबदेह प्रावधान ज़रूरी होते हैं। इसी कारण नए नियमों में 24 घंटे में समिति बैठक, 15 दिन में रिपोर्ट और 7 दिन में कार्रवाई की समयसीमा तय की गई है।
अब सवाल उठाया जा रहा है कि इसमें “सामान्य वर्ग” को क्यों नहीं शामिल किया गया। यह ठीक वैसा ही सवाल है जैसे महिला उत्पीड़न रोकने के लिए बनी Women Cell में पुरुषों को क्यों नहीं शामिल किया गया। वजह साफ़ है—जातिगत उत्पीड़न का ढांचा ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से SC/ST/OBC के खिलाफ बना है। यह बहिष्कार नहीं, बल्कि उस असमान यथार्थ की स्वीकारोक्ति है जिसे सदियों तक सामान्य बना दिया गया।
एक और तर्क दिया जा रहा है कि “इस नियम का दुरुपयोग होगा।” तो बताइए, ऐसा कौन सा कानून है जिसका दुरुपयोग नहीं हुआ? RTI, श्रम कानून, महिला सुरक्षा कानून—सबके दुरुपयोग के उदाहरण मिल जाएंगे। लेकिन दुरुपयोग की आशंका न्याय से इनकार का आधार नहीं हो सकती। वैसे भी UGC ने अंतिम नियमों में “फ़र्ज़ी शिकायत” वाला डराने वाला प्रावधान हटा दिया है, ताकि पीड़ित चुप न हों।
सच यही है कि जब बात SC/ST/OBC के साथ होने वाले जातिगत भेदभाव को रोकने की आती है, तभी ‘दुरुपयोग’ का शोर सबसे तेज़ हो जाता है। क्योंकि यह नियम किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को चुनौती देता है जिसने जातिगत असमानता को अब तक ‘नॉर्मल’ बना रखा था। कैंपस में समता भाषणों से नहीं, बल्कि सख़्त, जवाबदेह और लागू होने वाले नियमों से आएगी।
@ugc_india
उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव और UGC का नया प्रावधान
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UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में Equity Committee का प्रावधान किया है, जिसमें SC, ST के साथ OBC को भी शामिल किया गया है। यह कोई औपचारिक कदम नहीं, बल्कि इस सच्चाई की स्वीकारोक्ति है कि अब तक के “लचीले प्रावधान” कैंपसों में जातिगत अन्याय और भेदभाव को रोकने में असफल रहे हैं। यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि संविधान और सामाजिक न्याय से जुड़ा सवाल है।
आँकड़े क्या कहते हैं
UGC के अपने आंकड़ों के अनुसार 2019–20 में जातिगत भेदभाव की 173 शिकायतें दर्ज हुई थीं, जो 2023–24 में बढ़कर 378 हो गईं। यानी पाँच वर्षों में 118% से ज़्यादा की वृद्धि। यह साफ़ बताता है कि समस्या कुछ अपवादों की नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों की संरचना और संस्कृति में गहराई तक मौजूद है।
सख़्ती क्यों ज़रूरी है
जब शिकायतें लगातार बढ़ रही हों, तो सिर्फ़ पोस्टर, सेमिनार और संवेदनशीलता की अपीलें काफ़ी नहीं होतीं। इसी वजह से UGC के नए नियमों में 24 घंटे में समिति बैठक, 15 दिनों में जांच रिपोर्ट और 7 दिनों में कार्रवाई की समयसीमा तय की गई है। यहाँ सख़्ती दमन नहीं, बल्कि पीड़ित के लिए संरक्षण और न्याय की गारंटी है।
“जनरल वर्ग” वाला सवाल
कुछ लोग पूछ रहे हैं कि इसमें सामान्य वर्ग को क्यों नहीं जोड़ा गया। यह वही तर्क है जो महिला उत्पीड़न रोकने के लिए बनी वुमेन सेल पर भी दिया जाता है। सच्चाई यह है कि जातिगत उत्पीड़न एक संरचनात्मक सच्चाई है, जो ऐतिहासिक रूप से SC/ST/OBC के खिलाफ रही है। यह कानून किसी के खिलाफ़ नहीं, बल्कि उस असमान यथार्थ को ठीक करने की कोशिश है।
“दुरुपयोग होगा” की दलील
तो बताइए, कौन सा कानून दुरुपयोग-मुक्त है? RTI से लेकर महिला सुरक्षा कानून तक—हर जगह दुरुपयोग की आशंका रही है। लेकिन दुरुपयोग का डर न्याय रोकने का बहाना नहीं हो सकता। वैसे भी UGC ने अंतिम नियमों में “फ़र्ज़ी शिकायत” वाला डराने वाला प्रावधान हटा दिया है।
PDA न्याय की दिशा में कदम
पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समाज आज भी उच्च शिक्षा में असमान हालात में प्रवेश करता है। ऐसे में Equity Committee जैसे प्रावधान किसी विशेषाधिकार नहीं, बल्कि वास्तविक समानता की ओर उठाया गया ज़रूरी कदम हैं। यह कानून PDA न्याय की मूल भावना के अनुरूप है।
नतीज़तन जब जातिगत भेदभाव के मामले बढ़ रहे हों, तब समता की बात केवल भाषणों से नहीं चलेगी। इसके लिए सख़्त, जवाबदेह और लागू होने वाले नियम चाहिए। UGC का यह प्रावधान उसी दिशा में एक आवश्यक हस्तक्षेप है।
पूरा विश्लेषण इस लिंक पर जाकर ज़रूर सुनिएगा-
https://t.co/8x5bKY3zof
#UGC_RollBack बनाम #We_Support_UGC