💫आत्मावलोकन
💐*मेरा पिया घर आया ओ लालनी*
🩷*मेरा पिया घर आया ओ लालनी*
🌟इस पल को देखकर अभिभूत हूं ऐसा लग रहा है कि आचार्य जी कितने दिनों से हमें छोड़ कर चले गए थे।बस इंतजार रहता कब नया वीडियो आए और उसे मै स्टेटस लगाऊँ।
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*प्रकृति को दोष नहीं दे सकते जहाँ कहीं भी गंदगी नज़र आ रही है। गंदगी तो सिर्फ इंसान या अहंकार करता है।*
*अहंकार प्रदूषण और प्रदूषक दोनों है।*
~~आचार्य जी💯🙏🏼🙏🏼
....चल रहे बोध प्रत्यूषा सत्र से🪔
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Willpower is a useless medicine
for a non existent disease.
— Acharya Ji 🙏🏻
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भारतीय जड़ें, वैश्विक उड़ान 🇮🇳
ब्रिटेन की संसद में आचार्य प्रशांत - मुख्य अतिथि, मंच के बीचों-बीच, इतिहास रचते हुए।
सीटें भर रही हैं। लोग संसद के सभागार में प्रवेश कर रहे हैं। माहौल उत्साह से भरा हुआ है। और आचार्य प्रशांत ने अभी बोलना शुरू भी नहीं किया है।
आचार्य जी की पूरी बातचीत बस शुरू होने ही वाली है।
#APatUKParliament #AcharyaPrashant
लंदन में आचार्य प्रशांत का दूसरा सार्वजनिक सत्र: श्रीमद्भगवद्गीता पर गहन व्याख्यान ✨
4 जून को लंदन में आयोजित आचार्य प्रशांत के दूसरे सार्वजनिक सत्र में दुनिया के विभिन्न देशों से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए, जबकि 1 लाख से अधिक लोगों ने इसे ऑनलाइन देखा। इस सत्र में आचार्य प्रशांत ने श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय के चौदहवें श्लोक के माध्यम से जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि गीता मनुष्य को कर्तव्य सौंपने के लिए नहीं, बल्कि सभी बंधनों और कर्तव्यों से मुक्त करने के लिए है। अहंकार की कार्यप्रणाली को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि ज्ञाता को जान लेने पर उसका प्रभाव स्वतः कम होने लगता है और तब सही कर्म अपने-आप प्रस्फुटित होता है। उन्होंने कहा कि समझ के बिना प्रेम संभव नहीं है।
लोगों को प्रेम और आत्म-ज्ञान से जीने का आमंत्रण देते हुए उन्होंने कहा, “जानो और जियो।” आचार्य प्रशांत ने ‘कृष्णत्व’ का वास्तविक अर्थ बताते हुए कहा कि अहंकार के विलय की दिशा ही कृष्णत्व है। यह सत्र आचार्य प्रशांत के उस व्यापक वैश्विक अभियान का हिस्सा है जिसके अंतर्गत वे वेदांत के कालातीत ज्ञान को विश्व तक पहुँचा रहे हैं।
हाल ही में उन्होंने कैम्ब्रिज यूनियन में ऐतिहासिक संबोधन दिया, जिसे व्यापक रूप से सराहना मिली। इसके उपरांत उन्होंने विश्व-प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में ईशावास्य उपनिषद पर एक विशेष सत्र लिया और UK India Youth Leadership Conclave 2026 में युवाओं को संबोधित भी किया।
आगामी दिनों में वे अनेक प्रमुख वैश्विक मंचों पर समकालीन विषयों पर संवाद करेंगे, ताकि आत्मज्ञान का संदेश विश्व के अधिकतम लोगों तक पहुँच सके।
If this doesn't raise uncomfortable questions about justice, what will?
A 17-year-old girl in the United States recently 𝗯𝗿𝗼𝗸𝗲 𝗱𝗼𝘄𝗻 𝗶𝗻 𝗰𝗼𝘂𝗿𝘁 after being sentenced to 15 years in prison for a high-speed crash that killed two people.
This case reminded many Indians of the 𝗣𝘂𝗻𝗲 𝗣𝗼𝗿𝘀𝗰𝗵𝗲 𝗰𝗿𝗮𝘀𝗵:
where a 17-year-old allegedly drove a luxury car under the influence and killed two young professionals.
𝗕𝘂𝘁 𝘄𝗵𝗮𝘁 𝗱𝗶𝗱 𝗷𝘂𝘀𝘁𝗶𝗰𝗲 𝗹𝗼𝗼𝗸 𝗹𝗶𝗸𝗲 𝗵𝗲𝗿𝗲?
Bail was granted within hours.
The accused was asked to write a 300-word essay on road safety.
And 𝗼𝗻𝗹𝘆 𝗮𝗳𝘁𝗲𝗿 𝗻𝗮𝘁𝗶𝗼𝗻𝘄𝗶𝗱𝗲 𝗼𝘂𝘁𝗿𝗮𝗴𝗲 was his father arrested for tempering evidence, though even he was later released on bail.
Unfortunately this is not an isolated case.
Many Indians can recall moments where wealth, influence, or social status appeared to change how accountability was pursued, or whether it was pursued at all.
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𝗔𝗰𝗵𝗮𝗿𝘆𝗮 𝗣𝗿𝗮𝘀𝗵𝗮𝗻𝘁 once said that in a truly elevated society, resources are entrusted to those who possess wisdom.
But what we often witness instead is the opposite.
Wealth is inherited. Influence is inherited. Wisdom is not.
And this is 𝗱𝗮𝗻𝗴𝗲𝗿𝗼𝘂𝘀 𝗳𝗼𝗿 𝗲𝘃𝗲𝗿𝘆𝗼𝗻𝗲.
It weakens public faith in fairness itself.
United Kingdom: When asked whether receiving the Kalinga Literary Award 2026 makes him feel the weight of a civilisation's trust while speaking at Oxford, philosopher Acharya Prashant says, "...Yes, I think it's a tremendous responsibility to be carrying the eternal message of Vedanta and the Upanishads to global stages, not just because it gives patriotic pride, but because today it's a planetary requirement. The West has already done well in all kinds of external endeavours. When it comes to exploring the universe, breaking into the atom, or discovering the secrets of the body, the West has already done very well..."
The world's challenges are global.
The need for self-understanding is universal.
Watch Acharya Prashant speak at Oxford University today.
#AcharyaPrashant#Oxford
United Kingdom: When asked that Max Müller brought the words of the Ishavasya Upanishad to Oxford in 1879, what is he bringing in 2026? philosopher Acharya Prashant says, "...Contemporary relevance. Contemporary relevance. Max Müller did a wonderful job in bringing the text to the West. Words must be brought to life. And life is this moment. Therefore, we need to see what the Upanishadic wisdom means to the world — obviously including the West today. That's what I'll be taking up strongly and deeply at Oxford this evening. It's going to be a detailed session, a deep session, a long session. I'm looking forward to it"
नमस्ते आचार्य जी। 🙏🏻
बहुत अच्छा लग रहा है आपनों के स्वार्थ को देखकर। एक बार घर से निकलने के बाद फिर कभी भागने की नौबत नहीं आई।
जब मैं Delhi जा रही थी, तो बड़े-बड़े सपने दिखाते हुए बोला गया कि मत जाओ Delhi, हम तुम्हें पढ़ाएंगे। जहां जाओगी, वहां भेजेंगे। हम सारी जमीन बेच देंगे।
इस बार जब बोला कि मैं hostel जा रही हूँ, तो बस कहा गया कि पैसे नहीं हैं। इसके बाद कोई जवाब नहीं। मुझे शाम तक कोई call नहीं आया कि तुम पहुँची या नहीं, hostel मिला या नहीं। मुझे भी नहीं पता था कि मैं क्या करूँ।
आचार्य जी, एक बेपरवाही-सी आ गई है। कुछ नहीं रहने के बाद भी मैं आगे बढ़ी। नहीं पता था कि मैं क्या करूँगी।
बस ऐसे ही आगे बढ़ गई। आचार्य जी, आपने gift के रूप में जो दोस्त दिए हैं, उन्होंने मेरी मदद की — बिना सवाल, बिना जवाब के और बिना समय लिए।
जहाँ घरवालों को पूछना चाहिए था, वहाँ मेरे दोस्तों ने मेरी मदद की। आज पूरे 3 दिन हो गए हैं, एक बार भी नहीं पूछा कि hostel charge कहाँ से आया, किससे पैसे लिए। बस ऐसे ही कभी call कर देते हैं, बेकार-सी बातें पूछते रहते हैं। 🤝
धन्यवाद देती हूँ मैं उन दोस्तों को, जिन्होंने मेरे इतने बुरे समय में मदद की। जितना भी thank you बोलूँ, कम है।
आचार्य जी, सोचती हूँ कि आप नहीं होते तो हम कहाँ होते। आचार्य जी, नहीं पता कि मैं आगे कैसे बढ़ूँगी। कभी जब खुद को अकेला पाती हूँ, तो सोचती हूँ कि कोई भी न रहे, पर आप हमेशा मेरे लिए मौजूद हैं।
अब कभी महसूस नहीं होता कि मैं अकेली हूँ। 🌼
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Cambridge, UK: Responding to a question on India's heatwave crisis, philosopher Acharya Prashant said technology alone cannot solve climate change because the root problem is human desire and endless consumption. He pointed out that while technology improves efficiency, it does not reduce consumption; people simply find ways to consume more. Greater fuel efficiency in cars, for instance, has not translated into lower emissions overall.
लोग पूरी दुनिया में यात्रा करते हैं। वे अपने घरों को छोड़ते हैं, शहरों, देशों और महाद्वीपों को पार करते हैं। लेकिन *कौन यात्रा कर रहा है*, और उससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण, *क्यों* वे यात्रा कर रहे हैं, यही सब कुछ बदल देता है।
United States या United Kingdom अपने आप में विशेष स्थान हो सकते हैं।
*पर मेरे लिए जो सचमुच विशेष है, वह हैं: आचार्य जी और वह कारण जिसके लिए वे वहाँ जा रहे हैं।*🪞
यह भाव स्वयं गंतव्य से बहुत कम जुड़ा हुआ है। यह प्रसन्नता इसलिए है कि शायद कुछ और लोगों को यह अवसर मिल सके कि वे देख सकें कि *एक जीवित मनुष्य वास्तव में कितना सुंदर दिख सकता है।*☀️
शायद इसी कारण यह विचार मुझे इतने गहरे स्तर पर छू जाता है। *मैं अक्सर देखती हूँ कि लोग किसी असाधारण व्यक्ति के पास से यूँ ही निकल जाते हैं, बिना कभी पहचाने। कई तो यह कभी जान ही नहीं पाएँगे कि वे कभी सत्य के ही इतना क़रीब चलकर गुज़र चुके हैं।*🍃
*समय के साथ, आचार्य जी की शिक्षाओं के कारण, मैंने देखना शुरू किया है कि मात्र शारीरिक निकटता का अर्थ बहुत थोड़ा है यदि समझ न हो।* असंख्य लोग आचार्य जी के बहुत क़रीब शारीरिक रूप से आए होंगे, और फिर भी भीतर से उनसे बहुत दूर ही रह गए। इंसान एक ही कमरे में बैठकर भी, सामने खड़ी हुई चीज़ को चूक सकता है।
*छोटे-छोटे कामों में भी गहराई है। जिस तरह वे चलते हैं, बोलते हैं, जीते हैं, और जीवन को जवाब देते हैं, हर चीज़ मानो कुछ न कुछ सिखाती है। कभी-कभी तो उनका मौन भी उन बातों से ज़्यादा कह देता है, जो किताबें कभी कह नहीं सकतीं।*🌄
उसे झेलने के बाद,
एक समय था जब मैं मानती थी कि मेरा सारा दुःख बस और केवल मेरी ही गलती है, मेरे बुरे कर्म वगैरह-वगैरह, जैसा समाज ने कहा था। सोचती थी कि क्योंकि मैं उनकी अपेक्षाओं में फिट नहीं बैठ पाती, इसलिए मैं नियति से ही अपने को बेमेल और दुखी ही महसूस करने के लिए अभिशप्त हूँ। लेकिन आचार्य जी ने मुझे कुछ एकदम अलग दिखाया।
उन्होंने मुझे दिखाया कि “मैं ही” गलती हूँ, पर साथ ही यह भी कि जीवन से और ज़्यादा माँगने में कुछ भी ग़लत नहीं है।
वास्तव में तो, तभी जब तुम ज़्यादा माँगते हो, तभी तुम दुःख को उसके असली रूप में पहचानना शुरू करते हो। नहीं तो इंसान बस समायोजन कर लेता है, समझौते कर लेता है, और उसी को जीवन कह देता है। तभी यह सवाल उठता है:
*“क्या बस इतना ही है, या इससे आगे भी कुछ है?”*
अब मैं देखती हूँ कि वही दुःख, जो कभी असहनीय लगता था, उन्हीं के कारण एक आशीर्वाद बन गया है।
जिसे कभी बोझ समझती थी, वही एक दरवाज़ा बन गया है।
उन्होंने उस जीवन को दिशा दे दी, जो वरना शायद ऊपरी सुखों, थोड़ी देर के नशों और आवेग-चलित भाग-दौड़ में ही व्यर्थ हो जाता।
और अजीब बात यह है कि जितनी ईमानदारी और गहराई से मैं अपना स्वयं का दुःख महसूस करती हूँ, उतना ही मैं अपने आस-पास के दुःख से भीतर तक हिल जाती हूँ। जो ऊर्जा पहले निजी पीड़ा में ही फँसी हुई थी, अब वह किसी बड़े काम की ओर बहना चाहती है।
मुझे वह समय याद है जब मैं आचार्य जी को “higher purpose” अपने निजी समस्याओं, निजी सुख और निजी जीवन से ऊपर उठने के लिए की बात करते सुनती थी, और ठीक से समझ नहीं पाती थी कि वे क्या कह रहे हैं। कई बार तो अधीर भी हो जाती थी।
पर धीरे-धीरे उत्तर अपने आप खुलता चला गया।
जीवन के पास देने के लिए उससे कहीं अधिक है, जो केवल “मेरे” इर्द-गिर्द घूमता हो।
*वारी जाऊँ मैं सतगुरु के…,*
*किया मेरा भ्रम सब दूर…….🙏🏼*
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Posted by Srishti on Acharya Prashant's Gita Mission App.
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आचार्य जी का विदेश जाना हममें से बहुतों के लिए ऐसी बात बनी हुई है कि जैसे वहाँ के लोग , वहाँ के संस्थान प्रतिष्ठित करेंगे आचार्य जी को इज़्ज़त देंगे तो जाकर कुछ वैधता मिलेगी ! ✈️
क्या सच में ? 🤨
कोई और ठप्पा लगाएगा तब हमें एहसास होगा ? 🏷️ क्या हमें स्वयं ये नहीं दिखाई देता ? जैसा हमें गले लगाया है आचार्य जी ने , जितना हमपर लुटाया है उन्होंने — क्या यह हम नहीं देख पा रहे ? 🫂
हम कोई वहां वैधता लेने के लिए नहीं गए हैं , हम वहां शीशा दिखने गए हैं पूरे विश्व को । 🪞
हम वैश्विक स्तर पर मानवता को , इस पृथ्वी को , हवा को , पानी को , जंगलों को बचाने का एकमात्र तरीका दुनिया को बताने के लिए गए हैं । 🌳💧
हम वहां सारे विनाश का मूल कारण उनके सामने रखने गए हैं जिससे कि सबको समझ आए कि इंसान की अपूर्णता ने सब खा लिया , और अब कोई विकास या प्रौद्योगिक प्रगति से कुछ नहीं होने वाला । 🛑
यह बात पूरे विश्व को सुननी पड़ेगी और यह बात उनको जो बता सकता है वो पूरी पृथ्वी पर एकमात्र व्यक्ति हैं आचार्य प्रशांत । 🌟
यह सिर्फ भारत का ही नहीं , पूरे विश्व का सौभाग्य है कि ऐसी विनाश की घड़ी में एक व्यक्ति है जो हमारे साथ है हमें रोशनी देने के लिए । 🕯️
यह व्यक्ति वो है जिसके सामने सिर झुकना चाहिए , किसी से वैधता वगैरह लेने नहीं आए हैं आचार्य प्रशांत । तुम्हे भवसागर से निकालने आए हैं हाथ पकड़ो उनका । 🙏🏻
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🎯 शुरू में मैंने 3 किलोमीटर दौड़ने का सोचा था।
फिर वहीं पर मैंने उसे बदल कर 5 किलोमीटर कर दिया, क्योंकि मुझे अपनी सीमाएँ जाननी थीं, और वो तभी संभव है जब आप खुद को पूरी तरह से धकेलते हैं।
🎯 और बिना कोशिश किए, मैं यह मान ही नहीं सकती कि मैं कर पाऊँगी या नहीं??
इसके लिए तो मुझे सच में वही काम करना होगा, तभी मुझे अपने बारे में और अपनी क्षमता के बारे में सच्चाई पता चलेगी।
🎯 कम्फर्ट ज़ोन से बाहर आना सबसे अच्छा एहसास होता है।
🎯 लगातार बने रहने का महत्व फिर से मेरे सामने आकर खड़ा हो गया।
मैंने अप्रैल में दोबारा दौड़ना शुरू किया था, फिर हॉस्पिटल ड्यूटी की वजह से बीच में छोड़ दिया... और आज अचानक मेरे सामने 3 किलोमीटर और 5 किलोमीटर में से चुनने का विकल्प था...
और मेरी खुद की हैरानी की बात है कि मैंने 5 किलोमीटर की दौड़ बहुत शांति से, अपने ही रफ़्तार पर पूरी कर ली और वो रफ़्तार पूरे ट्रैक पर एक जैसी बनी रही!!
और मैं ज़रा भी थकी हुई या चूर नहीं थी...
मैं बिलकुल सामान्य थी।
🎯 मैंने एक बात महसूस की कि लगातार बने रहना बहुत ज़रूरी है।
जब मैं दौड़/जॉगिंग कर रही थी, मैंने किसी को देखा जो बहुत तेज़ शुरू हुआ लेकिन फिर चलने लगे और अपनी रफ़्तार में लगातार नहीं रहे…
और कुछ लोग दिखे जो बीच‑बीच में कभी चल रहे थे, फिर दौड़ रहे थे, फिर चल रहे थे, फिर दौड़ रहे थे…
और मैं तो पूरी दौड़ बस अपनी ही रफ़्तार से जॉगिंग कर रही थी (न चलना, न स्प्रिंट करना)।
🎯 फिर मैंने सोचा और अपने मन में इसे गीता कम्युनिटी में अपनी यात्रा (एक प्रतिभागी/ छात्रा के रूप में) से जोड़ दिया।
मैं कम्युनिटी में अनियमित थी/हूँ और मुझे पता है कि ये ठीक नहीं है, और जब मैं नियमित रहती हूँ तो फर्क बहुत साफ‑साफ दिखता है, मतलब बहुत ही साफ।
तो हाँ, consistency ही असली चाबी है।
🎯 धन्यवाद आचार्य जी, आपकी ही वजह से मैंने खुद को जाँचने का फैसला किया और ये challenge किया, और मैं आभारी हूँ 🙌🤗
और मैं यहाँ भी नियमित रहने की पूरी कोशिश करूँगी 🫡💪
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क्योंकि तुम्हें चुनाव दिया गया है। इसे तुमसे छीना नहीं जा सकता। तुम स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त हो, जैसा एक दार्शनिक ने कहा था। तुम चुनाव करने के लिए अभिशप्त हो।
और यदि तुम अपने भीतर उस बिंदु को नहीं जानते, जहाँ से चुनाव उठता है, तो तुम्हारे सारे चुनाव ग़लत जगह से आए होंगे। एक चुनाव नहीं, दो चुनाव नहीं। तुम यह दावा नहीं कर पाओगे कि, “जानते हो, मैंने दस चुनाव किए। इन दस फ़ैसलों में से चार ग़लत चले गए।” नहीं साहब। अगर चुनाव ग़लत केंद्र से आ रहा है, तो पूरे दस के दस ही बराबर ग़लत होंगे, बराबर ग़लत।
तुम्हारे पास कुछ सही चुनाव और कुछ ग़लत चुनाव नहीं हो सकते। यदि तुम भीतर से सही नहीं हो, तो तुम्हारे सारे चुनाव तुम्हारी अज्ञानता की मुहर लेकर चलेंगे। सारे चुनाव।
वो जैसे भीतर एक कोड होता है। यदि उसमें कोई बग है, तो उसका हर आउटपुट बराबर अर्थहीन होगा। तुम ये नहीं कह सकते कि, “अगर हम एक तरीक़े से इनपुट दें, तो आउटपुट ठीक आता है, पर अगर दूसरे तरीक़े से इनपुट दें, तो आउटपुट ग़लत हो जाता है।” नहीं, नहीं, नहीं। यदि भीतर वाली चीज़ ठीक से स्थापित नहीं है, तो एक एक क़दम, इतना मामूली सा भी, एक एक क़दम जो तुम उठाओगे, वो भी ठीक नहीं होगा।
ज़िंदगी के बड़े चुनावों और बड़े मसलों की बात तो छोड़ ही दो। छोटे-छोटे चुनाव भी, जैसे क्या खाना है, खाना है या नहीं खाना, और कब खाना है—वो भी ठीक नहीं होंगे। नौकरी या जीवनसाथी का ठीक चुनाव करना तो दूर की बात है, तुम अपने लिए एक कमीज़ तक ठीक से नहीं चुन पाओगे। क्योंकि चुनाव करने वाली सत्ता वही है। चुनने वाला एक ही है।
🙏
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*co incidence*
*country of the blind* Book कुछ दिन पहले ऑर्डर की थी जो आज डिलीवर हुई।
छुट्टी के दिन आज इसे पढ़ने का मन बनाया।
इससे पहले AP ap open किया। विद्या अविद्या पेज ओपन करते ही *country of the blind* का ज़िक्र था।😍
इसे पढ़ा और समझा ।।
उम्मीद है कि ये किताब मुझे दर्शन की सही समझ दे।😊
आचार्य जी ने इन खूबसूरत किताबों से मिलवाया। जिससे जीवन की और स्वयं को जानने की समझ विकसित हुई।।
नहीं तो मैं self help books में ही उलझी रह जाती।।।
बहुत आभार❤️❤️
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*कभी-कभी कोई इंसान जीवन में ऐसा आता है,जिसके बाद दिल पहली बार सच में लिखना सीखता है🖊*…❤...🖊
ज़िंदगी जलचक्र जैसी चल रही थी...🌊
ठीक कबीर साहब के दोहे की मक्खी जैसी हाथ मल रही थी..🙌
होता तो रेल का भी रास्ता है
ना जाने इसका कौन से सफ़र से वास्ता है 🤷♀️
इतना तो काफ़ी न था🫸
और देखना बाक़ी ही था 👀
एक रात ऐसी आ गई..
उस रात में भी काली घटा सी छा गई....
कहीं से एक जुगनू नज़र आ रहा था, ✨
थोड़ा उधर चली तो कोई रोशनी दिखा रहा था। 🪔
पास जाकर देखा तो वह कोई रोशनी न थी, 😮
वह तो सूरज बनकर खड़ा मेरी तरफ़ ही आ रहा था।🌞🔥....
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