#खेजड़ली_बलिदान_दिवस पर मां अमृता देवी तथा उन सभी वीर-वीरांगनाओं को शत-शत नमन जिन्होंने प्रकृति के संरक्षण के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। वृक्षों की रक्षा के लिए अपना जीवन न्योछावर कर देने की विश्व में ऐसी कोई अन्य मिसाल नहीं है। उनका त्याग हमारे लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा। जय जम्भेश्वर भगवान।
RSSB बोर्ड अध्यक्ष @alokrajRSSB जी JEN भर्ती विज्ञप्ति में Note लिखा होना चाहिए कि कुछ विभाग की अभ्यर्थना बाद में आने पर उन्हें संयुक्त JEN भर्ती में शामिल कर लिया जाएगा।
जिससे UDH, DLB, कृषि विभाग के रिक्त पदों को संयुक्त JEN भर्ती में शामिल किया जा सके। @BhajanlalBjp
कौन कहता है जाट और राजपूत एक साथ नहीं आ सकते, 🤣🤣 यह देखलो विगत दिनों पांचू क्षेत्र में बैंक की गाड़ी से 51 लाख की लूट में पुलिस ने फिल्हाल 2 आरोपियों विक्रमसिंह राजपूत और श्यामसुंदर जाट को पकड़ा है, बाकियों की तलाश जारी है !!!
डांगावास जैसी गंभीर घटना पर OBC राजनीति के बड़े-बड़े चेहरों की चुप्पी सिर्फ खामोशी नहीं है, यह उस चयनात्मक सामाजिक न्याय का आईना है, जिसमें न्याय का पैमाना घटना की गंभीरता से नहीं, बल्कि आरोपी और पीड़ित की जातीय पहचान से तय होता दिखाई देता है।
जब जाति से राजनीतिक लाभ मिलता हो तो “सामाजिक न्याय” के नारे बुलंद होते हैं, प्रतीक गढ़े जाते हैं, “ठाकुर का कुआँ” याद आता है और इतिहास के पन्ने खोल दिए जाते हैं। लेकिन जब सवाल अपनी सुविधानुसार असहज हो जाए, तो वही सामाजिक न्याय अचानक मौन व्रत पर चला जाता है।
यह कैसी राजनीति है? क्या सामाजिक न्याय का अर्थ यह है कि अपनी जाति के खिलाफ अन्याय हो तो आंदोलन और दूसरी जाति के खिलाफ हो तो मौन?
क्या न्याय का सिद्धांत भी अब राजनीतिक सुविधा के हिसाब से आरक्षित हो गया है?
“ठाकुर का कुआँ” सिर्फ तब याद नहीं किया जा सकता जब उससे राजनीतिक भाषण में तालियां मिलें। अगर उस प्रतीक का इस्तेमाल जाति आधारित अन्याय के खिलाफ किया जाता है, तो फिर सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या अन्याय की पहचान आरोपी की जाति देखकर बदलेगी?
अपराधी की कोई जाति नहीं होती। उसका धर्म अपराध होता है।
और पीड़ित की जाति उसके दर्द की तीव्रता तय नहीं करती।
लेकिन हमारी राजनीति ने शायद न्याय का भी एक नया फॉर्मूला खोज लिया है आरोपी अपना हो तो ‘षड्यंत्र’, दूसरे का हो तो ‘सामाजिक अन्याय’; पीड़ित अपना हो तो ‘आंदोलन’, दूसरा हो तो ‘मौन’।
डांगावास के मामले में OBC नेताओं से किसी व्यक्ति विशेष के पक्ष में खड़े होने की अपेक्षा नहीं थी। अपेक्षा इतनी भर थी कि वे न्याय की प्रक्रिया के पक्ष में खड़े होते। यदि निचली अदालत का फैसला गलत लगता है तो ऊपरी अदालत में मजबूती से अपील की मांग करते। निष्पक्ष सुनवाई की मांग करते। साक्ष्यों की स्वतंत्र समीक्षा की मांग करते। और सबसे महत्वपूर्ण यह कहते कि न दोषी बचे, न निर्दोष फंसे।
लेकिन शायद यह राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है कि न्याय की मांग करना आसान है, न्याय के सिद्धांत पर कायम रहना मुश्किल।
सच्चा सामाजिक न्याय तीन कारक पर टिका है
1. जिसके साथ अन्याय हुआ है, उसके साथ खड़े रहो।
2. जिसे गलत तरीके से फंसाया गया है, उसके लिए निष्पक्ष जांच मांगो।
3. और जो वास्तव में दोषी है, उसे उसकी पहचान नहीं, उसके अपराध के आधार पर सजा दिलाओ।
राजनीति यदि यह तय करने लगे कि किस अन्याय पर बोलना है और किस अन्याय पर चुप रहना है, तो फिर वह सामाजिक न्याय की राजनीति नहीं रह जाती; वह सिर्फ राजनीतिक चयनवाद बन जाती है।
और शायद डांगावास का सबसे बड़ा सवाल यही है
क्या सामाजिक न्याय सचमुच न्याय है, या फिर यह भी राजनीतिक मौसम देखकर बदलने वाला एक सुविधाजनक नारा भर है?
और इसी कसौटी पर डांगावास ने कई नेताओं की राजनीति को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है।