कभी-कभी बैठकर सोचता हूँ, अगर कोई व्यक्ति बचपन से ही सबके लिए खड़ा रहा हो बिना किसी शर्त के, बिना किसी “लेकिन” के, बिना किसी सौदेबाज़ी के, तो उसके भीतर किस तरह का संसार बसता होगा? और फिर यदि उसी संसार को बार-बार उपेक्षा, तिरस्कार, दुत्कार, छल और धोखे से तोड़ा जाए तो वह व्यक्ति आखिर भीतर से कैसा रह जाता होगा?
मैं ये प्रश्न किसी और से कम, स्वयं से अधिक पूछता हूँ।
बचपन में हमें सिखाया जाता है कि अच्छे बनो, सबकी मदद करो,अपनों के लिए त्याग करो। हम सचमुच विश्वास कर लेते हैं कि निस्वार्थता ही जीवन का सबसे ऊँचा धर्म है। और फिर हम उसी धर्म का निर्वाह करते रहते हैं परिवार के लिए, रिश्तेदारों के लिए, मित्रों के लिए, शिक्षकों के लिए…हर उस व्यक्ति के लिए जिसे हम अपना मानते हैं। हम थकान नहीं गिनते, हम अपमान नहीं गिनते, हम अपने हिस्से की इच्छाएँ तक स्थगित कर देते हैं।
पर धीरे-धीरे एक अजीब सन्नाटा पनपने लगता है। जब हर बार तुम्हें ही समझौता करना पड़े।जब हर गलती का बोझ तुम्हारे कंधे पर डाल दिया जाए। जब तुम्हारे त्याग को स्वाभाविक और तुम्हारे दर्द को अतिशयोक्ति कहा जाए। तब भीतर कहीं एक महीन दरार पड़ती है।
शुरुआत में वह दरार दिखाई नहीं देती। व्यक्ति मुस्कुराता रहता है, निभाता रहता है, अपने को समझाता रहता है कि कोई बात नहीं, यही जीवन है, अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। लेकिन अपेक्षा करना मानवीय है। सम्मान की चाह रखना अपराध नहीं है। स्नेह की प्रत्याशा स्वार्थ नहीं है।
जब वर्षों तक इन मूल मानवीय जरूरतों को नकारा जाता है, तब मन में एक धीमा विष जमा होने लगता है। वह अचानक नहीं फैलता। वह बूंद-बूंद रिसता है हर अपमान के साथ, हर धोखे के साथ, हर उस क्षण के साथ जब तुम्हारी सच्चाई को हल्के में लिया जाता है।
और फिर एक दिन वही मन जो कभी सबके लिए पिघलता था, कठोर होने लगता है। तुम्हें लोग स्वार्थी दिखने लगते हैं। हर मुस्कान में गणित दिखता है। हर संबंध में लाभ-हानि का हिसाब दिखता है।
तुम्हें स्वयं से भी घिन आने लगती है कि तुम इतने सरल क्यों थे और सबसे भयानक बात ये है कि जब तुम्हारा आक्रोश बाहर आता है, जब तुम्हारा मौन भारी हो जाता है, जब तुम पीछे हटने लगते हो तब भी दोषी तुम्हें ही ठहराया जाता है ये कहकर कि तुम बदल गए हो, तुम नकारात्मक हो गए हो, तुम्हारे भीतर कड़वाहट आ गई है।
कोई ये नहीं पूछता कि ये कड़वाहट उगी कहाँ से, कोई ये नहीं देखता कि जिस व्यक्ति को आज कठोर कहा जा रहा है, वही कभी सबसे अधिक कोमल था।
सच्चाई यही है कि निरंतर उपेक्षा मन को विषैला बना देती है। वह ज्वालामुखी बनता है, बाहर से शांत, भीतर से लावा से भरा हुआ और जब वह फटता है तो सबसे पहले उसी व्यक्ति को झुलसा देता है जिसके भीतर वह पल रहा था। नफ़रत धीरे-धीरे दूसरों से अधिक स्वयं को खाती है।
मैं मानता हूँ कि ये जीवन बहुतों का है। बहुत लोग ऐसे हैं जो निभाते-निभाते भीतर से टूट जाते हैं। जो दूसरों की ढाल बनते-बनते स्वयं नंगे खड़े रह जाते हैं। जो सबकी सुनते-सुनते अपने मन की आवाज़ पहचानना भूल जाते हैं।
लेकिन एक और सत्य है, यदि ये विष भीतर ही भीतर पलता रहा तो अंततः वह जीवन की दिशा को अंधकार में ले जाएगा। नफ़रत स्थायी निवास नहीं है; वह अस्थायी प्रतिक्रिया है। घृणा समाधान नहीं है; वह थके हुए मन का बचाव है।
शायद जीवन की दिशा तब बदलती है जब व्यक्ति पहली बार यह स्वीकार करता है कि मैं भी महत्वपूर्ण हूँ। जब वह सीमाएँ खींचना सीखता है। जब वह बिना अपराधबोध के “न” कहना सीखता है। जब वह ये समझता है कि त्याग और आत्म-उपेक्षा एक ही चीज़ नहीं हैं।
दर्द को नकारना समाधान नहीं है। उसे पहचानना, स्वीकारना और उसकी जड़ों को समझना यही शायद पहला उपचार है।
मैं ये नहीं कहता कि सब अचानक बदल जाएगा। जो वर्षों से जमा हुआ है, वह एक दिन में नहीं धुलेगा। लेकिन यदि मन में ये बोध जाग जाए कि मेरी करुणा मेरी कमजोरी नहीं थी, बस उसका दुरुपयोग हुआ तो शायद भीतर की आग थोड़ी शांत हो सके।
जीवन को नफ़रत में बदल देना आसान है। विश्वास को पुनः गढ़ना कठिन है। पर अंततः वही व्यक्ति विजयी होता है जो अपने भीतर के विष को पहचानकर उसे धीरे-धीरे बाहर निकालने का साहस रखता है। क्योंकि यदि हम भी वही बन जाएँ जिससे हमें घृणा है, तो हमारे सारे त्याग, सारे संघर्ष व्यर्थ हो जाएँगे।
शायद दिशा ये नहीं कि हम कठोर हो जाएँ। दिशा ये है कि हम सजग हो जाएँ। निष्क्रिय सहने वाले नहीं, बल्कि आत्मसम्मान के साथ खड़े रहने वाले बनें। और तब शायद ये ज्वालामुखी राख में बदल जाए, ऐसी राख जिसमें से एक दिन फिर से कोई नया, संतुलित, शांत जीवन अंकुरित हो सके। 🩶🤗
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
कभी–कभी जीवन हमें ऐसे आईने दिखा देता है, जिनमें अपना चेहरा कम और अपनों का चरित्र ज़्यादा साफ़ दिखाई देता है। वर्षों तक किसी के लिए खड़े रहना, बिना हिसाब–किताब के साथ देना, बिना ये जताए कि हम दे रहे हैं ये अपने आप में एक संतोष था। ये विश्वास था कि संबंध लेन–देन की रसीदों पर नहीं टिके होते, वे भरोसे की मिट्टी में उगते हैं।
हम अक्सर खुद को सौभाग्यशाली मान लेते हैं कि हमारे पास कुछ ऐसे लोग हैं जो हमारे जीवन के अनमोल रत्न हैं। हम उन्हें सहेजते हैं, उनके लिए समय निकालते हैं, उनकी मुश्किलों में बिना शर्त उतर जाते हैं। और सच कहूँ तो उस समय मन में कोई अपेक्षा भी नहीं होती। बस ये भाव होता है कि साथ होना ही पर्याप्त है।
लेकिन समय का एक स्वभाव है, वह परखता है। वह बिना शोर किए, बिना घोषणा किए एक छोटी-सी परिस्थिति सामने रख देता है। कभी आवश्यकता हमारी नहीं होती, फिर भी हम देखना चाहते हैं कि यदि ज़रूरत पड़े तो सामने वाला कितना साथ देगा, और वहीं बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है।
कभी–कभी लोग सक्षम होते हुए भी इच्छाशक्ति में असमर्थ हो जाते हैं। कभी साधन होते हुए भी संवेदना कम पड़ जाती है। कभी सहायता बड़ी नहीं चींटी से भी छोटी होती है, पर उस छोटी-सी तत्परता में ही संबंधों का वास्तविक आकार छिपा होता है।
जब वह भी नहीं मिलता, तब दुख सहायता के अभाव से कम और विश्वास के टूटने से अधिक होता है। तब मन में एक टीस उठती है कि हमने जो समय दिया, जो ऊर्जा दी, जो समर्पण दिया वह क्या एकतरफा था?
पर शायद ये भी एक सीख ही है। जीवन सिखाता है कि उदार रहो, पर अंधे मत रहो। विश्वास रखो, पर विवेक को सोने मत दो। संबंधों में पूरी तरह डूबने से पहले कभी-कभी पानी की गहराई नाप लेना बुरा नहीं। क्योंकि बड़ी चोट अक्सर वहीं लगती है जहाँ हमने कवच उतार दिया होता है।
इसका अर्थ ये बिल्कुल नहीं कि हम कठोर हो जाएँ, या हर व्यक्ति को शक की नज़र से देखें। बल्कि इसका अर्थ इतना भर है कि अपने समय और भावनाओं का मूल्य समझें। देने में कंजूसी नहीं, पर स्वयं को व्यर्थ खर्च कर देना भी बुद्धिमानी नहीं।
कभी–कभी लोग हमारे जीवन में इसलिए आते हैं कि हम सीख सकें, कौन हमारे साथ चलने योग्य है और कौन सिर्फ़ राह का यात्री था, और ये पहचान देर से हो, तो भी ठीक है; कम से कम भ्रम की उम्र लंबी नहीं रहती।
इसलिए ये समझ लीजिए कि सहायता देना कभी व्यर्थ नहीं जाता। वह हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बनती है, हमारे चरित्र को मजबूत करती है, पर साथ ही ये समझ भी जरूरी है कि हर मुस्कान, हर निकटता, हर प्रशंसा निष्ठा की गारंटी नहीं होती।
जीवन में लोगों को परखना अविश्वास नहीं है, वह आत्म-सुरक्षा है, और आत्म-सुरक्षा स्वार्थ नहीं परिपक्वता है।
तो अब आगे बढ़ते हुए इतना ध्यान रहे हम उदार रहें, पर सजग भी। दिल खुला रहे, पर आँखें भी खुली रहें। क्योंकि संबंध तभी सुंदर होते हैं जब दोनों ओर से समान रूप से धड़कनें सुनाई दें।🩶
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
आजकल रिश्ते जल्दी टूटते हैं, क्योंकि लोग अपने अंदर के खालीपन और अधूरी उम्मीदों को साथ लेकर मिलते हैं। अगर पहले खुद को संभाला और समझा न जाए, तो किसी और के साथ रिश्ता भी अधूरा ही रहेगा। पहले खुद को पूरा करो, तभी कोई रिश्ता सही मायनों में टिक सकता है।
जब प्रेम
हाथ छुड़ा कर जा रहा हो
तो उसे रोकना नहीं चाहिए...
क्योंकि,
जब वो हाथ छुड़ा रहा था
दरसअल प्रेम तो
उसके पहले ही
जा चुका था....!!
~अंजना टंडन(@anjafi)
और फिर तुम्हारे जाने के बाद जिंदगी ने एक अजीब सा हल्कापन महसूस कराना शुरू कर दिया। पहले जो हर चीज़ में बोझ सा महसूस होता था, वही अब कहीं पीछे छूट गया है। हर सुबह उठकर जब खिड़की से बाहर देखता हूं, तो लगता है जैसे हवा भी किसी बोझिल तन्हाई से मुक्त हो चुकी है। तुम्हारे आने से पहले और जाने के बाद शायद यही फर्क है। अब किसी चीज़ में कोई दबाव, कोई उम्मीद या कोई अधूरी चाहत महसूस नहीं होती।
सच कहूं तो तुम्हारे साथ बिताए हर पल की यादें अब किसी कड़वी सीख की तरह हैं, जो बिना किसी भ्रम के साफ-साफ दिखाती हैं कि तुम अपने लिए जी रही थी, किसी और के लिए नहीं। तुम्हारे भीतर की दुनिया, तुम्हारी महत्वाकांक्षा, तुम्हारी खुद की खोज वो सब इतनी ताकतवर थी कि किसी और का होना, कोई और समझ पाना, बस नामुमकिन ही था। शायद मैं ये कभी मानना नहीं चाहता था, लेकिन अब मान चुका हूं कि तुम्हारे लिए मैं बस एक पड़ाव भर था जिसे पार कर तुम अपनी उड़ान की ओर बढ़ी।
यकीन मानो ! तुम्हारे जाने के बाद भी जो खालीपन महसूस हुआ,वो असली नहीं था। असली खालीपन तो उस भ्रम का था जिसमें मैं अपने आपको तुम्हारे सपनों के हिस्से के रूप में देखता रहा। अब वो भ्रम टूट गया है। अब मैं देख सकता हूं कि तुम्हारा सच क्या था, तुम किसी के लिए नहीं बनी थी। तुम्हारे भीतर की दुनिया इतनी आत्मकेंद्रित और अपने लिए है कि किसी और की उम्मीदों, किसी और के प्यार, किसी और की ज़रूरत का वहां कोई स्थान नहीं था।
ये एहसास दर्द भी देता है, लेकिन उससे भी ज्यादा राहत है। क्योंकि अब मुझे उस झूठे बोझ से मुक्ति मिल गई है, जिसे मैंने खुद अपने भीतर पैदा कर रखा था। अब मुझे किसी तरह की कोशिश करने की जरूरत नहीं है, किसी तरह की आशा या अपेक्षा पालने की जरूरत नहीं है। अब मैं सिर्फ अपनी जिंदगी में हूं, अपनी रफ्तार में, अपनी सांसों के हिसाब से।
कितनी अजीब बात है न, कि इस खालीपन में भी एक तरह की खुशी है, एक शांति है। ये शांति इस बात की है कि मैंने खुद को ढूंढ लिया है, अपनी असली जगह पर आ गया हूं। तुम्हारी दुनिया, तुम्हारे खेल, तुम्हारी महत्वाकांक्षा सब अब मुझसे दूर हैं,और मैं अब सिर्फ अपनी दुनिया में हूं जिसमें तुम्हारा कोई हिस्सा नहीं है।
सच कहूं तो अगर ये रास्ता शुरू में ही अलग होता, तो शायद ही मैं इतनी गहराई तक खुद को खोता। लेकिन अब जो हुआ वो भी जरूरी था। तुम्हारा जाना, तुम्हारे रहस्य और तुम्हारी महत्वाकांक्षा ये सब मुझे सिखा गया कि कभी-कभी किसी के लिए जीना, किसी के लिए चाहना, किसी के लिए उम्मीद रखना, सिर्फ खुद को कमजोर बनाना होता है।
अब मैं खुश हूं। हां, खुश हूं। बिना किसी भ्रम के, बिना किसी छलावे के। अब मुझे किसी की जरूरत नहीं है, न किसी की मान्यता की, न किसी की मोहब्बत की। अब मैं सिर्फ अपने भीतर की आवाज़ सुनता हूं और उसी पर चलने का साहस रखता हूं। तुम्हारा सच और तुम्हारा जाना, दोनों ही मेरी आज़ादी बन गए हैं।
और इसी आज़ादी में मुझे लगता है कि जीवन का असली अर्थ कहीं न कहीं छिपा है,खुद को पहचानने में, अपनी सीमाओं और अपनी ताकत को समझने में। तुम्हारी मौजूदगी, तुम्हारी बातें ये सब अब मेरे लिए सिर्फ एक याद बनकर रह गई हैं, जिसे मैं बिना किसी दर्द के स्वीकार कर सकता हूं।
जीवन अब भारी नहीं है, अब बोझिल नहीं है। अब हर कदम, हर सांस, हर पल सिर्फ मेरा है। और ये एहसास, ये हल्कापन, ये शांति ,ये सब तुम्हारे जाने के बाद ही तो मिला है। शायद यही जिंदगी का सबसे बड़ा सच है ।कभी-कभी किसी को खोना ही सबसे बड़ी जीत होती है, और तुम्हारा जाना मेरी सबसे बड़ी जीत बन गया है।❤️🔥
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
एक अजीब-सी नफ़रत लोगों के भीतर इस कदर भर गई है कि अब इंसान सामने वाले को समझना नहीं, उसे पराजित करना चाहता है। संवाद का स्थान शोर ने ले लिया है, तर्क की जगह आरोप खड़े कर दिए गए हैं और संवेदना को कमजोरी मान लिया गया है। हर कोई स्वयं को सही सिद्ध करने की होड़ में इतना अंधा हो चुका है कि सामने खड़े व्यक्ति की मनुष्यता तक दिखाई नहीं देती। ऐसा प्रतीत होता है मानों संतुष्टि अब साथ चलने से नहीं, बल्कि दूसरे को गिरते देखने से मिलती हो।
ये संघर्ष अब सच और झूठ का नहीं रहा। सच तो कब का भीड़ में दबा दिया गया। ये लड़ाई अब वर्चस्व की है, कौन ज़्यादा ऊँची आवाज़ में बोलेगा, कौन ज़्यादा लोगों को अपने पक्ष में खड़ा करेगा और कौन दूसरे को पूरी तरह चुप करा देगा। यहाँ सही होना पर्याप्त नहीं, शक्तिशाली दिखना ज़रूरी है, और इस दिखावे की कीमत इंसान अपनी संवेदना, विवेक और नैतिकता से चुका रहा है।
लोग अब किसी मुद्दे पर खड़े नहीं होते, वे किसी खेमे में शामिल होते हैं। सोच स्वतंत्र नहीं रही, उधार की हो चुकी है। जो आपके पक्ष में है, वही सही है भले ही वह गलत हो। और जो आपके विरुद्ध है, वही अपराधी है भले ही वह सच बोल रहा हो। इस मानसिकता ने न्याय को तमाशा और पीड़ा को मनोरंजन बना दिया है। किसी की बर्बादी पर तालियाँ बजती हैं और किसी की चीख़ों पर बहस होती है।
विडंबना देखिए कि ये सब सामान्य लगने लगा है। नफ़रत अब शर्म की नहीं, गर्व की चीज़ बन गई है। कठोरता को सच्चाई और क्रूरता को स्पष्टवादिता कहकर पेश किया जा रहा है। जो शांत है, उसे कायर कहा जा रहा है और जो संयमित है, उसे पक्षपाती। मानों मानवता अब अप्रासंगिक हो चुकी हो और केवल जीत ही अंतिम मूल्य रह गया हो।
इस वर्चस्व की लड़ाई में कोई विजेता नहीं होता, ये बात लोग समझना नहीं चाहते। यहाँ हर जीत के साथ कुछ और मरता है; कभी विश्वास, कभी संबंध, कभी समाज की आत्मा। अंततः जब धुआँ छँटता है, तो हाथ में केवल खोखलापन बचता है। पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, क्योंकि जिसे हमने हराने की कोशिश की होती है, दरअसल उसी प्रक्रिया में हमने स्वयं को भी नष्ट कर लिया होता है।
यकीन मानिए अगर यही रास्ता चलता रहा तो एक दिन नफ़रत ही हमारी पहचान बन जाएगी। और तब हम एक-दूसरे को नहीं, अपने ही प्रतिबिंब को देखकर डरेंगे क्योंकि उसमें इंसान नहीं, केवल अहंकार और हिंसा का चेहरा शेष रहेगा। 🤗
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
कभी-कभी आप सोचते हैं कि काश सब कुछ सहजता से हो जाए, बिना ज़्यादा शोर के, बिना अतिरिक्त संघर्ष के, बस वैसे ही जैसे सुबह की पहली रौशनी धीरे-धीरे कमरे में फैल जाती है। इसी चाह में आप तरह-तरह के उपाय करते हैं। कभी खुद को समझाते हैं, कभी हालात से सौदेबाज़ी करते हैं, कभी लोगों से उम्मीदें जोड़ते हैं और कभी ईश्वर से चुपचाप कुछ मांग लेते हैं। भीतर एक विश्वास पलता रहता है कि शायद इस बार सब कुछ सरल हो जाएगा, इस बार रास्ते में कम कांटे होंगे।
आप योजनाएँ बनाते हैं, अपने शब्दों को सहेजते हैं, अपने व्यवहार को थोड़ा और संयमित करते हैं। आप सोचते हैं कि अगर आप ज़रा और धैर्य रख लें, ज़रा और समझदारी दिखा दें, तो परिस्थितियाँ भी नरम पड़ जाएँगी। कई बार आप अपने स्वभाव से भी समझौता कर लेते हैं, सिर्फ इसलिए कि चीज़ें बिगड़ें नहीं, उलझें नहीं। भीतर-ही-भीतर एक थकान जन्म लेती है, लेकिन आप उसे नाम नहीं देते, बस चलते रहते हैं।
धीरे-धीरे ये एहसास होने लगता है कि सरलता केवल उपायों से नहीं आती। जितना अधिक आप सब कुछ नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं, उतना ही जीवन अपनी जटिलता दिखाने लगता है। कुछ चीज़ें होती हैं जो आपकी कोशिशों से परे होती हैं। कुछ रिश्ते होते हैं जो आपकी हर सावधानी के बावजूद टूटने की जिद पर अड़े रहते हैं। कुछ हालात ऐसे होते हैं जो आपके हर समाधान को नकार कर आपको खाली हाथ खड़ा कर देते हैं।
तब आप खुद से सवाल करते हैं कि क्या गलती आपके प्रयासों में थी या आपकी अपेक्षाओं में। शायद आप बहुत ज़्यादा सरलता चाहते थे उस जीवन से जो मूल रूप से ही अधूरा और असंतुलित है। शायद आप ये भूल गए थे कि सहजता कभी-कभी स्वीकार करने से आती है, बदलने से नहीं। ये समझ धीरे-धीरे उतरती है, किसी भारी सत्य की तरह, जिसे एक बार जान लेने के बाद अनदेखा नहीं किया जा सकता।
आप ये भी महसूस करते हैं कि हर उपाय आपको कहीं न कहीं थोड़ा-सा बदल देता है। आप कम बोलने लगते हैं, ज़्यादा सहने लगते हैं। आप मुस्कुराते हैं, लेकिन भीतर कुछ दरक जाता है। आप सब कुछ ठीक रखने की कोशिश में खुद को पीछे छोड़ देते हैं। ये कोई अचानक होने वाली बात नहीं होती, ये रोज़ की छोटी-छोटी चुप्पियों में घटता है।
फिर एक दिन आप थककर रुक जाते हैं। आप स्वीकार कर लेते हैं कि सब कुछ सरल नहीं होगा, और शायद होना भी नहीं चाहिए। जीवन की जटिलता ही आपको गहराई देती है, आपको देखने की नई दृष्टि देती है। आप समझ जाते हैं कि उपाय करना बुरा नहीं है, पर हर बार समाधान मिल ही जाए ये ज़रूरी नहीं। कभी-कभी उपाय केवल ये सिखाने आते हैं कि कहाँ आपको खुद को छोड़ देना है।
उस दिन के बाद आपकी डायरी में शब्द बदल जाते हैं। शिकायतें कम होती हैं, स्वीकार्यता बढ़ती है। आप अब भी चाहते हैं कि चीज़ें सहज हों, पर आप उनसे जूझने के लिए खुद को कठोर नहीं बनाते। आप जानते हैं कि हर उलझन आपकी हार नहीं है, और हर सरलता आपकी जीत नहीं। आप बस इतना करते हैं कि जो आपके हाथ में है, उसे ईमानदारी से निभाते हैं, और जो नहीं है, उसे शांति से छोड़ देते हैं।
सच मानिए यहीं से एक अलग तरह की सरलता शुरू होती है बाहरी नहीं, भीतर की। ये सरलता उपायों से नहीं आती, बल्कि इस समझ से आती है कि हर प्रश्न का उत्तर आपके पास होना ज़रूरी नहीं। कुछ प्रश्न ऐसे ही रहते हैं, और शायद वही आपको मनुष्य बनाए रखते हैं।🩶
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
कभी-कभी आप बहुत बेबस हो जाते हैं। इतने बेबस कि शब्द साथ छोड़ देते हैं, तर्क थककर बैठ जाते हैं और आत्मविश्वास किसी कोने में दुबक जाता है। उस समय न रोना राहत देता है, न मुस्कुराना ढाल बन पाता है। बस भीतर कहीं एक खालीपन पसर जाता है, जो शोर नहीं करता पर लगातार मौजूद रहता है।
ऐसी बेबसी अक्सर अचानक नहीं आती। ये धीरे-धीरे बनती है। छोटी-छोटी उपेक्षाओं से, बार-बार टूटे भरोसों से और उन अपेक्षाओं से जो आपने किसी से नहीं, खुद से लगा रखी थीं। आप हर संभव कोशिश करते हैं समझाने की, संभालने की, निभाने की लेकिन फिर एक दिन महसूस होता है कि आपकी कोशिशें किसी बंद दरवाज़े पर सिर पटकने जैसी हो गई हैं। दरवाज़ा न खुलता है, न टूटता है, बस आप ही घायल होते जाते हैं।
उस समय सबसे कठिन ये नहीं होता कि लोग साथ नहीं हैं। सबसे कठिन ये होता है कि आप खुद को भी पूरा साथ नहीं दे पा रहे। भीतर से आवाज़ आती है "और कितना करोगे?" लेकिन आदत है चलते रहने की, इसलिए आप रुकते नहीं। बाहर से सब सामान्य दिखता है, भीतर सब बिखरा होता है। आप बातचीत करते हैं, काम करते हैं, हँस भी लेते हैं, पर वास्तव में आप बस निभा रहे होते हैं।
बेबसी तब और गहरी हो जाती है जब आप सही होकर भी असहाय होते हैं। जब आपके पास सच्चाई होती है, पर उसे साबित करने की ताक़त नहीं। जब आप जानते हैं कि आप गलत नहीं हैं फिर भी हालात आपके पक्ष में नहीं। उस वक्त मन बार-बार पूछता है क्या सही होना काफी नहीं? शायद नहीं। दुनिया अक्सर ताक़त, शोर और सुविधा के साथ चलती है; सच्चाई कई बार पीछे छूट जाती है।
कभी-कभी बेबसी रिश्तों में जन्म लेती है। जब आप किसी के लिए लगातार उपलब्ध रहते हैं, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर आपको ही इंतज़ार करना पड़ता है। जब आपकी चुप्पी को आपकी सहमति समझ लिया जाता है। आप बोलना चाहते हैं, पर जानते हैं कि बोलने से कुछ सुधरेगा नहीं, उल्टा और बिगड़ सकता है। तब आप चुप रहना चुनते हैं, और यही चुप्पी धीरे-धीरे बोझ बन जाती है।
इस बेबसी में एक अजीब थकान होती है। शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक। नींद आती है, पर आराम नहीं मिलता। सुबह होती है, पर ताजगी नहीं आती। आप खुद से कहते हैं कि ये भी गुजर जाएगा, लेकिन ये “भी” बहुत लंबा लगने लगता है। समय चलता रहता है, आप भी चलते रहते हैं, पर भीतर कुछ ठहरा रहता है।
फिर भी इस बेबसी का एक सच यही है कि ये आपको भीतर तक ईमानदार बना देती है। ये आपको दिखाती है कि आप कहाँ कमजोर हैं, कहाँ जरूरत से ज़्यादा उम्मीद लगाए बैठे थे, और कहाँ आपने खुद को नजरअंदाज़ किया। ये एहसास कड़वा होता है, पर जरूरी भी। क्योंकि यहीं से धीरे-धीरे स्वीकार की शुरुआत होती है, स्वीकार कि हर चीज़ आपके नियंत्रण में नहीं, हर लड़ाई आपको ही नहीं लड़नी, और हर मोर्चे पर जीत ही जीवन का प्रमाण नहीं।
कभी-कभी बस टिके रहना भी बहुत बड़ी बात होती है। बिना शोर, बिना शिकायत, बिना किसी को दोष दिए। बस आज का दिन काट लेना, बस खुद को पूरी तरह टूटने से बचा लेना। ये कोई कम साहस नहीं। ये वही साहस है जो दिखता नहीं पर आपको अगली सुबह तक ले आता है।
सच कहूं तो ये लिखते हुए भी मैं पूरी तरह मजबूत नहीं हूँ। बस इतना जानता हूँ कि ये बेबसी मेरी स्थायी पहचान नहीं है। ये एक पड़ाव है लंबा, थकाऊ, चुपचाप पर अंतहीन नहीं। शायद अभी जवाब नहीं हैं, शायद अभी रास्ता साफ नहीं, पर इतना तय है कि भीतर कहीं एक छोटा-सा हिस्सा अब भी हार मानने को तैयार नहीं। वही हिस्सा मुझे लिखने देता है, सांस लेने देता है, और अगला कदम उठाने की संभावना जिंदा रखता है।
और शायद कभी-कभी इतना ही काफी होता है।🩶
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
एक खत उसके नाम जो पढ़ेगी भी नहीं...
तुम्हें मुझसे बिछड़े पूरे 8 साल गुज़र गए और मुझे तुमसे बिछड़े 2920 दिन, हर एक दिन मेरे लिए एक साल के बराबर था अब महसूस करो मेरा दर्द मैं कितने सालों से तुमसे दूर हूं..! इस दर्द को मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता मगर इन सालों में मैं इन्हीं शब्दों में उलझा हुआ हूं रोज तुम्हारी पीड़ा में ग़ज़ल/शेर/शायरी/कविता पढ़ता हूं और लोगों को भी इसमें शामिल करता हूं कि शायद कोई और भी होगा इस दर्द में, बहुत कुछ अपना भी लिखा मगर शायद तुमने कभी पढ़ा ही नहीं होगा क्योंकि तुम्हारे लिए वो सब बकवास होंगे।
तुम अपनी दुनिया में खुश हो, मेरी भी इच्छा यही है कि तुम खुश रहो, मगर एक सवाल जिसका जवाब मैं कभी जान नहीं पाया या ही शायद कभी जान पाऊं कि मुझे 10 वर्षों तक प्रेम करने के बाद अचानक बेवजह मुझे क्यों छोड़ दिया गया.. एक बार कह देते की तुम ऊब गए हो मुझसे तो मैं अपना मन मारकर सह लेता वो बात मगर शायद किसी और का तुम्हारा हो जाना मुझे छोड़ने की वजह थी। खैर जो भी हो अब उन बातों में क्या पड़ना मेरे लिए तुम आज भी वही हो बस मेरी नहीं हो...
मुझे हफ्ते में एक या दो बार तुम सपनों में मिल जाती हो और मैं सोच लेता हूं कि तुम यही हो
हमें बात करें भी कई साल हो गए तुम्हें आखिरी बार 3 साल पहले देखा था उम्मीद है कि अगले साल वो दिन आए जब मैं तुम्हें देख पाऊं...
हम जनवरी में ही मिले थे 18 साल पहले जब तुमने मेरे प्यार के प्रस्ताव को स्वीकारा था और मुझे खुद फोन पर ये बात बताई थी उस दिन मैं अपने दोस्तों के साथ 3 इडियट फिल्म देख रहा था सिनेमा हॉल में.. आज मैंने पढ़ा कि उसके सिक्वल को ये कहकर उसके कलाकारों ने मना कर दिया कि हम बुड्ढे हो गए अब कॉलेज स्टूडेंट नहीं लग सकते... ये पढ़कर मुझे लगा कि मेरा प्यार आज भी जवान है क्यों न एक खत ही तुम्हें लिख दूं तुम पढ़ोगी तक बिल्कुल नहीं ये मालूम होने के बावजूद...
तुम्हें आने वाली जनवरी की ढेर शुभकामनाएं मुझे जनवरी से लगाव था क्योंकि हमारा मिलना और तुम्हारा जन्मदिन इसी महीने में था लेकिन अब नहीं जनवरी भाती क्योंकि हमारा बिछड़ना भी इसी जनवरी में था..!!
तुम्हारा 19 वर्षों से निस्वार्थ प्रेमी...
सच कहूं तो अब रातों में ही सुकून है। जैसे दिन का पूरा शोर, सारी उधेड़बुन, सारे चेहरे, सारे सवाल अंधेरा होते ही अचानक किनारे हो जाते हैं। रात अपने साथ एक अजीब-सी उदासी तो लाती है, लेकिन उसी के भीतर कहीं एक शांत-सा ठिकाना भी होता है। जहाँ कोई आवाज़ नहीं, कोई उम्मीद नहीं, कोई जवाब नहीं, बस मैं हूँ और मेरा कमरा है।
ये चार दीवारें मेरे लिए दुनिया बन चुकी हैं। लोग कहते हैं कि अकेलापन काटने लगता है, लेकिन मुझे लगता है कि अकेलापन भी एक कला है, इसे धीरे-धीरे सीखा जाता है और बड़े धैर्य से निभाया जाता है। मैंने इस कमरे की ख़ामोशियों को समझना सीख लिया है। यहाँ हर चीज़ अपनी जगह पर जमी रहती है। मेरी किताबें, मेरा बिस्तर, मेरी मेज़ और वो खिड़की जिससे रात की ठंडी हवा अंदर आती है और मुझे याद दिलाती है कि बाहर की दुनिया भले बड़ी है, पर मेरा सुकून सिर्फ़ यहीं है।
दिन में बहुत कुछ होता है लोग मिलते हैं, बातें होती हैं, कभी-कभी हँसी भी छूटती है। लेकिन भीतर का शोर वहीं का वहीं रहता है। रात आते ही वो शोर धीरे-धीरे कम होने लगता है, जैसे किसी ने भीतर बजती तेज़ आँधी का वॉल्यूम धीरे-धीरे कम कर दिया हो। जब पूरा शहर थककर सो जाता है, तभी मेरे अंदर की जागती हुई बेचैनियाँ थोड़ी शांत होती हैं। मुझे लगता है कि रातें मुझे समझती हैं, दिन की तरह मुझसे कोई उम्मीद नहीं रखतीं।
रातों में मैं अपने असली रूप में होता हूं जहां न मज़बूत बनने की ज़रूरत, न खुश दिखने की, न किसी को कुछ साबित करने की। ये कमरा मुझे जैसे मेरी चुप्पियों, मेरी थकान, मेरे डर, मेरी छोटी-छोटी खुशियों के साथ स्वीकार कर लेता है। कभी-कभी मैं बस लेटकर छत को देखता रहता हूँ और पाता हूं कि अंधेरे में भी एक भाषा होती है बहुत कोमल, बहुत धीमी, लेकिन पूरी तरह सच्ची।
इन रातों ने मुझे खुद से मिलवाया है। उन्होंने मेरी रफ्तार धीमी की है, मेरे अंदर की पीड़ा को जगह दी है। जब बाहर की दुनिया मेरे लिए बहुत भारी हो जाती है, ये छोटा-सा कमरा मेरे लिए एक बंदरगाह बन जाता है जहाँ मैं अपनी सारी थकान उतार देता हूँ, जहाँ किसी को फर्क नहीं पड़ता कि मैं कैसा दिख रहा हूं या किससे जूझ रहा हूं। यहाँ सिर्फ़ मैं और मेरी साँसों का धीमा-सा उतार-चढ़ाव है।
मैंने महसूस किया है कि सुकून कोई बड़ी चीज़ नहीं होता; वो बस दो-तीन पलों का मेल है। जब दिल शांत हो, दिमाग थका हुआ न हो और कमरे की हवा थोड़ी ठंडी हो, और ये रातें मुझे वही देती हैं। एक छोटी-सी राहत, एक ठहराव, एक मौका कि मैं फिर से अपने भीतर लौट सकूँ और बिना किसी शोर के खुद को समझ सकूँ।
कभी-कभी सोचता हूँ कि शायद ये रातें ही मेरी सबसे ईमानदार रिश्तेदार हैं। दिन चमकदार है, लेकिन झूठा; रात अंधेरी है, लेकिन साफ़। मैं उन अंधेरों में खुद को ज्यादा साफ़ देख पाता हूँ। शायद इसलिए अब मुझे रातें डराती नहींं, वे मुझे अपनी तरह से संभालती हैं।
ये रातें, मैं और मेरा कमरा यही मेरी दुनिया है।छोटा-सा, खामोश, लेकिन मेरे हिस्से का सुकून यहीं छिपा है। 🖤
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
" दिसंबर की इस बेराहम, ठिठुरती खामोशी में, तुम्हारी यादों की अलाव तापते हुए।"
मेरी जान,
बाहर दिसंबर अपनी पूरी हेकड़ी के साथ खड़ा है। हवाएं ऐसे चल रही हैं जैसे किसी पुराने दुश्मन ने बदला लेने की कसम खा ली हो। शहर ने कोहरे की एक मटमैली चादर ओढ़ रखी है, ठीक वैसे ही जैसे उदासी मेरे मन को ओढ़े रहती है जब तुम पास नहीं होती। खिड़की के शीशे पर जमा हुई धुंध उस झीनी सी उम्मीद की तरह लग रही है, जिसके पार देखने की मैं हर रोज़ कोशिश करता हूँ–कि शायद तुम उस मोड़ से आती दिखाई दे जाओ।
तुम्हें पता है? ठंड महज़ तापमान का गिरना नहीं है। यह एक अवस्था है–अकेलेपन की, इंतज़ार की, और उस सिहरन की जो स्वेटर की तीन परतों को भेदकर सीधे रूह को छू जाती है। आज की सुबह सूरज भी ऐसे उगा है जैसे कोई सरकारी मुलाज़िम बेमन से दफ्तर आया हो। उसकी धूप में वो तपिश नहीं है, वो तो बस एक रस्म अदायगी है। ठीक वैसे ही, जैसे तुम्हारे बिना मेरी ज़िंदगी की तमाम खुशियाँ–महज़ रस्म अदायगी भर हैं।
मैं यहाँ अपने कमरे में बैठा हूँ। रजाई की गर्माहट भी अब एक छलावा लगने लगी है। मुझे लगता है कि सर्दी हड्डियों में नहीं, बल्कि उन खाली जगहों में घुस गई है जो तुम्हारे जाने के बाद मेरे वजूद में बन गई हैं। लोग कहते हैं कि अलाव जला लो, हीटर चला लो। उन्हें कौन समझाए कि यादों की नमी से भीगी हुई लकड़ियाँ कभी जलती नहीं, बस सुलगती रहती हैं, धुआं देती हैं। और मैं, उसी धुएं में अपनी आँखें मलते हुए तुम्हें खत लिख रहा हूँ।
यह मौसम बड़ा ज़ालिम है, प्रिये। यह हमें मजबूर करता है कि हम अपनी बांहें सिकोड़ लें, खुद को समेट लें। तुम्हारे होने का एहसास, उस अदरक वाली चाय के पहले घूंट जैसा है जो हलक से नीचे उतरते ही, मुर्दा पड़ी नसों में जान फूंक देता है। पर अफ़सोस, आज चाय भी ठंडी हो गई है और तुम... तुम तो खैर दूर हो ही।
सर्दियों की रातें लंबी नहीं होतीं, वो अनंत होती हैं। ऐसा लगता है कि समय ने अपने पैरों में भारी बूट पहन लिए हैं और वो चल नहीं रहा, बस घिसट रहा है। सन्नाटा इतना गहरा है कि मुझे अपनी धड़कनें किसी घड़ी की टिक-टिक की तरह सुनाई देती हैं, एक-एक पल का हिसाब मांगती हुई। हर धड़कन गवाही देती है कि इस कड़कड़ाती ठंड में, मुझे किसी ऊनी लिबास की नहीं, तुम्हारे लफ़्ज़ों की, तुम्हारी सांसों की आंच की ज़रूरत है।
तुम्हें याद है वो पिछली सर्दी? जब हम साथ थे। तब ठंड, ठंड नहीं लगती थी, बल्कि एक बहाना लगती थी,करीब आने का। तब ये कोहरा डरावना नहीं लगता था, बल्कि एक पर्दा लगता था जिसने दुनिया की नज़रों से हमें छिपा रखा हो। लेकिन आज? आज वही कोहरा एक दीवार है। एक ऐसी दीवार जिसे न मैं लांघ सकता हूँ, न तोड़ सकता हूँ। बस इस पार खड़ा होकर, उस पार तुम्हारी आहट महसूस करने की नाकाम कोशिश कर सकता हूँ।
मैंने सुना है कि ठंड में चीज़ें सिकुड़ जाती हैं। सड़कें सूनी हो जाती हैं, दिन छोटे हो जाते हैं। मगर अजीब विरोधाभास है न? मेरे अंदर तुम्हारा प्रेम, तुम्हारा विरह इस ठंड में सिकुड़ने की बजाय और फैलता जा रहा है। जैसे पानी बर्फ बनकर ज्यादा जगह घेर लेता है, वैसे ही तुम्हारी यादें मेरे ज़हन के हर कोने को जमा चुकी हैं। मैं एक चलता-फिरता हिमयुग बन गया हूँ, जिसके पिघलने की शर्त सिर्फ तुम्हारा स्पर्श है।
आजकल मैं बादलों को बहुत गौर से देखता हूँ। वो भी तो मेरी तरह हैं। भारी, बोझिल, और बरसने को बेताब, लेकिन ठंड ने उन्हें भी जमा दिया है। मेरी स्थिति उन पक्षियों जैसी है जो इस उम्मीद में पलायन नहीं करते कि शायद मौसम बदल जाए, शायद कोई चमत्कार हो जाए। मैं अपनी जगह पर जमा हुआ हूँ, तुम्हारी प्रतीक्षा में। यह प्रतीक्षा ही अब मेरा एकमात्र मौसम है।
तुम्हें लिखते हुए मेरी उंगलियां सुन्न हो रही हैं, लेकिन दिल... दिल अजीब तरह से जल रहा है। विरह की आग भी बड़ी विचित्र होती है, जान। ये जलाती नहीं, बस पिघलाती है, धीरे-धीरे, कतरा-कतरा। जैसे मोमबत्ती का वजूद खत्म होता है रोशनी देते हुए, वैसे ही मैं भी खर्च हो रहा हूँ तुम्हारे इंतज़ार में।
जब तुम यह खत पढ़ोगी, शायद वहाँ भी मौसम सर्द हो। शायद तुम भी अपनी हथेलियों को रगड़कर गर्म करने की कोशिश कर रही हो। बस एक गुज़ारिश है, जब हवा का कोई झोंका तुम्हारे बालों को छेड़े, तो उसे हवा मत समझना। वो मेरी भेजी हुई एक अदृश्य छुअन होगी, जो मीलों का सफर तय करके, सिर्फ यह बताने आई होगी कि यहाँ कोई है, जो अपनी हर सांस को गिरवी रखकर तुम्हारे लौटने की राह देख रहा है।
जल्दी आना। इससे पहले कि यह ठंड मुझे पूरी तरह पत्थर बना दे। इससे पहले कि कोहरा मेरी आँखों में हमेशा के लिए बस जाए। आ जाओ, कि हम मिलकर इस दिसंबर को हरा सकें।
ख़त लिखने वाला लड़का।
चाय इश्क़ और राजनीति।
कितनी ही बातें हैं जो मन के किसी शांत कोने में बैठी रह गईं। ऊपर तक आती रहीं, होंठों तक पहुंचकर वापस लौटती रहीं, जैसे अपनी ही धड़कनों के बोझ से दबकर फिर वहीं गिर पड़ी हों। हर बात का अपना वज़न होता है, अपना ताप, और अपना एक अधिकार कि उसे सुना जाए। पर सुनने वाला जब न मिले, या मिलकर भी समझने का धैर्य न रखे, तो वे बातें भीतर ही भीतर घनीभूत होती चली जाती हैं, जैसे कोई पुरानी धूप जिसे किसी बंद कमरे में कैद कर दिया गया हो।
मैं अक्सर सोचता हूं, कितने लोग होंगे जो हर दिन मुस्कुराकर निकल पड़ते हैं हाथ में जिम्मेदारियों की गठरी, दिल में चुप्पियों का पहाड़ और चेहरे पर एक बनावटी सुकून लिए। वे घर की रौशनी बनते हैं, अपने से छोटों के लिए छत बनते हैं, और बड़ों के लिए सहारा पर उनकी अपनी आत्मा कब से थककर किनारे बैठी है, इसका किसी को अंदाज़ भी नहीं होता। वे लोग किसी शिकायत के बिना चलते रहते हैं, जैसे अपने आप से यह समझौता कर चुके हों कि ‘मेरी पीड़ा का कोई उत्तरदायी नहीं है, इसलिए इसे मुझे ही ढोना है।’
कई बार लगता है कि दर्द भी कोई जीव होता है धीरे-धीरे खाने वाला, भीतर से कुतरता हुआ। पहले वह केवल थोड़ा-सा हिस्सा लेता है, बस इतना कि आप असहज हों। फिर वह अंधेरों में फैलता है, अपनी जड़ें जमाता है, और फिर एक दिन समझ आता है कि वह आपकी बहुत-सी भावनाओं को खा चुका है। हँसी की ताजगी, आंखों की चमक, और उम्मीदों की उड़ान तक। मगर तब तक भी आप चुप रहते हैं, क्योंकि जीवन ने आपको सिखा दिया होता है कि “हर बात कहनी जरूरी नहीं होती”, और “हर सच सुनने वाला भी नहीं मिलता।”
पर सच तो ये है कि उन बातों को सुना जाना चाहिए था, किसी ऐसे कान से जो समझ सके, किसी ऐसे दिल से जो बिना किसी हित की तलाश के सिर्फ साथ दे सके। हर मन की अपनी एक भाषा होती है, पर हर किसी को वह भाषा पढ़ना नहीं आता। कई लोग अपने भीतर इतने वाक्य दबा लेते हैं कि एक दिन खुद ही अपनी ही चुप्पियों में गुम हो जाते हैं। फिर भी जीते हैं सिर्फ इसलिए कि जिम्मेदारी ने उनकी पीठ पर हाथ रखकर कहा होता है, “तुम्हें रुकना नहीं है।”
और वे रुकते भी नहीं। उम्मीद की किरण जलाए रखते हैं। परिवार के लिए छोटे-छोटे सपने चुनते हैं, किसी का मन बहलाते हैं, किसी का हाथ थामते हैं। पर अपनी थकान? उसे वे किसी कुर्सी पर बैठने भी नहीं देते। अपनी पीड़ा? उसे वे हमेशा एक कमरे में बंद रखते हैं, जिस कमरे की चाबी अक्सर कोई नहीं ढूंढ पाता, यहां तक कि वे ख़ुद भी नहीं।
और सबसे तकलीफ़देह बात ये है कि ऐसे लोग जानते हैं कि उनके दर्द का कोई पुरस्कार नहीं मिलेगा, कोई तालियां नहीं बजेंगी, कोई धन्यवाद भी नहीं देगा। फिर भी वे हर दिन चलते हैं, क्योंकि उनके भीतर एक छोटा-सा हिस्सा अभी भी चाहता है कि वे जिनके लिए जी रहे हैं, वे किसी तरह सुरक्षित रहें, मुस्कुराते रहें। मानों उनके अंदर का अंधेरा औरों के जीवन में एक रौशनी बनकर पहुंच जाए, भले ही उनसे रौशनी छिनती ही क्यों न जा रही हो।
कभी-कभी मैं सोचता हूं, इतना बोझ कोई कैसे ढो लेता है? शायद इसलिए क्योंकि इंसान की सहने की क्षमता को कभी ठीक से मापा ही नहीं गया। शायद इसलिए क्योंकि कुछ लोग अपनी चुप्पियों को अपना भाग्य मान लेते हैं। या शायद इसलिए क्योंकि ज़िन्दगी के सामने खुद को बेचारा दिखाना उनकी आदत में नहीं होता।
लेकिन इन सबके बीच एक त्रासदी होती है बहुत धीमी, बहुत गहरी, और बेहद एकाकी। वो ये कि हर दिन थोड़ा-थोड़ा करके वे लोग खुद को खो देते हैं। उनकी आंखों की चमक मद्धम होती जाती है, बातों की गहराई सिमटती जाती है, और भीतर का शोर इतना तेज हो जाता है कि बाहर की दुनिया उसे सुन ही नहीं पाती। और दुनिया को उनकी थकान तब तक दिखती भी नहीं जब तक उनके भीतर की चुप्पी एक दिन पत्थर न बन जाए।
शायद किसी दिन, किसी मोड़ पर, कोई ऐसा मिलेगा जो कहेगा, “तुम्हारी बात सुनी जानी चाहिए थी।” और शायद उस दिन उनका कुछ बोझ हल्का हो जाएगा। पर उस दिन के आने तक, वे अपनी जिम्मेदारियों के साए में चलते रहेंगे। थके हुए, टूटे हुए, फिर भी अडिग, जैसे उनकी आत्मा किसी गुप्त अनुशासन से बंधी हो।
और यही है उनका सत्य है। एक ऐसा सत्य जिसे वे खुद भी पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाते, फिर भी जीते हैं, निभाते हैं, और भीतर-ही-भीतर धीरे-धीरे घुटते जाते हैं। बिना किसी शोर, बिना किसी दावा, बिना किसी शिकायत के बस इसलिए कि घर की खुशियों को बचाए रखना, शायद उनकी अपनी पीड़ा से भी ज्यादा जरूरी लगता है। 🖤
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
सच कहूं तो अब रातों में ही सुकून है। जैसे दिन का पूरा शोर, सारी उधेड़बुन, सारे चेहरे, सारे सवाल अंधेरा होते ही अचानक किनारे हो जाते हैं। रात अपने साथ एक अजीब-सी उदासी तो लाती है, लेकिन उसी के भीतर कहीं एक शांत-सा ठिकाना भी होता है। जहाँ कोई आवाज़ नहीं, कोई उम्मीद नहीं, कोई जवाब नहीं, बस मैं हूँ और मेरा कमरा है।
ये चार दीवारें मेरे लिए दुनिया बन चुकी हैं। लोग कहते हैं कि अकेलापन काटने लगता है, लेकिन मुझे लगता है कि अकेलापन भी एक कला है, इसे धीरे-धीरे सीखा जाता है और बड़े धैर्य से निभाया जाता है। मैंने इस कमरे की ख़ामोशियों को समझना सीख लिया है। यहाँ हर चीज़ अपनी जगह पर जमी रहती है। मेरी किताबें, मेरा बिस्तर, मेरी मेज़ और वो खिड़की जिससे रात की ठंडी हवा अंदर आती है और मुझे याद दिलाती है कि बाहर की दुनिया भले बड़ी है, पर मेरा सुकून सिर्फ़ यहीं है।
दिन में बहुत कुछ होता है लोग मिलते हैं, बातें होती हैं, कभी-कभी हँसी भी छूटती है। लेकिन भीतर का शोर वहीं का वहीं रहता है। रात आते ही वो शोर धीरे-धीरे कम होने लगता है, जैसे किसी ने भीतर बजती तेज़ आँधी का वॉल्यूम धीरे-धीरे कम कर दिया हो। जब पूरा शहर थककर सो जाता है, तभी मेरे अंदर की जागती हुई बेचैनियाँ थोड़ी शांत होती हैं। मुझे लगता है कि रातें मुझे समझती हैं, दिन की तरह मुझसे कोई उम्मीद नहीं रखतीं।
रातों में मैं अपने असली रूप में होता हूं जहां न मज़बूत बनने की ज़रूरत, न खुश दिखने की, न किसी को कुछ साबित करने की। ये कमरा मुझे जैसे मेरी चुप्पियों, मेरी थकान, मेरे डर, मेरी छोटी-छोटी खुशियों के साथ स्वीकार कर लेता है। कभी-कभी मैं बस लेटकर छत को देखता रहता हूँ और पाता हूं कि अंधेरे में भी एक भाषा होती है बहुत कोमल, बहुत धीमी, लेकिन पूरी तरह सच्ची।
इन रातों ने मुझे खुद से मिलवाया है। उन्होंने मेरी रफ्तार धीमी की है, मेरे अंदर की पीड़ा को जगह दी है। जब बाहर की दुनिया मेरे लिए बहुत भारी हो जाती है, ये छोटा-सा कमरा मेरे लिए एक बंदरगाह बन जाता है जहाँ मैं अपनी सारी थकान उतार देता हूँ, जहाँ किसी को फर्क नहीं पड़ता कि मैं कैसा दिख रहा हूं या किससे जूझ रहा हूं। यहाँ सिर्फ़ मैं और मेरी साँसों का धीमा-सा उतार-चढ़ाव है।
मैंने महसूस किया है कि सुकून कोई बड़ी चीज़ नहीं होता; वो बस दो-तीन पलों का मेल है। जब दिल शांत हो, दिमाग थका हुआ न हो और कमरे की हवा थोड़ी ठंडी हो, और ये रातें मुझे वही देती हैं। एक छोटी-सी राहत, एक ठहराव, एक मौका कि मैं फिर से अपने भीतर लौट सकूँ और बिना किसी शोर के खुद को समझ सकूँ।
कभी-कभी सोचता हूँ कि शायद ये रातें ही मेरी सबसे ईमानदार रिश्तेदार हैं। दिन चमकदार है, लेकिन झूठा; रात अंधेरी है, लेकिन साफ़। मैं उन अंधेरों में खुद को ज्यादा साफ़ देख पाता हूँ। शायद इसलिए अब मुझे रातें डराती नहींं, वे मुझे अपनी तरह से संभालती हैं।
ये रातें, मैं और मेरा कमरा यही मेरी दुनिया है।छोटा-सा, खामोश, लेकिन मेरे हिस्से का सुकून यहीं छिपा है। 🖤
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
कितनी अजीब बात है न…हम चाहे जितना संभाल लें, जितना बचा लें, जितना थामे रहें, एक वक्त आता है जब लोग अपनी-अपनी दिशाओं में बिखर ही जाते हैं। जैसे कोई रिश्तों का मौसम हो, जो अपने समय पर आकर बदल ही जाता है, चाहें हम उसे हथेलियों की गर्मी से रोकने की कितनी भी कोशिश क्यों न करें।
समय ने मुझे एक बात बहुत धीरे-धीरे, और कभी-कभी दर्द देते हुए सिखाई, लोगों का चले जाना हमेशा हमारी कमी नहीं होता। कई बार वह बस जीवन का प्राकृतिक क्रम होता है, बिल्कुल वैसे ही जैसे पेड़ की कुछ पत्तियाँ सिर्फ एक मौसम के लिए होती हैं, पूरे जीवन के लिए नहीं। लेकिन इंसान होने की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि हम हर पत्ती को अपनी शाख़ समझ लेते हैं और उसके झड़ने पर खुद को दोष देने लगते हैं।
मैं भी कभी यही सोचता था कि हर रिश्ता बचाए रखने की जिम्मेदारी मेरी ही है। दूसरों के बदलने, दूर होने, ठहरने या थक जाने को भी मैं अपनी गलती की तरह ढोता था। लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि रिश्तों का भार अकेले किसी एक के कंधों पर नहीं टिकता। दो लोग मिलकर ही एक रास्ता तय करते हैं। अगर किसी एक के कदम रुक जाएँ, मुड़ जाएँ या थक जाएँ तो दूसरे को दोष नहीं दिया जा सकता, बस स्वीकार करना पड़ता है कि जिंदगी की धाराएँ अलग हो रही हैं।
और सच कहूँ तो हर विदाई विनाश नहीं होती। शुरुआत में लगता है जैसे सब खत्म हो गया। जैसे दुनिया थोड़ी छोटी, थोड़ी खाली हो गई। लेकिन कुछ देर बाद में समझ आता है कि जो लोग चले गए वे शायद उतने ही समय के लिए हमारे हिस्से में थे, जितनी सीख हमें उनसे लेनी थी। किसी ने हमें सहनशील बनाया, किसी ने मजबूत, किसी ने नाजुक हिस्सों को पहचानने की ताक़त दी। हर व्यक्ति, जो कभी पास था और अब नहीं है वह हमें थोड़ा और पूरा कर गया है।
तो फिर इतना मानसिक तनाव क्यों लेना? शायद इसलिए नहीं लेना चाहिए क्योंकि पकड़ कर रखने की कोशिश में हम अपना वर्तमान खो देते हैं। क्योंकि जो लोग सच में हमारे रहने लायक होते हैं, उन्हें हम संभालते नहीं वो खुद रुक जाते हैं। वो खुद ठहर जाते हैं। रिश्तों की असल परीक्षा शब्दों, वादों, बातों में नहीं बल्कि उस चुप्पी में होती है जिसमें दूसरे का दिल खुद-ब-खुद वापस चला आता है।
मैं अब यही सीख कर जीता हूँ कि लोग आएँ तो सम्मान से, जाएँ तो शांति से। न किसी के आने पर आसमान चढ़कर उम्मीदें बाँधूँ, न किसी के जाने पर अपने भीतर के घर को जला दूँ। आखिर हम सब अपने-अपने रास्तों के यात्री हैं। कुछ लोग बस थोड़ी दूर तक साथ चलने आते हैं, और कुछ लोग जीवन की लंबी सड़क पर हमारी तरह थकते-उभरते आगे बढ़ते रहते हैं।
कभी-कभी दूरी ही वह सम्मान होती है जो किसी रिश्ते को दिया जा सकता है और स्वीकार ही वह समझदारी जो खुद को दी जा सकती है।
इसलिए मैंने धीरे-धीरे ये स्वीकार कर लिया है कि कोई भी हमेशा के लिए नहीं आता और यही सच मुझे मजबूत भी करता है और शांत भी। जब जाना ही है तो अपने मन को क्यों तकलीफ़ दें? क्यों हर पीड़ा को अपने भीतर की गलती माने? क्यों हर बिछड़ने को अपने अस्तित्व पर चोट समझें?
अब मैं बस इतना समझता हूँ कि लोग जाते हैं, पर हम बच जाते हैं। हमारी सीख, हमारी समझ, हमारी संवेदनाएँ यही हमारे साथी हैं, और यही हमें आगे बढ़ने का साहस देते हैं।
शायद इसी को जीवन कहते हैं, जहाँ साथ और विदाई दोनों को एक ही सहजता से स्वीकार करना सीखना पड़ता है।🖤
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
@Raghvendra_101
सुनो,
मुझे कुछ और नहीं चाहिए बस मुझे ये एहसास होना चाहिए तुम्हारे साथ हमेशा की सुख हो या दुख हो... तुम हर परिस्थिति में मेरे साथ हो...मुझे तुम्हारे साथ हमेशा अपनापन लगे..ऐसा लगे कि तुम हो मेरे साथ जिसके साथ में अपने सुख और दुख बिना कुछ सोचे समझे कह सकूं ❤️
#वंदना