इस नफ़रती जीव के सर पर आखिर किसका हाथ है जो @DelhiPolice@Uppolice@uttarakhandcops इसे गिरफ्तार करने के लिए तैयार नहीं है? ये आए दिन विवादित एवं ज़हरीले बयान देता है, लेकिन मजाल भला कि इसे गिरफ्तार करके इसका जुलूस निकाला जाए!
कौन थे मौलाना मोहम्मद अली जौहर…
सूर्यकांत पाठक
रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी पर संकट के बादल गहरा रहे हैं। समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान की इस यूनिवर्सिटी के 40 में से 38 भवनों को रामपुर विकास प्राधिकरण (RDA) ने अवैध घोषित कर दि��ा है। इन भवनों को ध्वस्त करने के लिए 15 दिन का अल्टीमेटम दिया गया है। यदि विश्वविद्यालय स्वयं इन भवनों को नहीं गिराता तो तय मोहलत के बाद आरडीए भवनों को जमींदोज करने की कार्रवाई शुरू करेगा। यह विश्वविद्यालय मौलाना मोहम्मद अली जौहर के नाम पर है, जो कि एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे।
रामपुर में 10 दिसंबर 1878 को जन्मे मौलाना मोहम्मद अली जौहर स्वतंत्रता सेनानी थे, जो कि खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेताओ�� में शामिल थे। इसके अलावा वे पत्रकार, कवि और शिक्षाविद भी थे। वे सन 1923 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे। जौहर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से पहले मुस्लिम लीग के भी अध्यक्ष रहे थे।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़े थे जौहर
मौलाना मोहम्मद अली जौहर की मां का नाम वैसे तो आबादी बानो बेगम था लेकिन उनको 'बी अम्मा' के नाम से सभी पहचानते थे। वे पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। उन्होंने प्राइमरी शिक्षा रामपुर में ही हासिल की थी। मैट्रिक की पढ़ाई उन्होंने बरेली के हाईस्कूल में ली थी। उन्होंने ग्रेजुएशन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से किया था। बीए में यूनिवर्सिटी में पहला स्थान हासिल करने के बाद सन 1897 में वे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचे। इसके लिंकन कॉलेज से उन्होंने सन 1898 में मॉर्डन हिस्ट्री में एमए की डिग्री हासिल की थी।
जौहर की मां और भाई भी थे स्वतंत्रता सेनानी
मौलाना मोहम्मद अली जौहर के परिवार में सिर्फ वे ही स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे बल्कि उनके भाई मौलाना शौकत अली और उनकी मांता बी अम्मा भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रही थीं। तब जौहर और उनके भाई शौकत को अली बंधु के रूप में पहचाना जाता था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद सन 1919 में तुर्की के खलीफा के समर्थन में और ब्रिटिश सल्तनत के खिलाफ अली बंधुओं ने भारत में खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व किया था।
‘बी अम्मा' की बनाई टोपी बन गई 'गांधी टोपी'
महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन को भी इस आंदोलन से जोड़कर अंग्रेजों का जोरदार विरोध किया गया था। इस आंदोलन में देश में अभूतपूर्व हिंदू-मुस्लिम एकता देखी गई की। इसी आंदोलन के दौरान बी अम्मा ने महात्मा गंधी को एक टोपी सिलकर दी थी। यही टोपी बाद में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और बाद में भी 'गांधी टोपी' के रूप में पहचानी जाती रही है।
मुस्लिम लीग और कांग्रेस के भी अध्यक्ष रहे
मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने सन 1906 में मुस्लिम लीग की सदस्यता लेकर अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था। सन 1917 में जौहर को नजरबंद कर दिया गया था। इसी दौरान उनको मुस्लिम लीग का अध्यक्ष चुना गया था। सन 1919 में वे कांग्रेस में शामिल हो गए थे और सन 1923 में उनको पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया था।
जौहर ने दो अखबार प्रकाशित किए
मोहम्मद अली जौहर पत्रकारिता करते हुए अंग्रेजों के खिलाफ मुखरता से लिखा करते थे। उन्होंने अंग्रेजी में 'कॉमरेड' और उर्दू में 'हमदर्द' नाम के अखबार निकाले थे। वे इन अखबारों में ब्रिटिश सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना करते थे और आम लोगों को जागरूक करते थे। मोहम्मद अली जौहर ने सन 1920 में अलीगढ़ में जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी। वे इसके सह संस्थापक थे। जामिया मिल्लिया इस्लामिया बाद में दिल्ली स्थानांतरित हो गई थी।
निधन लंदन में, सुपुर्द-ए-खाक यरुशलम में
मोहम्मद अली जौहर का देहांत सन 1931 में लंदन में हुआ था। वे तब गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए लंदन गए थे। चार जनवरी 1931 को उनका वहां निधन हो गया था। उनकी अंतिम इच्छा के मुताबिक उन्हें फिलिस्तीन के यरुशलम ले जाकर वहां की पवित्र मस्जिद अल-अक्सा के परिसर में दफनाया गया था।
(लेखक नवभारत टाइम्स (डिजिटल) में कंसल्टेंट हैं।)
जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर बड़ी ख़बर.
मुरादाबाद के मंडल आयुक्त आञ्जनेय कुमार सिंह ने DM रामपुर के आदेश पर रोक लगाते हुए ध्वस्तीकरण की कार्रवाई फ़िलहाल रोक दी है.
यूनिवर्सिटी की 40 इमारतों में से सिर्फ दो इमारतों का नक��शा पास रहने कि बात कही गई थी.
डीएम रामपुर ने 38 इमारतों को ध्वस्त करने के आदेश दिए थे. इस आदेश के खिलाफ लगातार आंदोलन जारी रहा है।
किसी के हिस्से खुशियाँ आई, किसी के हिस्से खुशियों कि मुस्कान आई.
मैं उस मूवमेंट का अब्दुल था, मेरे हिस्से में मेरी दुख भरी दास्तान आई…
-मुनव्वर राणा साहब से माज़रत के साथ.
यूपी के मुख्यमंत्री @myogiadityanath कानून व्यवस्था पर बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि उनके राज में ‘कमज़ोरों’ का जीना हराम हो गया है। इस वीडियो में दरिंदगी की इंतेहा हो रही है। इंसान के साथ जानवरों से बदतर सलूक किया जा रहा है। @dgpup साहब क्या @Uppolice इन बदमाशों का एनकाउंटर होगा? इनके घरों पर बुलडोज़र चलेगा?
मेरे पड़ोस के गांव ललियाना के निवासी ज़ुबैर अहमद तीन जुलई 1999 हिंद पहाड़ी पर शहीद हुए थे। उनके शरीर पर दुश्मन ने कुल 40 गोलियां मारी थी। कारगिल के शहीद ज़ुबैर अहमद के बच्चे भी जवान हो गए हैं। हमारी व्यवस्था शहीदों के नाम पर सिर्फ तमाशा करती है, ग्राउंड पर सब कुछ समतल है।
ललियाना गांव में ज़ुबैर अहमद की याद में ना तो कोई कॉलेज बन पाया, ना अस्पताल, कारगिल यु��्ध के दौरान जब तिरंगे में लिपटा ज़ुबैर का शव उनके गांव आया था, तो पूरे इलाक़े की आंखें नम थीं। तत्कालीन, विधायक, सांसद, अफसरों ने वादा किया था कि ललियाना को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली सड़क का नाम भी ज़ुबैर अहमद के नाम पर किया जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो पाया।
जब पूरा देश #KargilVijayDiwas का जश्न मना रहा हो तब यह सच मुंह चिड़ाता है। यह सिर्फ एक ज़ुबैर की नहीं बल्कि देश पर शहीद होने वाले अधिकतर शहीदों की दा���्तानें ऐसी ही हैं। आए दिन जंतर मंतर पर सेवानिवृत फौजी, शहीदों के परिवार पेंशन के लिए धरना प्रदर्शन करते रहते हैं।
सत्ताधारी, विपक्षी और देशभक्त एंव 'जागरुक' जनता कारगिल विजय दिवस का जश्न मना रही है, मनाना भी चाहिए, लेकिन इस जश्न में उन शहीदों को न भूला जाए जिन्होंने अपने प्राण दे��र आपको जश्न मनाने का मौक़ा दिया।
जस्टिस उज्जल भुइयां सुप्रीम कोर्ट के जज हैं। उन्होंने यह टिप्पणी अदालत की कार्यवाही में नहीं है बल्कि भोपाल की नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित पाँचवें जस्टिस जी.पी. सिंह मेमोरियल लेक्चर में अपने संबोधन के दौरा�� की है। उनके संबोधन का सिर्फ यही अंश नहीं बल्कि पूरा संबोधन ही शानदार है। लेकिन हमें बात ‘शानदार’ से आगे ले जानी है। ये बातें हॉल में तालियां पिटवाने के लिए ही नहीं कही जानी चाहिए। बल्कि अदालत की कार्यवाही में दिखनी भी चाहिए।
ज��्टिस उज्जल भुइयां सुप्रीम कोर्ट के जज हैं, जिस मामले का वो ज़िक्र कर रहे हैं, उसमें बिरयानी खाए जाने का कोई सबूत ही नहीं था। लेकिन इसके बावजूद मुस्लिम युवाओं को महीनों तक जेल में रखा गया। उन युवकों को ज़मानत भी हाईकोर्ट से मिली है। चूंकि गंगा में बिरयानी खाना कानून ‘अपराध’ नहीं है, इसलिए उन युवकों के मामले में नाविक को अगुवा करने और धमकी देने जैसे संगीन मामलों की धाराएँ जोड़ी गईं। दिल्ली में बैठे सुप्रीम कोर्ट के जजेस खुले आम उड़तीं कानून की इन धज्जियों को देखते रहे। सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान तक नहीं लिया।
अब सुप्रीम कोर्ट के जजेस कोर्ट के बाहर कितना ही शानदार भाषण दें, कितनी ही शानदार दलीलें दें, इनकी कोई अहमियत नहीं है। जब आपके हाथ में कलम है! तब तालियां आपके भाषणों पर नहीं बल्कि फैसलों पर बजनी चाहिए।
छात्रों ��ा आंदोलन समाप्त हुआ, लेकिन एक सवाल अब भी पूछे जा रहे हैं कि इतना बड़ा आंदोलन हुआ, जिस दिन छात्रों कि भीड़ पार्लियामेंट से कुछ मीटर दूर रेल भवन तक पहुँच गई उस दिन 20 टीयर गैस शैल चले, लेकिन राहुल गांधी और विपक्ष इसको Police Brutality बता रहे हैं, जबकि ये भी बताया जा रहा कि जहाँ 44 प्रोटेस्टर घायल हुए वहाँ 150 पुलिस वाले भी घायल हुए। फिर ऐसा कैसे मुमकिन है कि पुलिस ने लाठीचार्ज किया हो और पुलिस ही ज़्यादा घायल हुई ���ो। ये सारे सवाल अब भी अधूरे हैं।
दिल्ली का ‘जेन-जी’ आंदोलन समाप्त हो गया। आंदोलन के फायदे नुकसान पर बात होती रहेगी। लेकिन अब दूसरा पहलू भी देखिए! आंदोलनरत भीड़ संसद के सामने थी, उस भीड़ वहाँ से हटाने के लिए पुलिस ने एहतियात के तौर पर “सिर्फ़ 20 टीयर गैस शैल” चलाए। सवाल है कि पुलिस करती भी क्या? क्या उस भीड़ को संसद में घुसने देती? लाठीचार्ज का नैरेटिव अपनी जगह, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा? उसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? क्या वह ज़िम्मेदारी पुलिस फोर्स की नहीं है?
आंदोलन खत्म! अब ‘सरकार’ का काम शुरू हो गया है। जिस तथाकथित जेन-जी आंदोलन में युवाओं पर दर्ज हुए मुकदमे वापस लेने की मांग को भी माना गया ह��, क्या उस आंदोलन में ‘��ूसरे’ युवाओं के लिए भी कोई मांग है? युवाओं की जिन मांगो को माना गया है, क्या उनमें ये युवा नहीं आते? क्या इनके लिए आवाज़ उठेगी?
इस नफ़रती चिंटू का नाम सत्यम पंडित है। @Uppolice की अपराधियों के खिलाफ ज़ीरो टोलरेंस नीति में यह अपराधी शामिल नहीं है? यह आए दिन अपराध करता है, उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करता है, लेकिन मजाल भला कि @ghaziabadpolice इसके घर पर बुलडोजर चलाए, या एनकाउंटर करने का साहस जुटा पाए।
इस वीडियो में देखिए! यह अपराधिक रिकॉर्ड रखने वाला ‘जीव’ किस तरह बच्चों को प्रताड़ित कर रहा है। इन बच���चों का ‘कसूर’ यह था कि ये प्रोटेस्ट में गए थे। यह नफ़रती जीव उन्हें भद्दी गालियां दे रहा है, उनके साथ हाथापाई कर रहा है। ��्या @dgpup ऐसे अपराधियों से सख्ती से निपटने का निर्देश देंगे? क्या यूपी के मुख्यमंत्री @myogiadityanath ऐसे अपराधियों को ‘मिट्टी’ में नहीं मिलवाएंगे?
मुझे आजादी दो या कब्र के लिए दो गज जमीन…
अशोक उपाध्याय
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पास से गुजरते हुए एक सड़क का नाम आपको ठहरने पर मजबूर कर देगा- मौलाना मोहम्मद अली जौहर मार्ग। यह सिर्फ एक नाम नहीं, उस शख्स की याद है जिसने दिल्ली को अपनी कलम, आवाज और अपने जज्बे से आजादी की लड़ाई का महत्वपूर्ण मोर्चा बनाया। रामपुर में जन्मे मौलाना जौहर का दिल्ली से गहरा रिश्ता रहा। आजकल उनके नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय खबरों में है।
पत्रकारिता का केंद्र: जब 1911 में ब्रिटिश हुकूमत ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली शिफ्ट करने का ऐलान किया, तो मोहम्मद अली जौहर भी इस बद���ाव के साथ दिल्ली आ गए। वह तब तक कलकत्ता से अंग्रेजी साप्ताहिक अखबार 'द कॉमरेड' निकाल रहे थे। महंगे कागज पर छपने वाला यह अखबार अपनी बेबाक टिप्पणियों और राष्ट्रीय चेतना के प्रसार के लिए जल्द ही प्रसिद्ध हो गया। मौलाना जौहर दिसंबर 1912 में दिल्ली शिफ्ट हुए। 12 अक्टूबर 1912 को 'द कॉमरेड' का पहला दिल्ली संस्करण निकला।
हमदर्द की शुरुआत: आम जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए उन्होंने 1913 में दिल्ली से उर्दू दैनिक अखबार 'हमदर्द' भी शुरू किया। वह खुद इसके स���पादक थे। उनकी लेखनी इतनी प्रभावशाली थी कि ब्रिटिश अधिकारी भी इसे ध्यान से पढ़ते। लॉर्ड मिंटो ने एक बार कहा था कि भारत में मोहम्मद अली जौहर की कलम से ज्यादा खतरनाक कोई कलम नहीं। उनकी तीखी लेखनी से आजिज आ अंग्रेजी सरकार ने दोनों अखबारों पर रोक लगा दी। 1924 में उन्होंने फिर से प्रकाशन शुरू किया, पर बाद में बंद हो गया।
पहले वीसी: 1920 में खिलाफत और असहयोग आंदोलन के दौरान ��ौहर ने अलीगढ़ में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई। वह इसके पहले वाइस-चांसलर बने। बाद में यह संस्थान दिल्ली के करोल बाग में आ गया। जौहर शिक्षा को आजादी का सबसे बड़ा हथियार मानते थे। उन्होंने कहा था कि गुलाम देश की शिक्षा व्यवस्था गुलाम ही पैदा करेगी, इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान जरूरी हैं।
बापू से मतभेद: वह मुस्लिम लीग के अध्यक्ष रहे। 1923 में कांग्रेस के भी अध्���क्ष बने। हालांकि कुछ महीनों बाद ही संगठन में बढ़ते असंतोष के चलते वह पार्टी से अलग हो गए थे। शुरू में वह महात्मा गांधी के करीब थे, पर बाद में दोनों में राजनीतिक मतभेद उभरे। 1922 के चौरी-चौरा कांड के बाद जब गांधीजी ने असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया, तो जौहर निराश हो उठे थे।
अंतिम इच्छा: उन्होंने 1930 में लंदन के गोलमेज सम्मेलन में बीमार होने के बावजूद भाग लिया। वहां उन्होंने कहा, 'मुझे आजादी दो या क���्र के लिए दो गज जमीन। मैं गुलाम देश में लौटना ��हीं चाहता।' 4 जनवरी 1931 को लंदन में उनका निधन हो गया। अंतिम इच्छा के अनुसार उन्हें यरुशलम में दफनाया गया।
(लेखक नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में सीनियर डिजिटल कंटेंट प्रोड्यूसर हैं।)
यह वीडियो @themodernhp द्वारा पोस्ट किया गया है। वीड���यो में एक शख्स दो महिलाओं को पीट रहा है। पास में एक भीड़ खड़ी है, जो इस पिटाई का समर्थन कर रही है। महिलाओं पर आरोप है कि उन्होंने हिमाचल स्थित नागनी माता मंदिर में चोरी की ��ै। इसके बाद महिलाओं को जानवरों की तरह पीटा गया है।
देश में नियम है कि यदि कोई महिला अपराधी भी है तब भी उसे महिला पुलिसकर्मी ही गिरफ्तार करेगी। लेकिन यहां क्या हो रहा है? एक पुरुष द्वारा महिलाओं को जूते और डंडे से जानवरों की तरह पीटा जा रहा है। मंदिर में चोरी से अगर इतनी ही गुस्सा आया है, तो यह गुस्सा चढ़ावा चोरी की घटना पर कहाँ गायब हो गया था?
नोएडा में बैठकर नफ़रत फैलाने ज़हरीले ‘एंकर/एंकराइन’ ही नहीं बल्कि कुछ ‘यू-ट्यूबिए’ भी नफ़रत फैलाते हैं। ध्यान रहे! लोगों के मूल भूत मुद्दों के बजाय अगर हर वक्त नफ़रत ही फैलाओगे, तो विरोध का सामना करना ह�� पड़ेगा। अभी भी वक्त है! पत्रकारिता के नाम पर समाज में विष फैलाने का कृत्य ना करो।