क्यों तुम्हारे बाप का संपत्ति है जो हम दान में दे दें.?
दिन रात मेहनत करके खून पसीना बहा कर और जो धन-संपत्ति हमने अर्जित की है वह इतनी आसानी से नहीं दे देंगे!
हमारे बाप दादा ने दिन रात मेहनत करके जमीन खरीदा और तुम्हें मुफ्त में दे दे, क्योंकि तुम्हारा चोचण हुआ है.?
नील बाबा के समर्थक दिन-रात आकर पोस्ट पर अपना सर फोड़ते रहते हैं कि हमने इनका चोचण कर लिया, हमने इनकी जमीन छीन ली, हमने इनका हक मार लिया?
अरे भाई तुम्हारे बाप दादा इतनी मूर्ख क्यों थे कि हमने तुम्हारा हक ले लिया और उन्होंने आसानी से दे दिया.?
बेचारे नीलचट्टे हजारों वर्ष से त्राहिमाम त्राहिमाम कर रहे थे क्योंकि धरती पर उनके सांस लेने के लिए ऑक्सीजन नहीं था, मनुवादियो ने उनसे उनके सांस लेने का हक छीन रखा था तभी नील ग्रह से नील बाबा धरती पर अवतार लिए और उन्होंने ऑक्सीजन देकर सांस लेने का अधिकार दिलाया
जब धरती विदेशी राक्षसों की गुलाम थी उस वक्त नील बाबा विदेशी सूट-बूट और टाई पहन कर विदेशी राक्षसों के स्थान विशेष सहलाया करते थे
जब धरती पर चुनाव हो रहा था तो मनुवादियों का इतना ज्यादा प्रकोप था कि मनुवादियों ने नील बाबा को बुरे तरीके से हरा दिया, इस सदमे से नील बाबा बीमार हो गए और वापस नील ग्रह जाकर पंच नील में समाहित हो गए
जय नील जय नील जय जय जय जय जय नील
गुजरात के जूनागढ़ में 7 मुस्लिम युवकों को लाइन में खड़ा कर मस्जिद के मुख्य द्वार पर पट्टों से पीटते पुलिसकर्मी,इन युवकों पर आरोप है कि जब पुलिस मस्जिद के अवैध निर्माण को हटाने पहुंची थी तो इन्होंने हिंसक प्रदर्शन किया था,अब पुलिस वाले मुस्लिम युवकों को तलाश करके चौराहों पर ही पीट रहे है!
#Junagadh
सबसे पहले तो उस मुस्लिम लेखिका का लिंक भेजिए जो उसने यह पोस्ट किया था।
नोट :- याद रहे id रियल होना चाहिए फर्जी नही।
दूसरी बात हर मामले में मुस्लिमो का नाम लेकर अपने समाज को जागरूक करने से बेहतर है, अपने आदर्शों का नाम ले उनके बताए रास्ते को बताए इस तरह जागरूक कीजिए।
और यह नही होता है, तो मुस्लिमो को अपना आदर्श मानिये... न कि उनसे नफरत कीजिए।
हम कई दफा देखते है, कोई भी मामला हो, किसी भी तरह का एंगल हो हर वक्त आप लोग मुस्लिमो को घुसेड़ देते है।
एक मुस्लिम लेखिका द्वारा समस्त हिन्दू (woke) समाज पर ऐसा थप्पड़ मारा गया है कि गाल सहलाने के सिवा कोई जवाब नहीं सूझता।
मुस्लिम महिला द्वारा लिखा गया लेख :
"आपके साथ हुए दुराचार के दोषी आप स्वयं हैं, पता है क्यूं ?? मैं बताती हूं....
• आपकी विवाहित महिलाओं ने माथे पर पल्लू तो छोड़िये, साड़ी पहनना तक छोड़ दिया, पाश्चात्य देशों का पहनावा उनकी पहली पसंद बन गई है, और आपको इससे कोई आपत्ति नहीं। जबकि हमारे समाज में महिलाएं सभ्य और समाज में मान्य वस्त्र ही पहनती हैं।
• आपने घर से निकलने से पहले तिलक लगाना तो छोड़ा ही, आपकी महिलाओं ने भी आधुनिकता और फैशन के चक्कर में और फारवर्ड दिखने की होड़ में माथे पर बिंदी लगाना क्यों छोड़ दिया?
•हमारे यहां बच्चा जब चलना सीखता है तो बाप की उंगलियां पकड़ कर इबादत के लिए जाता है और जीवन भर इबादत को अपना फर्ज़ समझता है।
आप लोगों ने स्वयं ही मंदिरों की ओर देखना छोड़ दिया, जाते भी केवल तभी हो जब भगवान से कुछ मांगना हो अथवा किसी संकट से छुटकारा पाना हो।अब यदि आपके बच्चे ये सब नहीं जानते कि मंदिर में क्यों जाना है, वहाँ जाकर क्या करना है और ईश्वर की उपासना उनका कर्तव्य है....
तो क्या ये सब हमारा दोष है?
• आप के बच्चे कॉन्वेंट से पढ़ने के बाद पोयम सुनाते थे तो आपका सर ऊंचा होता है! होना तो यह चाहिये था कि वे बच्चे भगवद्गीता के चार श्लोक कंठस्थ कर सुनाते तो आपको गर्व होता!
हमारे घरों में किसी बाप का सिर तब शर्म से झुक जाता है जब उसका बच्चा रिश्तेदारों के सामने कोई दुआ नहीं सुना पाता!
•हमारे घरों में बच्चा बोलना सीखता है तो हम सिखाते हैं कि सलाम करना सीखो।
आप लोगों ने प्रणाम और नमस्कार को हैलो हाय से बदल दिया...
तो इसके दोषी क्या हम हैं?
•हमारे मजहब का लड़का कॉन्वेंट से आकर भी उर्दू अरबी सीख लेता है और हमारी धार्मिक पुस्तक पढ़ने बैठ जाता है!
और आपका बच्चा न रामायण पढ़ता है और ना ही गीता। उसे संस्कृत तो छोड़िये, शुद्ध हिंदी भी ठीक से नहीं आती...
क्या यह भी हमारी त्रुटि है ?
• आप लोग ही तो पीछा छुड़ाएं बैठे हैं अपनी जड़ों से! हम ने अपनी जड़ें ना तो कल छोड़ी थी और ना ही आज छोड़ने को राजी हैं!
•आप लोगों को तो स्वयं ही तिलक, जनेऊ, शिखा आदि से और आपकी महिलाओं को भी माथे पर बिंदी, हाथ में चूड़ी और गले में मंगलसूत्र-इन सब से लज्जा आने लगी, इन्हें धारण करना अनावश्यक लगने लगा और गर्व के साथ खुलकर अपनी पहचान प्रदर्शित करने में संकोच होने लग गया!
तथाकथित आधुनिकता के नाम पर आप लोगों ने स्वयं ही अपने रीति रिवाज, परंपराएं, संस्कार, भाषा, पहनावा सब कुछ पिछड़ापन समझकर त्याग दिया!
आज इतने वर्षों बाद आप लोगों की नींद खुली है तो आप अपने ही समाज के दूसरे लोगों को अपनी जड़ों से जुड़ने के लिये कहते फिर रहे हैं!
अपनी पहचान के संरक्षण हेतु जागृत रहने की भावना किसी भी सजीव समाज के लोगों के मन में स्वत:स्फूर्त होनी चाहिये, उसके लिये आपको अपने ही लोगों को कहना पड़ रहा है।
विचार कीजिये कि यह कितनी बड़ी विडंबना है! और क्या इस विडंबना के जिम्मेदार हम या हमारा मजहब है ?
आपकी समस्या यह है कि आप अपने समाज को तो जागा हुआ देखना चाहते हैं किंतु ऐसा चाहते समय आप स्वयं आगे बढ़कर उदाहरण प्रस्तुत करने वाला आचरण नहीं करते, जैसे बन गए हैं वैसे ही बने रहते हैं।
ठीक इसी प्रकार आपके समाज में अन्य सब लोग भी ऐसा ही आपके जैसा डबल स्टैंडर्ड वाला हाइपोक्रिटिकल व्यवहार करते हैं!
क्या यह भी हमारी त्रुटि है ??
दशकों से अपनी हिंदू पहचान को मिटा देने का कार्य आप स्वयं ही एक दूसरे से अधिक बढ़-चढ़ करते रहे, परंतु हम अपनी पहचान आज तक भी वैसे ही बनाए रखने में सफल रहे हैं। आपके स्थिति के जिम्मेदार आप स्वयं हैं ना कि हम मुसलमान।"
उनका ये लेख पढ़कर मैं तो निशब्द हो गई। जवाब देने के लिए कुछ था नहीं मेरे पास। अगर आपके पास उत्तर है, तो कमेंट में बताइएगा जरूर 🙏