यह आंदोलन पूरे देश में फैल रहा है 🔥
अभिजीत दिपके: पहला विरोध प्रदर्शन बहुत सफल रहा। कम से कम 6,000 से 7,000 लोग आए।
रिपोर्टर: आगे क्या कदम उठाए जाएंगे?
अभिजीत दिपके 🎯: यह आंदोलन अब पूरे देश में फैलेगा। जब तक धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते, हम पीछे नहीं हटेंगे।
जो पीड़ित वो पीडीए।
आज के भाजपा शासनकाल में हर तरह से उपेक्षित-उत्पीड़ित आशा वर्कर बहनों की माँगों के समर्थन में हम पूरी निष्ठा के साथ हैं। उनकी आर्थिक सुरक्षा व सामाजिक सुरक्षा से भाजपा सरकार पीछे क्यों हट रही है? जब भाजपा के झूठे प्रचार और निर्जीव पर अपव्यय के लिए सरकार के पास धन लूटाने को है तो आशा वर्कर्स के साथ भेदभाव का आधार क्या केवल यही है कि वो शोषित, वंचित, निर्धन पृष्ठभूमि से आती हैं या वो पीडीए में शामिल आधी आबादी मतलब महिलाएं हैं, क्या उन्हें सम्मान से जीने का हक़ नहीं?
#Protest
#AashaWorkers
#ashaworkersprotest
भाजपा राज में विशेष कृपा प्राप्त लोगों ने नराई, लखनऊ में स्कूल की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करके स्कूल बंद करा दिया है।
बच्चों की पुकार सुननेवाला कहीं कोई ‘संवेदनशील-सहृदय’ है?
घोर निंदनीय!
समस्त विश्व में भगवान राम के उपासकों के लिए ये एक बेहद संवेदनशील समाचार है कि ‘राम मंदिर’ के चढ़ावे की करोड़ों की रकम गायब पायी गई है।
ये मंदिर ट्रस्ट के लिए अत्यंत शर्मनाक स्थिति है। कोई भी सफ़ाई देने के लिए सामने नहीं आना चाहता है।
न्यायालय से स्वतः संज्ञान लेने की माँग है क्योंकि इसका सीधा संबंध वैश्विक स्तर पर समस्त सनातनी समाज की प्रभु राम में गहरी आस्था से जुड़ा है।
सरकार की चुप्पी संदिग्ध है।
जिस युग में पुलिस ही अपराधी बन जाए वही कलयुग है।
माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भाजपा सरकार के समय में हो रही पुलिसिया ज़्यादतियों को देखकर, उप्र की पुलिस व्यवस्था पर जो सख़्त टिप्पणी की है उसे सुनकर तो नैतिक रूप से भाजपा सरकार को शासन करने का कोई अधिकार नहीं बचता है परंतु नैतिकता, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठता, ईमानदारी व इंसाफ़ जैसे शब्द भाजपा के शब्दकोश में हैं ही नहीं।
भाजपा राज में पुलिस भाजपा के भ्रष्टाचार की ‘भ्रष्टपुतली’ बनकर, संविधान के स्थान पर अवैधानिक-आपराधिक तरीक़े अपनाकर सत्ता के सियासी फ़ायदे के लिए क़ानून अपने हाथ में ले रही है। भ्रष्ट पुलिसवाले दो बातें याद रखें :
1. भाजपा किसी की सगी नहीं है।
2. संविधान सदैव रहेगा, ये भाजपाई तो अंतिम दौर में हैं। भाजपाई निश्चित रूप से जा रहे हैं और फिर कभी लौटकर आएंगे भी नहीं।
न्याय कहे आज का, नहीं चाहिए भाजपा!
#असफल_मुख्यमंत्री_उप्र
#पक्षपाती_मुख्यमंत्री_उप्र
‘गुरूरमंद हुक्मरानों’ तक पहुँचे ये आवाज़
सुनो दरवाज़े पर खटखटा रहा है ‘बदलाव’
दरारें पड़ गईं क़िलों में, दरक रही बुनियाद
अब नौजवानों ने भी कर दिया है इंक़लाब!
ज़हरीली साज़िशों से तब तक न निजात मिल पाएगी जब तक केवल शाख पर उँगली उठाई जाएगी और सिर्फ़ वो शाख हटाई जाएगी, असली आज़ादी, तरक़्क़ी और इंसाफ़ तब मिलेगा जब इस गुनाह का असली तना और ज़मीन के अंदर गहरी छुपी दीमकी जड़ उखाड़ी जाएगी।
एक देश-एक आवाज़ मतलब इंक़लाब!
#BJP_बनाम_CJP
CM यानी करप्ट माउथ
• ANI पर गाली।
• सदन में नेता प्रतिपक्ष जैसे वयोवृद्ध को अभद्र शब्दों से संबोधित किया।
• गुरुजनों से अभद्र वाचिक व्यवहार
• मंच से गाली।
• और अब भाषण का यह निम्न स्तर।
आख़िर क्यों?
विज्ञान कहता है की किशोरावस्था में किया गया “वनस्पति” का अत्यधिक सेवन व्यक्ति के बोलने और समझने की छमता को प्रभावित करता है। वही मनोविज्ञान कहता है कि बचपन और किशोरावस्था के अनुभव व्यक्ति की भाषा, व्यवहार और व्यक्तित्व पर गहरी छाप छोड़ते हैं। वही संस्कार आगे चलकर सार्वजनिक जीवन में भी झलकते हैं।
CM के “करप्ट माउथ” होने की वजह शायद यही है।
जिन्हें CM का इतिहास नहीं पता, उनके लिए यह दबाई गई जानकारी है:
• मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 1994 के आसपास अजय सिंह बिष्ट अपने पारिवारिक परिवहन व्यवसाय में सहयोग कर रहे थे।
• उस समय उनके पास तीन बसें और एक ट्रक था।
• संभवतः उन्होंने यह भाषिक अभद्रता उसी दौर में, डग्गामार वाहन चलवाते समय सीखी।
• अजय सिंह बिष्ट के पिता श्री आनंद सिंह बिष्ट और गोरखनाथ मठ के पूर्व महंत श्री अवैद्यनाथ जी यानी श्री कृपाल सिंह बिष्ट जी, रिश्ते में भाई बताए जाते हैं।
• कहा जाता है कि बाद में उनके चाचा ने ही उन्हें मठ में बुलाया।
• महंत श्री अवैद्यनाथ जी ने अपने भतीजे अजय सिंह बिष्ट को कुछ ही वर्षों में मठ का उत्तराधिकारी बना दिया।
सवाल उठता है: उत्तराधिकारी के रूप में उन्हीं को क्यों चुना गया? क्या यह केवल योग्यता का निर्णय था या रिश्तेदारी का भी प्रभाव था? पहले मठ की गद्दी मिली, फिर कुछ ही वर्षों में लोकसभा की सीट भी।
स्पष्ट किया जाए कि मठ में महंत चुनने के लिए क्या कोई औपचारिक चुनाव प्रक्रिया हुई थी? डग्गामार वाहन चलवाने वाला व्यक्ति क्या 4 वर्षों में ही इतना योग्य हो गया? यदि नहीं, तो क्या इसे ‘पक्षपाती परिवारवाद’ नहीं कहा जाना चाहिए?
और अंत में- पद और परिधान रिश्तों और समय की मदद से मिल सकते हैं, पर भाषा और व्यवहार नहीं।
#असफल_मुख्यमंत्री
#CM_CorruptMouth
सुना है कि मुख्यमंत्री जी के अति प्रिय अधिकारी के अनुपयुक्त प्रशासनिक व्यवहार को माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दंडित किया गया है। और भविष्य में उनको किसी दायित्व दिये जाने के लिए उनकी योग्यता पर शंका प्रकट की गयी है और उनके दुर्व्यवहार का मामला ‘कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग’ को भेज दिया गया है, साथ ही कैबिनेट की अपॉइंटमेंट कमेटी को भी।
दरअसल वो तो खट्टे फल हैं, दोष तो उस वृक्ष की जड़ में है जिसके साये में वो कार्यरत हैं। लोक सेवक जब अपने को लोक शासक समझने लगता है तो उसका अहंकार न्यायालय तक की अवमानना करने लगता है।
वैसे क्यों न ऐसा किया जाए कि जिस तरह टीचर्स को अपनी योग्यता पुनः साबित करने के लिए फिर से परीक्षा पास करने के लिए कहा जा रहा है, वैसा ही नियम प्रशासनिक अधिकारियों पर भी लागू हो, जिससे समय-समय पर उनकी योग्यता की जाँच हो सके।
हम शिक्षकों से पूछ रहे हैं : हमने कुछ गलत कहा क्या?
लत से गलत की ओर…
वनस्पति विवेक छीन लेती है और निर्दोष लोगों की हत्याओं का ख़ौफ़ रातों की नींद। नहीं तो पूरे होश में इतने ऊँचे पद पर बैठकर इतना निकृष्ट बयान कोई नहीं देता है। कुछ लोग अपनी असफलता के लिए दूसरों को दोषी ठहराते हैं। ये हार की हताशा बोल रही है क्योंकि क़ुदरत का बुलडोज़र अब घूम गया है।