एक समय ऐसा था जब दुश्मन ने कोशिश की थी कि इस्लामी व्यवस्था की सामाजिक लोकप्रियता को कमज़ोर कर दे; लेकिन आज समाज के विभिन्न वर्ग अपने न्यायसंगत और सही रुख़ पर दृढ़ता से क़ायम हैं और विशेष रूप से हॉर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण बनाए रखने के अपने रुख़ पर अडिग हैं।
पिछले सात महीनों से हमारे हमवतनों ने पूरे देश के चौराहों और सड़कों को अपनी ज़िम्मेदाराना और उत्साहपूर्ण उपस्थिति से सजा रखा है, ताकि इस्लामी मुजाहिदीन का मनोबल ऊँचा रहे और दुश्मन भय और आतंक में मुब्तला हो।
आज कुछ लोग हमें चौथा सुपर पावर कहते हैं। हालांकि वे यह बात सांसारिक गणनाओं के आधार पर कहते हैं; जबकि इलाही मानदंड के अनुसार, जो देश स्वयं को पैग़म्बर के पाकीज़ा परिवार से जुड़ा हुआ मानता हो और जिसके लोग सत्य की स्थापना में किसी से न डरते हों, वह दुनिया की पहली शक्ति है।
जिन दिनों में दुश्मन हमें वापस ले जाना चाहता है, वे दिन पिछड़ेपन, अपमान और निर्भरता से भरे हुए थे। इसके विपरीत, आज के दिन प्रगति, सम्मान, स्वतंत्रता और इस्लामी जगत बल्कि पूरी दुनिया में ईरान की प्रतिष्ठा और गौरव के दिन हैं।
आज ऐसे दिन आ गए हैं कि वो आक्रांता और वर्चस्ववादी शक्तियाँ ख़ुद, यानी सिर्फ़ उनके घटक नहीं, इस्लामी मुजाहेदीन के हमलों के सामने शरण तलाशती फिर रही हैं और युद्ध समाप्त करने के लिए गुहार लगा रही हैं।
उस थोपी गई जंग की आग से, जिसे जनता-विरोधी बास सरकार ने भड़काया था, इस्लामी व्यवस्था पहले से अधिक मज़बूत होकर उभरी; उसकी आवाज़ पहले से अधिक बुलंद हुई और उसकी उड़ान पहले से अधिक ऊँची हुई। बाद में भी दुश्मन के पैदा किए गए संकटों में भी यही इस व्यवस्था की स्थायी ख़ासियत रही।
इस्लामी क्रांति उन शक्तियों के लिए अत्यंत अप्रिय थी, जिनकी निगाहें इस धरती के संसाधनों पर टिकी हुई थीं और जो वर्षों से इस पर अपना क़ब्ज़ा बनाए रखने के लिए यहाँ की जनता पर तरह-तरह के ज़ुल्म करती आई थीं।
इस्लामी इंक़ेलाब से पहले के दिन अँधेरे और घुटन भरे हुए थे। साम्राज्यवादी शक्तियों के प्रतिनिधि ईरान के शाह को आदेश देते थे और वह उन्हें अक्षरशः लागू करता था। यहाँ तक कि इमाम ख़ुमैनी की अगुवाई में ईरान की महान जनता की क्रांति ने इस पूरे तंत्र को तहस-नहस कर दिया।
मेहर महीने के शुरुके दिन ईरान पर थोपी गई पहली जंग में नेशन के आठ वर्षीय प्रतिरोध की याद ताज़ा करते हैं। उन दिनों इस्लामी क्रांति के साथ एकजुटता की भावना पैदा हुई, जो क्रांति के उगते सूरज की चमक से प्रेरित थी। इसके प्रभाव से प्राचीन और नए साम्राज्यवाद की जमी हुई बर्फ़ पिघलने लगी।
बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम
“और बेशक हमने मूसा को अपनी निशानियों के साथ भेजा था (और हुक्म दिया था) कि अपनी क़ौम को (कुफ़्र के) अँधेरों से निकालकर (ईमान की) रोशनी में लाएं और उन्हें अल्लाह के मख़सूस दिनों की याद दिलाएं।”
(सूरए इब्राहीम, आयत 5)
इस समय पूरे इस्लामी ईरान में विभिन्न प्रकार की तैयारियाँ, विशेष रूप से सशस्त्र कार्रवाई की तैयारियाँ जारी हैं, ताकि ऐसा रणक्षेत्र तैयार किया जा सके जो ईरानी जनता को सम्मान और गौरव दिलाए तथा दुश्मन को अपमान और शर्मिंदगी का सामना करना पड़े।
इन दिनों दुश्मन, हमारे बहादुर ईरानी मुजाहिदीन और होर्मुज़ स्ट्रेट के रक्षकों से मिली दर्दनाक चोट के कारण अरब सागर से आगे बढ़ने का साहस नहीं कर पा रहे हैं... और वह समय भी दूर नहीं, जब अरब सागर को भी उनके अस्तित्व से पाक कर दिया जाएगा।
दुआ है कि हमारे आक़ा की (अल्लाह उन्हें जल्द ज़ाहिर करे) बरकत भरी दुआओं के सदक़े, ज्ञान और अदब तथा प्रगति की सबसे ऊँची चोटियों को सर करने में वे दिन-ब-दिन और अधिक सफलताएँ प्राप्त करें।
अल्लाह का सलाम व रहमत और बरकत उन शहीद शिक्षकों व छात्र-छात्राओं पर हो, जिन्होंने तीसरी थोपी गई जंग में अपने प्राण न्योछावर किए; और विशेष रूप से हमारे शहीद हकीम रहबर और महान मार्गदर्शक पर, जिनका देश में ज्ञान की उल्लेखनीय और तीव्र प्रगति में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है।
आज जब साम्राज्यवादी व्यवस्था विशेषकर अमेरिका की अपराधी सरकार और जाली ज़ायोनी शासन की बर्बरता चरम पर है, ज्ञान की वह शक्ति जो तक़वा और नैतिकता से जुड़ी हो, एक फ़ौलादी ढाल और धारदार तलवार के समान है; ऐसी शक्ति जो मानवता के विरुद्ध आक्रमण करने वालों को रोकने की क्षमता रखती है।
ज्ञान के इन केंद्रों में सही ढंग से सोचने तथा नवीनता और सृजनशीलता के मार्ग तलाशने का अभ्यास करें। साथ ही, अपनी राष्ट्रीय पहचान की जड़ों, अपने सम्मान और गौरव, सांस्कृतिक स्वाधीनता, मातृभाषा और इस्लामी व्यवस्था के पवित्र ध्वज के सदैव रक्षक बने रहें।
आज छात्र-छात्राओं की ज़िम्मेदारी है कि अज्ञानता और अंधकार के पर्दों को हटाने का प्रयास करें, ताकि ज्ञान की सीमाओं का विस्तार करते हुए और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने वाले ज्ञान की सर्वोच्च चोटियों को सर करते हुए, इस्लामी ईरान की प्रतिष्ठा के लिए अपना तारीख़ी फ़र्ज़ निभाएं।